मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

नवरात्र पर विशेष : असतो मा सदगमय

नवरात्रिमें यथाशक्ति श्री दुर्गासप्तशती पाठ करते हैं ।मार्कंडेय पुराणमें इसी देवीचंडीका माहात्म्य बताया है । उसमें देवीके विविध रूपों एवं पराक्रमोंका विस्तारसे वर्णन किया गया है । इसमेंसे सात सौ श्लोक एकत्रित कर देवी उपासनाके लिए `श्री दुर्गा सप्तशतीनामक ग्रंथ बनाया गया है । सुख, लाभ, जय इत्यादि कामनाओंकी पूर्तिके लिए सप्तशतीपाठ करनेका महत्व  बताया गया है

शारदीय नवरात्रिमें यह पाठ विशेष रूपसे करते हैं । कुछ घरोंमें पाठ करनेकी कुलपरंपरा ही है । पाठ करनेके उपरांत हवन भी किया जाता है । इस पूरे विधानको `चंडीविधानकहते हैं । संख्याके अनुसार नवचंडी, शतचंडी, सहस्रचंडी, लक्षचंडी ऐसे चंडीविधान बताए गए हैं । प्राय: लोग नवरात्रिके नौ दिनोंमें प्रतिदिन एक-एक पाठ करते हैं । पाठके उपरांत पोथीपर फूल अर्पित करते हैं ।  उसके उपरांत पोथीकी आरती करते हैं ।
श्री दुर्गासप्तशती पाठमें देवीमांके विविध रूपोंको वंदन किया गया है ।
श्री दुर्गासप्तशती पाठकरनेके परिणाम
१.  भावसहित पाठ करनेसे व्यक्तिमें भावका वलय निर्माण होता है ।

२ ईश्वरीय तत्व का  प्रवाह श्री दुर्गासप्तशती ग्रंथमें आकृष्ट होता है 
३. संस्कृत शब्दोंके कारण चैतन्यका प्रवाह श्री दुर्गासप्तशती ग्रंथमें आकृष्ट होता है ।
४. श्री दुर्गासप्तशती ग्रंथमें मारक शक्तिका प्रवाह आकृष्ट होता है ।
५.    मांत्रिकोंद्वारा अर्थात पातालकी बलशाली आसुरी शक्तियोंद्वारा व्यक्तिके देहपर लाया गया काली शक्तिका आवरण तथा देहमें रखी काली शक्ति नष्ट होते हैं ।
६. व्यक्तिके देहके चारों ओर सुरक्षा कवच निर्माण होता है ।

श्री दुर्गासप्तशती अनुष्ठान विधि
श्री दुर्गासप्तशती महायज्ञ / अनुष्ठान विधि

भगवती मां दुर्गाजी की प्रसन्नता के लिए जो अनुष्ठान किये जाते हैं उनमें दुर्गा सप्तशती का अनुष्ठान विशेष कल्याणकारी माना गया है। इस अनुष्ठान को ही शक्ति साधना भी कहा जाता है। शक्ति मानव के दैनन्दिन व्यावहारिक जीवन की आपदाओं का निवारण कर ज्ञान, बल, क्रिया शक्ति आदि प्रदान कर उसकी धर्म-अर्थ काममूलक इच्छाओं को पूर्ण करती है एवं अंत में आलौकिक परमानंद का अधिकारी बनाकर उसे मोक्ष प्रदान करती है। दुर्गा सप्तशती एक तांत्रिक पुस्तक होने का गौरव भी प्राप्त करती है। भगवती शक्ति एक होकर भी लोक कल्याण के लिए अनेक रूपों को धारण करती है। श्वेतांबर उपनिषद के अनुसार यही आद्या शक्ति त्रिशक्ति अर्थात महाकाली, महालक्ष्मी एवं महासरस्वती के रूप में प्रकट होती है। इस प्रकार पराशक्ति त्रिशक्ति, नवदुर्गा, दश महाविद्या और ऐसे ही अनंत नामों से परम पूज्य है। श्री दुर्गा सप्तशती नारायणावतार श्री व्यासजी द्वारा रचित महा पुराणों में मार्कण्डेयपुराण से ली गयी है। इसम सात सौ पद्यों का समावेश होने के कारण इसे सप्तशती का नाम दिया गया है। तंत्र शास्त्रों में इसका सर्वाधिक महत्व प्रतिपादित है और तांत्रिक प्रक्रियाओं का इसके पाठ में बहुधा उपयोग होता आया है। पूरे दुर्गा सप्तशती में 360 शक्तियों का वर्णन है। इस पुस्तक में तेरह अध्याय हैं। शास्त्रों के अनुसार शक्ति पूजन के साथ भैरव पूजन भी अनिवार्य माना गया है। अतः अष्टोत्तरशतनाम रूप बटुक भैरव की नामावली का पाठ भी दुर्गासप्तशती के अंगों में जोड़ दिया जाता है। इसका प्रयोग तीन प्रकार से होता है।
[ 1.] नवार्ण मंत्र के जप से पहले भैरवो भूतनाथश्च से प्रभविष्णुरितीवरितक या नमोऽत्त नामबली या भैरवजी के मूल मंत्र का 108 बार जप। 
[ 2.] प्रत्येक चरित्र के आद्यान्त में 1-1 पाठ।
[ 3.] प्रत्येक उवाचमंत्र के आस-पास संपुट देकर पाठ। नैवेद्य का प्रयोग अपनी कामनापूर्ति हेतु दैनिक पूजा में नित्य किया जा सकता है। यदि मां दुर्गाजी की प्रतिमा कांसे की हो तो विशेष फलदायिनी होती है। 
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श्री दुर्गासप्तशती का अनुष्ठान कैसे करें।
1. कलश स्थापना
2. गौरी गणेश पूजन 
3. नवग्रह पूजन 
4. षोडश मातृकाओं का पूजन 
5. कुल देवी का पूजन 
6. मां दुर्गा जी का पूजन निम्न प्रकार से करें।
आवाहन : आवाहनार्थे पुष्पांजली सर्मपयामि। 
आसन : आसनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि। 
पाद : पाद्यर्यो : पाद्य समर्पयामि। 
अर्घ्य : हस्तयो : अर्घ्य स्नानः । 
आचमन : आचमन समर्पयामि। 
स्नान : स्नानादि जलं समर्पयामि। 
स्नानांग : आचमन : स्नानन्ते पुनराचमनीयं जलं समर्पयामि। 
दुधि स्नान : दुग्ध स्नान समर्पयामि। 
दहि स्नान : दधि स्नानं समर्पयामि। 
घृत स्नान : घृतस्नानं समर्पयामि। 
शहद स्नान : मधु स्नानं सर्मपयामि। 
शर्करा स्नान : शर्करा स्नानं समर्पयामि। 
पंचामृत स्नान : पंचामृत स्नानं समर्पयामि।
गन्धोदक स्नान : गन्धोदक स्नानं समर्पयामि 
शुद्धोदक स्नान : शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि
वस्त्र : वस्त्रं समर्पयामि 
सौभाग्य सूत्र : सौभाग्य सूत्रं समर्पयामि
चदंन : चदंन समर्पयामि
हरिद्रा : हरिद्रा समर्पयामि 
कुंकुम : कुंकुम समर्पयामि 
आभूषण : आभूषणम् समर्पयामि 
पुष्प एवं पुष्प माला : पुष्प एवं पुष्पमाला समर्पयामि 
फल : फलं समर्पयामि 
भोग (मेवा) : भोगं समर्पयामि 
मिष्ठान : मिष्ठानं समर्पयामि 
धूप : धूपं समर्पयामि। 
दीप : दीपं दर्शयामि। 
नैवेद्य : नैवेद्यं निवेदयामि। 
ताम्बूल : ताम्बूलं समर्पयामि।
भैरवजी का पूजन करें इसके बाद कवच, अर्गला, कीलक का पाठ करें। यदि हो सके तो देव्यऽथर्वशीर्ष, दुर्गा की बत्तीस नामवली एवं कुंजिकस्तोत्र का पाठ करें। नवार्ण मंत्र : ''ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै'' का जप एक माला करें एवं रात्रि सूक्त का पाठ करने के बाद श्री दुर्गा सप्तशती का प्रथम अध्याय से पाठ शुरू कर तेरह अध्याय का पाठ करें। पाठ करने के बाद देवी सूक्त एवं नर्वाण जप एवं देवी रहस्य का पाठ करें। इसके बाद क्षमा प्रार्थना फिर आरती करें। पाठ प्रारंभ करने से पहले संकल्प अवश्य हो। पाठ किस प्रयोजन के लिए कर रहे हैं यह विनियोग में स्पष्ट करें।
नवरात्रिमें घटपर स्थापित देवीमांका पूजन करनेकी पद्धति
नवरात्रिके प्रथम दिन घटस्थापना के साथ श्री दुर्गादेवीका आवाहन कर स्थापना करते हैं । इसके उपरांत देवीमां के नित्यपूजनके लिए पुरोहितकी आवश्यकता नहीं होती । पूजाघरमें रखे देवताओंके नित्य पूजनके साथही उनका पूजन करते हैं । देवीमांके स्नानके लिए फूलद्वारा जल प्रोक्षण करते हैं । इसके उपरांत देवीमांको अन्य उपचार अर्पित करते हैं । पूजनके उपरांत वेदीपर बोए अनाजपर जल छिडकते हैं ।
देवी  माँ की आरती
देवताकी आरती करना देवतापूजनका एक महत्त्वपूर्ण अंग है । आरतीका अर्थ है, देवताके प्रति शरणागत होना और उनका कृपाप्रसाद प्राप्त करनेके लिए आर्तभावसे उनका स्तुतिगान करना! मनुष्यके लिए कलियुगमें देवताके दर्शन हेतु आरती एक सरल माध्यम है । आरतीके माध्यमसे अंत:करणसे देवताका आवाहन करनेपर देवता पूजकको अपने रूप अथवा प्रकाशके माध्यमसे दर्शन देते हैं । इसीलिए हमारे ऋषि-मुनियों  एवं संतोंने विभिन्न देवताओंकी आरतीकी रचना की ।
देवीमांकी कृपा प्राप्त करनेके लिए उनकी आरती करते समय कुछ सूत्रोंका ध्यान रखना लाभदायक है । ये सूत्र हैं । देवीकी आरती मध्यम वेगसे, आर्त्त स्वर में तथा भावसे गाइए । संभव हो, तो आरती करते समय शक्तियुक्त तरंगें निर्माण करनेवाले चर्मवाद्य हलके हाथसे बजाइए । देवीकी आरती दक्षिणावर्त्त अर्थात दिशामें पूर्ण गोलाकार पद्धतिसे उतारिए ।

आरती के उपरांत देवीमांकी एक अथवा नौ की संख्यामें परिक्रमा करनी चाहिए । इन सभी कृतियोंको भावसहित करनेसे पूजकको देवी तत्व का  अधिक लाभ मिलता है ।

विभिन्न श्रोतों से 

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