बुधवार, 31 दिसंबर 2014

सोमवार, 29 दिसंबर 2014

भावनाएं

                                         भावनाएं (स्त्री और पुरुष की )
     
                      (चित्र गूगल से साभार )


स्त्री या पुरुष दोनों को कहीं न कहीं यह शिकायत रहती है कि अगला उनकी भावनाएं नहीं समझ पा रहा है ...... यह भावनाएं कहाँ पर आहत हैं यह समझने के लिए हम दो स्त्री ,दो पुरुष स्वरों को एक साथ लाये हैं ..... आप भी पढ़िए

अटूट बंधन पर आज :भावनाएं (स्त्री और पुरुष की )
 एक ईक्षा अनकही  सी
.... किरण आचार्य 
तुम .... दीपक गोस्वामी 
तुम मेरे साथ हो .....डिम्पल गौर 

ढूढ़ लेते हैं .....डॉ  गिरीश चन्द्र पाण्डेय 








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एक इच्छा अनकही सी

आज फिर गली से निकला
ऊन की फेरी वाला
सुहानें रंगों के गठ्ठर से
चुन ली है मैनें
कुछ रंगों की लच्छियाँ
एक रंग वो भी
तुम्हारी पसंद का
तुम पर खूब फबता है जो
बैठ कर धूप में
पड़ोसन से बतियाते हुए भी
तुम्हारे विचारों में रत
अपने घुटनों पर टिका
हल्के हाथ से हथेली पर लपेट
हुनर से अपनी हथेलियों की
गरमी देकर बना लिए हैं गोले
फंदे फंदे में बुन दिया नेह
तुम्हारी पसंद के रंग का स्वेटर

टोकरी में मेरी पसंद
के रंग का गोला पड़ा
बाट देखता है अपनी बारी की
और मैं सोचती हूँ
अपनी ही पसंद का
क्या बुनूँ
कोई नहीं रोकेगा
कोई कुछ नहीं कहेगा
पर खुद के लिए ही खुद ही,,,
एक हिचक सी
पर मन करता है
कभी तो कोई बुने
मेरी पसंद के रंग के गोले

लो फिर डाल दिए है
नए रंग के फंदे
टोकरी में सबसे नीचे
अब भी पड़ा हैं
मेरी पसंद के रंग का गोला

लेखिका किरन आचार्य
आक्समिक उद्घोषक
आकाशवाणी
चित्तौड़गढ
Add - B-106 प्रतापनगर चित्तौड़गढ (राज.)








              तुम

जब भी सोचता हूँ तुम्हारे बारे में

भावनाएं एक कविता कहती है
कभी निर्झर हो गिरते है
आवेश मेरे
तो कभी
मुझसे तुम तक
तुमसे मुझ तक
एक अछूती, अनदेखी
शांत सरिता बहती है।

जब भी सोचता हूँतुम्हारे बारे में

भावनाएं एक कविता कहती है
अक्सर
घंटो बतियाते है आवेग मेरे
दिनों तक
निर्वात रखता है व्यस्त मुझे
महीनों में खुद के हाथ नही आता
वर्षो मेरे अस्तित्व की संभावनाएं
वनवास सहती है

जब भी सोचता हूँतुम्हारे बारे में

भावनाएं एक कविता कहती है।

दीपक गोस्वामी 



कविता --तुम मेरे साथ हो
-----------------------------
यादों के झरोंखों में देखूं तो
तुम बस तुम ही नजर आते हो
कुछ खोए खोए गुमसुम से
नजर आते हो
कोलाहल के हर शोर में
स्वर तुम्हारे सुनते हैं
रेत के बने घरोंदों में
निशाँ तुम्हारे दीखते हैं
हर विशाल दरख्त की छाया
अहसास तुम्हारा कराती है
तुम हो मेरे आसपास ही
मन में यही आस
जगाती है
-------------------------------–---------------------------डिम्पल गौर ' अनन्या '




 ●●●●●●●ढूँढ़ लेते हैं●●●●●●●●●
बहुत कमियाँ हैं मुझमें,आजा ढूँढ लेते हैं
बहुत खामियाँ हैं मुझमें,आजा ढूँढ़ लेते हैं
कोई चाहिए मुझे, जो बदल दे मेरी जिन्दगी
बहुत गुत्थियाँ हैं मुझमें,आजा खोल लेते हैं
आज तक जो मिला,बस आधा ही मिला है
बहुत खूबियाँ हैं मुझमें,आजा खोज लेते हैं
जो दिखता हूँ मैं,वो अक्सर  होता ही नहीं
बहुत दूरियाँ हैं मुझमें,आजा कम कर लेते हैं
चाँद भी कहाँ पूरा है बहुत दाग देखे हैं मैंने
बहुत कमियाँ हैं मुझमें,प्रतीक मान लेते हैं

डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय प्रतीक
डीडीहाट पिथोरागढ़ उत्तराखंड
मूल-बगोटी ,चम्पावत
09:57am//07//12//14
रविबार

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

नसीब

                       !!!!!!!! नसीब !!!!!!!!
                      (कहानी -उपासना सियाग )
                       
 
                      

कॉलेज में छुट्टी की घंटी बजते ही अलका की नज़र घड़ी पर पड़ी। उसने भी अपने कागज़ फ़ाइल में समेट , अपना मेज़ व्यवस्थित कर कुर्सी से उठने को ही थी कि जानकी बाई अंदर आ कर बोली , " प्रिंसिपल मेडम जी , कोई महिला आपसे मिलने आयी है।"
" नहीं जानकी बाई , अब मैं किसी से नहीं मिलूंगी , बहुत थक गयी हूँ ...उनसे बोलो कल आकर मिल लेगी।"

रविवार, 14 दिसंबर 2014

बेमेल विवाह के विभिन्न आयाम

   
                           
              





नाम - संगीता पाण्डेय
सम्प्रति :अध्यापन
शैक्षिक योग्यता - अंग्रेजी , शिक्षाशास्त्र तथा राजनीती विज्ञानं में परास्नातक ,
 शिक्षाशास्त्र विषय में नेट परीक्षा उत्तीर्ण , पी एच डी हेतु नामांकित। 


मेरा परिचय ............. 
साहित्य प्रेमी माता - पिता की संतान होने के कारण बचपन से ही मेरा भी रुझान साहित्य में रहा। कवि सम्मेलनों में जाना और काव्य पाठ  सुनना ही कवितायेँ लिखने हेतु मेरी प्रेरणा के स्रोत  बने।  अंग्रेजी  साहित्य में परास्नातक करते समय कवितायेँ लिखने का श्री गणेश हुआ। 

वैसे तो प्रकृति में व्याप्त प्रत्येक वस्तु  मुझे आकर्षित करती है।  किन्तु मानव स्वाभाव तथा मानवीय सम्बन्ध  मेरी जिज्ञासा   का विषय रहें हैं। उपकरणीय जटिलताओं और विद्रूपताओं ने  मानवीय संबंधों के समीकरण को यांत्रिक बना दिया। सबकुछ स्थायी एवं सुविधापूर्ण बनाने की लालसा ने मानवीय संवेदनाओं को बुरी तरह से प्रभावित किया। मुझे ऐसी परिस्थितियां सदैव कुछ कहते रहने को विवश करती रहीं। 




बेमेल विवाह के विभिन्न आयाम 



                                    
विवाह न केवल दो आत्माओं का संयोग मात्र है वरन दो संस्कारों एवं परिवारों का भी संयोग है। विवाह में कुण्डलियाँ तो मिलाई जाती हैं , गुणों में अधिक अंतर न होने पाये इस बात का विशेष ध्यान भी रखा जाता है तथापि बहुत सारे आधारों पर बेमलता को समाप्त किया जा सकना संभव नहीं हो पाता। वैवाहिक बेमलता के कई ऐसे आयाम बताये जा सकते हैं जिनके प्रभाव से विवाह के सम्बन्धों  को टूटते , बिखरते एवं सिसकते देखा गया है। फलतः जिस सम्बन्ध की नींव भावी जीवन को सुखी व संपन्न बनाने के लिए रखी गयी थी वही सम्बन्ध जीवन भर के दुःख का कारण बन जाता है। 

अद्यतन परिस्थितियां हों या प्राचीन समाज ;विवाह को सदा ही परिभाषित किये जाने की प्रथा है। कुछ लोग इसे सामाजिक  संस्था मानते हैं , कुछ लोग सामाजिक समझौता , कुछ लोग दो आत्माओं का मिलन , कुछ लोग दो संस्कारों का संयोग , तो वहीँ कुछ लोग इसे जुआ मान कर भी चलते हैं। फ़िलहाल हिन्दू धर्म के सन्दर्भ में देखा जाये तो विवाह अनुबंध नहीं वरन जन्म - जन्मांतर का सम्बन्ध है। जो सोलह धार्मिक संस्कारो में से एक है। किन्तु स्थिति तब दुःखद हो जाती है  जबकि विभिन्न स्तरों पर समानता लुप्तप्राय होती है।  जिसके कारण वैवाहिक सम्बन्धो में दरार आ जाती है या तलाक़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। विवाह में बेमलता के विभिन्न आयामो को इंगित करते हुए कहा जा सकता है कि ये शैक्षिक , सामाजिक , आर्थिक , शारीरिक , धार्मिक , संवेगात्मक तथा आयु में व्यापक अंतर आदि विभिन्न आधारों  पर हो सकते हैं। 


शैक्षिक बेमलता .......... निःसंदेह शिक्षा समायोजन करना सिखाती है जबकि शैक्षिक स्तर पर भारी विषमता वैवाहिक जीवन को कलुषित बना देती है। यदि पति - पत्नी शैक्षिक स्तर पर एक दूसरे के समकक्ष नहीं होते तो विचारो का आदान - प्रदान सहज नहीं होता। एक दूसरे के विचारो को उन्ही अर्थों में आत्मसात कर पाना जिन अर्थों में कहे गए है , निश्चय ही वैवाहिक जीवन को सुगम एवं सरल बनाता है। समझ का आभाव होने पर निरर्थक आरोपों - प्रत्यारोपों की  श्रंखला आरम्भ हो जाती है जो वैवाहिक जीवन को नारकीय बना देती  है। 

 सामाजिक रूप से वैवाहिक बेमलता ……… सामाजिक रूप से वैवाहिक बेमलता को हम तब देख पाते है जबकि पति पत्नी के मध्य संस्कृति एवं सभ्यता के स्तर पर स्पष्ट अंतर होता है। दोनों में से कोई एक गाँव से सम्बंधित है तो दूसरा शहर से , जहाँ एक परम्पराओं और रूढ़ियों का पुजारी है , तो वहीँ दूसरा हर बात को तर्क की कसौटी पर कसने का अभ्यस्त होता है। अपनी - अपनी ढपली, अपना - अपना राग ; परिणामतः टकराव और अलगाव स्वाभाविक रूप से  जन्म ले लेता है। 
                                               

                                         
अत्यधिक आर्थिक विषमता भी बेमेल विवाह के महत्वपूर्ण आयामो में से एक है। स्थिति तब उतनी दयनीय नहीं होती जब की पति पक्ष आर्थिक रूप से अधिक संपन्न होता है , इसके विपरीत यदि पत्नी पक्ष आर्थिक  रूप से अधिक सबल है तो दोनों के मध्य सामंजस्य बहुत कठिन हो जाता है।आर्थिक रूप से निम्न परिवार से आई लड़की जहाँ ससुराल में धीरे धीरे सामंजस्य बना लेती है वही आर्थिक रूप से उच्च परिवार से आई हुई लड़की प्रारम्भ से परिवार में संदेह और नकचढेपन का पर्याय बन जाती है। पति और उसके परिवार वाले अपनी कुंठा और हीनभावना के तहत नववधू  की हर छोटी बड़ी बात को तूल देकर पारिवारिक वातावरण को विषाक्त बना देते हैं। कभी - कभी यह भी देखा जाता है कि आर्थिक रूप से संपन्न लड़की के मायके वालों से ससुराल वालों की अपेक्षाएं सुरसा के मुख की भांति होती हैं तथा मांगें पूर्ण न होने पर लड़की को प्रताड़ित किया जाता है। हाल की एक घटना का उदाहरण देते हुए कहा जा सकता है कि लड़की को ससुराल वालो ने जलाकर मार डाला क्योंकि लड़की का भाई एक आला अफसर होते हुए भी अयोग्य बहनोई को एक अदद सरकारी भी नहीं दिला पा  रहा था। लोभ के कारन , जीवन की समाप्ति के रूप में प्रेम विवाह का यह अंत हुआ। 


शारीरिक रूप से वैवाहिक बेमलता को इंगित करते हुए कहा जा सकता है कि जब पति और पत्नी लम्बाई - चौड़ाई , सुंदरता , शारीरिक विकलांगता एवं स्किन कलर में एक दूसरे से इतने भिन्न हो  उन्हें साथ देखना आँखों को स्वाभाविक न लगे। ऐसी स्थिति में दोनों को ही एक दूसरे के  साथ  सामाजिक रूप से उपस्थित होने में असुविधा , ग्लानि , लज्जा एवं हीनभावना का अनुभव होता है। 




                                                
 अन्तर्जातीय विवाहयद्यपि भारत में अन्तर्जातीय विवाह अभी प्रचलन का हिस्सा नहीं है तथापि यदा - कदा  देखा जा सकता है। यह भी सच है की यदि ऐसे विवाह होते भी हैं तो उसके मूल में प्रेम विवाह ही हुआ करते हैं। प्रारम्भ में प्रेम विवाह के रूप में ऐसे सम्बन्ध बना तो लिए जाते हैं किन्तु यथार्थ के धरातल पर पाँव  पड़ने पर निष्ठुर सत्य का सामना कर पाना सबके लिए सहज नहीं होता। परिणामतः आरोपों - प्रत्यारोपों से विवाद  प्रारम्भ होता  है तथा तलाक़ पर समाप्त। 

भावुकता में अंतर कहा जाता है की ' अति सर्वत्र वर्जते ' ऐसे में पति पत्नी दोनों में से कोई एक अति संवेदनशील है या अत्यंत भावुक है, तो भी स्थिति गंभीर हो सकती है। एक अत्यंत सैद्धांतिक तो दूसरा व्यापक रूप से व्यवहारिक , तब भी सामंजस्य कठिन हो जाता है। 


                                       


पति पत्नी की आयु में व्यापक अंतर भी बेमेल विवाह के प्रमुख आयामों में से एक है। यह अंतर दो आधारो पर सम्भव है। प्रथम तो वह जबकि स्त्री से पुरुष आयु में आवश्यकता से अधिक अर्थात कम से कम दस - पन्द्रह वर्ष बड़ा हो ।  दूसरा यह कि पुरुष से स्त्री आयु में आवश्यकता से अधिक अर्थात कम से कम दस - पन्द्रह वर्ष बड़ी  हो। पुरुष का स्त्री से आयु में बड़ा होना भारतीय सन्दर्भ में सामान्य सी बात है यद्यपि पत्नी का पति से आयु में बड़ा होना कम  ही देखा जाता है। किन्तु यदि पति अपनी पत्नी से दस - पंद्रह वर्ष बड़ा है तो वो पति न रहकर पिता की भूमिका में आ जाता है। पत्नी को कम आयु का जानकर अनुभव में कम मानने लग जाता है। अपने विचार थोपना , अपनी पसंद थोपना पति का स्वाभाव बन  जाता है। वहीँ दूसरी तरफ पत्नी घुटन महसूस करने लग जाती है।  पत्नी में  मानसिक एवं शारीरिक असंतोष पनपने लगता है। परिणामतः विवाद जन्म ले लेता है। कभी - कभी पति अपनी पत्नी पर निराधार संदेह करने लग जाता है।  दूसरे पुरुष की तरफ पत्नी का देख लेना या पत्नी की तरफ दुसरे पुरुष का देख लेना भी पति को नागवार गुजरने लगता है। फलस्वरूप क्लेश का  जन्म स्वाभाविक है। कमोबेश यही परिस्थितियां तब भी उत्पन्न हो सकती हैं जबकि स्त्री आयु में अधिक बड़ी हो। विचारों और इच्छाओं का व्यापक अंतर अंततः रिश्ते में खटास उत्पन्न कर ही देता है। 


अतः यह मानना होगा की विवाह के  स्वरुप को क्षत - विक्षत करने में विभिन्न ऐसे तथ्यों की भूमिका होती है जिन्हे हम अक्सर विवाह के समय अनदेखा कर देते है। यदि कुंडली के गुणों को मिलाने की अपेक्षा इन छोटी बड़ी - बातों पर ध्यान दिया जाये तो संभवतः रिश्तों के निरंतर टूटने की श्रृंखला को सीमाबद्ध  किया जा सकता  है

संगीता पाण्डेय 

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

अरविन्द कुमार खेड़े की कवितायेँ

                   



1-परिचय...
अरविन्द कुमार खेड़े  (Arvind Kumar Khede)
जन्मतिथि27 अगस्त 1973
शिक्षाएम..
प्रकाशित कृतियाँ- पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित
सम्प्रति-प्रशासनिक अधिकारी लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग मध्य प्रदेश शासन.
पदस्थापना-कार्यालय मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, धार, जिला-धार .प्र.
पता- 203 सरस्वती नगर धार मध्य प्रदेश.
मोबाईल नंबर- 9926527654
ईमेल- arvind.khede@gmail.com 


आत्मकथ्य-
'' मैं बहस का हिस्सा हूँ... मुद्दा हूँ....मैं पेट हूँ....मेरा रोटी से वास्ता है...."
............................................................................................................................
अरविन्द जी की कविताओं में एक बेचैनी हैं ,जहाँ वो खुद को व्यक्त करना चाहते हैं।  वही उसमें एक पुरुष की समग्र दृष्टि पतिबिम्बित होती है ,"छोटी -छोटी खुशियाँ "में तमाम उत्तरदायित्वों के बोझ तले  दबे एक पुरुष की भावाभिव्यक्ति है. बिटिया में  सहजता से कहते हैं की बच्चे ही माता -पिता को  वाला सेतु होते हैं। ………कुल मिला कर अपनी स्वाभाविक शैली में वो  कथ्य को ख़ूबसूरती से व्यक्त कर पाते हैं। आइये आज "अटूट बंधन" पर पढ़े अरविन्द खड़े जी की कविताएं ……………     

1-कविता-पराजित होकर लौटा हुआ इंसान
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पराजित होकर लौटे हुए इंसान की
कोई कथा नहीं होती है
कोई किस्सा होता है
वह अपने आप में
एक जीता-जागता सवाल
होता है
वह गर्दन झुकाये बैठा रहता है
घर के बाहर
दालान के उस कोने में
जहॉ सुबह-शाम
घर की स्त्रियां
फेंकती है घर का सारा कूड़ा-कर्कट
उसे भूख लगती
प्यास लगती है
वह जीता है
मरता है
जिए तो मालिक की मौज
मरे तो मालिक का शुक्रिया
वह चादर के अनुपात से बाहर
फैलाये गए पाँवों की तरह होता है
जिसकी सजा भोगते हैं पांव ही.

                      (चित्र गूगल  साभार )

2-कविता-तुम कहती हो कि.....
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तुम कहती हो कि
तुम्हारी खुशियां छोटी-छोटी हैं

ये कैसी
छोटी-छोटी हैं खुशियां हैं
जिनकी देनी पड़ती हैं
मुझे कीमत बड़ी-बड़ी
कि जिनको खरीदने के लिए
मुझे लेना पड़ता है ऋण
चुकानी पड़ती हैं
सूद समेत किश्तें
थोड़ा आगा-पीछा होने पर
मिलते हैं तगादे
थोड़ा नागा होने पर
खानी पड़ती घुड़कियां

ये कैसी
छोटी-छोटी हैं खुशियां हैं
कि मुझको पीनी पड़ती है
बिना चीनी की चाय
बिना नमक के भोजन
और रात भर उनींदे रहने के बाद
बड़ी बैचेनी से
उठना पड़ता है अलसुबह
जाना पड़ता है सैर को

ये कैसी
छोटी-छोटी हैं खुशियां हैं
कि तीज-त्योहारों
उत्सव-अवसरों पर
मैं चाहकर भी
शामिल नहीं हो पाता हूँ
और बाद में मुझे
देनी पड़ती है सफाई
गढ़ने पड़ते हैं बहानें
प्रतिदान में पाता हूँ
अपने ही शब्द

ये कैसी
छोटी-छोटी हैं खुशियां हैं
कि बंधनों का भार
चुका  नहीं पाता हूँ
दिवाली जाती है
एक खालीपन के साथ
विदा देना पड़ता है साल को
और विरासत में मिले
नए साल का
बोझिल मन से
करना पड़ता है स्वागत

भला हो कि
होली जाती है
मेरे बेनूर चेहरे पर
खुशियों के रंग मल जाती है
उन हथेलियों की गर्माहट को
महसूसता हूँ अपने अंदर तक
मुक्त पाता हूँ अपने आप को
अभिभूत हो उठता हूँ
तुम्हारे प्रति
कृतज्ञता से भार जाता हूँ
शुक्र है मालिक
कि तुम्हारी खुशियां छोटी-छोटी हैं

                                               (चित्र गूगल से साभार )           


3-कविता-जब भी तुम मुझे
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जब भी तुम मुझे
करना चाहते हो जलील
जब भी तुम्हें
जड़ना होता है
मेरे मुंह पर तमाचा
तुम अक्सर यह कहते हो-
मैं अपनी हैसियत भूल जाता हूँ
भूल जाता हूँ अपने आप को
और अपनी बात के
उपसंहार के ठीक पहले
तुम यह कहने से नहीं चुकते-
मैं अपनी औक़ात भूल जाता हूँ
जब भी तुम मुझे
नीचा दिखाना चाहते हो
सुनता हूँ इसी तरह
उसके बाद लम्बी ख़ामोशी तक
तुम मेरे चेहरे की ओर
देखते रहते हो
तौलते हो अपनी पैनी निगाहों से
चाह कर भी मेरी पथराई आँखों से
निकल नहीं पाते हैं आंसू
अपनी इस लाचारी पर
मैं हंस देता हूँ
अंदर तक धंसे तीरों को
लगभग अनदेखा करते हुए
तुम लौट पड़ते हो
अगले किसी
उपयुक्त अवसर की तलाश में.



4-कविता-उस दिन...उस रात......
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उस दिन अपने आप पर
बहुत कोफ़्त होती है
बहुत गुस्सा आता है
जिस दिन मेरे द्वार से
कोई लौट जाता है निराश
उस दिन मैं दिनभर
द्वार पर खड़ा रहकर
करता हूँ इंतजार
दूर से किसी वृद्ध भिखारी को देख
लगाता हूँ आवाज
देर तक बतियाता हूँ
डूब जाता हूँ
लौटते वक्त जब कहता है वह-
तुम क्या जानो बाबूजी
आज तुमने भीख में
क्या दिया है
मैं चौंक जाता हूँ
टटोलता हूँ अपने आप को
इतनी देर में वह
लौट जाता है खाली हाथ
साबित कर जाता है मुझे
कि मैं भी वही हूँ
जो वह है
उस दिन अपने आप पर......
उस रात
मैं सो नहीं पाता हूँ
दिन भर की तपन के बाद
जिस रात
चाँद भी उगलता है चिंगारी
खंजड़ी वाले का
करता हूँ इंतजार
दूर से देख कर
बुलाता  हूँ
करता हूँ अरज-
खंजड़ी वाले
आज तो तुम सुनाओ भरथरी
दहला दो आसमान
फाड़ दो धरती
धरा रह जाये
प्रकृति का सारा सौंदर्य
वह एक लम्बी तान लेता है
दोपहर में सुस्ताते पंछी
एकाएक फड़फड़ा कर
मिलाते है जुगलबंदी
उस रात.......



                        (चित्र गूगल से साभार )
५ बिटिया --------
बिटिया मेरी,
सेतु है,
बांधे रखती है,
किनारों को मजबूती से,
मैंने जाना है,
बेटी का पिता बनकर,
किनारे निर्भर होते हैं,
सेतु की मजबूती पर.

                          (चित्र गूगल से साभार )
-अरविन्द कुमार खेड़े.

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