सोमवार, 12 जनवरी 2015

पुदी उर्फ़ दीपू

                                             


पूदी उर्फ़ दीपू

‘तुम्हारा नाम क्या है दीपू ?’ – खेलते हुए बच्चे चिल्लाकर पूछते‘पू उ उ उ दि ‘— दीपू हो हो कर हँसते हुए बड़ी मुश्किल से बोल पाता उत्तरसुनकर खेलते – खेलते बच्चों का वह झुंड ताली बजा – बजाकर हंसने लगता.औरउन सबके साथ दीपू भी हो – हो कर हँसता जाता .बिना यह समझे कि वे सभी उसपर ही हँसे जा रहे हैं


                                                          गूगल से  साभार
       दीपू दस वर्ष का मानसिक – मंडित बच्चा था .अभी कुछ दिनों पूर्व हीएक छोटे से शहर से लखनऊ जैसे बड़े शहर में आया था .उस के माता – पितादोनों ही एक सरकारी विभाग में मुलाजिम थे और एक सरकारी कालोनी में रहतेथे .दीपू से किसी बच्चे ने दोस्ती नहीं की थी .वह तो अपने से दो वर्षबड़े भाई विभूति के साथ अक्सर आ जाता था खेलने . शहर में नया होने के कारण अपने नए मित्रों के दीपू के साथ के इस खेल का विभूति कभी विरोध नहीं कर पाता था .बस चुपचाप दीपू और अन्य बच्चों को हँसते हुए देखता रहताथा.बचपन से अपने छोटे भाई की इस त्रासदी को झेलने के कारण विभूति के मन मेंउस के  प्रति सहानुभूति की भावना धीरे – धीरे कम  होती जा रही थी .वह माँ के बहुत कहने पर ही दीपू को खेलने साथ लेकर आता थादीपू के जन्म पर पिता मुकुल सक्सेना ने एक पार्टी रखी थी .सभी नाते –रिश्तेदारों को बुलाला था .खूब धूम – धडाके हुए थे .पार्टी के बाद रिश्तेदारों और दीपू की माँ सुलोचना के आग्रह पर शहर के सबसे बड़े ज्योतिष को भी बुलाया था दीपू की जन्मकुंडली बनवाने के लिए   दीपू का भविष्य जानने की इच्छा से .दीपू की दादी ने उन ज्योतिष जी को ख़ास आग्रह कर कहा था – ‘पंडी जी जैसे हमारे बडके  पोता विभूति की कुण्डली आप ने मनसे बनाई है वैसे ही इन छोटके राजकुमार की भी बनाईये हम मुंहमांगा इनाम देंगे ‘और ,पंडीजी जो कुण्डली बना लाये  उस के मुताबिक़ दीपू का दिमाग बचपन से
ही काफी तेज होना था तथा  बड़े होने पर उसे एक विश्व – प्रसिद्ध हस्ती भीबनना था .कुण्डली जोर – जोर से पढ़कर मुकुल  सक्सेना ने सबको सुनाया था.उस दिन एक बार फिर से घर में खुशी ऎसी छिटकी कि उत्सव सा माहौल हो गया ‘दादी ने दीपू की बलैया लेते हुए कहा – मैं न कहती थी यह मेरा पोता हजारों- लाखों में एक है .किसी बहुत बड़े आदमी की आत्मा है इसके अन्दर ‘दादी की बात सुन भला दादा कहाँ चुप रहने वाले थे ‘तुरत ही बोल पड़े--‘पहली बार तुम ने बिलकुल सही बात की है मुकु की अम्मा .यह मेरे कुल का
नाम रोशन करेगा इसलिए इसका नाम दीपक रहेगा .’माता –पिता ,दादा –दादी सबके आकर्षण का केंद्र अपने छोटे भाई को बना देख
तब दो साल का विभूति मुंह लटकाए चुपचाप एक और बैठा था .उसकी  बाल –बुद्धि ने जब उसे अपनी हीनता का बोध कराया तो वह अचानक जोर – जोर से रो पडा .दादी ने उसे अपने पास खींच प्यार से सर सहलाते हुए रोने  का कारण पूछा तो उस ने बड़ी मासूमियत से कहा – ‘आप सब लोग सिर्फ इस दीपू को प्याल करते हो मुझे तो कोई प्याल  नहीं करता 



                                                  गूगल से साभार 

बच्चे की मासूमीयत पर रीझ दादी ने उसे  अपने से चिपका  माथा चूमते हुए कहा था –‘ अरे तू तो हमारा ही नहीं हमारे पुरे गाँव की विभूति बनेगा ‘ और दादी के प्यार से हँसता हुआ दो वर्ष का नन्हा विभूति दादी की गोद में लेट गया लेकिन ,जैसे –जैसे दीपू बड़ा होता गया सुलोचना और मुकुल के ह्रदय में
चिंता घर करने लगी .वह अपने बड़े भाई से अलग था .जिस उम्र में विभूति अपने भावों को माँ को अपनी क्रियाओं से समझा देता था – दीपू ऐसा कुछ न कर पाता. एक साल  का होते – होते चाईल्ड – स्पेशलिस्ट ने भी यह बता दिया कि दीपू का मानसिक विकास एक सामान्य बच्चे की तरह नहीं हो रहा . माँ के गर्भ में ही किसी कारण उस का मस्तिष्क सामान्य रूप से विकसित  नही हो पाया था .सुनकर सुलोचना की आँखों से आंसुओं का सैलाब बह निकला था .मुकुल चाह कर भी कोई दिलासा नहीं दे पा रहा था .तीन  साल का विभूति माँ को चुपचाप पास खडा रोते देखता रहता कभी ,करीब जा अपनी नन्हीं हथेलियों से आँसू पोछ पूछता – ‘ममा क्या हुआ ?क्यों रो रही हो ?’जवाब में सुलोचना उसे अपने पास खींच सीने से चिपटा लेती . इस पूरी प्रक्रिया के दौरान दीपू निर्विकार बैठा रहता .लेकिन ,जब बड़े भाई को माँ से चिपका देखता तो जोर – जोर से रोने लगता .उस की रुलाई से सुलोचना का कलेजा मुंह को आने लगता और वह विभूति को छोड़ झट दीपू को गोद में उठा प्यार करने लगती .माँ के कलेजे से लग दीपू को चैन मिलता और वह तुरत चुप हो जाता .दिन – प्रतिदिन उस की जिद्द भी बढ़ती जा रही थी ‘जिस चीज को पकड़ने या लेने की बात करता अगर वह नहीं मिल पा रही हो तो जब तक उसे पा नहीं लेता लगातार रोता रहता .मानसिक कमजोरियों के बावजूद उस में मानवीय भावों को समझने की अद्भुत क्षमता थी .उसे प्यार करने वाले व्यक्ति के ह्रदय में उस के प्रति सच्चा प्यार पल रहा है या वह सिर्फ  दिखावा कर रहा है – यह बात उसकी समझ में तुरत आ जाती और वह इस अनुसार अपनी प्रतिक्रियाएं भी प्रगट कर देता .दीपू की दादी को जब दीपू के बारे में डॉक्टर की बातों का पता चला तो दादी ने पूरे घर में यह कहते हुए हंगामा खडा कर दिया कि ज्योतिष की कही बात कभी झूठी नहीं हो सकती .जरुर डॉक्टर ने ही गलत बताया है .अत: दीपू को किसी बड़े अस्पताल में ले जाकर बड़े डॉक्टर से दिखाना होगा .दादी की लगातार जिद्द से मुकुल और सुलोचना को भी लगने लगा कि हो न हो इस डॉक्टर से कोई गलती हो गई है .सो उन्हों ने उसे एम्स,नई दिल्ली में ले जाकर चेक
– अप कराने का फैसला किया .इस बार दादी ने भी साथ चलने की जिद्द की . एम्स के बाल – रोग विभाग में डॉक्टर ने एक के बाद एक सवाल करने शुरू किये– ‘आपका बेटा कितने महीने का है ‘सुलोचना की जगह दादी ने उत्तर दिया – ‘एक बरस का हुआ है पिछले महीने ‘इस पर डॉक्टर ने एक चार्ट निकालते हुए कहा कि मैं क्रमवार जो पूछता जाऊं उसका अच्छे से सोचकर ठीक – ठीक जवाब बच्चे की माँ दे .सुलोचना ने हामी में सर हिलाया डॉक्टर चार्ट देखकर सवाल करने लगा –


                                             गूगल से साभार
“क्या आपका बच्चा तीन माह का होते ही आप को देखकर हंसने लगा था ?”“नहीं ,यह तो अभी भी कभी – कभी ही ऎसी प्रतिक्रया दे पाता है ““इसका सर कब स्थिर हुआ “
“जी छ: माह के बाद “
सुनते ही दादी ने तीखे लहजे में प्रतिवाद किया “आजकल की माएं अपने बनाव –सिंगार में ज्यादा ध्यान देती हैं .बच्चे की ढंग से चार – पांच बार मालिश हो तभी तो सर समय पर स्थिर होगा “सुनते ही डॉक्टर को गुस्सा आ गया और उसने दादी को संबोधित कर कहा – “माताजी ,आप डॉक्टर हैं या मैं .आप चुपचाप बैठे रहो और मुझे अपना काम करने द डॉक्टर की फटकार सुन दादी ने बुरा सा मुंह बनाया और घूम कर दरवाजे के बाहर देखने लगी .डॉक्टर ने अपना सवाल जारी रखते हुए सुलोचना से पूछा  – “आप का बच्चा अब पूरे एक साल का हो गया है क्या वह घुटने के बल चलता ह या पेट के बल खिसकने की कोशिश करता है ?”“नहीं डॉक्टर “ – सुलोचना ने गहरी उदासी से जवाब दिया .सुनकर पास खड़े जूनियर डॉक्टर  ने धीमे स्वर में कहा – “इस उम्र में दूसरे बच्चे चलने लगते हैं और आपका बच्चा अभी  रोलिंग भी नहीं कर पा रहा सुलोचना की आँखें दुःख से भर गईं .उसने कातर दृष्टि से सीनियर डॉक्टर को  देखते हुए कहा – “ डॉक्टर प्लीज़ किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले अच्छे से चेक – अप कर लें “सीनियर डॉक्टर  ने उसे दिलासा दते हुए  पास खड़े जूनियर डॉक्टर को इशारा किया और उस जूनियर ने सुलोचना की गोद से दीपू को ले पास के चेक –अप बेड पर लिटा दिया .फिर दोनों डॉक्टरस ने मिलकर दीपू का गहन चेक – अप कर वही कहा जो उनके शहर के डॉक्टर ने कहा था --- “ माँ के गर्भ में ही किसी कारण
दीपू ला मानसिक विकास अवरुद्ध हो गया .जिस कारण उसकी ग्रोथ  सामान्य बच्चे की तरह नहीं है .दीपू शारीरिक रूप से बड़ा तो होगा पर मानसिक रूप से वह एक बच्चा ही रहेगा .आप चाहें तो इसकी काउंसलिंग करवाएं .इससे इसकी मानसिक दशा में कुछ सुधार संभव है .”एम्स से होटल के कमरे में पहुंचते ही दादी ने डॉक्टर की बातों के विरोध में एक से एक तर्क देने शुरू कर दिए – ‘ये डाक्टर मुए ऐसे ही जो मन में आता है बोलते हैं . हमारे गाँव में उस रघु की बहु को कह दिया था कि उसे बच्चा नहीं होयेगा और देखों अब दो – दो बच्चे उसके आँगन में खेल रहे हैं.पूजा – पाठ ,और मौलवी जी के फूंके पानी का असर हुआ .मेरा दीपू भी ठीक हो
जाएगा .मुकु ,तुमने जो पार्टी में उतने लोगों को बुला अधिक खुशी जाहिर की यह उसका ही असर लगता है शायद किसी ने इसे नजर लगा दी है इसलिए यह ऐसा हो गया और फिर ज्योतिष – शास्त्र इतना पुराना शास्त्र होकर गलत नहीं हो सकता. इसे लेकर चलो गाँव – डीह पर बने सती माई के मंदिर में .वहाँ हम मन्नत मानेंगे और फिर जिन मौलवी जी का फूंका पानी रघु की बहु पी थी उन्हें ही
दिखाएँगे .’इतना कह उनहोंने दीपू को गोद में उठा कलेजे से चिपटा लिया .दुःख में डूबी सुलोचना का मन सास की बातों के पीछे भागता अपने बेटे के बारे में सुखद कल्पना कर उठा और मुकुल को देख उसने सास की बातों का समर्थन करते हुए कहा– ‘क्यों न हम उनउपायों को आजमा कर देख लें जो अम्मा कह रही हैं .हो सकता है इनसे हमारे दीपू की किस्मत शायद सुधर जाए .’पत्नी की बातों  से एक पिता का ह्रदय तुरत सहमत हो गया और अब तक के सारे प्रगतिशील विचारों को भूल वह भी मंदिरों की चौखट पर सर झुकाने और साधू –
संतों ,मौलवियों के पास अपनी समस्या का हल पाने को जाने के लिए तैयार हो गया .देश के सर्वोच्च  चिकित्सा – संस्थान को नकार शुरू हुआ गाँवों में ज़िंदा लोगों के भोले विश्वासों को ठगने  वालों की स्वार्थी चिकित्सा का अंतहीन सिलसिला 


                                                  गूगल से साभार


.अब  दीपू के पूर्ण सामान्य हो जाने की आशा में मुकुल और सुलोचना ऑफिस से लगातार छुट्टियां ले उन सभी धार्मिक स्थलों पर जाने लगे जहां किसी भी परिचित की मन्नत पूरी  होने की खबर उन्हें मिलती .उनके सर बाबाओं और मौलवियों के कदमों में भी झुकने लगे .इस तरह ,इन्हीं क्रियाओं में चिकित्सीय दृष्टि से महत्वपूर्ण दीपू के जीवन के कई वर्ष यूँ ही निकल गए.समय बीतता गया  और दीपू का शरीर बड़ा होता गया मन की तुलना में  .दीपू काउंसलिंग के अभाव में अपनी दैनिक क्रियाओं के लिए पूरी तरह सुलोचना पर ही निर्भर था .अत्यधिक प्यार भी उसके मानसिक विकास को रोक रहे थे .माता–पिता उसकी हर छोटी – बड़ी जिद्द पूरी तत्परता से पूरी करते  जिससे उसका बाल मन निरंतर और भी जिद्दी होता जा रहा था उसे अपना नाम ठीक – ठीक बोलना कई बार सुलोचना ने सिखाने की कोशिश की पर उसकी बातों को सुन वह हो – हो कर हंस टाल देता  .घर के अन्य सभी सदस्य वह जैसा था उसे वैसा ही स्वीकार
करते थे .इसलिए उसके व्यवहार और बोल – चाल में अनगढ़ता अन्य मानसिक मंडित बच्चों की तुलना में अधिक थी .और ,इसी कारण दस वर्ष की आयु में भी दीपू अपना नाम भी ठीक से नहीं बोल पाता था.दीपू की इस खामी की और सुलोचना और मुकुल का ध्यान तब गया जब सुलोचना के साथ काम करने वाले मिस्टर भल्ला के घर वे सभी एक दिन उनके बुलाने पर गए .वहाँ उनकी मुलाक़ात मिस्टर भल्ला की मानसिक मंदित बेटी से हुई .सुलोचना ने नोटिस किया कि मिस्टर भल्ला की बेटी है तो लगभग दीपू की
ऊम्र की ही पर उसमें कई  व्यवहारगत कुशलता भी है .जैसे – उसे अपना नाम सही – सही बोलना आता है ,माँ के कहने पर वह उनका हंसते हुए थोड़ी अनगढ़ता से ही सही पर ,अभिवादन भी करती है .सुलोचना ने जब इस बावत मिसेज भल्ला से बात की तो पता चला लखनऊ में मानसिक मंदित बच्चों का एक अत्यंत ही प्रतिष्ठित स्कूल है जो ,अपनी क्लासेज सामान्य बच्चों के क्लास ऑवर में
ही चलाता है जिस कारण मानसिक मंदित बच्चों को  काउंसलिंग के साथ-साथ सामान्य बच्चों का  बिहेवियर भी देखने को मिलता रहता है और वे कई बातें सीख लेते हैं ..मुकुल और सुलोचना ने बिना देरी किये दीपू का नामांकन उसी स्कूल में करा दिया दीपू अन्य बच्चों का साथ पा तथा समुचित काउंसलिंग से बहुत कुछ धीरे– धीरे सीखने लगा .अब वह अपना नाम पूदी  की जगह दीपू बोलने लगा तथा अपने रोज के क्रिया – कलापों के प्रति भी उसकी निर्भरता बढ़ती गई .समय अपनी रफ़्तार से बीतता चला गया .दीपू का बड़ा भाई विभूति अब इंजीनियर हो गया था और घर में उसकी शादी की तैयारियां चल रही थीं .दीपू शारीरिक रूप से एक सुन्दर युवा में बदल चुका था पर अब भी  मानसिक रूप से वह  एक छोटा बच्चा ही था .हां ,यह समझ उसमें आ गई थी कि कब और किस परिस्थिति में
उसे चुप रहना है .वह भी अपने बड़े भाई की शादी की खुशियों में घर आये बच्चों के  साथ नाच – गा रहा था .बच्चों के बीच नाचते – नाचते उसे अचानक कुछ याद आया और वह एकदम से नाचना छोड़ अपनी माँ सुलोचना के पास भाग कर आ उससे पूछ बैठा –‘माँ मेरी शादी कब होगी ?’ जवाब में सुलोचना कुछ कह पाती उसके पहले ही उसे पकड़ हो – हो कर हंसते हुए वह उससे लिपट गया .विभूति जब शादी कर आया तब दीपू अपनी सुन्दर सी भाभी के साथ भी ‘तुम कितनी सुन्दर हो ‘कहते हुए हो – हो कर हँसते हुए लिपट गया और उसके गालों पर सबके सामने एक चुम्बन भी अंकित कर दिया .सब ने इसे एक कामअक्ल  देवर की ठिठोली के रूप में ही लिया .लेकिन ,अपने विवाह के दूसरे दिन जब विभूति की नवविवाहिता पत्नी अपने कमरे में दोपहर के वक्त सो रही थी और विभूति अपने कुछ दोस्तों के साथ बाहर बैठा बातें कर रहा था तभी दीपू उसके कमरे में जा घुसा और सोती हुई भाभी के बगल में लेट उसके चेहरे पर कई चुम्बन अंकित कर दिए .भाभी इस अनायास जताए गए देवर के प्यार से हतप्रभ हो उठ बैठी और उसने कडे शब्दों में दीपू को कमरे से बाहर जाने को कहा . यह बात विभूति के माध्यम से सुलोचना तथा मुकुल के पास पहुंची .सुनकर दोनों अन्दर तक सिहर उठे और उन्हों ने इस विषय पर दीपू की काउंसलर मीनू शर्मा से मिलने का निर्णय लिया .अगले ही दिन वे मीनू शर्मा के पास अर्जेंट एप्वाईंन्टमेंट लेकर पहुंचे.सारी घटना सुन मीनू ने कहा – ‘ऐसे बच्चों का शरीर एक युवा का हो जाता है .भले ही इनका मानसिक विकास एक बच्चे का होता है लेकिन शरीर का सामान् विकास होने के कारण उसके अन्दर सभी सामान्य शारीरिक जरूरतें एक सामान्य युवा की तरह ही होती हैं 




                                                    गूगल से साभार 


.बस ,यह घटना इसलिए हुई क्योंकि वह अन्य सामान्ययुवकों की तरह अपनी भावना को संतुलित करने की क्षमता नहीं विकसित कर पाया.इसमें बहुत अधिक चिंता करने की बात नहीं है .आप लोग इसकी भी या तो शादी करा दें या इसे ऐसे माहौल से दूर रखें ‘‘पर ,शादी के बाद की जिम्मेवारियों को यह संभालेगा कैसे ?’- सुलोचना ने चिंता भरे स्वर में कहा .जवाब में मीनू शर्मा ने यह कह पल्ला झाड लिया कि यह बात तो पैरेन्ट्स के सोचने की है ,इसमें एक सईकाटिस्ट भला क्या राय दे सकती है .एक बार फिर सुलोचना दीपू के लिए घर आकर रो पड़ी .मुकुल ने ढाढस बंधाया कि कुछ न कुछ तो करेंगे ही हम अपने दीपू के लिए .इस घटना के कुछ दिनों के बाद एक मित्र ने चर्चा के दौरान सुझाया कि उनके एक गरीब रिश्तेदार है विश्वेश्वर .उनकी बेटी प्रीती देखने में सामान्य है पर ,पढी – लिखी तथा काफी समझदार है .उचित दहेज़ नहीं जुटा पाने के कारण वे अपनी इस योग्य पुत्री के विवाह के लिए काफी चिंतित हैं .अगर मुकुल की
सहमती हो तो वे उनसे दीपू की बात करें .’अंधे को क्या चाहिए – दो आँखें ‘मुकुल ने झट सहमती देते हुए कहा – ‘बस यार तू यह रिश्ता करा दे .हम लड़की को सर – आँखों पर बिठाएँगे .हम दोनों की कमाई का जो है वह दीपू के लिए ही तो है .लड़की अगर पढी – लिखी और समझदार है तो मैं अपने पैसों से उसके लिए एक स्कूल खुलवा  दूंगा जिसमें काम करते हुए वह अपनी गृहस्थी की गाड़ी भी चला ले जायेगी और मैं उसके माता – पिता की जरूरतों का भी ख़याल रखूंगा बस मेरे दीपू का घर बस जाए ‘गरीबी के मारे हुए विश्वेश्वर ने सारी बातों की जानकारी के बाद भी प्रीती के लिए यह रिश्ता स्वीकार लिया .प्रीती को सिवा इसके कि उसका होने वाला पति मानसिक मंदित है बाक़ी सबकुछ बता दिया गया – यह कि उसके ससुर काफी प्रगतिशील विचारों के हैं और वे शादी के बाद उसके संचालन के लिए एक स्कूल भी खुलवायेंगे आदि  आदि .सारी बातें जानकर प्रीती अपने भाग्य पर फूली नहीं समा रही थी और रिश्ते वाले दिन से ही अपनी शादी की बेसब्री से प्रतीक्षा करने लगी परन्तु ,शादी के समय मंडप पर कई बार उसे दीपू का व्यवहार कुछ अजीब सा लगा;जिससे वह कुछ  असहज सी हो गई .विदाई के बाद दीपू के साथ एक ही कार में एक साथ बैठकर आते हुए उसका शक यकीन में बदलता जा रहा था कि उसका पति कुछ असामान्य सा है .विवाह पूर्व के प्रीती के उछाह पर पानी पड़ता जा रहा था

                                                      गूगल से साभार
.उसका मन एक अथाह अँधेरे में डूबता जा रहा था .ससुराल में सारे रीति –रिवाजों से निबट जब वह और दीपू कमरे में अकेले हुए दीपू ने बिना किसी भूमिका के प्रीती को जोर से पकड़ बेतरह चूमना शुरू कर दिया . इस आक्रामक प्यार से घबडा प्रीती ने दीपक को जोर का धक्का दिया .पहले तो प्रीती के इस रवैये पर दीपक हो – हो कर हंसने लगा फिर अचानक कमरे से दौड़ते हुए भागता  – भागता सो रही सुलोचना के बगल में जा उससे लिपट रोने लगा सुलोचना को एकदम से कुछ समझ में नहीं आया .वह बेटे के साथ आँसू बहाती चुपचाप उसके आँसू पोछने लगी .कुछ मिनटों के बाद अपनी भावना को नियंत्रित कर सुलोचना ने दीपू को प्यार कर उसके रोने का कारण पूछा तो दीपू ने बड़े ही भोलेपन से कहा – ‘प्रीती ने मुझे मारा ‘सुनकर ,सुलोचना का कलेजा मुंह को आ गया .वह दीपू को लिए – लिए प्रीती के
पास कमरे में पहुंची तो देखा प्रीती तकिये पर सर गडाए लगातार रोये जा रही थी .सुलोचना ने अपने आप को संयत कर प्रीती के सर पर प्यार से हाथ फेरते हुए पूछा –‘बेटा ,क्या हुआ ?’सुनते ही प्रीती के आंसुओं से क्रोध की चिंगारियां फूट पडीं और उसने सर पर से सुलोचना का हाथ झटकते हुए कहा – ‘आप लोगों ने हमसे यह क्यों छुपाया कि आपका बेटा एक सामान्य इंसान नहीं पागल है सुलोचना ने स्वर में यथासंभव मिठास भरकर कहा – ‘बीटा दीपू एक पागल नहीं मानसिक मंदित लड़का है और यह बात हमने तुम्हारे पिताजी को बता दी थी.चाहो तो उनसे फोन पर बात कर सच्चाई पता कर लो ‘सुलोचना के स्वर की दृढ़ता ने प्रीती को उनके बातों की सच्चाई का आभास करा दिया .वह बिना कुछ बोले चुपचाप बैठी रही .तब सुलोचना ने उसके सर पर प्यार से हाथ फेरते हुए फिर कहा – ‘बेटा दो – चार रोज और रह लो .जब सारे रिश्तेदार चले जाएँ उसके बाद अगर तुम्हारा जी यहाँ नहीं लगे तो अपने मायके जाकर रह लेना और जब इच्छा हो यहाँ आना .हम तुम्हारे ऊपर कोई दवाब नहीं डालेंगे .हां ,तुम मेरे दीपू की ब्याहता हो तो हम तुम्हारे जीवन –यापन का सारा खर्च उठाएंगे .चाहे तुम अपने मायके में रहो या यहाँ रहो ‘चार –पांच दिन प्रीती ने किसी तरह काटे .इस बीच उसकी दीपू से कोई बात नही हुई .सुलोचना दीपू पर कड़ी निगाह रखती कि वह प्रीती के कमरे में कभी अकेला नहीं जाए .अन्दर से टूटी हुई सुलोचना के लिए सब के सामने अपने आप को सहज रखना काफी कठिन हो रहा था .बहु प्रीती के प्रति उसके मन में कहीं कोई आक्रोश नहीं था और न ही उसके व्यवहार से कोई शिकायत .वह प्रीती की परिस्थति में स्वयं को रखकर कई बार मन ही मन देख चुकी थी और इस कारण
प्रीती का व्यवहार उसे सामान्य ही लगता दीपू ,प्रीती के रूखे व्यवहार और माँ की अपने ऊपर कड़ी निगरानी के कारण
अक्सर बुझा – बुझा रहता .उसके बाल – मन को गहरी ठेस लगी थी .उसका मन प्रीती के प्रति बाल – क्रोध के भावों से भरता जा रहा था .जब – तब वह सुलोचना के सामने अपने भाव प्रगट करता – ‘माँ ,वह प्रीती बहुत खराब लड़की है .मुझसे बात भी नहीं करती .हमेशा मुंह सुजाये घूमती रहती है .उसे घर से निकाल दो ‘दीपू की बातें सुनकर सुलोचना वेदना भरी हंसी से दीपू का सर सहला कहती –
‘ऎसी बातें नहीं करते बेटा .वह तुम्हारी पत्नी है .भगवान् जी नाराज होजायेंगे ‘
‘लेकिन वह मुझसे बात क्यों नहीं करती ‘—दीपू गुस्से से चीखते हुए कहता .‘बात करेगी बेटा .उसे थोड़ा समय दो ‘‘कितना समय ‘ दीपू के स्वर में हर्ष मिश्रित उत्कंठा होती
‘मैं उससे पूछ कर बताऊँगी ‘ – सुलोचना स्वर में भरसक प्यार भर दीपू कोबहलाती .लेकिन इन चार दिनों में सुलोचना चाह कर भी प्रीती से खुल कर बात नहीं कर पाई .जब घर से विवाह में आये सभी रिश्तेदार चले गए तब प्रीती नेसास से आकर अपने घर जाने की बात कही 

                                                           गूगल से साभार 
.कुछ देर सोचने के बाद सुलोचना ने पति मुकुल से सलाह लेकर बताने को कहा .नुकुल सभी परिस्थितियों से वाकिफ था .अत: सुलोचना की बात सुन उसने कहा – ‘ मुझे इस समस्या का समाधान इसी में लग रहा है कि प्रीती अपने माता – पिता से मिलकर खुल कर दीपू और हमारे बारे में बात करे .अत: हमें बिना किसी हील – हुज्जत के प्रीती को उसके मायके जाने देना चाहिए .’चार – पांच दिनों बाद जब सारे रिश्तेदार चले गए और घर में सिर्फ सुलोचना,मुकुल  दीपू तथा प्रीती रह गए तो मुकुल ने प्रीती के पिता विश्वेश्वर को फोन कर बुला सारी परिस्थियों से अवगत करा दिया तथा कहा कि वे प्रीती को अपने घर ले जाकर कुछ महीने रख उसे अपने फैसले के बारे में समझाएं और जब प्रीती अपने मन से यहाँ आने के लिए तैयार हो जाए तब वे उसे पहुंचा जाएँ.वे और सुलोचना खुले ह्रदय से अपनी बहु का स्वागत करेंगें .विश्वेश्वर मुकुल और सुलोचना की सदाशयता के सामने नतमस्तक हो गए और उनके कहे अनुसार प्रीती को ले अपने घर आ गए .ससुराल से आई प्रीती से मिलने उसकी कई सहेलियां आतीं और चुहल कर उससे पति के बारे में पूछतीं तो प्रीती या तो बात बदल अपने सास – ससुर के बारे में बताने लगती या फिर शादी में आये किसी रिश्तेदार के बारे में .सभी इस में
उसके शालीन व्यक्तित्व की झलक पाते और प्रीती की प्रशंसा करते नहीं अघाते एक दिन ,प्रीती का मूड अच्छा देख विश्वेश्वर ने उसे बुला अपने फैसले की मजबूरी बताई .इस पर प्रीती धीमे स्वर में ‘बाबूजी ,पहले ही सब कुछ बता देते मुझे तो अच्छा रहता ;-- कह वहाँ से उठ कर चली गई .प्रीती का एक छोटा भाई भी था मनोज – जो अभी – अभी कॉलेज में गया था.परिवार की गरीबी के कारणों से उपजी विसंगतियों को वह भी अपने स्तर पर झेल रहा था .अक्सर कॉलेज से मुंह लटकाए वह घर आता ,एक दिन घर पर प्रीती
के अलावा कोई नहीं था ,माँ – बाबूजी किसी रिश्तेदार के यहाँ शादी में सम्मिलित होने गए थे ,मनोज ने आते ही किताबें जोर से पटक प्रीती से कहा ‘दीदी ,मैं इस गरीबी से तंग आ चुका हूँ .बाबूजी के पास कभी पैसे होते ही नहीं हैं .न तो ढंग के कपडे हैं और न ही कुछ  .रोज एक ही कपडे में कॉलेज जाना अच्छा नहीं लगता ‘‘लेकिन बाबूजी ने तुम्हारा एडमिशन शहर के बड़े कॉलेज में तो करवाया तो है
न .यह अलग बात है कि रोजाना तुम्हें वहाँ तक जाने में डेढ़ – दो घंटे लग जाते हैं .लेकिन मनोज तुम शिक्षा तो अच्छी पा रहे हो न ‘—प्रीती ने भाई पर प्यार भरी दृष्टि डालते हुए कहा .बहन की बात सुन मनोज चुपचाप सर झुकाए घर से बाहर निकल गया .प्रीती मनोज
को बाहर जाता देख चुपचाप उठी और मनोज की किताबें उठा उसे किताबों के लिए बनी अलमारी में रखने लगी तभी उसकी नजर किताबों के बीच से झाँकती मनोज कीएक फटी सी डायरी नजर आई .उत्सुकतावश वह डायरी निकाल पढ़ने लगी .दो – तीन
पृष्ठों पर दो – चार पंक्तियों की कवितायें लिखीं थीं .फिर कुछ पन्ने खाली थे .उन्हें निरुद्देश्य पलटने के बाद प्रीती की निगाह उन पन्नों परगई जो अत्यंत ही तल्लीनता से लिखे गए थे .प्रीती ने पढ़ना शुरू किया – ;मैं जाने क्यों पैदा हुआ ? मुझे मेरा होना सदा ही परेशान करता रहा है मैं एक गरीब माँ – बाप का लड़का .न तो मेरे पास अच्छे कपडे हैं और न ही
दोस्तों के ऊपर खर्च कर देने के लिए पैसे .मेरे अन्दर इतनी योग्यता भी नहीं कि मैं कॉलेज के स्पोर्ट्स का चैम्पियन बनूँ और न ही मैं पढ़ने में इतना तेज हूँ कि पूरे क्लास  का ध्यान मेरी और आकृष्ट हो .कद – काठी औसत;शक्ल – सूरत भी सामान्य .ऐसे में नव्या क्यों मेरी और आकृष्ट होगी भला ?एक औसत लडके को देख भर ले यही क्या काफी नहीं ? उस दिन अपने मित्रों सी घिरी नव्या को मैं ने जाकर सिर्फ हलो ही तो कहा था और उसने कितनी हिकारत से मुझे देख हलो के एक शब्द को चबाते हुए मुझे वापस किया  – इसे मैं कैसे भूल सकता हूँ ? उसके बाद मेरे वहाँ से चुपचाप निकल जाने के बाद वह बहुत देर तक अपने मित्रों के साथ हंसती रही थी .उसके बार – बार इग्नोर करने के बाद भी जाने क्यों मैं उससे ही प्यार करता हूँ .हर समय उसका ही ख़याल दिल में रहता है कि कैसे मैं उसका दिल जीतूँ ? दीदी जाने क्यों वापस आ गई है अपने ससुराल से .मुझे तो जीजू अपनी तरह ही लाचार से दिखाते हैं .शायद वे भी दीदी का दिल ही जीतना चाह रहे हों .किसी भी व्यक्ति में कोई कमी होना अपराध तो नहीं ? और फिर यह कमी उसकी खुद के द्वारा बनाई नहीं होती ;ईश्वर प्रदत्त कमियों और खूबियों के साथ जीने के लिए हम मजबूर हैं --- कई बार सोचता हूँ क्या कमियों से भरा  व्यक्तित्व सामान्य जिन्दगी जीने का हक नहीं रखता ?’


                                            गूगल से साभार 



                                               
यह अंतिम पंक्ति पढ़ते ही  डायरी फिसलकर प्रीती के हाथों से गिर गई और आँसू भरी आँखों के सामने मनोज का उदास चेहरा आ गया जो दीपू के भोले चेहरे में बदल गया .मनोज और दीपू के चेहरे एक – दूसरे में गडमड होते गए औरप्रीती अपना सर पकड़ वहीं जमीन पर बैठ घुटनों में अपना सर छुपा फूट – फूट कर रो पड़ी .अगले दिन जब विश्वेश्वाए वापस आये तो प्रीती के हाव – भाव उन्हें कुछ
बदले हुए लगे .विश्वेश्वर ने गौर किया की प्रीती के चेहरे का रंग उड़ा हुआ है और उसकी आँखें कभी उनके तो कभी माँ के चेहरे पर पड़ते ही भर जा रही हैं .विश्वेश्वर ने पत्नी को प्रीती के मन की थाह लेने को कहा .माँ ने बेटी को पास बुला बिठा कर जब पूछा कि वह क्या सोच रही है तो प्रीती ने पहले तो ‘कुछ भी नहीं माँ ‘ कह जबरदस्ती मुस्कुराकर बात टालने की कोशिश की .लेकिन माँ ने जब प्यार से उसके सर पर हाथ फेर स्वर में अतिरिक्त स्नेह भर कहा ‘ बेटी मुझसे अपने मन को कैसे छुपा पाओगी तुम ?’ तो ,इस
अतिरिक्त प्यार की उष्मा से प्रीती के सप्रयत्न जमाये हुए आँसू पिघल कर आँखों से बह निकले .वह माँ की गोद में सर रख फूट – फूट कर रो पड़ी .कुछ देर वह रोती  रही.जब आंसुओं का आवेग थोड़ा कम हुआ तो उसने माँ से कहना शुरू किया – ‘ माँ मुझे आप और बाबूजी माफ़ कर दें .मैं ने आप दोनों को गलत तो समझा ही अपने ससुराल वालों को भी बेबात की सजा दी .वहां भी सभी
बड़े दिल वाले हैं मुझे मेरी गलतियों की सजा न देकर मुझे उन्हें सुधारनेका अवसर दिया .अगर आप लोग बुरा न मानें तो मैं अपने ससुराल जाना चाहती हूँ .मुझे वहाँ भिजवा दो माँ ‘प्रीती की बात सुन भरी आँखों से हंसते हुए माँ ने कहा – ‘ बेटा यह बुरा
मानने नहीं बल्कि खुशी की बात है हमारे लिए कि हमारी बेटी को हमारा फैसला मंजूर है .मैं अभी तुम्हारे बाबूजी से कह तुम्हें भिजवाने की व्यवस्था करती हूँ .मुझे अपनी बेटी की समझ पर पूरा भरोसा है कि वह अपना जीवन अधिक
अच्छे से संवारेगी ‘इस घटना के दो दिनों के बाद ही प्रीती अपने ससुराल वापस आ गई .सुलोचना और मुकुल ने उसका स्वागत खुले ह्रदय से किया .दीपू प्रीती को आया देख खुश हो प्रीती आ गई ,प्रीती आ गई ‘ कहता हुआ पूरे घर में घूमता हंसता रहा लेकिन इस बार सुलोचना ने सावधानी बरती और दीपू को प्रीती के पास अकेले नहीं जाने दिया .रात में जब दीपू प्रीती के पास कमरे में चला गया तो
सुलोचना झट उसके पास आ उसका हाथ पकड़ बोली ‘ बीटा प्रीती अभी थकी हुई हैं न इसलिए तुम मेरे साथ ही चलकर सो जाओ ‘ फिर उसने प्रीती की और मुखातिब हो कहा -- –‘जब तक तुम  नहीं चाहोगी दीपू मेरे ही पास सोयेगा .और हां ,कल हम सब पूजा करने पास के शिवाला में जायेंगे तो सुबह स्नान कर तैयार हो जाना प्रीती ने सर हिलाकर चुपचाप अपनी स्वीकृति जता दी .अगले दिन दीपू  उत्साह से तैयार हो माँ और पत्नी के साथ शिवाला गयासुलोचना ने बड़े प्यार से दोनों को पूजन करा शिव – पार्वती की तरह सदासाथ रहने का आशीर्वाद दिया .

                                                                 गूगल से साभार
मंदिर से लौटते हुए दीपू की निगाह मंदिर की दीवार पर बने भित्तिचित्र पर पड़ी .चित्र देख दीपू हो – हो कर हंसने लगा .माँ ने जब हंसने का कारण पूछा तो उसने मासूमियत से माँ से ही सवाल कर दिया – ‘वह चित्र तो देखो .-आधा में स्त्री है और आधे में पुरुष हो हो हो  चित्र बनाने वाले को बनाने नही आया ‘ सुलोचना ने हल्के मुस्कुराते हुए जवाब दिया – ‘बेटा यह चित्र  शिव जी केअर्द्धनारीश्वर रूप का है .विवाह के बाद सब को ऐसे ही जीना चाहिए आधा पुरुष और आधी नारी मिलकर ही एक स्वस्थ परिवार बनाते हैं ---- मतलब नारी
और पुरुष दोनों जब मिलते हैं तभी शिव जी का कल्याणकारी रूप बनता है और शिव जी भी ऐसे ही जोड़ों से खुश भी रहते हैं ,जो अपने जीवन में इस बराबरी की बात को उतारते हैं  ‘‘जैसे कि मैं और प्रीती है न माँ !‘
‘हां बेटा ‘ – प्यार से कहते हुए सुलोचना ने बहु को कनखियों से देखा प्रीती का चेहरा किसी सोच में डूबा हुआ था .
घर पहुंचते ही दीपू ने प्रीती को माँ के पास भेज अपने आप को कमरे में बंद कर लिया .कमरे में बंद – बंद जब दीपू को काफी देर हो गई तो प्रीती ने सास से दीपू के बारे में अपनी चिंता जाहिर की .सुलोचना को बहु की यह चिंता अत्यंत भली
लगी और वह मुस्कुराते हुए प्रीती को साथ ले दीपू के कमरे पास जा उसे आवाज देने लगी . पत्नी की आवाज सुन मुकुल भी पास आ दीपू को पुकारने लगे .माता– पिता की आवाज सुन दीपू ने अन्दर से ही कहा – ‘बस माँ अभी थोड़ा रुको आ रहा हूँ ‘और जब दसेक मिनट के बाद दरवाजा खुला तो सब के मुंह आश्चर्य से खुले रह गए.सब ने देखा दीपू का एक पैर शायद शेविंग रेजर चला बाल हटाने से जहां –
तहां कट गया है और उससे खून छलक रहा है .उसने आफ पेंट पहन रखी है ,दूसरे पैर में प्रीती की एक साड़ी लपेट कंधे पर डाली हुई  है .साडी लिपटे पैर के नाख़ून जैसे – तैसे रँगे  हुए हैं ,उसमें दीपू ने पायल पहन रखी है.आधे ओठों पर लिपस्टिक फैली पड़ी है .ललाट पर बिंदी चमक रही है एक कलाई में कुछ कांच की चूड़ियाँ हैं .बेटे का यह रूप देख सुलोचना की आँखों में आँसू आ गए .रुंधे गले से उसने पूछा ---‘ यह क्या बेटा ?’हो हो कर हंसते हुए दीपू बोला – ‘माँ तुमने बताया था न मंदिर में शिव जी जिससे खुश होते हैं वही ‘
‘हां हां अर्द्धनारीश्वर रूप  .लेकिन यह पैर के बाल क्यों शेव कर डाले तुमने ‘’चित्र वाले रूप के पैर में भी बाल नहीं थे .माँ अब तो शिव जी खुश हो जायेंगे और प्रीती मुझे मारने के बदले प्यार करेगी न ‘
दीपू की बातों ने सबकी आँखों में आँसू भर दिए .तभी सब ने देखा ;प्रीती लगभग दौड़ते हुए आकर दीपू के सीने से लगी रो रही
है .दीपू उसे चुप कराते हुए कह रहा है – ‘चुप हो जाओ प्रीती नहीं तो मै भी रोने लगूंगा .अब तो मुझे प्यार करोगी न !देखो अब हम एक रूप हो गए हैंसचमुच के ‘ और दीपू के आँखों के आँसू प्रीती की आँखों से जा मिलने लगे .
सुलोचना खुशी के अतिरेक से मुकुल के कन्धों पर सर रख रो पड़ी .‘अर्द्धनारीश्वर आज सचमुच धरती पर अवतरित  हो गए हैं’ – मुकुल ने अपने आँसू पोछते हुए कहा .दीपू के इस भोले प्यार को प्रीती ने सहज भाव से स्वीकार लिया .प्यार की इतनी सुन्दर परिभाषा उसने केवल पढी थी लेकिन वह इस रूप में उसके जीवन मेंआयेगा यह बात उसकी कल्पना के परे थी .

वीणा वत्सल 
सलाहकार सम्पादक "अटूट बंधन "
राष्ट्रिय मासिक पत्रिका 




6 टिप्‍पणियां:

  1. E वीणा जी आज तक आपकी कलम को बस फेसबुक में ही पढ़ा है!
    आज पहली बार आपकी इस कहानी को अटूट बंधन ब्लॉग में पढ़ रहा हूँ... इसका भी लिंक फेसबुक से ही मिला...
    बहुत अच्छी कहानी...
    कहानी अपनी शुरुआत से लेकर अंत तक बांधे रखती है...
    यही कहानी की सबसे बड़ी खूबी है!
    हार्दिक बधाई आपको!

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  2. दिल को छूती बेहतरीन कहानी। बधाई

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  3. गजब
    सुन्दर भाव-भूमि पर अंकुरित हुई भावनाओं को नमन.

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