सोमवार, 29 मई 2017

अरे ! , चलेंगे नहीं तो जिंदगी कैसे चलेगी |


हजारों किलोमीटर की यात्रा  की शुरुआत बस एक कदम से होती है



मुहल्ले के अंकल जी वॉकर ले कर ८० की उम्र दोबारा चलना सीख रहे थे | अभी कुछ दिन पहले गिरने से उनके पैर की हड्डी टूट गयी थी | प्लास्टर खुलने  के बाद भी मांस पेशियाँ अकड गयी थी , जिन्होंने चलने तो क्या खड़े होने में मदद देने से इनकार कर दिया था | इक इंसान जो जिंदगी भर चलता हैं , भागता है दौड़ता है | किसी दुर्घटना के बाद डेढ़ – दो महीने में ही चलना भूल जाता है | एक – एक कदम अजनबी सा लगता है | हिम्मत जबाब दे जाती है | लगता है नहीं चला जाएगा | फिर एक अंत : प्रेरणा जागती है ,अरे ! , चलेंगे नहीं तो जिंदगी कैसे चलेगी |तब जरूरत  होती है अपनों के प्यार की , वाकर के सहारे की और द्रण इच्छा शक्ति की |  और शुरू हो जाती है कोशिश फिर से सीखने की |चल पड़ते हैं कदम |





                                                क्या हम सब जिंदगी के अनेकों मोड़ों पर किसी ऐसी दुर्घटनाओं के शिकार नहीं होते जहाँ लगता है जिंदगी रुक सी गयी है | मांस पेशियाँ अकड गयी हैं | नहीं अब बिलकुल नहीं चला जाएगा | जब कोई अपना बिछड़ जाता है , जब कोई काम बिगड़ जाता है या जब कोई राह भटक जाता है तो अकसर हिम्मत टूट जाती है | अगर चलने  की कोशिश भी करों तो आंसुओं से पथ धुंधला हो जाता है | रास्ता दिखता ही नहीं | तब अंदर से एक आवाज़ आती है , चलों , चलोगे नहीं तो जिंदगी चलेगी कैसे ?और डगमगाते कदम निकला पड़ते हैं अनजानी राह पर | 



 अक्सर ऐसे समय में अपनों का साथ नहीं मिलता , वाकर का सहारा भी नहीं | क्योंकि बहुधा लोग तन की तकलीफों में तो साथ खड़े हो जाते हैं पर मन की तकलीफों में नहीं | वो दिखाई जो नहीं देती | ऐसे समय में बहुत जरूरी है हम अपने दोनों हाथों से कानों को बंद कर लें | जिससे बाहर  की कोई आवाज़ न सुनाई न दे | वो आवाजें जो रोकती  हैं , वो आवाजे जो हिम्मत तोडती हैं , वो आवाजे जो घसीट – घसीट कर अतीत में ले जाना चाहती हैं | तब सुनाई देती है वो आवाज़ जो अंदर से आ रही हैं |जोर – जोर से बहुत जोर से , हर चीज से टकरा – टकरा कर प्रतिध्वनि उत्पन्न करती हैं ,अरे ! चलेंगे  नहीं तो जिंदगी कैसे चलेगी ........ और जिंदगी चल पड़ती है | 

वंदना बाजपेयी 

रविवार, 28 मई 2017

कतरा कतरा पिघल रहा है


 साधना सिंह


कतरा कतरा पिघल रहा है  
दिल नही मेरा संभल रहा है  || 

हवा भी ऐसे सुलग रही है 
और ये सावन भी जल रहा है ||

कि एक तेरे जाने से देखो, 
कैसे सबकुछ बदल रहा है || 

शनिवार, 27 मई 2017

वो पहला खत







बचपन में एक गाना  अक्सर सुनते थे  "लिखे जो खत तुझे वो तेरी याद में हज़ारों रंग के सितारे बन गए " | गाना हमें बहुत पसंद था पर हमारा बाल मन सदा ये जानने की कोशिश करता ये खत सितारे कैसे  बन जाते हैं।. खैर बचपन गया हम बड़े हुए और अपनी सहेलियों को  बेसब्री मिश्रित ख़ुशी के साथ उनके पति के खत पढ़ते देख हमें जरा -जरा अंदाज़ा होने लगा कि खत सितारे ऐसे बनते हैं।  और हम भी एक अदद पति और एक अदद खत के सपने सजाने लगे।  खैर दिन बीते हमारी शादी हुई और शादी के तुरंत बाद हमें इम्तहान देने के लिए मायके   आना पड़ा।  हम बहुत खुश थे की अब पति हमें खत लिखेंगे और हम भी उन खुशनसीब सहेलियों की सूची में आ जाएंगे जिन के पास उनके पति के खत आते हैं।

स्त्री और नदी का स्वच्छन्द विचरण घातक और विनाशकारी






लेखक:- पंकज प्रखर
कोटा(राज.)

स्त्रीऔर नदी दोनों ही समाज में वन्दनीय है तब तक जब तक कि वो अपनी सीमा रेखाओं का उल्लंघन नही करती | स्त्री का व्यक्तित्व स्वच्छ निर्मल नदी की तरह है जिस प्रकार नदी का प्रवाह पवित्रऔर आनन्दकारकहोता है उसी प्रकार सीमा रेखा में बंधी नारी आदरणीय और वन्दनीय शक्ति के रूप में परिवार और समाज में  रहती है| लेकिन इतिहास साक्षी है की जब –जब भी नदियों ने अपनी सीमा रेखाओं का उल्लंघन किया है समाज बढ़े –बढे संकटों से जूझता नजर आया है| तथाकथित कुछ महिलाओं ने आधुनिकता और स्वतंत्रता के नाम पर जब से स्वच्छंद विचरणकरते हुए  सीमाओं का उल्लंघन करना शुरू किया है तब से महिलाओं की  स्थिति दयनीय और हेय होती चली गयी है |

स्मृति - पिता की अस्थियां ....





सुशील यादव


पिता ,
बस दो दिन पहले
आपकी चिता का
अग्नि-संस्कार कर
लौटा था घर ....
माँ की नजर में
खुद अपराधी होने का दंश
सालता रहा ...
पैने रस्म-रिवाजों का
आघात
जगह जगह ,बार बार
सम्हालता रहा ....

शुक्रवार, 26 मई 2017

भूमिका के अनुसार ही हो चरित्र


'एक राजा के पास एक बहुरुपिया आया और उसने राजा से कहा कि वो रूप बदलने में इतना माहिर है कि कोई उसे पहचान ही नहीं सकता। राजा ने कहा कि चाहे तुम जितने रूप बदलो, मैं तुम्हें पहचान लूंगा।
राजा और बहुरुपिया के बीच शर्त लग गई। बहुरूपिया ने कहा कि आप जिस दिन मुझे नहीं पहचान पाएंगे, आप एक स्वर्ण मुद्रा मुझे इनाम में देंगे। 
राजा तैयार हो गया। बहुरूपिया रोज़ नए रूप में राजा के पास आता, राजा उसे पहचान लेता।
बहुरुपिया बहुत हैरान था कि चाहे जिस रूप में भी वो आए, राजा पहचान लेता। धीरे-धीरे बहुरुपिया ने राजा के पास आना बंद कर दिया।
कई दिन बीत गए।
एक दिन अचानक राज्य में खबर उड़ी कि पास के गांव में एक बहुत पहुंचे हुए महात्मा आए हैं। लंबी दाढ़ी, गेरूआ वस्त्र और माथे पर गज़ब का तेज़।

गुरुवार, 25 मई 2017

ब्रेस्ट कैंसर - गुलाबी दिल नहीं जानकारी ही बचाव है







कल से जिस संख्या में नन्हे से गुलाबी दिल देखने को मिल रहे हैं उसके हिसाब से तो आज बहुत सारी  महिलाएं अस्पतालों में जा कर अपना चेकअप शुरू करा देंगी | पर अफ़सोस की ऐसा कुछ नहीं होगा | अव्वल तो बहुत से लोग इस प्रतीकात्मक कैम्पेन का मतलब ही नहीं समझ पाए | जो समझ भी गए उन्होंने इसे गंभीरता के स्थान पर हलके में ही लिया होगा | क्यों न हो ? जिस देश में महिलाएं अपनी छोटी – बड़ी हर तकलीफ को नज़रअंदाज करती है | जहाँ छोटे शहरों  गाँव देहात में शिक्षा की कमी है वहाँ प्रतीकत्मक प्रचार से कुछ नहीं होगा | जरूरत है इस गंभीर मुद्दे पर खुल कर बोलने की |
लाइलाज नहीं है स्तन कैंसर
कैंसर शब्द दिमाग में आते ही बात आती है की अब पीड़ादायक मृत्यु होगी और इसी कारण कैंसर होने के समाचार मात्र से ही रोगी को जीवन के प्रति निराशा हो जाती है। लेकिन स्तन या ब्रेस्ट कैंसर के क्षेत्र में एक अच्छी बात यह है कि  इसके ठीक होने की संभावना ज़्यादा होती है। स्तन कैंसर होने का पता साधारणतः पहले या दूसरे चरण में ही चल जाता है। इसलिए इसका इलाज सही समय पर हो पाता है। लेकिन इसके लिए ज़रूरी है हर किसी को इस बारे में सही जानकरी हो और वे सचेत हो। स्तन कैंसर से बचने का सबसे पहला कदम है जागरूकता। उसके बाद आता है इस रोग से बचने के उपाय। जीवनशैली में बदलाव और सचेतता ही आपको कष्टदायक स्तन कैंसर से बचा सकता है।