बुधवार, 28 जनवरी 2015

तौबा इस संसार में ...... भांति- भांति के प्रेम

तौबा इस संसार में............. भांति भांति के प्रेम




   वंदना बाजपेयी                   गूगल से साभार  

वसन्त ऋतु तो अपनी दस्तक दे चुकी है , वातावरण खुशनुमा है ,पीली सरसों से खेत भर गए है, कोयले कूक रहीं हैं पूरा वातावरण सुगन्धित और मादक हो गया है ....उस पर १४ फरवरी भी आने वाली है .... जोश खरोश पूरे जोर शोर पर है ,सभी बच्चे बच्चियाँ ,नव युवक युवतियाँ नव प्रौढ़ प्रौढ़ाये ,बाज़ार ,टी .वी चैनल ,पत्र पत्रिकाएँ आदि आदि प्रेम प्रेम चिल्लाने में मगन हैं | हमारे मन में यह जानने  की तीव्र इक्षा हो रही है कि ये प्रेम आखिर कितने प्रकार होते  है ,दरसल जब हम १७ ,१८ के हुए तभी चोटी पकड़ कर मंडप में बिठा दिए गए .... बाई गॉड की कसम जब तक समझते कि प्रेम क्या है तब तक नन्हे बबलू के पोतड़े बदलने के दिन आ गए फिर तो बेलन और प्रेम साथ साथ चलता रहा ....( समझदार को ईशारा काफी है ) हां तो मुद्दे की बात यह है  रोमांटिक  फिल्मे देख देख कर और प्रेम प्रेम सुन कर हमारे कान पक गए हैं और हमने सोचा की मरने से पहले हम भी जान ले की ये प्रेम आखिर कितने प्रकार का  होता है इसीलिए अपना आधुनिक इकतारा (  मोबाइल )उठा कर निकल पड़े सड़क पर (आखिर साठ  की उम्र में सठियाना तो बनता ही है) |सड़कों पर हमें तरह तरह के प्रेम देखने को मिले ,प्रेम के यह अनेकों रंग हमें मोबाईल की बदलती रिंग टोन  की तरह कंफ्यूज करने वाले लगे .... सब वैसे का वैसा आप के सामने परोस रही हूँ ..................
१ )छुपाना भी नहीं आता ,जताना भी नहीं आता  :-
                                       ये थोडा शर्मीले किस्म का प्रेम होता है इसमें प्रेमी ,प्रेमिका प्यार तो करते पर इजहार करने में कतराते हैं पहले आप ,पहले आप की लखनवी गाडी में सवारी करने की कोशिश में अक्सर वो प्लेटफार्म पर ही रह जाते हैं |ये तो बिहारी के नायक नायिका से भी ज्यादा कच्चे दिल के होते हैं जो कम से कम भरे भवन में नैनों से तो बात कर लेते थे खैर आपको ज्यादा निराश होने की जरूरत नहीं है ....आजकल ऐसा प्रेम ढूढना दुलभ है आप चाहे तो www.google.प्रेम आर्काइव पर जा कर इसके बारे में अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं |
२ )हमारे सिवा तुम्हारे और कितने दीवाने हैं :-
                      ये कुछ ज्यादा समझदार  वाले प्रेमी /प्रेमिका होते हैं ...  इनको इस बात की इतनी खबर  रहती है कि भगवन न करे कोई दिन ऐसा आजाये की इन्हें बिना पार्टनर के रहना पड़े  इसलिए ये सेफ गेम खलने में विश्वास करते हैं .... इनकी इन्वोल्वमेंट  इक साथ कई के साथ रहती है
तू नहीं तो तू सही  की तर्ज पर |इसके लिए ये काफी मेहनत  भी करते हैं इनके खर्चे भी बढ़ जाते हैं .... पर अपनी घबराहट दूर करने के लिए ये हर जोखिम उठाने को तैयार रहते हैं |पर बहुधा इनके मोबाईल व् खर्चों के बिल देखकर इनके माता पिता का दिल साथ देना छोड़ देता  है |सुलभ दैनिक द्वारा कराये गए सर्वे के अनुसार युवा बच्चों के माता पिता को हार्ट अटैक आने का कारण अक्सर यही पाया गया है |
३ )तुम्हारा चाहने वाला खुदा की दुनियाँ में मेरे सिवा भी कोई और हो खुदा न करे :-
                                ये थोडा पजेसिव टाइप के होते हैं अग्निसाक्षी के नाना पाटेकर की तरह इन्हें बिलकुल भी बर्दास्त  नहीं होता कि उनके साथी को कोई दूसरा पसंद करे ... इन्हें दोस्त तो दोस्त माता पिता भाई बहन भी अखरते हैं किसी ने भी अगर साथी की जरा सी भी तारीफ कर दी तो हो गए आग बबूला और शुरू हो गयी ढिशुम ढिशुम |ये अपने साथी को डिब्बे में बंद करने में यकीन करते हैं ,सुविधानुसार निकाला ,प्रेम व्रेम किया वापस फिर डब्बे में बंद |अफ़सोस यह है कि इतना प्यार करने के बाद भी इन प्रेम कहानियों का अंत ,हत्या ,आत्महत्या या अलगाव से ही होता है
४ )मिलो न तुम तो हम घबराए :-
                    ये थोडा शक्की किस्म का प्रेम होता है |इसमें बार बार मोबाइल से फोन कर इनफार्मेशन ली जाती है अब कहाँ हो ,अब कहाँ हो ?मिलने पर कपडे चेक किये जाते हैं कपड़ों पर पाए जाने वाले बाल ,बालों की लम्बाई उनका द्रव्यमान ,घनत्व आदि शोध के विषय होते हैं .... तकरार ,मनुहार और  प्यार इसका मुख्य हिस्सा होते हैं ,साथ ही साथ इस प्रकार प्रेम करने वाले इंटेलिजेंट  भी होते हैं कभी कभी अपने साथी पर नज़र रखने के लिए अपनी सहेलियों ,दोस्तों आदि का सहारा भी लेता हैं आजकल तमाम जासूसी संस्थाएं यह सेवा उपलब्ध  करा रही हैं .........जैसे महानगर साथी जासूसी निगम  आदि कुछ मोबाइल कम्पनियां साल में दो बार जासूसी करवाने पर तीसरी सेवा मुफ्त देती हैं


                         
५ )जो मैं कहूंगा करेगी .... राईट :-
                          ये थोडा डिक्टेटर टाइप के होते हैं |इन्हें लगता है की ये सही हैं और अगला गलत ,इनसे कितनी भी बहस कर लो अंत में अपनी ही बात मनवा लेते हैं ,उस पर तुर्रा यह कि कहते हैं कि प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ है |प्रेमी प्रेमिका का रिश्ता बिलकुल ग्रेगर जॉन  मेंडल (पहला नियम ) की पीज (मटर ) की तरह डोमिनेंट व् रेसिसिव की तरह चलता है और खुदा न खास्ता इनकी शादी करवा दी जाए तो इनके बच्चे भी ३ :१ के अनुपात में डोमिनेंट व् दब्बू पाए जाते हैं |
६ )खुल्लम खुल्ला प्यार करेंगे हम दोनों :
                           यह नए ज़माने का प्यार आजकल बहुतायत से पाया जाता है |महानगरों में पार्कों ,सडको के किनारे ,माल्स ,रेस्त्रों आदि में आप यह आम नज़ारा देख सकते है |आप की वहां से गुजरते समय भले शर्म  से आँखें झुक जाए पर यह निर्भीक  युगल अपने सार्वजानिक  प्रेम प्रदर्शन में व्यस्त ही रहते हैं | वैधानिक चेतावनी :ऐसे प्रेमी युगलों को देख कर पुराने ज़माने के बुजुर्गों की सचेत करने वाली खांसी की तरह खासने का प्रयास न करे ..... ईश्वर गवाह है खांसते खांसते टेटुआ बाहर निकल आएगा पर इनकी कान पर जूं भी न रेंगेगा |




७ )ना उम्र की सीमा हो ना जन्म का हो बंधन :-
                              इसे एक नया नाम मिला है ४० +प्रेम जिसके बारे में आजकल तमाम कवितायेँ यहाँ तक विवादस्पद सम्पादकीय भी लिखे जा रहे हैं | , होता यह है कि जब बाल सफ़ेद होने लगते हैं ,दांत और आंत के हालत थोड़े बिगड़ने लगते हैं तो अपनी उम्र को धत्ता बताने  की कोशिश में दिल तो बच्चा है जी की तर्ज पर कई नव प्रौढ़ प्रौढाए इस दिशा में बढ़ने  लगते हैं |ना उम्र की सीमा हो न जन्म का हो बधन कह कर प्रेम की शुरुआत करने वाले इन जोड़ों के प्रेम की उम्र बहुत छोटी होती है .... फेस बुक से शुरू हुआ यह प्रेम  अक्सर ट्विटर तक आते आते दम तोड़ देता है और दोनों अपने अपने बच्चों की शादी की तैयारियों  में मगन हो जाते हो ...जो इक्षुक हो वो फर्जी आई डी से फेस बुक की शरण में जा सकते हैं |
                          खैर ! यह तो थी प्रेम की विभिन्न किस्मे जिनके बारे में  मैंने सुबह से शाम तक घूम घूम कर काफी जानकारी ईकट्ठी की है |अब तो मेरे इकतारे की बैटरी भी जवाब दे गयी है .... ऊपर से ये ६० की उम्र जिसमें दिमाग तो सठियाने ही लगता है साथ ही साथ परिया भी परपराने लगती हैं....अब घर चलती हूँ पर मेरी शोध जारी है ,आगे भी बताती रहूंगी .....


सोमवार, 26 जनवरी 2015

देश भक्ति की कवितायेँ



जवानी                                                                                                                     

प्राण अन्तर में लिये, पागल जवानी !
कौन कहता है कि तू
विधवा हुई, खो आज पानी?
 
चल रहीं घड़ियाँ,
चले नभ के सितारे,
चल रहीं नदियाँ,
चले हिम-खंड प्यारे;
चल रही है साँस,
फिर तू ठहर जाये?
दो सदी पीछे कि 
तेरी लहर जाये?

पहन ले नर-मुंड-माला, 
उठ, स्वमुंड सुमेस्र् कर ले;
भूमि-सा तू पहन बाना आज धानी
प्राण तेरे साथ हैं, उठ री जवानी!

द्वार बलि का खोल
चल, भूडोल कर दें,
एक हिम-गिरि एक सिर
का मोल कर दें
मसल कर, अपने
इरादों-सी, उठा कर,
दो हथेली हैं कि
पृथ्वी गोल कर दें?

रक्त है? या है नसों में क्षुद्र पानी!
जाँच कर, तू सीस दे-देकर जवानी?

वह कली के गर्भ से, फल-
रूप में, अरमान आया!
देख तो मीठा इरादा, किस
तरह, सिर तान आया!
डालियों ने भूमि स्र्ख लटका
दिये फल, देख आली !
मस्तकों को दे रही
संकेत कैसे, वृक्ष-डाली !

फल दिये? या सिर दिये?त तस्र् की कहानी-
गूँथकर युग में, बताती चल जवानी !

श्वान के सिर हो-
चरण तो चाटता है!
भोंक ले-क्या सिंह
को वह डाँटता है?
रोटियाँ खायीं कि
साहस खा चुका है,
प्राणि हो, पर प्राण से
वह जा चुका है।

तुम न खोलो ग्राम-सिंहों मे भवानी !
विश्व की अभिमन मस्तानी जवानी !

ये न मग हैं, तव
चरण की रखियाँ हैं,
बलि दिशा की अमर
देखा-देखियाँ हैं।
विश्व पर, पद से लिखे
कृति लेख हैं ये,
धरा तीर्थों की दिशा
की मेख हैं ये।

प्राण-रेखा खींच दे, उठ बोल रानी,
री मरण के मोल की चढ़ती जवानी।

टूटता-जुड़ता समय
`भूगोल' आया,
गोद में मणियाँ समेट
खगोल आया,
क्या जले बारूद?-
हिम के प्राण पाये!
क्या मिला? जो प्रलय
के सपने न आये।
धरा?- यह तरबूज
है दो फाँक कर दे,

चढ़ा दे स्वातन्त्रय-प्रभू पर अमर पानी।
विश्व माने-तू जवानी है, जवानी !

लाल चेहरा है नहीं-
फिर लाल किसके?
लाल खून नहीं?
अरे, कंकाल किसके?
प्रेरणा सोयी कि
आटा-दाल किसके?
सिर न चढ़ पाया
कि छाया-माल किसके?

वेद की वाणी कि हो आकाश-वाणी,
धूल है जो जग नहीं पायी जवानी।

विश्व है असि का?-
नहीं संकल्प का है;
हर प्रलय का कोण
काया-कल्प का है;
फूल गिरते, शूल
शिर ऊँचा लिये हैं;
रसों के अभिमान
को नीरस किये हैं।

खून हो जाये न तेरा देख, पानी,
मर का त्यौहार, जीवन की जवानी 
माखन लाल चतुर्वेदी 

२ .....
रेणुका से 
मेरे नगपति! मेरे विशाल!
साकार, दिव्य गौरव विराट
पौरुष पूंजीभूत ज्वाल!
मेरी जननी के हिम-किरीट!
मेरे भारत के दिव्य भाल! 
मेरे नगपति! मेरे विशाल! 


युग-युग अजेय, निर्बन्ध मुक्त, 
युग-युग गर्वोन्नत, नित महान, 
निस्सीम व्योम में तन रहा 
युग से किस महिमा का वितान? 
कैसी अखण्ड यह चिर समाधि 
यतिवर! कैसा यह ध्यान? 
तू महाशून्य में खोज रहा 
किस जटिल समस्या का निदान? 
उलझन का कैसा विषम जाल? 
मेरे नगपति! मेरे विशाल! 


ओ, मौन, तपस्या लीन यति! 
पल भर को तो कर दृगन्मेष 
रे ज्वालाओं से दग्ध, विकल 
है तड़प रहा पद पर स्वदेश। 
सुख सिंधु, पंचनद, ब्रह्मपुत्र, 
गंगा, यमुना की अमिय-धार 
जिस पुण्य भूमि की ओर बही 
तेरी विगलित करुणा उदार, 
जिसके द्वारों पर खड़ा क्रान्त 
सीमापति तूने की पुकार, 
'पद दलित इसे करना पीछे 
पहले ले मेरा सर उतार' 
उस पुण्य भूमि पर आज तपी! 
रे,आन पड़ा संकट कराल, 
व्याकुल तेरे सुत तड़प रहे 
डस रहे चतुर्दिक विविध व्याल। 
मेरे नगपति! मेरे विशाल! 


कितनी मणियाँ लुट गईं ? मिटा 
कितना मेरा वैभव अशेष 
तू ध्यान-मग्न ही रहा, इधर 
वीरान हुआ प्यारा स्वदेश। 
वैशाली के भग्नावशेष से 
पूछ लिच्छवी शान कहाँ? 
ओ री उदास गण्डकी! बता 
विद्यापति कवि के गान कहाँ? 
तू तरुण देश से पूछ अरे, 
गूँजा कैसा यह ध्वंस-राग? 
अम्बुधि अन्तस्तल-बीच छिपी 
यह सुलग रही है कौन आग? 
प्राची के प्रांगण-बीच देख 
जल रहा स्वर्ण-युग-अग्नि-ज्वाल, 
तू सिंह नाद कर जाग तपी 
मेरे नगपति! मेरे विशाल! 
रामधारी सिंह दिनकर












अरुण यह मधुमय देश हमारा 
अरुण यह मधुमय देश हमारा।
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।।
सरल तामरस गर्भ विभा पर, नाच रही तरुशिखा मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर, मंगल कुंकुम सारा।।
लघु सुरधनु से पंख पसारे, शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस ओर मुँह किए, समझ नीड़ निज प्यारा।।
बरसाती आँखों के बादल, बनते जहाँ भरे करुणा जल।
लहरें टकरातीं अनन्त की, पाकर जहाँ किनारा।।
हेम कुम्भ ले उषा सवेरे, भरती ढुलकाती सुख मेरे।
मंदिर ऊँघते रहते जब, जगकर रजनीभर तारा


जय शंकर प्रसाद

एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।
एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।

इन जंजीरों की चर्चा में कितनों ने निज हाथ बँधाए,
कितनों ने इनको छूने के कारण कारागार बसाए,
इन्हें पकड़ने में कितनों ने लाठी खाई, कोड़े ओड़े,
और इन्हें झटके देने में कितनों ने निज प्राण गँवाए!
किंतु शहीदों की आहों से शापित लोहा, कच्चा धागा।
एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।

जय बोलो उस धीर व्रती की जिसने सोता देश जगाया,
जिसने मिट्टी के पुतलों को वीरों का बाना पहनाया,
जिसने आज़ादी लेने की एक निराली राह निकाली,
और स्वयं उसपर चलने में जिसने अपना शीश चढ़ाया,
घृणा मिटाने को दुनियाँ से लिखा लहू से जिसने अपने,
“जो कि तुम्हारे हित विष घोले, तुम उसके हित अमृत घोलो।”
एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।

कठिन नहीं होता है बाहर की बाधा को दूर भगाना,
कठिन नहीं होता है बाहर के बंधन को काट हटाना,
ग़ैरों से कहना क्या मुश्किल अपने घर की राह सिधारें,
किंतु नहीं पहचाना जाता अपनों में बैठा बेगाना,
बाहर जब बेड़ी पड़ती है भीतर भी गाँठें लग जातीं,
बाहर के सब बंधन टूटे, भीतर के अब बंधन खोलो।
एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।

कटीं बेड़ियाँ औ’ हथकड़ियाँ, हर्ष मनाओ, मंगल गाओ,
किंतु यहाँ पर लक्ष्य नहीं है, आगे पथ पर पाँव बढ़ाओ,
आज़ादी वह मूर्ति नहीं है जो बैठी रहती मंदिर में,
उसकी पूजा करनी है तो नक्षत्रों से होड़ लगाओ।
हल्का फूल नहीं आज़ादी, वह है भारी ज़िम्मेदारी,
उसे उठाने को कंधों के, भुजदंडों के, बल को तोलो।
एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।
हरिवंश राय बच्चन 




भारत माता का मंदिर यह 
भारत माता का मंदिर यह
समता का संवाद जहाँ,
सबका शिव कल्याण यहाँ है
पावें सभी प्रसाद यहाँ ।

जाति-धर्म या संप्रदाय का,
नहीं भेद-व्यवधान यहाँ,
सबका स्वागत, सबका आदर
सबका सम सम्मान यहाँ ।
राम, रहीम, बुद्ध, ईसा का, 
सुलभ एक सा ध्यान यहाँ,
भिन्न-भिन्न भव संस्कृतियों के 
गुण गौरव का ज्ञान यहाँ ।

नहीं चाहिए बुद्धि बैर की
भला प्रेम का उन्माद यहाँ
सबका शिव कल्याण यहाँ है,
पावें सभी प्रसाद यहाँ ।

सब तीर्थों का एक तीर्थ यह
ह्रदय पवित्र बना लें हम
आओ यहाँ अजातशत्रु बन,
सबको मित्र बना लें हम ।
रेखाएँ प्रस्तुत हैं, अपने
मन के चित्र बना लें हम ।
सौ-सौ आदर्शों को लेकर
एक चरित्र बना लें हम ।

बैठो माता के आँगन में
नाता भाई-बहन का 
समझे उसकी प्रसव वेदना
वही लाल है माई का
एक साथ मिल बाँट लो
अपना हर्ष विषाद यहाँ
सबका शिव कल्याण यहाँ है
पावें सभी प्रसाद यहाँ ।


मिला सेव्य का हमें पुज़ारी
सकल काम उस न्यायी का
मुक्ति लाभ कर्तव्य यहाँ है
एक एक अनुयायी का
कोटि-कोटि कंठों से मिलकर
उठे एक जयनाद यहाँ
सबका शिव कल्याण यहाँ है
पावें सभी प्रसाद यहाँ ।
मैथिली शरण गुप्त 


भारत पुत्री नगरवासिनी 
धरती का आँचल है मैला
फीका-फीका रस है फैला
हमको दुर्लभ दाना-पानी
वह तो महलों की विलासिनी
भारत पुत्री नगरवासिनी

विकट व्यूह, अति कुटिल नीति है
उच्चवर्ग से परम प्रीति है
घूम रही है वोट माँगती
कामराज कटुहास हासिनी
भारत पुत्री नगरवासिनी

खीझे चाहे जी भर जान्सन
विमुख न हों रत्ती भर जान्सन
बेबस घुटने टेक रही है
घर बाहर लज्जा विनाशिनी
भारत पुत्री नगरवासिनी

नागार्जुन 




मेरे देश की आँखें 

नहीं, ये मेरे देश की आँखें नहीं हैं
पुते गालों के ऊपर
नकली भवों के नीचे
छाया प्यार के छलावे बिछाती
मुकुर से उठाई हुई
मुस्कान मुस्कुराती
ये आँखें -
नहीं, ये मेरे देश की नहीं हैं...
 
तनाव से झुर्रियाँ पड़ी कोरों की दरार से
शरारे छोड़ती घृणा से सिकुड़ी पुतलियाँ -
नहीं, ये मेरे देश की आँखें नहीं हैं...
 
वन डालियों के बीच से
चौंकी अनपहचानी
कभी झाँकती हैं
वे आँखें,
मेरे देश की आँखें,
खेतों के पार
मेड़ की लीक धारे
क्षिति-रेखा को खोजती
सूनी कभी ताकती हैं
वे आँखें...
 
उसने
झुकी कमर सीधी की
माथे से पसीना पोछा
डलिया हाथ से छोड़ी
और उड़ी धूल के बादल के
बीच में से झलमलाते
जाड़ों की अमावस में से
मैले चाँद-चेहरे सुकचाते
में टँकी थकी पलकें
उठायीं -
और कितने काल-सागरों के पार तैर आयीं
मेरे देश की आँखें...
अज्ञेय 

इस विशाल देश के 

इस विशाल देश के
धुर उत्तर में
एक छोटा-सा खँडहर है
किसी प्राचीन नगर का
जहाँ उसके वैभव के दिनों में
कभी-कभी आते थे बुद्ध
कभी-कभी आ जाता था
बाघ भी
दोनों अलग-अलग आते थे
अगर बुद्ध आते थे पूरब से
तो बाघ क्या
कभी वह पश्चिम से आ जाता था
कभी किसी ऐसी गुमनाम दिशा से
जिसका किसी को
आभास तक नहीं होता था
पर कभी-कभी दोनों का
हो जाता था सामना
फिर बाघ आँख उठा
देखता था बुद्ध को
और बुद्ध सिर झुका
बढ़ जाते थे आगे
इस तरह चलता रहा 

केदार नाथ सिंह 



यह गंध उडती है देश की हवाओं में 

तुम उसे निर्जन तलैयों के पीछे
तलाशने मत जाना
मत खोजना उसकी छाया 
किंशुक के पत्तों की ओट

ढूँढना मत
उदास चैत के मौसम में
हवा में घुलता-छाता कोई गीत

वह तो होगी अब
किसी और ही वीराने में
किसी और ही संसार में
गुलामी करती और
अपने दुखों को रोज़ भूलती 

मत खोजने जाना तुम वह हंसी
जो बहुत कुछ कहती थी 

घाट के पत्थरों को देखो ---
कोई रंग वहां छूटा रह गया है 

हर गुज़रे चैत का है 
एक रंग, एक गंध
प्यार से परे है यह रंग
यह गंध उड़ती है देश की हवाओं में 
यह रंग जो है उसका होना ।
उसे मत खोजना
किसी पेड़, किसी मैदान
किसी सड़क, किसी घर
किसी सहन में....
आलोक श्रीवास्तव 

सभी पाठकों को भारतीय गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 
समस्त चित्र हमने गूगल से साभार प्राप्त किये हैं ,पाठकों को एक स्थान पर देशभक्ति की कवितायेँ प्रदान करने के लिए हमने गूगल से विभिन्न श्रोतों से इन रचनाओं का संकलन किया है ...रचनाओ के नीचे रचनाकाओं का नाम दिया है  इन पर हमारा स्वामित्व नहीं हैं