शनिवार, 30 मई 2015

सद्विचार


बैसाखियाँ



                                                                          






बैसाखियाँ 

जब
जीवन के पथ पर
 गर्म रेत सी
लगने लगती   दहकती  जमीन
जब बर्दाश्त के बाहर हो जाते  है
दर्द भरी लू  के थपेड़े
संभव नहीं दिखता
 एक पग भी आगे बढ़ना
और रेंगना
बिलकुल असंभव
तब ढूढता है मन बैसाखियाँ


२ )
ठीक उसी समय
बैसाखियाँ ढूंढ रही होती हैं लाचार
लाचारों  के बिना खतरे में होता है उनका वजूद
आ जाती हैं देने सहारा
गड जाती हैं बाजुओं में
एक टीभ सी उठती है
सीने के बीचो -बीच
विवशता है
सहनी ही है यह गडन
 लाचारी  ,और बेबसी से भरी नम आँखें
बहुधा नजरंदाज करती हैं बैसाखियाँ






३ )
मानता है अपंग
लौटा नहीं जा सकता अतीत में
न मांग कर लाये जा सकते हैं
दबे कुचले  पाँव
जीवन है तो चलना है
गर
जारी रखनी है यात्रा
आगे की तरफ
तो जरूरी है लेना
बैसाखियों का सहारा

४ )
बैसाखियाँ कभी हौसला नहीं देती
वो  देती है सहारा
कराती हैं अहसास
अपाहिज होने का
जब
आदत सी बन जाती हैं बैसाखियाँ
तब मुस्कुराती हैं अपने वजूद पर
कि कभी -कभी भाता  है उनको
देखना
गिरना -पड़ना और रेंगना
की बढ़ जाता है
उनका कुछ कद
साथ ही बढ़ जाती है
लाचार के बाजुओ की गडन




५ )
बैसाखियाँ
प्रतीक हैं अपंगता की
बैसाखियाँ
प्रतीक हैं अहंकार की
बैसाखियाँ
प्रतीक हैं शोषण की
फिर भी आज हर मोड़ पर मिल जाती हैं बैसाखियाँ
बिना किसी रंग भेद के
बिना किसी लिंग भेद के
देने को सहारा
या एक दर्द भरी गडन
जो रह ही जाती है ताउम्र

६ )
बैसाखियाँ सदा से थी ,है और रहेंगी
जब -जब
भावुक लोग
महसूस करेगे
अपने पांवों को कुचला हुआ
तब -तब वजूद में आयेगी  बैसाखियाँ
इतरायेंगी  बैसाखियाँ
सहारा देकर
स्वाभिमान छीन  ले जायेंगी बैसाखियाँ
जब तक
भावनाओं  के दंगल में
हारा ,पंगु हुआ पथिक
अपने आँसू
खुद पोछना
नहीं सीख जाएगा
तब तक बैसाखियों का कारोबार
यूँ ही फलता -फूलता जाएगा

वंदना बाजपेई


atoot bandhan  ………कृपया क्लिक करे 

शुक्रवार, 22 मई 2015

रिया स्पीक्स :पापा की परदेश यात्रा


                                                      



!!!!!!!!!!!! रिया स्पीक्स!!!!!!!!!!!!!

पापा की परदेश यात्रा

रिया : अखबार पढ़ते हुए अपनी सहेली से फोन पर बात कर रही है “देख पिंकी आज की हेड लाइंस में क्या लिखा है “दोस्ती में नहीं कोई सीमा “क्या बात है ?अब हमारे देश के मुखिया नेता बरसों पुराने सीमा विवाद मिटा देंगे | एक नए युग की शुरुआत होगी |
पिंकी : (फोन से )वाओ !ग्रेट ..... रीयल हीरो हैं | यार क्या लग रहे थे ओबामा के बगल में| माशाल्लाह नज़र ना लग जाए ......... डैशिंग ,स्मार्ट ,हैं ना |  वो सूट...अगेन वाओ  .... आखिरकार दिखा ही दिया पूरी दुनियाँ को हम भारतीय भी महंगे कपडे पहन सकते हैं केवल वो ही नहीं | सच्ची! गर्व से गर्दन तन गयी |
दादी : (कमरे में प्रवेश करते हुए ) हे शिव ,शिव ,शिव का जमाना आ गा है |ई से तो भले हम अपन उतरी पूरा में रहे पर ईहाँ ?सोचा था बेटा बहुरिया के नगीच रहिये तो कुछ नीक लागे | कुछ तो सेवा मिले .... ई से ज्यादा तो हम बुढ़ापा में कर लेत  हैं | ई तो हमार अपमान है | अब तो हमें वापस जाए का है .... इहाँ न रुकिए |
रिया : (पिंकी से ) ओह गॉड ! लगता है कुछ महाभारत हो गया है | मैं तुमसे बाद में बात करती हूँ |
बाय | फोन रख कर दादी से : अब क्या हो गया दादी ?, ( हँसते हुए )मेरी प्यारी दादी किसका घर धूप  में कर दें ?मई जून का महीना तड़प कर रह जाएगा हा हा हा .......
दादी : ही ही कर के ई दांत न दिखाओ | तनिक समझो | ४ दिन हुई गए हैं ,तुम्हारी मम्मी हमका बस दाल उबाल के दे रही हैं | सब्जी का पूछो तो काहत है “इहे बना है “का चाहत का है की हम यहाँ ना रुकी | अब बूढ़े बच्चे एक समान | बुढ़ापा में जुबान का स्वाद बिगड़ जात है लागत है कुछ चटपटा ,तीखा खा ले तो भूख खुल जाए |
रिया : हां दादी पर ...........
दादी : पर वर का | हम कोई छप्पन भोग की थोड़ी कहत हैं ............ तनिक कदुआ  बनाई दे अमिया डाल के , या भिंडी ही मसाला डाल के बनाई दे | जरा नीक लागे ,तो रोटी चले | एइसन तो थाली देख के उठ जाए का मन करता है | ईमा भी कामचोरी करत है ,ई से ज्यादा तो हम अभी ई उम्र में बनाय  सकत हैं | (पल्ले से सुबकते हुए आँसूं पोचते हुए ) हम ईहाँ न रुकिहें |
रिया : दादी ,मम्मी सच कह रहीं हैं |आजकल घर में यही बन रहा है | सिर्फ दाल  और रोटी| पहले तो बनती थी न आप के पसंद की सब्जियां ?

दादी : 


हाँ  पहले तो सब पूँछ –पूँछ कर बनावत थी “ अम्मा का खइयों ? पर अगर अब इहे बन रहा है तो ........... चलो हमका छोड़ो | तुम बच्चन की तो चढ़ती उम्र है ,इहे खायेंगे तो शरीर में मजबूती कैसे  रहिये | बनने का समय है ये .... सब डॉक्टर के ईहाँ चढ़ाव का है का ?
रिया : दादी इसमें मम्मी की कोई गलती नहीं है आजकल  घर का बजट बिगड़ा हुआ है ,ऊपर से सब्जियों के दाम आसमान पर हैं ?
दादी : पर बजट काहे को बिगड़ा है |हमरे मुन्ना को तो अभी दफ्तर  नयी जिम्मेदारी मिली है | काफी चहकत राहे | कुछ तो रूतबा पैसा बढ़ा  होई |
रिया : हां दादी ,आपकी बात सही है | पर अभी जब कंपनी के जी ऍम का स्वागत करने एअरपोर्ट जाना था तो अपनी औकात से ऊपर सूट सिलवा  लिया | उसके लिए बैंक से पैसे निकलवा लिए |अब मम्मी भी क्या करे ? मकान का किराया ,हमारी पढाई ,ये तो रोकी नहीं जा सकती | हैं ना दादी |
दादी : अब हम समझी बिटिया | कोंहू बात नाही | हम सोये का जा रही है | तुम पढो |
दो तीन दिन बाद दादी : हे शिव ,शिव ,शिव सारी  रात बत्ती नहीं आई |देह से पसीना ऐसे चुअत है जैसे कपडा निचोड़े हो | का सबकी गयी है का ?
रिया : नहीं दादी ,सबकी नहीं गयी है | बिल न भरने की वजह से केवल अपने घर की काटी गयी |आप चिंता ना करो ,आज माँ अपने कंगन बेंच कर बिल भर देंगी |शाम तक आ जाएगी |
दादी :बहु कंगन बेंच देगी | पर मुन्ना की तो तनख्वाह बढ़ी राहे....... फिर ?



रिया : आजकल पापा का सूटकेस तैयार ही रहता है | अपने पुराने जान पहचान के लोगों से मिलने दूसरे शहरों में जा रहे हैं | कहते हैं कि इस तरह आने –जाने से ,रिश्ते सुधरने से घर को फायदा होगा | उसी में ट्रेन का टिकट व् नए कपडे –लत्तों का खर्चा बढ़ जाता  है |अभी कानपुर रोहित अंकल के घर गए हैं |
दादी : रोहित ! ( याद करते हुए) हां ओ बाबू | ओही बचपन मा बाबु –मुन्ना भाई –भाई ,बाबू –मुन्ना भाई का नारा लगात –लगात हमरे घर का कुआ पर अपना कब्ज़ा कर लीन्ह | पानी को तरस गयी | तब तुम्हार दादाजी उधर ले के दूसरा कुआ खुदाए रहे | उस उधार  का ब्याज पाटत पाटत जवानी निकल गयी |ऊ के यहाँ मुन्ना गया है ..........  बैंक से पैसा निकाल के | ( चिंतित होकर ) हे शिव ! शिव ! शिव |
रिया : ( रेडिओ ओंन  करते हुए ) दादी आप टेन्स न हो |खबरे सुनो |
दादी : कुछ देर खबरे सुनने के बाद चिंतित मुद्रा में ........ एक बात तो है बिटिया ,मुखिया चाहे घर का हो या देश का उकी पहली जिम्मेवारी घर -देश की है | नाही तो खाने के लाले पड़िए ,बिज़ली न मिलिहे और घर की बहूँ –बेटियन  के गहने बिकिहे | बाहर की वाहवाही से का होत  है | ई से अच्छा है सादा कपडा पहनो ,घर देश पर धयान दो , वो निखारिहे , तो यश मिलिहे तब दूसर लोग आइहिये रिश्ता सुधारन  की खातिर | तब मन भी खुश हुइए और नाक भी ऊंची रहिये | कुछ रूककर .......... मुन्ना को तो हम समझाई लेबे पर देश के मुखिया को कौन समझाई ?
रिया : (गंभीरता पूर्वक सुनते हुए ) बात तो आप सही कह रही हैं दादी |

वंदना बाजपेई 

(चित्र  गूगल से )
अटूट बंधन........... क्या आपने लाइक किया ?


सद्विचार



आज का सद्विचार 








गुरुवार, 21 मई 2015

आज का सद्विचार

       
                                        आज का सदविचार 




                                       

मंगलवार, 19 मई 2015

और हार गई जिन्दगी


                                                                          




और हार गई जिन्दगी

 बरसात का उतरता मौसम,कभी उमस,कभी ठण्ड का अहसास करवाता है। रात में देर से आँख लगी थी तो ऐसे में सुबह नींद थोड़ा ज्यादा ही सताती है। तेज घंटी की आवाज उनींदी आँखे खुलने से और कान का साथ देने से इंकार कर रहे थें पर लगातार बजती घंटी की आवाज उठकर दरवाजा खोलने पर मजबूर कर दी। दरवाजा खोल ठीक से देख भी न पाई थी की आवाज आई " आंटीजी मम्मी आज काम करने नहीं आयेगी।" क्यों क्या हुआ फोटो जो तुम्हारी मम्मी काम करने नहीं आयेगी,नींद के झोंको में डोलती मैं पूछी। "मम्मी रात मर गई,अभी भी हॉस्पिटल में ही तो है भैया मेरा बोला की जाओ आंटी को बोल आओ नहीं तो मम्मी का इंतजार करेगी,तो मैं आ गई।" उसकी बात को सुनने,समझने और उसके बाद स्वीकार करने में मेरा शरीर,मन सभी जागृत हो गये। वो बच्ची सच्चाई को भावविहीन बयां कर रही थी और मैं अवाक्,निश्चल खड़ी  थी। काफी देर बाद मैं वस्तुस्थिति से तालमेल बैठा पाई। "फोटो क्या हुआ था,कैसे तुम्हारी मम्मी मर गई,कब हुआ ये सब ,तुम्हारी मम्मी कल शाम तो काम करके गई है मेरे घर से।"  हालाँकि बोलते हुए भी मैं बखूबी जानती हूँ कि रातभर का क्या,जिंदगी गंवाने में वक़्त ही कितना लगता है। मैं ज्यादा बोल नहीं पा रही थी ,दुःख के कारन जिव्हा बैचनी में तालू से सटा जा रहा था। "जानती हैं आंटीजी माई रात जीजा के साथ दारू पी  रही थी,बहुत पी ली थी किसी का नहीं सुन रही थी ,जीजा से किसी बात का झगड़ा हो गया था,जीजा भी खूब गुस्सा हो गया था। माई भी खूब चिल्ला रही थी,जीजा कुल्हारी उठा माई को काट दिया। भैया माई को ठेला पे लाद के हॉस्पिटल लाया पर माई १-२ घंटे में ही मर गई।"मैं दुःख से कातर हुई जा रही थी पर वो छोटी बच्ची शायद समझ भी नहीं पा रही थी कि क्या हो गया है। उसके साथ भगवान कितना बड़ा अन्याय कर दिये हैं। कदाचित सड़क पे पलती जिंदगी  यूँही बेभाव पल जाती है। जिंदगी हो या और कुछ,संवरने में ज्यादा वक़्त लगता है बिगड़ने के लिए कुछ ही वक़्त काफी है। 


                       उस बच्ची फोटो के जाने के बाद  दरवाजा बंद कर वही दीवान पे बैठ गई। दुःख-बैचनी के कारन नींद आँखों से उड़ गई थी। उसकी जगह पिछली सारी  बातें जेहन को उकेरने  लगा। ३साल भी तो अभी पुरे नहीं हुए हैं। यहाँ क्वार्टर में शिफ्ट करने पर दाई की खोज कर रही थी। नई जगह है मेरे लिए पूछने पे पता चला की कॉलोनी के सामने सड़क के उस पार दाइयों की भरी-पूरी बड़ी सी बस्ती है।  यहाँ बैठके बुलवाने की जगह सुबह उठके टहलते हुए मैं ही चली गई थी बस्ती में। बस्ती का पहला घर कालिया का ही था। हाँ जिसकी बात मैं कर रही हूँ उसका नाम कालिया ही था। माँ-बाप ने आबनूसी रंग देखकर ही काली नाम रखा जो कालक्रम में पुकार में कालिया हो गया। ऊँचा -लम्बा,भरा-पूरा शरीर,ऊँचा कपाल,छोटी सी नाक। हँसने पे पीले लम्बे दांत निकल जाते थें। एक दन्त में थाती के तौर पर चांदी जड़ा था। मैं जिसवक़्त वहां पहुंची वो पूरा चिल्लाके किसी को गाली दे रही थी। मुझे सामने देखते मुँह बंद कर ली। तुम्हारे बस्ती में कोई दाई मिलेगी क्या?मैं  कॉलोनी के बड़े क्वार्टर . में शिफ्ट की हूँ। सुनते ही चेहरे पे स्मित आ गई। "हाँ दीदी क्यों नहीं,बहुत सारी है पर हम भी काम करते हैं,आप क्यों आई हैं ड्राइवर से बुलवा लिया होता। हम १० बजे तक आ  जायेंगे काम करने।" मैं लौट आई पर पेशोपेश में पड़ गई। डर लग रहा था इतनी कर्कश और इतनी खूंखार,भगवान जाने कैसा काम करेगी। १० बजे से इंतजार कराके ११ बजे वो आई और फिर कल शाम तक आते रही। मतलब 
अपनी मौत आने के पहले तक वो मेरे साथ अपना दायित्व और साथ निभाते रही है। इन कुछेक सालों में ही मैं उसे पूरी तरह पहचान गई थी। वो मेरे इतने करीब आ गई थी कि कोई काम करनेवाली भी आ सकती है विश्वास नहीं आ रहा है। गले में कुछ अटक सा गया है उसके हमेशा के लिये चले जाना सोचकर। 
                           काले रंग के भीतर एक जागरूक और सफ़ेद चरित्र था उसका। समय पे आना,मन लगाके साफ काम करना। न चोरी-चमारी ना ही किसी तरह का लालच। मैं उसे निरख़्ती थी तो वो भी मेरी अन्यमस्कता धीरे-धीरे पहचानती गई,फिर मेरे मेरे करीब आते गई थी और कितने सारे काम खुद ब खुद करने लगी थी। मैं उसके गुणों पर मुग्ध रहती थी। कितना उठाके उसे दे दूँ समझ नहीं आता था। मन मिलते गया और काफी हदतक वो दोस्त जैसी होते गई। जबतक उससे घण्टों गप्प ना कर लूँ  ,मन ही नहीं लगता था।

 
                       ,फिर धीरे-धीरे ये गप्प मन लगाने और कामकाज से ऊपर उठ सामाजिक सरोकार तक पहुँच गया।मुझे तो घर-गृहस्थी से इतर कुछ करने नहीं दिया गया तो मैं कलिया के पीठ पर खड़ी उससे कुछ-कुछ करवाते जा रही थी।  खली समय में उसे अक्षरज्ञान करवाती थी ,गिनती-पहाड़ा रटवाती थी कि कुछ मूलभूत ज्ञान उसे हो जाये। दिमाग की भी कलिया  काफी तेज थी।  कुछ महीनो में ही कितनी आत्मसात कर ली ,कितना कुछ सीख गई थी। शब्द-शब्द मिलाके किताब,अख़बार पढ़ना सीख गई थी। सोचके खुद पे हंसती थी कि कोई घर के कामो के लिये दाई  रखती है,मैं उससे गप्प मारने,कुछ सीखाने,कुछ सीखने की भी अपेक्षा रखने लगी थी। किसी कारणवश एकदिन भी नहीं आई  तो मन दूसरी तरफ लगाना पड़ता था। बहुत कुछ बताती थी कलिया अपनी बस्ती की,रीति-रिवाजों कि, संस्कारों  की। गरीबी और अभावों के भीतर भी एक जूझती जिंदगी होती है जो चलती रहती है और परवान भी चढ़ती है। 
                    कलिया को दारू से सख्त चिढ थी जबकि इनलोगों में तो औरतें भी जोशोखरोश से दारू पीती  है। "जानती हैं दीदी मेरे ७ बच्चे हैं,५ बेटा और २ बेटी। मेरे पति को पीने  से फुर्सत ही नहीं है। जो कभी-कभी कमाता है दारू पी कर उड़ा देता है,फिर मेरे कमाई पर भी हाथ साफ करना चाहता है। हमलोगों में मर्द नहीं भी कमा के निश्चिन्त रहता है कि हमारी औरतें घर और बच्चा सम्भाल लेंगी। मैं  दीदी खूब लड़ती हूँ,बस्ती की सभी औरतों को बोली हूँ कि विरोध करो ,कमाके लाओ तो रोटी खाओ,दारू पीओ। लेकिन औरतें मार से डर जाती है।" मैं  भी साहस का पाठ पढ़ाती कि तुम सभी एक होके रहो,अपना दुःख साझा करो,किसी को उसका पति पीटता है किसी भी वक़्त,तुम सभी मिलके उसे पीटो,अधमुआ करके बस्ती के बाहर खदेड़ दो,तीमारदारी मत करो। यदि सच में इनलोगों के मर्द रोज़-रोज़ दारू पीना बंद कर पैसा घर लाएं तो दोनों की कमाई इतनी अच्छी राशि के रूप में नज़र आएगी कि ये लोग काफी आराम और शानोशौकत से रह सकेंगे। 

                      कलिया की हिम्मत,बुद्धि,कुशाग्रता पे मुग्ध होती मैं उसे आगे की प्लानिंग सिखलाती। कलिया को साफसुथरा रहना,घर बच्चों को सम्भालना ,औरत के स्वास्थ से जुडी जानकारी ,फैमिली प्लानिंग बगैरह सिखलाती और बोलती जाओ अपने बस्ती में सभी को सिखलाओ। कलिया स्फूर्ति,जागरूकता के साथ बाकायदे सभी का क्लास लेती। "देखो दीदी ५ मर्द को मैं भी तो पैदा की हूँ,१ पति है,२ दामाद है जो बगल में ही झोपडी डाल लिया है। सोचिये अभी से नहीं चेतूँगी तो ये ८ मर्द बैठके दारू पियेगा,मेरी बहु-बेटी कमाएगी भी और मार भी खायेगी। पति को तो इतना धिक्कार के रखी  हूँ कि मज़ाल है जो मुझे मार ले।"

                           वक़्त गुजरते जा रहा था। कलिया से एक तादात्म्य स्थापित हो गया लगता था। उसको माध्यम बना मैं गौरवान्वित महसूस करती थी। ४-५ महीनो के लिए कुछ कार्यवश मुझे ससुराल जाना पड़ा,कलिया के ऊपर ही घर की सभी जिम्मेवारियाँ सौप के। इतने सुथरे ढंग से वो सभी काम करने लगी कि मैं भी स्थिर हो के सभी काम निपटा के ही लौटी। आने पे लगा कि कलिया कुछ मुरझाई,उदास,खोई-खोई सी है पर अपनी व्यस्तता में उसपर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाई। कुछ दिनों के बाद काम करने आई तो मैं चौंक गई .....कलिया के पैर लड़खड़ा रहे थें,बोली लटपटा  रही थी। अपनी आँखों पे मुझे खुद विश्वास नहीं हो रहा था। आँधियाँ सी चलने लगी दिमाग में की ऐसा क्या हुआ होगा आखिर कि कलिया बेलन के बदले बोतल उठा ली। फिर कलिया हमसे कटने लगी,मुँह चुराने लगी। अपने बदले बहु को काम करने भेजने लगी। बहु से ही मैं बहुत कुछ जान पाई थी। जो कलिया मेरे आत्मबल के आधार पर अपने पति और समाज के सामने तन के खड़ी हो गई थी,मेरे न रहने पर वो अपने बेटों और दो  दामाद  के सामने हार गई। मर्द के समाज में औरत सिद्ध हो कमजोर पड़ गई,फिर कमजोरी गले लगाके बिखर गई। एक जीती हुई बाज़ी क्रमशः वो हारने लगी। जीत हार  में जब पूर्णतः हो गई,वो दुनिया छोड़ गई। इतनी हिम्मती होके क्यों तुम कलिया कायर हो गई। अभावों की खाई पाटके  भरीपुरी जिंदगी तुम खुद बनाई फिर क्यूँ मुँह फेर ली। 
               शायद उसके रूप में मैं हार चुकी हूँ। मेरा आत्मबल भी कही गिरवी रह गया। मेरी ख़ुशी,उत्साह से लबरेज  दिनचर्या ख़त्म हो चुकी है। 

अपर्णा साह 
परिचय - 
मैं अपर्णा साह हूँ। राँची में रहती हूँ। सिवान(बिहार) की रहनेवाली हूँ। सफल घरेलु महिला और माँ हूँ। 30 मई जन्मदिन है। दो बेटे ही हैं,पति  कोलइंडिया में इंजीनियर हैं। बचपन से पढ़ने-लिखने का माहौल मिला  है। बीच में बच्चों के कारन कुछ ठहराव हुआ पर अकेलापन फिर से कलम पकड़ा गई। 
 दिल से स्पंदित शब्द ,भावनाओं का ज्वार ,सुख-दुःख की स्याही .....बस ये ही है मेरी पहचान .कुछ न कह पाने की झिझक,हद से न निकल पाने की कुंठा ,जाने कितना कुछ अनकहा,अनसुना, अनचीन्हा रह जाता है.तो हाथों में कलम आ जाती है। चूँकि मनोविज्ञान से पढ़ी हूँ सो इस विषय पे कलम ज्यादा चलती है। 

(सभी चित्र गूगल से साभार )

atoot bandhan ............क्या आप ने  हमारा फेस बुक पेज लाइक 

                                              किया ?

रविवार, 17 मई 2015

सद्विचार











अटूट बंधन ........... कृपया क्लिक करे 

रिया स्पीक्स - औरत का घर


                           



!!!!!!!!!!!!!!रिया स्पीक्स !!!!!!!!!!!!!!!!

               औरत का घर 


बहुत दिनों से मैं उसे खोज रही थी। अचानक ही मिल गयी , वो भी मेरे घर के पास।तो आइये आज आप का भी परिचय करा ही देते है उससे .... मैं बात कर रही हूँ रिया की , 21 वर्षीय दिल्ली में पैदा हुई और दिल्ली में पली लड़की। इस वक़्त दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ रही है। रिया एक परंपरावादी परिवार से है ,विचारों से आधुनिक है। रिया में परंपरा व् आधुनिकता का अनुपातिक समावेश है। रिया जींस,स्कर्ट सलवार -कुरता जो मन आये पहनती है। मंदिर भी जाती है ,डिस्को में भी। लिंकन पार्क ,माइकल जैक्सन तेज वॉल्यूम में सुनती है तो धीमी -धीमी वॉल्यूम में शास्त्रीय संगीत भी। धार्मिक ,सामाजिक ,राजनीतिक हर मुददे पर रिया खुल कर बोलती है। वही दूसरी ऒर रिया की दादी फूल रानी जो उत्तर प्रदेश के एक गाँव उतरी -पूरा से यहाँ रहने आयी है। दादी घोर परंपरा वादी है, पर कही न कही समझाने पर समझती हैं,. इन दोनों के बीच में हैं रिया की माँ रेखा जो दो पीढ़ियों के बीच में मौन रहना ही पसंद करती है।जो मैं उस घर में देखूँगी आपको एक नए कॉलम >>>रिया स्पीक्स <<<के माध्यम से जरूर बताऊँगी। यह दो पीढ़ियों के विचारों का टकराव हैं. …(कौन सही है कौन गलत यह निर्णय आप का मेरा इससे कोई लेना -देना नहीं है। )तो चले है रिया के घर। ......................

दादी फूल रानी पान में चूना लगा रहीहै "हे !शिव ,शिव ,शिव ,कितनी गर्मी है , बिटिया ,अरी ओ रिया हाँथ में अखबार लीन्ह हो तनिक कोनहुँ खबर तो पढ़िके बताओ "
रिया :हां दादी वही तो मैं पढ़ रही हूँ। दिल्ली के पास एक आदमी ने अपनी पत्नी ,साले और ससुर का क़त्ल कर आत्महत्या की .... सिर्फ इसलिए की पत्नी उसकी ईक्षा  के विरुद्ध मायके चली गयी थी। सो !डिस्गस्टिंग
दादी :ई तो बड़ा बुरा हुआ।तबै तो क्रोध को बुद्धि नाशक बतावत है सबै वेद -पुराण.।  पर इ माँ उ मेहरारी का भी दोष राहे ,अरे आदमी नहीं चाहत ,तो कोनहुँ जरूरत राहे जाए की , कुछ दिनन बाद तो सुलह हो ही जात. .. अब मर्दन का तो गुस्सा नाक पे धरा ही राहत है। ……… आज -कल की मेहरारी भी... सब्र नाहीं है। का जमाना आ गए है , हे !शिव शिव ,शिव
रिया :कब तक दादी ,आखिर कब तक औरत अपने मायके या ससुराल जाने के लिए स्वेक्षा से निर्णय नहीं ले पायेगी। दो पाटों में बंटी है औरत.… सामाजिक तौर शादी के बाद ससुराल ही उसका घर है पर भावनात्मक रूप से गहरे मायके जुड़ी रहती है औरत। …………क्या आज भी औरत एक वस्तु है की पति ने अपनी नाक का प्रश्न  बना उसे उसके भावनात्मक सम्बल से वंचित कर सकने का अधिकार खरीद लिया है। ............. एक तरफ पुराणों में शिव पत्नी सती, पति का अपमान सहन न कर पाने की वजह से आत्मदाह करती हैं। एक तरफ यह औरत जो मायके जाने पर मारी जाती है। ……………… क्या कभी पिता या पति दोनों यह यह कभी समझ पाएंगे कि , दो कुलों की इज़्ज़त समझी जाने वाली नारी दोनों ही परिवारों से गहरे जुडी होती है। अपनी नाक या प्रतिष्ठा का प्रश्न बना कर उसे किसी एक परिवार से प्रेम करने से वंचित कर देना कहाँ का न्याय है कहाँ की इनसानियत है।
दादी :हे शिव शिव शिव बात तो तुम सही कहत हो बिटियाँ।
वन्दना बाजपेयी
चित्र गूगल से

अटूट बंधन ………कृपया क्लिक करे 

गुरुवार, 14 मई 2015

अन्तराष्ट्रीय तम्बाकू निषेध दिवस पर विशेष : चाहिए बस एक स्नेह भरा हाथ

                    
                  
अन्तराष्ट्रीय तम्बाकू निषेध दिवस पर विशेष

 चाहिए बस एक स्नेह भरा हाथ .......

टूट जाते हैं कुछ लोग 
सांसों के टूटने से पहले 
जब जीवन के
टीभते  दर्द के 
अनेक नाम ,अनेक रूप 
गढ़ लेते हैं 
अपनी सर्वमान्य परिभाषा 
"निराशा "
कि  छोटे- बड़े रास्तों 
पगडंडियों से होते हुए 
अपनी समस्याओं का समाधान खोजते 
क्यों पहुँच जाते हैं 
एक ही जगह 
चौराहों की गुमटियों पर
जहाँ  
फूट जाती है कुछ आँखें 
आँखों के फूटने से पहले 
दिखती  ही नहीं 
साफ़ -साफ़ शब्दों में लिखी 
वैधानिक चेतावनी
कि  पैसे देकर 
खरीदते हैं "धीमी मौत "
समय के साथ 
रगड़ते -घिसटते 
अतिशय पीड़ा झेलते 
जब तय कर देता है डॉक्टर एक तारीख
आह ! दुर्भाग्य  
मर जाते हैं कुछ लोग
 मौत के आने से पहले 


 मैं जहाँ जा रही हूँ वहां मेरे साथ इस यात्रा में मेरी सहेली सुलेखा है। विशाल प्रांगण से होते हुए ईमारत में अन्दर घुसने से ठीक पहले मैं  धडकते दिल से मुख्य द्वार  पर लगा बोर्ड देखती हूँ … "क ख ग कैंसर हॉस्पिटल "। कैंसर एक ऐसा शब्द जिसको सुनकर भय के  अनगिनत केकड़े शरीर पर रेंगने लगते हैं । कैंसर जैसे जिंदगी मृत्यु की तरफ रेंग -रेंग कर चल रही हो ,सब ख़त्म कर देने के लिए सब लील जाने के लिए । मैं सुलेखा का हाथ कस कर पकड़ लेती हूँ । मैं आश्वस्त हो जाना चाहत हूँ की एक -दूसरे का साथ शायद उस पीड़ा को कम कर दे जो एक शोध के लिए हम अन्दर देखने जा रहे हैं । हम एक बड़े से वार्ड में प्रवेश करते हैं जहाँ मरीज ही मरीज हैं। .... तम्बाकू का दुष्परिणाम भोगते हुए मरीज ……… या अस्पताल की भाषा में कहें तो बेड संख्या । बेड नंबर -१ पर लेटा  मरीज बुरी तरह खांसता  है ,उसका दाहिना गाल फूल कर चार गुना हो गया है लाल ,सडा ,पीब भरा | दर्द की टीस  के साथ मरीज उलटी कर देता है ........ खून की उल्टी .... कैंसर की तीसरी अवस्था ।दर्द की सिहरन के साथ सुलेखा को उबकाई   आती है  ।"नहीं मैं और नहीं देख सकती कह कर सुलेखा मेरा हाथ छुडा  कर बाहर भाग जाती है । "जो सुलेखा से देखा नहीं जा रहा  है वो कोई भोग  रहा है ।
                                          मैं आगे बढती हूँ बेड नंबर -२।  ओपरेशन के बाद गाल सिल  दिया गया है  । मरीज ठीक हो गया है पर होठ ,गाल ,नाक एक विचित्र स्तिथि में आ गए हैं बोलने में लडखडाहट है जो शायद पूरी उम्र रहेगी । बेड नंबर ३ व् चार की असहनीय यंत्रणाओं को देखते हुए मेरी दृष्टि पड़ती है बेड नंबर -५ के मरीज पर... शांत ,निश्चेष्ट ,सफ़ेद कफ़न ओढ़े । साथ में रोती -बिलखती २६ -२७ साल की स्त्री ,गोद में ६ माह का शिशु लिए । शायद पत्नी ही होगी ,और वह नन्हा  शिशु उसका पुत्र ,जो  पिता  शब्द सीखने से पहले ही  पिता के स्नेह से वंचित हो गया । वहीँ जमीन पर पसरी अपने जवान पुत्र की मौत पर मातम मनाती बदहवास अर्धविक्षिप्त सी माँ ।  हे विधाता ! एक साथ चार मौते ...,एक दिख रही है ,तीन दिख नहीं रही । क्यों आखिर क्यों? नशे की दिशा भटके क़दमों के साथ  ये नशा लील लेता है इतनी सारी  जिंदगियाँ एक साथ  । अनमयस्क सी मैं बाहर की तरफ भागती हूँ ।  
                                 बाहर खुली हवा में एक बेचैन कर देने वाली घुटन है । रह -रह कर बेड नंबर १,, ……… के मरीज मुझे याद आ रहे हैं । शायद उनसे मेरा कोई रिश्ता नहीं है……… या शायद उनसे मेरा बहुत घनिष्ठ रिश्ता है जो एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य से ,एक आत्मा को दूसरी आत्मा से जोड़ता है .......... हमारे बीच मानवता का रिश्ता है । अनमयस्क सी मैं चल पड़ती हूँ और मेरे साथ चल पड़ती हैं फूटपाथ पर कुकुरमुत्तों की तरह उगी पान की गुमटियां और उस पर सजे  सिगरेट के पैकेट व् ख़ूबसूरती से लटकाये गए तम्बाकू के गुटखे । जिन पर साफ़ -साफ़ लिखी वैधानिक् चेतावनी " तम्बाकू स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है  "मुझे मुंह चिढा रही है । जानते समझते हुए भी बच्चे ,किशोर ,युवा और कुछ वृद्ध उसे खरीद कर ले जा रहे हैं और साथ में खरीद कर ले जा रहे हैं ............. अतिशय पीड़ा ,एक धीमी मौत ।
        आज  स्कूल में चार्ट कॉम्पटीशन है । विषय है "से नो टू  टुबैको "। कक्षा ३ ,४ और ५ के ढेर सारे  बच्चे चार्ट बना रहे हैं ।  तरह -तरह की आकृतियों  के बीच बड़ा -बड़ा लिखा है "से नो टू  टुबैको "। इनमें से किसी की प्रथम पुरूस्कार मिलेगा ,किसी को द्वितीय किसी को तृतीय । पर मैं खोज उन बच्चों को जो हार जायेंगे । आज की इस प्रतियोगिता में नहीं । उम्र के किसी पड़ाव में ,किसी समय में किसी उलझन में "से नो टू  टुबैको " कहने वाले बच्चे  ,एक सिगरेट का पैकेट या एक तम्बाकू का गुटखा खरीद कर "से यस टू  टुबैको कहते हुए लील जायेंगे ..........तम्बाकू नहीं , ये सारे चार्ट ,ये सारे भाषण ,ये सारे मार्च पास्ट.... और ये सारा उत्साह और धीरे -धीरे तब्दील होने लगेंगे बेड नंबर १ ,,३ के मरीजों में ।  
                   हर वर्ष  अन्तराष्ट्रीय तम्बाकू निषेध दिवस मनाया  जाता  है । जोर -शोर से तम्बाकू और उसके उत्पादों की खराबियाँ  बतायी जाती हैं । स्कूलों  में विशेष कार्यक्रम होते हैं । सेमिनार्स होते हैं । ज्यादातर सबको बचपन से ही रट  जाता है “कि तम्बाकू धीरे धीरे सुरसा के मुंह की तरह पूरी दुनिया को लीलने को आमादा है | ४५० ग्राम तम्बाकू में निकोटीन मात्रा लभग ६५ ग्राम होती है और  इसकी ६ ग्राम मात्रा से एक कुत्ता ३ मिनट में ही मर जाता है|भारत में किए गए अनुसंधानों से पता चला है कि गालों में होने वाले कैंसर का मुख्य कारण खैनी अथवा जीभ के नीचे रखी जाने वाली, चबाने वाली तम्बाकू है। इसी प्रकार गले के ऊपरी भाग में, जीभ में और पीठ में होने वाला कैंसर बीड़ी पीने से होता है। सिगरेट से गले के निचले भाग में कैंसर होता पाया जाता है, इसी से अंतड़ियों का भी कैंसर संभव हो जाता है।तम्बाकू का नियमित सेवन व्यक्ति को धीरे –धीरे मृत्यु के करीब ला देता है और वह असमय काल कवलित हो जाता है |  मन में अजीब सा मंथन है.……आखिर क्या है जो तमाम वैधानिक चेतावनियों ,जानकारी और  हर साल मनाये जाने वाले “से नो टू टुबैको “वाले दिवस के बावजूद कुछ लोग उस दिशा में बढ़ जाते हैं जो वर्जित क्षेत्र है |ज्यादातर तम्बाकू खाने की शुरुआत किशोरावस्था या युवावस्था में ही होती है |जो उम्र ऊर्जा व उत्साह  से भरी होती है उसमें क्यों चुनते हैं कुछ लोग धीमी मौत |क्यों बचपन से दब्बू सा बबलू  जिसने जीवन में अब तक कभी  कौन से जूते  खरीदने हैं  का भी निर्णय स्वयं से नहीं लिया चौदह साल की उम्र में दोस्तों के कहने पर “अरे ये तो मुन्ना है ,छोटा बेबी ,दूध पीता बच्चा ,जा माँ की गोद में खेल कहकर उकसाए जाने पर “दूसरों की नजर में खुद को बड़ा साबित करने के लिए तम्बाकू खा लेता है |वही राहुल प्रेम में असफल हो जाने पर , रामरती पति की असमय मृत्यु के बाद समाज से लड़ने की हिम्मत जुटाने के लिए ,सोमेश असफल विवाह के बाद ,मयंक  बेरोजगारी से जूझते  हुए एक के बाद एक इंटरव्यू में असफल होने के बाद तम्बाकू में अपने दुःख का समाधान ढूँढने लग जाते हैं |
                                  मानव मन भी कितनी विचित्रताओ से भरा है |हर मन की समस्या अलग ,उसकी उलझन अलग ,उसकी  मानसिक गुत्थी अलग | कितने लोग कितने दुःख कितने कारण पर इन सब के बीच एक समानता है सब के सब निराश हैं ...जीवन की किसी हार से किसी पराजय बोध से | पर सबने एक ही समाधान खोजा है ......... तम्बाकू के छोटे –छोटे दानों में |जो कुछ क्षण के लिए उनके अवसाद को दूर कर सके जीवन की निराशा से निकाल सके |ये सब निराश लोग  बुझते जीवन में आशा की चिंगारी जलाने के लिए उस गाडी पर सवार हो जाते हैं जो उन्हें धीरे –धीरे चिता की ओर ले जाती है |इनमें से कई हमारे प्रियजन हैं |मेरे मन में यह शास्वत प्रश्न है ....... आखिर  क्यों टूट गए ये लोग |सुख दुःख तो जीवन का हिस्सा हैं |आशा –निराशा में दिन –रात की सी आंख मिचौली है |फिर पराजय बोध इतना ,इस कदर क्यों हावी हो गया की पढ़े लिखे लोग भी इस दिशा की तरफ बढ़ चले |

                           मुझे पता है, शायद सब को पता हो | जितने भी नशीले पदार्थ  होते हैं,उन सब में एक गुण अवश्य होता है ..... वो है बार –बार उनको खाने का मन जिसे हम आम भाषा में  एडिक्शन कहते हैं | अक्सर किशोरावस्था में उत्सुकता वश या मित्रों के साथ इन पदार्थो का सेवन शुरू होता है फिर इसके नशे का आनंद  आने लगता है। इसकी मात्रा बढ़ाई जाती है। जो लोग बार-बार लोग इसका सेवन करते है, उनका शरीर इस मादक पदार्थ का आदी हो जाता है और फिर वह उसको छोड़ नहीं पाते। छोड़ने से कई प्रकार के लक्षण जैसे- बेचैनी, घबराहट होने लगती है। इस कारण लोग इसके आदी हो जाते है, उसी प्रकार जैसे लोग शराब या अन्य पदार्थों के आदी हो जाते है और जब कोई किसी पदार्थ का आदि हो जाए तो उसका नियमित सेवन उसकी बाध्यता हो जाती है |फिर सब कुछ जानते समझते हुए भी व्यक्ति अपने आप को उस नशे के चुंगल से मुक्त नहीं कर पाता |मेरा मन व्यग्र है | काश की इन भटके हुए लोगों को वापस लाया जा सके | काश की हमारे अपने प्रियजन इसके गंभीर परिणामों को न भुगते |काश की इस नशे का लती किसी का भाई बेटा  पति अपने अंतिम दिन कैंसर हॉस्पिटल में न  गुज़ारे | ख़ुशी की बात है कि कुछ नशा मुक्ति केंद्र हैं जो बड़े ही प्यार से वैज्ञानिक तरीकों द्वारा इन मासूमों को वापस सहज सरल जीवन में ले आते हैं | पर इसमें मरीज की संकल्प शक्ति का बहुत योगदान होता है ,अन्यथा नशे की लत से निकलना संभव नहीं |यहाँ मैंने जानबूझ कर मरीज शब्द प्रोयोग किया है ,क्योकि मेरे विचार से नशे के चुंगल में फंसने वाले सब मरीज ही हैं ........... मन के मरीज ,भावनाओं के मरीज ,कमजोर जिजीविषा के मरीज | इनमें से कितने हैं जो नशा मुक्तिकेंद्र में जा कर अपनी संकल्प शक्ति जगा पाते होंगे | शायद कुछ .... आंकड़े भी यही कहते हैं | बाकी के लिए कहीं न कहीं किसी न  किसी अस्पताल का बिस्तर तय हैं .....और तय है एक दर्द भरी मौत | काश की इनके नशा करने के शुरूआती दिनों में ही इन्हें  इस काल कोठरी से वापस खींचा जा सके |
                 अगर समस्या है तो समाधान भी अवश्य होगा | बेहतर हैं की नशे की आदत की शुरुआत ही न हो या हो गयी हो तो शुरू में ही इसे सुधारा जा सके |पर कैसे ? किस तरह ? अपने प्रश्न का उत्तर खोजने मैं कमरे में टहलने लगती हूँ |वहीं  मेरा  बारह वर्षीय बेटा नीद में कुनमुनाता है |मैं स्नेह से उसके सर पर हाथ फेरती हूँ | बेटा गहरी नींद में है फिर भी मेरे हाथ फेरने पर वो मुस्कुराता है |  गहरी नींद में भी उसे अहसास होता है स्नेह का | सहसा मैं मुस्कुरा उठती हूँ ..... शायद यही मेरे प्रश्न का उत्तर है | नींद की अपनी एक दुनिया है ,जैसे की नशे की अवस्था की एक दुनिया हैं ...... इस दुनिया के भीतर इस दुनिया से बिलकुल अलग | एक अहसास स्नेह का ,एक प्यार भरे हाथ का स्पर्श ,कुछ भावनाओं से भरे  मीठे शब्द | बस इतना ही जरूरी है........ या शायद ...इसी की कमी है | कुछ प्रतिशत को छोड़ कर नशा करने वाला निराश व्यक्ति कहीं न कही खुद से घृणा करने लग जाता है| कभी –कभी चाहते हुए भी नशा नहीं छोड़ पाता है ,असफल प्रयासों से  उसकी मनहस्तिथि और कमजोर हो जाती है | अगर उसी समय उसको परिवार से निरंतर ताने उलाहने मिलते हैं तो वो उस अपमान को फिर नशे से ही भूलाने की कोशिश में लग जाता  हैं और  नशे की आदत छोड़ना और मुश्किल हो जाता है | पर ये तस्वीर बदली जा सकती है जब ये कदम तम्बाकू –सिगरेट की तरफ उठ रहे हों तभी उनको किन्ही दो स्नेह भरे हाथों का सहारा मिल जाए ,दो मीठे शब्द मिल जाए ,अपने वजूद का हल्का सा अहसास मिल जाए तो इन  क़दमों को वापस नशा मुक्त जीवन की तरफ मोड़ा जा सकता है |
                          अंत में बस इतना ही कहना चाहूंगी कि नशा केवल एक व्यक्ति को नहीं खाता ,पूरे परिवार को खाता है | मेरे विचार से जितना जरूरी है तम्बाकू के नशे को रोकने  के लिए जन जागरण अभियान ........ ये चार्ट ,ये स्लोगन ,ये लेख ये मार्चपास्ट हैं  उतना ही जरूरी है निराशा ,अवसाद या किसी  कारण से तम्बाकू की तरफ मुड गए लोगों की नशा मुक्त सामान्य जीवन में  वापसी ........ तभी शायद कैंसर हॉस्पिटल के बेड नंबर १ ,२ ,३ पर कोई यंत्रणा भोगता मरीज नहीं होगा ,बेड नंबर ५ के बगल में रोती  हुई पत्नी नहीं होगी | ये हो सकता है ....जब स्नेह से भरे दो हाथ थाम लेंगे उन हाथों को जो बढ़ रहे हैं किसी गुटखे किसी सिगरेट  की तरफ | हमारी आपकी और समस्त मानवता की तभी जीत है जब कोई नशे के आदि दो हाथ गुटखा तम्बाकू दूसरी तरफ फेंक कर कहेंगे ...........”नो टू टुबैको “ और गा उठेंगे ..........

कह दो कि न  पुकारे ,ये सर्द स्याह रातें
लौट आई हैं बहारे अब मेरे गुलिस्तान में


एक कोशिश है ......... कर के देखते हैं         
       


सोमवार, 11 मई 2015

क्या आपका नाम भाग्यशाली है ?

              
                                       Omkar Mani Tripathi
                   

क्या आपका नाम भाग्यशाली है ?

अंकशास्त्र में जितना महत्व मूलांक और भाग्यांक का है,उतना ही महत्व नामांक का भी है.नाम के अक्षरों का योग नामांक कहलाता है। मूलांक और भाग्यांक का ज्ञान तो लगभग सभी को होता है,लेकिन नामांक की गणना करना बेहद जटिल कार्य है। नामांक को सौभाग्य अंक भी कहा जाता है। किसी भी जातक की जन्मतिथि का योग मूलांक होता है, जैसे 4 ,22,31 तारीखों को जन्मे जातकों का मूलांक 4 कहलाएगा।  जन्म की तिथि, माह व वर्ष का योग भाग्यांक होता है, जैसे 31 अक्टूबर माह 1949 का भाग्यांक  3+ 1+1+0 +1+9+4+9 =28=10 =1होगा।अंकशास्त्र की मान्यताओ के अनुसार नाम अगर मूलांक और भाग्यांक  के अनुकूल नहीं होता, तो व्यक्ति को जीवन में कई तरह की असुविधाओ का सामना करना पड़ता है.आइये हम जानते हैं कि नामांक की गणना कैसे की जाती है? 

A I J Q Y = 1
B K R = 2
C G L S = 3
D M T = 4
E H N X = 5
U V W = 6
O Z = 7
F P = 8
 कीरो पद्दति के मुताबिक अंग्रेजी  के अक्षरों को दिये गये इन अंकों के आधार पर ही नामांक की गणना की जाती  है.खास बात यह है कि किसी भी अक्षर को 9 अंक नहीं दिया गया है. आप भी इन ऊपर दिये गये अंकों से अपना नामांक निकाल सकते हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी का नाम mohan है,तो उसका नामांक 22 यानि 2+2=4 होगा.अब mohan की जन्मतिथि यदि 4,13,22 या 31 हो,तो उसे जीवन में ज्यादातर सफलताही मिलेगी,किन्तु यदि नामांक,मूलांक और भाग्यांक में सामंजस्य नहीं है,तो जीवन में अनेक तरह की कठिनाइयाँ आ सकती हैं.हम अपनी जन्मतिथि नहीं बदल सकते,इसलिए जन्मांक और मूलांक नहीं बदले जा सकते.यदि नामांक,मूलांक और भाग्यांक में सामंजस्य न हो ,तो हम सिर्फ इतना ही कर सकते हैं कि नाम की स्पेलिंग में थोडा फेरबदल करके नामांक को जन्मांक और मूलांक के अनुकूल बना सकते हैं.कई फ़िल्मी सितारों और राजनीतिज्ञों ने यह प्रयोग आजमाया भी है.फिर देर किस बात की.

आप भी अपने नामांक को अपने मूलांक और भाग्यांक से मिलाकर देखिये और यदि इनमे सही तालमेल न हो ,तो नाम में थोडा फेरबदल करके तालमेल बिठा लीजिये.

ओमकार मणि त्रिपाठी