शनिवार, 29 नवंबर 2014

सुन्दरता का दंड क्यों

                     Shikha Singh         



    सुंदरता  को  दंड  क्यों 


प्रेम में या आपसी रिश्तों  में उम्र का या खूबसूरत या बदसूरत. होना बाजिव है।
क्या पति पत्नी के रिश्तों में सुन्दरता या छोटा बडा होना मायने रखते है । अगर रखते है तो वो रिश्ते प्यार के हो ही नही सकते ।वो केवल समझौते होते है। दुनियाँ की नजर में अपमानित होने से बचाने के लियें वो जबरन निभाये जाते है क्या इस तरह की जिंदगी संतुष्ट पूर्ण होती है ॥

                                           (चित्र गूगल से साभार )




लेकिन एक मायने में रिश्तों में अगर प्रेम हैं तो न वहाँ  सौन्दर्य को आँकाँ जाता है न उम्र को रिश्ते हमेशा दिल से और अच्छी सोच से बनते है। जिन लोगों के विवाह ऐसे ही हो जाते है जो एक खूबसूरत होता है और एक कम ।और कभी-कभी ऐसा भी होता है परिस्थितियों बस कभी एक की उम्र कम या ज्यादा होती है।पर सच तो ये हैं कि अपने रिश्तों को सम्मान नही दे पाते और एक दूसरे के साथ सहमति भी नही जता पाते पर मेरा मानना है कि रिश्ते भवनाओ से जुड़ते है आप एक दूसरे का सम्मान करो एक दूसरे का खयाल रखो  ।
इसके साथ साथ अपनी इच्छाओं को थोडा सा अनदेखा करो और अपने रिश्तों की इच्छाओं को सरोपर रखो धीरे धीरे करीबियाँ होती जायेगी हमेशा एक दूसरे को अनदेखा मत करो उसकी अच्छाइयां देखो याद करो तो रिश्तों में विश्वास और प्रेम खुद व खुद पनपने लगेगा रिश्ते कोई हो किसी भी तरह के हो हमेशा अच्छाई को याद करो कोई रिश्ते बोझ नही होते बोझ बना लेते है ।कभी किसी और की तारीफ अपने ऐसे रिश्तों के सामने मत करो तकि वो अपने को कुण्ठित महसूस करे और रिश्तों में दूरियाँ पैदा होने लगे ।
पति पत्नी के रिश्तों में अगर एक खूबसूरत हैं और एक नही तो बोझ न समझे क्यों कि कोई खुद से नही बनाये गये है ये तो प्रकृति बनाती है अगर खुद से बने होते तो सब एक दूसरे से ज्यादा खूबसूरत बन जाते कोई एक दूसरे से शिकायत या अपमानित नही कर पाता क्या खूबसूरती प्यार और रिश्तों से ज्यादा मायने रखती  है मै नही मानती जहाँ प्यार और सम्मान न हो तो वहाँ इन सब का कोई मायने नही होता न कोई वजूद है ।साथ रहना रिश्तों को निभाना अपनेआप में एक कला है ।जो कि व्यक्ति के खुद के ऊपर निर्भर करती है।


                                               (चित्र गूगल से साभार )


बस सोचने समझने की शक्ति होनी चाहिये । जरूरी नही हर रिश्ते को अपने तरीके से जिया जाये पर कभी कभी ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पडता है जो मन नही चहाता पर कुछ सामाजिक रिश्ते जीने पढ. जाते है।और घरेलू समस्याओं का भी सामना करना जरूरी हो जाता है। विवाह कोई जबरदस्ती का बंधन नही है। ये प्रेम का भी रिश्ता है।जिस नजर से आप देखेगे  उसी नजर से आपको दिखेगा ।कभी कभी ऐसे विवाह में लोग अपने रिश्तों से खुश न होकर गलत या नाजायज रिश्ते बना लेते है जो हमेशा पीडादायक ही बनते है।लोग एक के साथ क ईयों का जीवन बर्बाद कर देते है।अगर विश्वास खोने लगे तो वो रिश्ते जीते जी मर जाते है एक दूसरे के साथ रहते हुए भी साथ नही होते उन रिश्तों में दम घुटने लगता है ।क्यो नही बदलते ऐसी सोच रखने बाले लोग जो अपने घुटन के साथ साथी  को भी घुटन भरी जिंदगी दे रहे है ।क ई बार तो ऐसा होता है कि बच्चे तो पैदा कर लेते है लोग ऐसी घुटन भरी जिंदगी में भी इसका अर्थ निकलता है ।शारीरिक भूख मिटाना न कि रिश्तों को समझना और सम्मान करना ।इस विवाह के क्या मायने हो सकते है। जब तक आपसी ताल मेल न हो तो पूरा जीवन एक रोग बन जाता है ।हमारे सामाजिक परम्पराओं के अनुसार क ई विवाह भी नही किये जाते इस डर से लोग गलतियाँ कर बैठते है। पर अगर ऐसा विचारों से बहार निकल कर अपने ही रिश्तों को सम्मान दे और नय तरीको से देखे उनकी गलतियाँ अनदेखा करके अच्छाईयो में नजर दौडायें तो क ई परिवार और उनके रिश्ते सम्मान पूर्वक बचाये जा सकते है।
क ई बार हमे यह भी देखते है कि उम्र और खूबसूरती या बदसूरती रिश्तों के आडे आ जाती है। जब की पति पत्नी दोनों
सक्षम होने के बाद भी ऐसी परिस्थितियों का सामना करना पड जाता है।पर इसके लिए हमें अपनी इच्छाओं को खत्म करना नही है । रिश्ते को इस सूरत में सम्हालना है । कि उसमें  सामने बाले को कोई कमी  न दिखे ऐ जरूरी तो नही कि उन रिश्तों  को बोझ समझा जाये क्यो कि अगर ऐसा समझा जायेगा तो हमारे बच्चों  पर ये असर पडेगा ॥जो कि उनके जीवन को भी गलत रास्ता  तय करा सकता है और अक्सर पीडी दर पीडी ये होता चला जाता है और घरों में अशांति छाई रहती है ।इस कारण कभी उभर ही नही पाते ।
जिंदगी के मायने ये नही है कि हमेशा अपनी इच्छाओं का सम्मान करो जरूरी यह भी होता है ।कि अपने रिश्तों  का भी सम्मान करे क्यो कि इच्छायें सब की बराबर होती है। बस अन्तर ये होता है कोई खुल कर बोल देता है बिना सोचे समझें कोई अपने को दवा लेता है। लोगो को अपनी सोच बदलनी चाहिये ।क्यो कि आज की पढी लिखी पडी इतनी तो समझदार होती ही है ।कि हमें किस ढंग का फैसला करना चाहिये ।
फिर भी गलतियाँ क्यो करते है लोग ?

शिखा सिंह 

गुरुवार, 27 नवंबर 2014

अनामिका चक्रवर्ती की कवितायेँ


                                Anamika Chakraborty
                                      अनामिका चक्रवर्ती ''अनु'' 



एक  स्त्री कितना कुछ भोगती है जीवन में ........... बहुत जरूरी है उस पीड़ा उस कसक को सामने लाना ,आज साहित्य में इसे स्त्री विमर्श का नाम दिया गया है ,जिस पर पुरुष भी लिख रहे हैं ........परंतू जब स्त्री लिखती है तो वो उसका भोगा  हुआ सच होता है ,जो मात्र शब्दों तक सीमित नहीं रहता अपितु मन की गहराइयों में उतरता है ........कुछ हलचल उत्पन्न करता है और शायद एक इक्षा भी की कुछ तो बदले यह समाज ........इन विषयों  पर अनामिका चक्रवर्ती जी जब कलम चलाती  हैं तो वह दर्द महसूस होता है ......... अपनी कविता घूंघट में वो परदे के पीछे छिपी स्त्री के दर्द के सारे परदे हटा देती हैं, कहीं वो याचना करती है मैं माटी  जब रिश्तों की नदी में बह जाऊ  तो दरख्त बन अपनी जड़ों में समां लेना .........लेकिन उनकी यात्रा यहीं तक सीमित नहीं है वो किसान  के दर्द को भी महसूस करती है ..........आज अनामिका जी को पढे  और जाने उनके शब्दों में छिपे गहरे भावों को  


हर बार कुछ नई बनती गई,
प्रकृति थी जो सर्वशक्ति थी।
जो अबला ना थी ।
हर वक़्त जीती रही औरत होने का सच
पर जी ना पाई कभी औरत होने को ।





1-   '' घूँघट ''

दाँतो तले दबाये रखती,
कई बार छूटता जाता ।
पर सम्भाल लेती ।
अब तक सम्भाल ही तो रही है।
सर पर रखे घूँघट को ।
याद नहीं पहली बार कब रखा।
पर खुद को आड़ में रख लिया हमेंशा के लिये।
कभी बालो को हवा से खेलने न दिया।
ना कभी गालो पर धूप पड़ने दी।
आँखो ने हर रंग धुंधलें देखे ।
देखा नहीं कभी बच्चे को खिलखिलाते ,
हाँ सुनती जरूर थी।
माथे से आँखो तक खींचती रहती,
गोद से चाहे बच्चा खिसकता रहा।
साँसे बेदम होती सपने बैचेन।
इच्छाये सिसकती रहीं,
दिल किया कई बार,
बारिश में खुद को उघाड़ ले,
बूंदो को चूम ले,
ये पाप कर न सकी।
घूँघट का मान खो न सकी।
चौखट पर चोट खाती,
उजालो के अंधेरे में रहती।
बालो की काली घटा,
जाने कब चाँदी हो गई,
मगर घूँघट टस से मस ना हुआ।

                                                        (चित्र गूगल से साभार )

2-
औरत

हर वक़्त जीती रही
औरत होने का सच
पर जी ना पाई कभी औरत होने को
रिस्तों के साँचे में,
हर बारकितनी बार ढाला गया।
हर बार कुछ नई बनती गई,
प्रकृति थी जो सर्वशक्ति थी।
जो अबला ना थी ।
हर वक़्त जीती रही औरत होने का सच
पर जी ना पाई कभी औरत होने को ।



                                      (चित्र गूगल से साभार )



3 -''
किसान''

जल मग्न पाँव किये
कुबड़ निकालें सुबह से साँझ किये।
गीली रहीं हाथो की खाल हरदम।
दाने दाने का  मान किये।
धूप सर पर नाचती रहीं।
गीली मिट्टी तलवो को डसती रहीं।
भूख निवाले को तरसती रहीं।
धँसे पेट जाने कितनो के निवाले तैयार किये।
धान मुस्काती रहीं लहलहाती रहीं।
साँसे कितनी उखड़ती रहीं।
हरा सोना पक कर हुआ खाटी।
पर दरिद्र किसान
ताकता रहा दो जून की रोटी
आत्ममुग्ध सरकार से।



                                     (चित्र गूगल से साभार )

4-
दरख़्त
जब रिश्तों  की नदीं में बह जाऊँ
फ़र्ज़ की आँधी में ,
मिट जाऊँ।
बन जाना तब तुम एक दरख़्त
जिससे लिपट के मैं सम्भल जाऊँ
बहने न देना ,मिटने न देना
बस मिट्टी बना कर समा लेना ,
खुद की जड़ो में,
मै जी जाऊँगी सदा के लिये




5-
नियती है बहना

शायद मैं सुन सकती तुम्हारी आवाज़
अंधेरे से निकलती हुई
एक आह बनकर मेरे अंतस में उतरती हुई
जबकी ये जानती हूँ मैं ,
प्रेम यथार्त में नहीं बस एक तिलिस्म है ।
खत्म होने के डर के साथ,
नियती है बहना ।
बनकर धारा बह रही हूँ।



                                                                (चित्र गूगल से साभार )



6-
मील का पत्थर

लम्बी सड़कों के तट पर,
सदियों से खड़ा है।
सीने में अंक और नाम टाककर ,
कि मुसाफिर भटक न जाये।
पर मुसाफिर भटकते है फिर भी,
क्योंकि भटकने से पहले ,
नहीं दिखता उन्हें कोई मील का पत्थर।
या देखने से बचना चाहते है,
उठाना चाहते है भटकने का आनंद।
उन्हें ठोकर का एहसास ही नहीं होता,
बड़े बेपरवाह होते है ये मुसाफिर।
मील के पत्थर की आवाज,
उसके भीतर पत्थर में ही तब्दील हो जाती है।
मुसाफिर और मील के पत्थर का रिश्ता ,
आँखों का होता है।
इशारों ही इशारों में कर लेते है बातें
नहीं आती उन्हें कोई बोली।
मगर होती है उनकी भी आवाज़,
जो दिशाएँ बताती है।
रास्तों को मंजिल तक ले जाती है।


अनामिका चक्रवर्ती ''अनु''

   -
परिचय

 
अनामिका चक्रवर्ती  'अनु'
जन्म स्थान : सन् 11/2/1974  जबलपुर (म.प्र.)

प्रारंभिक शिक्षा : भोपाल म.प्र.
स्नातक : गुरू घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर छत्तीसगढ़
 
एवं PGDCA

प्रकाशन : विभिन्न राज्यों के पत्र पत्रिकाओ में रचनाएँ और लेख प्रकाशित।
एवं एक साझा म्युज़िक एलवम प्रतिति के लिये गीत लिखे

संप्रति : स्वतंत्र लेखन

संपर्क : अनामिका चक्रवर्ती अनु
 
वार्ड न.- 7 नॅार्थ झगराखण्ड
मनेन्द्रगढ़ कोरिया
 
छत्तीसगढ़ - 497446

ई-मेल : anameeka112@gmail.com



सोमवार, 24 नवंबर 2014

वीरू सोंनकर की कवितायेँ

                                                   Veeru Sonker
                                                       


कानपुर निवासी वीरू सोनकर जी आज किसी परिचय के मोहताज़ नहीं है। कम उम्र में ही उन्होंने कविता की गहन समझ का परिचय दिया है। उनकी लेखनी विभिन्न विषयों पर चलती है.………… पर मुख्यत :वो समाज की विसंगतियों व् विद्रूपताओं पर प्रहार करते हैं। …………… मानवीय भावनाओं को वो सूक्ष्मता  से पकड़ते हैं.………। उनकी कलम आम आदमी की पीड़ा को बहुत सजीवता  से रेखांकित करती है ,कही वो शब्दों के मकड़जाल में  न फंस कर समाधान को वरीयता देते हैं। ............. उनकी लम्बी कविता प्रतिशोध सताई गयी लड़कियों के प्रति सहानभूति जागाते हुए भयभीत भी काराती है "सामाज अभी भी सुधर जाओ वो लडकियां वापस आयेगी प्रतिशोध लेने ……… हमारे और आपके घरों में ............. 


- तीनो लडकियाँ मरने के बाद,
ऊपर आसमानों पर मिलती है
और वह अब पक्की सहेलियाँ बन गयी है
वह फिर से जन्मना चाहती है
एक साथ---
फिर से किसी इस्लामिक देश में,
लेनिनग्राद वाली लड़की का फैसला है
वह देश इस्लामिक ही होगा !
तीनो लड़कियों के लड़ने का फैसला अटल है
और शायद
जीत जाने का भी-----------------
तैयार रहिये !
वह लडकियाँ वापस आ रही है
शायद हमारे और आपके ही घरो में !


शब्द 
मैंने कहा "दर्द"
संसार के सभी किन्नर, सभी शूद्र और वेश्याएँ रो पड़ी !
मैंने शब्द वापस लिया
मैंने कहा "मृत्यु"
सभी बीमार, उम्रकैदी और वृद्ध मेरे पीछे हो लिए !
मैंने शर्मिन्दा हो कर सर झुका लिया
मैंने कहा "मुक्ति"
सभी नकाबपोश औरते, विकलांग और कर्जदार मेरी ओर देखने लगे !
अब मैं ऊपर आसमान में देखता हूँ
और फिर से,
एक शब्द बुदबुदाता हूँ
"वक्त" !
कडकडाती बिजली से कुछ शब्द मुझ पर गिर पड़े---
"मैं बस यही किसी को नहीं देता !"
मैं अब अपने सभी शब्दों से भाग रहा हूँ
आवाजे पीछे-पीछे दौड़ती है---
अरे कवि,
ओ कवि !
संसार के सबसे बड़े भगोड़े तुम हो !
उम्मीदों से भरे तुम्हारे शब्द झूठे है !
मैं अपने कान बंद करता हूँ !
मैं अपने समूचे जीवन संघर्ष के बाद,
सबके लिए बोलना चाहूँगा,
बस एक शब्द----
"समाधान"
अब से,
अभी से,
यही मेरी कविताओ की वसीयत है !
अब से,
अभी से,
मेरी कविताये सिर्फ समाधान के लिए लड़ेंगी !
मैंने मेरी कविताओ का वारिस तय किया---
सबको बता दिया जाये............................................

.
                                                                (चित्र गूगल से साभार )


२। ………

रेहाना 
अपनी इस फ़ासी पर,
रेहाना कतई नहीं रोती है !
वह जागती है
और इंतज़ार करती है------
वह अपने माँ-पिता या भाई को नहीं सोचती,
भविष्य के सपने भी नहीं याद करती,
रेहाना अपने अंगूठे से जमीन भी नहीं कुरेदती,

खुद की आजादी के लिए तो वह सोचती तक नहीं---
बहुत ही शांत चेहरे के साथ,
जैसे रेत में घिरी कोई पहाड़ी धुप में चमकती है
वैसे ही रेहाना जल्दी में रहती है !
चाहती है उस पर कुछ न लिखा जाये,
वह अपनी फाँसी पर दुनिया के देशो के महासम्मलेन भी नहीं चाहती,
संयुक्त राष्ट्र संघ के विरोध पत्र,
या
नारी मुक्ति की बहस में भी उसको नहीं पड़ना,
रेहाना को किसी से शिकवा नहीं
रेहाना किसी से गुस्सा भी नहीं !
रेहाना सोचती है !
वह गलत जगह आ गयी थी,
ये दुनिया उसकी गलती ठीक कर रही है !
फ़ासी पर चढ़ती रेहाना !
दुनिया की शुक्रगुजार रहती है
और चाँद सितारों के पार देखती है
वही, जहाँ उसे जाना है-------------------------


                                             (चित्र गूगल से साभार )
                                            

३। ............

.सुनी -सुनाई   
हम--
एक अंधी गहरी गुफा में,
बढ़ाते है
कुछ सामूहिक कदम !
और
लड़खड़ाते है
गिरते है
फिर-फिर सँभलते है----
और आगे बढ़ते है !
हमने सुन रखा है
आगे !
बहुत आगे जा कर,
जहाँ / गुफा ख़त्म होती है
वहाँ रौशनी मिलती है
हमने सुन रखा है______



४। …………।

 प्रतिशोध 
1---
लेनिनग्राद की पक्की सड़क पर
एक बच्ची
तेज़ी से जाती है
अपने स्कूल की ओर,
वह बिलकुल लेट नहीं होना चाहती
और
वह नहीं जानती
isis क्या होता है---
हाँ , उसने मलाला युसुफजई का नाम सुना है
टीचर कहती है
उसे उसके जैसा ही बहादुर बनना है !
2---
एक तालिबानी लड़की भी चलती है गॉव की कच्ची सड़क पर,
और उसे कोई जल्दी नहीं
स्कूल पहुचने की,
वह देखती है रोज के रोज
अपनी सोचो में बुनी खुद की एक सहेली,
जो बिलकुल,
उस जैसी दिखती है
वह लड़की रोज स्कूल तक जाती है
झूट मुठ की अपनी सहेली को वहीँ छोड़ आती है
लड़की को सपने वाली सहेली के भविष्य की बहुत चिंता होती है---
3----
एक इराकी-यहूदी लड़की
अब स्कूल नहीं जाती !
वह अब यहूदी भी नहीं रही,
और लड़की भी नहीं रही,
वह 3 बार बिक चुकी है
अपने ही स्कूल के बाहर के औरत-बाजार में,
लड़की कोशिश करती है हालात समझने की---
बस एक महिना पहले,
जब वह रोज स्कूल जाती थी
अपने पिता के संग,
और स्कूल के गेट पर थमा देती थी अपनी फरमाईशों की लिस्ट
पापा भूलियेगा नहीं !
और पिता कभी नहीं भूलता था
अब लड़की,
अपने पिता को नहीं भूलती !
वह खुद के हर खरीदार में अपना पिता तलाशती है
फिर से किसी स्कूल तक जाने के लिए---
और उसका सपना हर रात तोड़ दिया जाता है !
------------------------ तीनो लडकियाँ मरने के बाद,
ऊपर आसमानों पर मिलती है
और वह अब पक्की सहेलियाँ बन गयी है
वह फिर से जन्मना चाहती है
एक साथ---
फिर से किसी इस्लामिक देश में,
लेनिनग्राद वाली लड़की का फैसला है
वह देश इस्लामिक ही होगा !
तीनो लड़कियों के लड़ने का फैसला अटल है
और शायद
जीत जाने का भी-----------------
तैयार रहिये !
वह लडकियाँ वापस आ रही है
शायद हमारे और आपके ही घरो में !



                                                     (चित्र गूगल से साभार )



५। .
आम आदमी---
आम आदमी सुबह सोचता है,
सोचता है
कि शाम तक 
वह जुटा लेगा अगले हफ्ते का राशन,
और अपने बच्चो से कहेगा
मन लगा कर पढो,
और पिछले महीने की फीस उनके हाथ में रख देगा
आम आदमी
अपने बच्चो के सामने गर्व से भरा रहना चाहता है
चाहता है कि
इसके बच्चे उसका संघर्ष जान जाये
जान जाये कि
सफलता कितना तरसा कर आती है
सुबह का योद्धा
आम आदमी,
शाम ढलते-ढलते
अपनी पराजय स्वीकार लेता है
वह घर जाने से पहले
जाता है शराब की दूकान,
वह चाहता है
उसके बच्चे,
उसकी अगली पीढ़ी !
अपनी पिछली पीढ़ी को हारा हुआ न देखे,
वह रोज शराब के नशे में
अपनी हार की आड़ ढूंढ़ता है
और--
आम आदमी
ऐसे ही एक दिन
चुपचाप गुजर जाता है
शराब की दूकान में भीड़ बनी रहती है
पुरानी पीढ़ी में नयी पीढ़ी
बदस्तूर
बदलती रहती है----
खिलाडी बदलने से खेल के नियम नहीं बदलते
खेल वही रहता है
परिणाम भी वही रहता है
बड़े आदमी
आम आदमी का खेल देखते है
और हर हार पर
हर परिणाम पर
एक दर्द भरी "आह" के बाद
वापस अपने अपने काम में लग जाते है
और----
आम आदमी जान जाता है
खेल के नियमो से भी निर्मम बड़े आदमी की "आह" होती है..............................




६। …………।
डरी हुई लड़की 
 .
डरी हुई लड़की
अपनी हर बात पर
सहम सहम कर
धीमी आवाज़ में बोल कर
मुझे अपना मुरीद बना लेती हैं
शायद
अगर वो निकलती बेहद तेज़ तर्रार
और मुझसे भी चालाक
तो मैं उससे दुरी बना लेता
क्युकी
तेज़ लड़की
मेरे मर्द होने
मेरे चतुर होने की
मुझमे व्याप्त अनादी काल की भावना का
कतई पोषण नहीं करती,
इस लिए तेज़ लड़की
मेरी पसंद नहीं
मेरी पसंद हैं डरी हुई लड़की.......



संछिप्त परिचय-----
नाम-- वीरू सोनकर पिता-- स्वर्गीय श्री किशन सोनकर, माता-- मुकन्दर देवी,
जन्म-- 9 जून 1977,
शिक्षा-- क्राइस्ट चर्च कॉलेज कानपूर से स्नातक, डी ए वी कॉलेज से बीएड,
संपर्क सूत्र---veeru_sonker@yahoo.com,
78/296, क्वार्टर नॉ 2/17, लाटूश रोड , अनवर गंज कालोनी , कानपूर नगर, उत्तर प्रदेश,
पिनकोड--- 208001