सोमवार, 24 जुलाई 2017

सुनो सखी , विश्राम कहाँ है ?

सुनो सखी !विश्राम कहाँ है ?

महबूब के मेंहदी की रस्म है

रोऊँगा नही मै------------------- आज मेरी महबूब के मेंहदी की रस्म है। भीच लुंगा होंठ को दाँतो से कुचलकर, एै खुदा चढ़े-

एंटन चेखव की अनूदित रूसी कहानी कहानी निंदक - अनुवाद : सुशांत सुप्रिय

 
                                                      



               सुलेख के शिक्षक सर्गेई कैपितोनिच अख़िनेयेव की बेटी नताल्या की शादी इतिहास और भूगोल के शिक्षक इवान पेत्रोविच लोशादिनिख़ के साथ हो रही थी । शादी की दावत बेहद कामयाब थी । सारे मेहमान बैठक में नाच-गा रहे थे । इस अवसर के लिए क्लब से किराए पर बैरों की व्यवस्था की गई थी । वे काले कोट और मैली सफ़ेद टाई पहने पागलों की तरह इधर-उधर आ-जा रहे थे । हवा में मिली-जुली आवाज़ों का शोर था । बाहर खड़े लोग खिड़कियों में से भीतर झाँक रहे थे । दरअसल वे समाज के निम्न-वर्ग के लोग थे जिन्हें विवाह-समारोह में शामिल होने की इजाज़त नहीं थी ।

गरीबों को मुफ्त में दवा बांटना मेरा मिशन है - ओमकार नाथ शर्मा





संकलन - प्रदीप कुमार सिंह 

            मैं उदयपुर, राजस्थान का रहने वाला हूं। मैंने नोएडा के कैलाश अस्पताल में बारह-तेरह साल नौकरी की है। मैं गरीबों को मुफ्त में दवाएं बांटने के मिशन से कैसे जुडा, इसकी एक कहानी है। वर्ष 2008 में दिल्ली के लक्ष्मीनगर में जब मेट्रो का काम चल रहा था, तब वहां एक दुर्घटना हुई, जिसमें कुछ लोग मरे, तो कुछ घायल हुए। ये सभी गरीब लोग थे। मैं तब संयोग से लक्ष्मीनगर से गुजर रहा था और बस में बैठा था। दुर्घटनास्थल पर मैं उतर गया। चूंकि अस्पताल में काम करने का मेरा अनुभव था, इसलिए मैं भी घायलों के साथ तेगबहादुर मेडिकल काॅलेज अस्पताल में चला गया। वहां मीडिया की भारी भीड़ थी, इसलिए मरीजों के प्रति डाॅक्टरों का रवैया रक्षात्मक था। लेकिन मैंने देखा कि गंभीर रूप से घायल मरीजों को भी डाॅक्टर दवा न होने की बात कहकर लौटा रहे हंै। मैं यह देखकर स्तब्ध रह गया। मेरे मन में सवाल उठने लगे कि दवा के अभाव में होने वाली मौतों को कैसे रोका जाए। छह-सात दिन मंथन करने के बाद मैंने फैसला कर लिया कि जहां तक संभव होगा, मैं गरीबों को दवाएं बाटूंगा और दवाओं के अभाव में उन्हें मरने नहीं दूंगा।

रविवार, 23 जुलाई 2017

#NaturalSelfi ~ सुंदरता की दुकान या अवसाद का सामान


                                                  

#NaturalSelfi,ये मात्र एक शब्द नहीं एक अभियान हैं | पिछले कुछ दिनों से इस हैशटैग से महिलाएं  फेसबुक पर अपनी तसवीर पोस्ट कर रहीं  हैं| यह मुहीम बाजारवाद के खिलाफ है |  इस मुहिम की शुरुआत की है  गीता यथार्थ यादव ने |   बाजार जिस तरह सौंदर्यबोध को प्रचारित कर रहा है और मेकअप प्रोडक्ट बेचे जा रहे हैं, उसके खिलाफ यह महिलाओं को ऐलान है कि वे बिना मेकअप के भी सुंदर हैं | 
                           सुन्दरता के इस चक्रव्यू में महिलाओं को फंसाने का काम सदियों से चला आ रहा है |आज भी ये शोध का विषय है की क्लियोपेट्रा  किससे  नहाती थी | आज भी सांवली लड़की पैदा हिते ही माता - पिता के चेहरे उतर जाते हैं की उसका ब्याह कैसे करेंगे | योग्य वर कैसे मिलेगा ? बचपन से ही उसका आत्मसम्मान बुरी तरह कुचल दिया जाता है | और शुरू होता है लड़की को स्त्री बनाने की साजिश | उसमें मुख्य भूमिका अदा करता है उसका सौन्दर्य |  यह माना जाता रहा है की सुन्दरता स्त्री के अन्य गुणों के ऊपर है या कम से कम साथ तो है ही | दुर्भाग्य है की स्त्री शिक्षा व् जागरूकता के साथ - साथ  एक नया कांसेप्ट आया ब्यूटी विद ब्रेन का | बाजारवाद  ने इसको हवा दे दी | मतलब स्त्री ब्रेनी है तो भी  उसके ऊपर ख़ूबसूरती बनाये रखने का दवाब भी है | ये दवाब है खुद को नकारने का , बाज़ार के मानकों में फिट होने का , ऐसी स्किन , ऐसे हेयर और ऐसी फिगर .... इन सब  के बीच अपना करियर , अपनी प्रतिभा अपना हुनर बचाए रखने की जद्दोजहद | 
                                         एक तरफ हम सुखी जीवन जीने के लिए self love को प्रचारित करते हैं | वहीँ मेकअप कम्पनियां स्त्री को खुद को कमतर समझने और हीन भावना भरने की जुगत में लगी  रहती हैं |  ये आई ब्रो के बाल तोड़ने से पहले आत्मविश्वास तोड़ने का काम करती हैं | ये ख़ुशी की बात हैं की आज महिलाएं खुद आगे आई हैं | उन्होंने न सिर्फ इस जाल को समझा है बल्कि उसे नकारना भी शुरू किया है | 

                                                                    बहुत पहले  इसी विषय पर कविता लिखी थी ... " सुन्दरता की दु कान या अवसाद का सामान " | आज ये #NaturalSelfi अभियान उसी दर्द का मुंहतोड़ जवाब है | 


सुधरने का एक मौका तो मिलना ही चाहिए - मार्लन पीटरसन, सामाजिक कार्यकर्ता


        संकलन: प्रदीप कुमार सिंह  

    कैरेबियाई सागर का एक छोटा सा देश है त्रिनिदाद और टोबैगो। द्वीपों पर बसे इस मुल्क को 1962 में आजादी मिली। मार्लन के माता-पिता इसी मुल्क के मूल निवासी थे। उन दिनों देश की माली हालत अच्छी नहीं थी। परिवार गरीब था। लिहाजा काम की तलाश में वे अमेरिका चले गए।

            मार्लन का जन्म बर्कले में हुआ। तीन भाई-बहनों में वह सबसे छोटे थे। अश्वेत होने की वजह से परिवार को अमेरिकी समाज में ढलने में काफी मुश्किलें झेलनी पड़ीं। सांस्कृतिक और सामाजिक दुश्वारियों के बीच जिंदगी की जद्दोजहद जारी रही। शुरूआत में मार्लन का पढ़ाई में खूब मन लगता था, पर बाद में मन उचटने लगा। उनकी दोस्ती कुछ शरारती लड़कों से हो गई। माता-पिता को भनक भी नहीं लग पाई कि कब बेटा गलत रास्ते चल पड़ा?

समाज के हित की भावना ही हो लेखन का उद्देश्य






 किरण सिंह 
जिन भावों में हित की भावना समाहित हो वही साहित्य है तथा उन भावों को शब्दों में पिरोकर प्रस्तुत करने वाला ही साहित्यकार कहलाता है  |

ऐसे में साहित्यकारों पर सामाजिक हितों की बहुत बड़ी जिम्मेदारी पड़ जाती है जिसका निर्वहन उन्हें पूरी निष्ठा व इमानदारी से करना होगा ! साथ ही सरकार को भी नवोदित साहित्यकारों के उत्थान के लिए भी कदम उठाना होगा! पत्र पत्रिकाओं अखबारों आदि ने तो साहित्यकारों की कृतियों को समाज के सम्मुख रखते ही आये हैं साथ ही सोशल मीडिया ने भी इस क्षेत्र में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जिसके परिणाम स्वरूप आज हिन्दी साहित्य जगत में रचनाकारों की बाढ़ सी आ गई है  ( खास तौर से महिलाओं की ) जो निश्चित ही साहित्यक क्रांति है! 

अगर सावन न आइ (भोजपुरी )


रंगनाथ द्विवेदी
हे!सखी पियरा जाई हमरे उमरियाँ क धान------- अगर सावन न आई। रहि-रहि के हुक उठे छतियाँ मे दुनौव, लागत हऊ निकल जाई बिरहा में प्रान------- अगर सावन न आई।
हे!सखी पियरा जाई हमरे उमरियाँ क धान------ अगर सावन न आई।

शनिवार, 22 जुलाई 2017

नाबालिग रेप - पीडिता को मिले गर्भपात कराने का अधिकार



दीपेन्द्र कपूर 
आजकल मीडिया, न्यूज़ पेपर ,टी वी चैनल्स पर एक न्यूज आग की तेजी से फैली हुई है 10 वर्ष की बच्ची के गर्भवती होने और कोर्ट के गर्भपात करने की इजाज़त नही दिए जाने की ...! ये किसी नाबालिग के बलात्कार का पहला मामला नही है...ऐसे जाने कितने मामले न्यायालय में लंबित और विचाराधीन है...जो न्यायालय तक पहुचे हैं। और कितने ही ऐसे मामले हैं जो न्यायालय तक पहुंच ही नही पाते । खैर आइए जानते है ये पूरा मामला आखिर है क्या? ...