मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

इंटरनेट के द्वारा वैश्विक स्तर पर सामाजिक परिवर्तन का जज्बा उभरा है


- प्रदीप कुमार सिंह,
शैक्षिक एवं वैश्विक चिन्तक
            आज हम इंटरनेट तथा सैटेलाइट जैसे आधुनिक संचार माध्यमों से लैस हैं। संचार तकनीक ने वैश्विक समाज के गठन में अहम भूमिका अदा की है। हम समझते हैं कि मानव इतिहास में यह एक अहम घटना है। हम एक बेहद दिलचस्प युग में जी रहे हैं। आओ, हम सब मिलकर एक अच्छे मकसद के लिए कदम बढ़ाएं। पिछले कुछ साल से विभिन्न देशों की दर्दनाक घटनाएं इंटरनेट के जरिये दुनिया के सामने आ रही हैं। इनसे एक बात तो तय हो गई कि चाहे हम दुनिया के किसी भी कोने में हों, हम सब एक ही समुदाय का हिस्सा हैं। इंटरनेट ने मानव समुदाय के बीच मौजूद अदृश्य बंधनों को खोल दिया है। दरअसल हम सबके बीच धर्म, नस्ल और राष्ट्र से बढ़कर आगे भी कोई वैश्विक रिश्ता है और वह रिश्ता नैतिक भावना पर आधारित है। यह नैतिक भावना न केवल हमें दूसरों का दर्द समझने, बल्कि उसे दूर करने की भी प्रेरणा देती है। यह भावना हमें प्रेरित करती है कि अगर दुनिया के किसी कोने में अत्याचार और जुल्म हो रहा है, तो हम सब उसके खिलाफ खड़े हों और जरूरतमंदों की मदद करें।

सोमवार, 24 अप्रैल 2017

जाने क्यूँ मुझको मेरी माँ मेरी बेटी लगती है !






उषा लाल 
                            जाने क्यूँ मुझको मेरी माँ 
                           मेरी बेटी लगती है !
घड़ी घड़ी जिज्ञासित हो कर
बहुत प्रश्न वह करती है 
भर कौतूहल आँखों में
हर नई वस्तु को तकती है !
बात बात पर घूम घूम फिर
वही सवाल उठाती है
उत्तर पा कर , याददाश्त को
वह दोषी ठहराती है !

घूंघट वाली औरत और जींस वाली औरत







आँखें फाड़ – फाड़ कर देखती है
घूंघट  वाली औरत
पड़ोस में आकर बसी
जींस पहनने वाली औरत को
याद आ जाते हैं
वो दो गज लम्बे दुप्पटे
जिन्हें भी तहा  कर रख आई थी
माँ की संदूक में
की अब बस साड़ी ही पहननी है
यही ससुराल का ड्रेस कोड है
इसके इतर कुछ पहनने पर
लग जायेंगे
उसके संस्कार पर प्रश्न चिन्ह ?
नाप दिए जायेंगे बाप – दादा
पर वो , कैसे पहन पाती है जींस
फिर अपने ही प्रश्न को
पलट देती है , तवे पर रोटी के साथ
फुर्सत में सोंचेगी
पहले सबको खाना तो खिला दे

रविवार, 23 अप्रैल 2017

अर्थ डे और कविता









 अर्थ डे  और मैं कविता लिखने की नाकामयाब कोशिश में लगी हूँ  | मीडिया पर धरती को बचाने  का शोर है  | मैं मन की धरती को बचाने में प्रयासरत | धरती पर पानी की कमी बढती जा रही है और मन में आद्रता की | सूख रही है धरती और सूख रही है कविता | हाँ  कविता ! जो  जीवन के प्रात: काल में उगते सूर्य के साथ लबालब भरे मन के सरोवर पर किसी कमल के फूल सी खिल उठती  है | कितनी कोमल , कितनी मनोहर |  भ्रमर  गीत गाती सी खिलाती है पत्ती – पत्ती माँ , बहन व् अन्य रिश्तों को सितार के तार सा  छेड़ते हुए आ जाती है प्रेम के पायदान पर और  फैलाने  लगती है सुगंध | पर जीवन सिर्फ प्रेम और वसंत ही तो नहीं | की जब बढ़ चलता है उम्र का सूर्य , खिल जाती है धूप तो नज़र आने लगती हैं जीवन की  विद्रूपताएं |सूख ही जाता है थोडा सा सरोवर , तभी ...

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

लेकिन वो बात कहाँ - कहाँ तक सच है ?



दो लोगों की तुलना नहीं हो सकती | जो रास्ता आपके लिए सही है , हो सकता है दूसरे के लिए गलत हो |हर किसी की अपनी विशेष यात्रा है |हम सब की यात्रा न सही है न गलत न अच्छी है न बुरी .... बस अलग है - डैनियल कोपके 
                           तुलना का इतिहास बहुत पुराना है | शायद जब से प्रकृति में दूसरा मानव बना तब से तुलना करना शुरू हो गया होगा | ये तुलना भले ही सही  हो या गलत पर जीवन के हर क्षेत्र में होती है | तुलना
करने से किसको क्या मिलता है , पता नहीं पर तुलना रंग -  रूप में होती है , आकार प्रकार में होती है | सफलता असफलता में में होती है |हालांकि तुलना करना न्याय संगत  नहीं है | क्योंकि दो लोगों की परिस्तिथियाँ व् सोंच , दृष्टिकोण अलग - अलग हो सकता है | उनके संसाधन भी अलग - अलग हो सकते हैं |  उस पर भी अगर बात दो पीढ़ियों की तुलना की हो , वो भी उनकी सफलता की  तो ?

मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

रुतबा





रामलाल एक दफ्तर में चपरासी था | उसके   दो बेटे थे ।यही उसका सब कुछ थे | अर्धांगिनी तो बीमारी और गरीबी के चलते कब का उसका साथ छोड़ दूसरी दुनिया में चली गयी थी | अब वही माँ और पिता दोनों की भूमिका में था | दो बच्चों की जिम्मेदारी गरीबी और मामूली नौकरी ने उसे चिडचिडा बना दिया था | चाहते  न चाहते हुए भी कभी दफतर में , कभी पैसों की कमी के चलते पंसारी की दुकान वाले लाला जी तो कभी बच्चों की परवरिश के कारण पड़ोस की चाची का , वह सब का रुतबा मानने को विवश था |
बड़ा ही विरोधाभास था की उसकों दूसरों द्वारा रुतबा दिखाए जाने से नफ़रत थी | परन्तु यही एक तमन्ना भी थी जो उसके दिल में पल रही थी | गरीब रामलाल यही सोंचता था कि वह अपने दोनों बेटों को आईएएस अफसर बनाएगा । फिर उसके बच्चों का खूब रुतबा होगा | वह भी उनके माध्यम से यही रुतबा सब पर दिखाएगा |  उसने पूरी मेहनत से अपने बच्चों की पढाई का प्रबंध किया ।साथ ही वो बच्चों के मन में रुतबा दिखाने की मंशा भी भरने लगा |

बदलाव किस हद तक ?






रहिमन प्रिति सराहिए, मिले होत रंग दून । 
ज्यों जरदी हरदी तजै, तजै सफेदी चून

                                               प्रेम का एक अलग ही रंग होता है , जहाँ दोनों एक दूसरे के लिए अपना रंग त्याग देते हैं |तब एक  रंग बनता है , प्रेम का रंग | भले ही प्रेम के एकात्म भाव की फिलोसिफी में इसे सर्व श्रेष्ठ पायदान पर रखा गया हो परन्तु किसी रिश्ते में एक दूसरे के हिसाब से बदलाव की हद क्या हो | यह जरूर चर्चा का विषय है |  अक्सर किसी नव विवाहित जोड़े से मिलने के बाद हमारे मुँह से अनायास ही ये निकल पड़ता है ," अरे फलाने भैये तो ये सब्जी खाते ही नहीं थे , भाभी ने बदल दिया " या अमुक दीदी ये रंग तो कभी पहनती ही नहीं थी जीजाजी ने बदल दिया | " इसके बाद वातावरण नव विवाहित जोड़े की शर्मीली सी मुस्कान के साथ खुशनुमा हो जाता है | रिश्ता पति - पत्नी का हो, सास - बहू का या कोई और हम जिस भी रिश्ते को चलाना चाहते है उसमें पूरा प्रयास करते हैं की दूसरे के हिसाब से जितना