शनिवार, 28 फ़रवरी 2015

सद्विचार


१ )सबसे ज्यादा बहादुर लोग  क्षमाशील  और झगड़े को टालने वाले होते हैं। ……थैकरे 

२ )एक शब्द और लगभग सही शब्द में उतना ही अंतर है जितना रोशिनी और जुगनू में … मार्क ट्वेन


३ )सांप के दांत में विष रहता है ,मक्खी  के सर में ,बिच्छू की पूँछ में किन्तु दुर्जनों के सरे शरीर में विष रहता है .... अज्ञात   


४ )सफल होने के लिए असफलता आवश्यक है ताकि आप को यह पता चल सके की अगली बार क्या नहीं करना है। .......... एंथोनी जे डीएंजेलो 


५ )समझोता एक अच्छा छाता भले ही बन सकता है लेकिन एक अच्छी छत नहीं। .... अज्ञात 


६ )किसी के गुणों की प्रशंशा करने में समय मत बर्बाद करो अपितु उसके गुणों को अपनाने में समय का सदपयोग करो। ...................... कार्ल मार्क्स 


७ )हंसमुख व्यक्ति वह फुहार है जिसके छींटे सबको ठंडा करते हैं। ………… अज्ञात 


८ )आशा अमर है उसकी आराधना कभी निष्फल नहीं होती। …………महात्मा गाँधी 


९ )वह मनुष्य वास्तव में बुद्धिमान है जो क्रोध के समय भी गलत बात मुंह से नहीं निकालता है। .... शेख सादी


१० ) आपको अपने भीतर से ही विकास करना होता है। कोई आपको सीखा नहीं सकता, कोई आपको आध्यात्मिक नहीं बना सकता। आपको सिखाने वाला और कोई नहीं, सिर्फ आपकी आत्मा ही है।.………… स्वामी विवेकानंद 


११ )  जिसके पास धैर्य है वह जो चाहे वो पा सकता है.…… बेंजामिन  फ्रैंकलिन



१२ )बीस वर्ष की आयु में व्यक्ति का जो चेहरा रहता है, वह प्रकृति की देन है, तीस वर्ष की आयु का चेहरा जिंदगी के उतार-चढ़ाव की देन है लेकिन पचास वर्ष की आयु का चेहरा व्यक्ति की अपनी कमाई है।
- अष्टावक्र  
गूगल से विभिन्न श्रोतों से साभार 
चित्र गूगल से साभार        

दिल्ली:जहाँ हर आम आदमी है ख़ास


                                       


बचपन की याद आती है जब माँ सुबह -सुबह हमें उठाते हुए कह रहीं थी "जरा  जल्दी उठ कर ठीक -ठाक कपडे पहन लो दिल्ली वाली चाची आने वाली हैं "वैसे तो हमारे घर मेहमानों का आना .-जाना लगा रहता था। उसमें कुछ ठीक -ठाक करने जैसा नहीं था ,पर चाची दिल्ली की थी।  चाची  पर इम्प्रैशन डालने का अर्थ सीधे संसद तक खबर।  हालाँकि   हम उत्तर प्रदेश के एक महानगर में रहते थे पर दिल्ली हमारे लिए दूर थी।  दिल्ली वो थी जहाँ की ख़बरों से अखबार पटे रहते थे। हमें अपने शह र की जानकारी हों न हो पर दिल्ली की हर घटना की जानकारी रहती थी गोया की हमारा शहर  दीवाने आम हो  और दिल्ली दीवाने ख़ास।  दिल्ली ,दिल्ली का विकास और दिल्ली के लोग हमारी कल्पना का आयाम थी।  बरसों बीते हम बड़े हुए ,हमारा विवाह हुआ और पति के साथ तबादले का शिकार होते हुए देश के कई शहरों का पानी पीते हुए आखिर कार दिल्ली पहुँच  ही गए। और दिल्ली आकर हमें पता चला की कितने भी आम हो अब हम आम आदमी /औरत नहीं रहे हैं। अब हम भी उन लोगों में शुमार हो गए हैं जो खबरे पढ़ते ही नहीं बल्कि ख़बरों का हिस्सा हैं।

                                                 पहला अनुभव हमें दिल्ली प्रवास के  दूसरे दिन ही हो गया जब हमारी प्रिय सखी का फोन दिल्ली पहुँचने की बधाई देने का आया।  बधाई  देने के बाद बोली "  बड़ी परेशानी होगी ,पानी नहीं आ रहा न तुम्हारे घर "अच्छा हमने सकपकाते हुए कहा ,पता नहीं नल खोल कर देखते हैं ,तुम्हें कैसे पता चला ?
अरे सुबह से क क क  चैनल पर दिखा रहे हैं  , दिल्ली में तुम्हारे एरिया में पानी नहीं आ रहा हैं लोग खाली बोतलें लेकर सड़कों पर हैं … टी वी नहीं देखा क्या तुमने ? पहली बार हमें बड़ा अटपटा लगा हमारे घर में पानी नहीं आ रहा है इसका पता हमसे पहले पूरे देश को है। हमारी निजी स्वतंत्रता का  कोई स्थान नहीं ? फिर तो यह रोज का सिलसिला हो गया।  हमने भी आपने आस -पास की बातों  पर ध्यान देना शुरू कर दिया क्योकि ,अडोस -पड़ोस में क्या हो रहा है इसकी खबर जाते ही सुदूर बसे परिवार के सदस्यों के लिए घटना की  आधिकारिक पुष्टि हमें
ही करनी होती थी अन्यथा हमारे समान्य ज्ञान पर प्रश्न चिन्ह लगने का पूरा ख़तरा था।
                                                                    एक बार तो हमारी कश्मीर वाली बहन हमसे  कई दिन तक इस बात पर नाराज रही कि सर्दियाँ होते ही सारे रिश्ते दारों के हमारे घर में "अपना और बच्चों का धयान रखना "के हिदायत भरे फोन आने लगते  जबकि वो -१० डिग्री से नीचे जम रही होती पर  उसके यहाँ कोई फोन नहीं पहुँचता, इस पारिवारिक भेदभाव में हमारा कोई हाथ नहीं था। ये तो टी वी  चैनल वाले २४ घंटे दिल्ली की सर्दी का आँखों देखा हाल बताते रहते ,,सर्दी की भयावता को देख दूसरे शहरों के लोग रजाई में किटकिटाते हुए भाग्य को सराहते "भैया दिल्ली की सर्दी से राम बचाए ".|  एक बार कानपुर  में एक रिश्तेदार की शादी में जाने पर हम चर्चा का केंद्र बन गए"बताओ क्या दिन आ गए हैं  दिल्ली में अबकी गर्मी में दो -दो घंटे बिजली काट रहे हैं।  जब सुनते -सुनते हम हम थक गए तो पूँछ ही लिया "कानपुर में कितने घंटे आती है  ?कोई ठीक नहीं पर २४ घंटे में १० -११  घंटे तो आ ही जाती है।  उत्तर प्रदेश की औद्यौगिक राजधानी बिजली की किल्लत से बुरी तरह जूझ रहीं है ,उद्योग -धंधे चौपट हैं ,भीषण बेरोजगारी  ने लूट पाट  को बढ़ा दिया है. पर दिल्ली में २ घंटे बिजली गुल होना खबरों का शहंशाह  बन कर तख्ते  ताऊस पर बैठा है।


                                              एक बार तो हद हो गयी रात को ११ बजे माँ का फोन आया। उन्होंने कांपती आवाज़ में कहा "बिटिया अपना ,दामाद  जी का बच्चों का ध्यान रखना "क्यों माँ क्या हुआ इतनी घबराई हुई क्यों हो ?मैं उल्टा प्रश्न दागा। अभी -अभी टी वी चैनल में दिखा रहे हैं दिल्ली भूकंप से ज्यादा प्रभावित होने वाली जोंन  में आता हैं  ,हम तो घबरा गए। देखो ज्यादा बेख्याली में मत सोना। टंकी पूरी ना भरना … गमले………… माँ ने हिदायतों की पूरी लम्बी लिस्ट सुनानी शुरू कर दी। हमने बीच में ही माँ को रोकते हुए कहा माँ ठहरों जिस सेस्मिक जोंन  में दिल्ली  है उसी में आप का शहर भी है। चिंता न करिए।   माँ ने लगभग डांटते  हुए कहा "हमारा जी इतना घबरा रहा है ,और तुम्हे मजाक सूझ रहा है ,तुम्हे ज्यादा पता है या चैनल वालों  को.…  हम निरुत्तर हो गए हम बचपन में सुना चुटकुला याद आ गया "एक आदमी का परिक्षण कर रहे डॉक्टर ने नर्स से कहा ,ये मर चुका है तभी आदमी उठ कर बोला मैं जिन्दा हूँ ,मैं ज़िंदा हूँ , नर्स उसे टोंकते हुए बोली चुप राहों तुम्हें ज्यादा पता है या डॉक्टर को  "

                                 खैर अब तो हमें  ख़बरों में रहने की आदत हो गयी है दूसरे शहर तकलीफे आपदाए झेते रहे ,............पर.  खबर है तो दिल्ली की , …………  यहाँ हर आम घटना ,हर आम आदमी खबर का हिस्सा है चर्चा का विषय है इसीलिये यहाँ का हर आम आदमी ख़ास है।  और देखिये तो अब तो आम आदमी पार्टी भी चुनाव जीत कर ख़ास हो गयी है। 
वंदना बाजपेयी  
                         चित्र गूगल से साभार 

बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

चलती ट्रेन में दौड़ती औरत









कुछ ही मिनट विलंब के कारण ट्रेन छूट गयी कानोँ तक आवाज आई, पीरपैँती जानेवाली लोकल ट्रेन पाँच नंबर प्लेटफार्म पर खड़ी है गणतव्य तक पहुँचने
की नितांत आवश्यकता ने मतवाली गाड़ी के पीछे दौड़ लगाने को कहा हाँफते
हुए उस डब्बे के करीब पहुँचा जहाँ भीड़ कम दिखाई पड़ी देखते ही आँखेँ
झिलझिला गई, आदमी तो कम लेकिन बड़े गठ्ठर से लेकर छोटी बोड़िया की ढेर लगी
हुई
किसी तरह अंदर प्रवेश किया सीट पर तो दो-चार महिलाएँ ही बैठी हुई थीँ,
ज्योँही उसकी नजर मुझपर पड़ी और सीट पर पसर कर बैठ गयी
कुछ देर यूँ ही टुकूर-टुकूर देखता रहा, भला कोई मर्द रहे तब तो अपने
हिस्से की बात कही जाए मन मेँ वेवकुफाना सोच भी उत्पन्न हुआ, ऐसा तो
नहीँ महिला बोगी मेँ गया
एक महिला पास बैठी महिला से बोली, "बोयल दहो आगु चैल जैतेय, यहाँ
खड़ा-खड़ा टटुआय जैतेय।"
आपस मेँ खिलखिलाती हुई बोली, "आगु चैल जा खालिये छैय..."
बोल ही रही थी कि मुखर्जी आके बढ़ा, वहाँ भी जस-के-तस समझ से परे हो चला
एक अधेर महिला ठिठोली मेँ मग्न थी देखते ही बोली, कहाँ जाएगा , बैठ
जाईये थोड़ा-थोड़ा खिसक कर जगह बना दी मुखर्जी भी बैठ गया, वही
टुकूर-टुकूर वाला स्टाईल मेँ
अगला स्टेशन मेँ कल्याणपुर मेँ दो महिला धमकी चाल-चलन, पहनावा-ओढ़ावा
से थोड़ी पढ़ी-लिखी मालूम पड़ रही थी हिम्मत नहीँ हुआ कि बोल पाऊँ बैठ
जाईये दोने खड़े-खड़े बातेँ करती जा रही थी
पास मेँ बैठी महिलाओँ मेँ एक बोली, "नरसिनिया होते - कहो आगु जाय ले..."
दूसरी बोली, "अरे नाय-नाय ! यहाँ के नेतवा की कैल कैय नाय जाने छो, सब
घसघरहनिया के हाथो मेँ कलमोँ थमाये देलकैय और सब देखैय नैय छो- एक कखनी
मेँ बैगवा लटकाय के दौड़ा-दौड़ी करैत रहल छैय ..."
वह दोनोँ महिला अनसुनी करती हुई आगे बढ़ गई ठीक बगल वाला सीट पर बैठ गई
कभी बुनाई की बात तो सिलाई की.... विद्यालय के बच्चोँ की शिकायत ट्रेन
पर करती रही
एक शिक्षिका महोदया चर्चा छेड़ी, क्या बतावेँ दीदी, एक बार मैँ मुंबई गई
थी, अपने मालिक के संग वे पहले वहीँ काम करते थे समय पर रुपया-पैसा
भी नहीँ भेजते थे मैँ भी घरनी बन आस लगाए ताकती रहती थी कब डाक बाबू
आवे ? रुपया-पैसा का टांट बना ही रहता था सोची जब तक पुरुष को कसके
नहीँ पकड़ा जाए तो, छुट्टा घोड़ा बन जाएगा गाँव-गिराम मेँ भी सुनती रही
थी, परदेश मेँ वे लोग बिगर जाते हैँ बात भी सही है मैँ चली गई वहाँ की हालात देखकर तो हँसी भी आती है और घूटन भी कम नहीँ
एक दिन बाजार घूमने निकली, देखकर तो मेरी आँखेँ चकरा गई। अधनंगी छोरी तो
थी ही, मेरी मां की उम्र की भी महिला आधे कपड़े मेँ खुद को बेढ़ंग दिख रही
थी।
मेरे पति उस ओर दिखाकर कहने लगे।


देखो, यही है शहर तुमलोग खामखाह बदनाम करती रहती हो।
"
देख रही हो !"
मैँ कुछ नहीँ समझ पाई झट से उसके आँखोँ पर हाथोँ से ढ़क दी और बोली , आप
उधर मत देखिये
दूसरी महिला ठहाका मार कर हँसने लगी ..... अरे आप तो कमाल कर दिया, तब क्या हुआ ?
आपको हँसी आती है ? मेरा तो प्राण ही निकला जा रहा था। घर मेँ तो वे कुछ
समझते ही नहीँ थे। डर के मारे कुछ बोल भी नहीँ पाती थी। फिर भी हिम्मत
करके बोली, आज के बाद इस रास्ते से नहीँ गुजरेँगे।
वे हकचका कर बोले, तब तो ठीक है। गंधारी के तरह आँखोँ पर पट्टी बांध दो,
तुम आगे-आगे और मैँ पीछे-पीछे चलता रहुँगा।
कुटिल मुस्कान नारी मन मेँ बदबू भी उत्पन्न कर रही थी।
पल भर के लिए मैँ उधेर बुन मेँ विचरण करने लगी। भला मैँ क्या करुँ?
रास्ते भर चलती रही। जहाँ कहीँ अधोवस्त्र का दर्शन होता, मैँ उनके आँखोँ
पर हाथ रख देती।
आगे बढ़ती गई। बंबईया चकाचौंध से लड़ते हुए अपनी मरैया तक पहुँच गई जहाँ
ढेर सारे बच्चोँ की भीड़ टुकड़े पुरजे से बने बसेरा जो क्षण भर मेँ गाँव की
याद ताजा कर गई।
सरकार तो हम महिलाओँ के लिए भगवान बन उतर आये, तो भला नौकरी मिलती?
कितना पढ़े-लिखे दिल्ली-ढ़ाका खाक छान रहा है। यहाँ भी लफुआ-लंगा बन
चोरी-डकैती पर उतारु है, उससे तो हम भला हैँ।
साथी महिला बोली, अभी कहाँ हैँ आपके ---?
अब भला मैँ साथ छोड़ूँ। वह कठमर्दवा भी आशा मेँ ही था, छोअन-भोजन साथ चले।
मैँ भी सोची सोने पे सोहागा।
अब तो बस दिनभर घर के काम मेँ इधर-उधर मंडराते रहता है। मैँ अपनी डयूटी
मेँ मगन रहती हूँ।
अचानक गाड़ी की सीटी बजी और आगे बढ़ गई। चिल्लाई, लो जी! तुम्हारे चक्कर
मेँ गाड़ी भी खुल गई क्षण मेँ चुप्पी ने अपना दबदबा बना दिया।
चिँतित स्वर मेँ बुदबुदायी। ट्रेन भी कोई गाड़ी है, ऑटो से आती तो रुकवा
कर उतर भी जाती, इसे कौन कहने वाला?
इधर एक महिला ठहाके के साथ ताने दी, "हम्मे कहलियो नै कि घसगरहनी सब
मास्टरनी बैन गेलैय- पढ़ल-लिखल रहैय तब नै नामो पैढ़के उतैर जाये। औकरा से
अच्छा हमसब छियै, अगला स्टेशन कोन अयतैय पता छैय...."
मुखर्जी चुप-चाप सुनता जा रहा था।धीरे-धीरे भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। डब्बे की यह हालात कि हर कोई चढ़ने वाले
रिश्ते मेँ बंधे हो, मानो एक दूसरे से पारिवारिक संबंध हो। कोई संकोच
नहीँ, आना और बैठ जाना। बातचीत भी जारी।
पसीने से तरबतर एक महिला आई, अपने गट्ठर को उपरी सीट पर फेँक कुछ बोलना
चाही तब तक मेँ मुखर्जी थोड़ा खिसक गया। वह बैठ गई। तभी पहले से बैठी
महिला बोली, "आंय हे बरियारपुर वाली तोहर मर्दवा कारी माय संग फंसल छौ
की....."
मैले कुचैले साड़ी का आंचल मेँ ही पसीना पोँछी और राहत की सांस ली। किसी
तरह की सकुचाहट नहीँ, ही घृणा।
बोली, "आजो कल भतरा अपने शेर समझी रहल छै। बिलाय नियर घौर मेँ बैठलो
रहल और गुरकी देखायव मेँ आगु। अपने फुसुर-फुसुर कनचुसकिया मशीनमा से करैत
रहल औअर घरनी पर इलजामोँ लगायत रहल... कौन एयसन मरदौ होतैय जे घरौ मेँ
बैठलो रहतेय और ओकर मौग घौर-बाहर दोनोँ समहालतैय। हम जंजालो मेँ फंसी
गैलोअ छिये तो कवैय ऐसन मरदौ के छोयर के चैयल जैतिहिये रे ...."
बचवा के मुंहो देखी के रही रहलिये....
दूसरी महिला जो आस-पास की ही थी, वह भी बिना संकोच किए पुरुषोँ पर प्रहार
करना शुरु कर दी...
"
बहिन ठीके कही रहल छो.... हमरो मरदौ कहि रहलो छैय, अकेलो-अकेलो हरदोम
भागलोपुरोव जाय छो, कोय चकरो चलाय छो कि....?"
गाड़ी नाथनगर स्टेशन पहुँचने वाली थी। एका-एक ट्रेन खाली होना शुरु।
भागलपुर पहुँचते-पहुँचते गाड़ी पर इक्का-दुक्का ही सवारी बची रही।
गाड़ी खुलती ही भीड़ पहले की तरह हो चली। सभ्यता के चादर से ढ़ंके, पुरुषोँ
से सभ्य दिख रही थी... महिलाएं इशारे-इशारे मेँ चार के जगह सात-आठ बैठ
गये।
कुछ बोलने मेँ भी नहीँ बन रहा था .... सबके सब डेली पेसेन्जर मान गाड़ी
को दखल कर रखी थी....






हिम्मत जुटायी, कुछ बोलूं पर मुखर्जी की बातोँ मेँ कोई दम नहीँ; आँखेँ
फेर ली, मानो प्रत्येक पुरुष उसे मर्द ही दिखाई पड़ा हो। कुछ ही देर मेँ
सफेद कुर्ता-पैजामा वालोँ की भीड़ जमा होने लगी। पूरी गाड़ी को अपने कब्जे
मेँ कर लिया... चुनावी माहौल की दुर्दाँत नतीजा। नेताजी फुलोँ से लदे,
दोनोँ हाथ बांधे बोले जा रहे थे
"
हमू तोरे गाँव घौर के बेटा छियोव, एक बार धियान दै दिहौ- फेर कसम-कस
से छुटकारा देलाना हम्मर काम छै - औअर तोरा सबके लाठी डंडा से पुलिसवा जे
तंग करैय छौ, सबके अस्पताल देखलो ने वहीँ रहतैय।"
नेताजी के पीछे कई समर्थक जो वोट नहीँ मांग रहे थे, बल्कि गरीबी से जुझते
हुए फटे-चिटे कपड़ो द्वारा निहारनेमात्र से धन्य-धान्य समझ रहा था। उसकी दोगली निगाहेँ अधेर नहीँ बल्कि
कमसिन को ढ़ूंढ़े जा रहा था। डब्बे मेँ प्रत्येक सीट के पास दो-एक चमचोँ का
बखान परवान पर था। जैसे पालनहार गये होँ। गाड़ी धीमी होती ही जिंदाबाद
जिँदाबाद नारोँ के साथ पटाक्षेप कर गये।
महिलाओँ मेँ कानाफुसी शुरु। अभद्र व्यवहार का जिक्र देहाती अंदाच मेँ।
कानोँ मेँ झनझनाहट पैदा कर दी। चमचोँ ने महिलाओँ की अस्मत के साथ खिलवाड़
करना चाहा। उसे धक्का देते हुए वाथरुम की ओर ले जाने की दानवी प्रयास
किया।
भगवान का ही शुक्र है कि मैँ बच गई, वरना जाने क्या होता? कभी
पुलिसवालोँ के गंदे हाथ, कभी कर्मचारियोँ के नपाक हाथ तो कभी स्थानिय
गुंडोँ चिथड़े मन के द्वारा वर्षोँ से सतायी जा रही हूँ। फिर भी यह ट्रेन
साथ नहीँ छोड़ती। निःसंकोच बोली जा रही थी। हमलोग तो इस लोहे की पट्टी को
छोड़ कबके उतर जाती पर, यह भूख और उसकी (पति) अमानुषी सोच, खीँच लाती है
और अपने साथ निर्जीवता लिए चलने को मजबूर करती है।
बीच मेँ ही हिम्मत जुटाकर मुखर्जी ने कहा, ईश्वर प्रत्येक जगह है, उनका
ध्यान हरेक प्राणी पर समान भाव से है। अनाचारियोँ को सजा देना निहित
कर्तव्य है।
बगल मेँ बैठी महिला पहले तो मुस्कान बिखेरी।
मुखर्जी सोचा शायद मेरी आस्तिकता पर हँसी गई होगी। चुप रहा
"
ईश्वर, वही भगवनमा का बात करते हो, जो चोर-गुंडोँ को भी घंटो तक शक्ति
देता रहता है और हम भीड़-भरक्का मेँ तड़पते रहते हैँ!"
उस महिला की आवाज से मुखर्जी सन्न रह गया।
बोली जा रही थी, अरे! कहानी सुनती रही हूँ, द्रोपदी को कृष्ण ने बचाया
था। उस अबला के पास बचा क्या, जब साड़ी से जमीन लद ही गया। मैँ नहीँ मानती
अत्थर-पत्थर को। मैँ तो दो-दो हाथ करना जानती हूँ। उस गुंगा से क्या
उम्मीद जो कुछ फुल-पत्तियां, लड्डु-बतासोँ की महक से व्यभिचारी को साथ
दे।
बातोँ मेँ ही ट्रेन पीरपैँती स्टेशन पहुँचने वाली थी। मुखर्जी ने हिम्मत
को दुहराया और कहा, बहन! वाकई आपलोग जज्बाती हैँ। कठिन रास्तोँ को लांघने
की पूर्ण क्षमता है, भारतीय नारी की प्रतिमान को स्थापित रखने की साहस
है। आप सबोँ की जिन्दगी तप के समान है।
दूसरी महिला जो महिला मानी गई थी, पहनावा से। शायद गरीबी और ग्रामीण
संस्कृति ने उम्र से पहले ही मां बनने के लिए मजबूर किया होगा।बोली, नहीँ ! आप अभी सामर्थ्यहीन हो। मेरी जिन्दगी तप नहीँ बल्कि लाचारी
को लीलने के लिए है, तप तो निःसहाय मानव का ढ़ोंग है, दुर्बलता की परिचायक
है। मैँ ढ़ोँगी पर विश्वास नहीँ रखती हूँ। ट्रेन के रफ्तार से कहीँ अधिक
तेज मेरी जिन्दगी चलती है। चलती ट्रेन मेँ दौड़ती औरत का मिसाल हूँ। गाड़ी
स्टेशन पर रुकी, मुखर्जी धीरे-धीरे डब्बा से बाहर गया। उसके कानोँ तक
आवाज टकराई, "ऐसे सब मरदौ उपदेशो देते रहलौ छैय" जब तक ट्रेन खुल नहीँ
गई, मुखर्जी देखता रहा और अंतस की आवाज निकली- सच मेँ ट्रेन की रफ्तार
धीमी थी और कानोँ से टकराई आवाज तेज.......


 संजय कुमार अविनाश लखीसराय बिहार
मोबाइल 09570544102




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