रविवार, 28 जून 2015

विदाई


                                           

जीवन भी कितना विचित्र है आज यूँ ही मुकेश का गाया  यह गीत कानों में पड  गया और मन की घडी के कांटे उलटे चलने लगे ।
ये शहनाईयाँ दे रही हैं  दुहाई ,
कोई चीज अपनी हुई है पराई
किसी से मिलन है किसी से जुदाई
नए रिश्तों ने तोडा नाता पुराना ...........

                                             बात तब की है जब मैं बहुत छोटी थी घर के पास से शहनाई की आवाज़ आ रही थी । थोड़ी देर सुनने के बाद एक अजीब सी बैचैनी हुई..... जैसे कुछ टूट रहा हैं कुछ जुड़ रहा है । आदतन अपने हर प्रश्न की तरह इस प्रश्न के साथ भी  माँ के पास  जाकर  मेरा अबोध मन पूँछ उठा " माँ ये कौन सा बाजा बज रहा है ,एक साथ ख़ुशी और दुःख दोनों महसूस हो रहा है । तब माँ ने सर पर हाथ फेर कर कहा था " ये शहनाई है। अंजू दीदी की विदाई हो रही है ना । इसलिए बज रही है । अब अंजू दीदी यहाँ नहीं रहेंगी अपने ससुराल में अपने पति के साथ रहेंगी । क्यों माँ आंटी -अंकल ऐसा क्यों कर रहे है क्यों अपनी बेटी को दूसरे के घर भेज रहे हैं । क्या सब बेटियां दूसरों के घर भेजी जाती हैं ? क्या मुझे भी आप दूसरे के घर भेज देंगी । माँ की आँखें नम हो गयी । हां बिटिया  ! हर लड़की की विदाई होती है । उसे दूसरे के घर जाना होता है । तुम्हारी भी होगी । मेरे घबराये चेहरे को देखकर माँ ने मेरे सर पर हाथ फेर कर किसी कविता की कुछ पक्तियाँ दोहरा दी । पता नहीं किसकी थी पर जो इस प्रकार हैं। .............

कहते हैं लोग बड़ी शुभ घडी हैं
शुभ घडी तो है पर कष्टदायक बड़ी है
जुदा  होता है ,इसमें टुकड़ा जिगर का
हटाना ही पड़ता है दीपक ये घर का
                                             उस दिन पहली बार समझ में आया था ये घर मेरा अपना नहीं है मुझे जाना पड़ेगा … कहीं और । पर बचपन की खेल कूद में कब का भूल गयी । एक दिन यूँही माँ ने आरती कर के रखी थी।तेज हवा का झोंका आया और वो बुझ गयी । मैं जोर से  चिल्लाई "माँ आरती बुझ गयी ,आरती बुझ गयी ". । माँ ने डाँट कर कहा " बुझ गयी नहीं कहते …  कहते हैं विदा हो गयी ।  माँ के शब्दों को मैं देर तक सोचती रही  आरती विदा हो गयी । कैसे ,कहाँ ,किसके साथ ……शायद प्रकाश  अन्धकार के साथ  विदा हो गया…… जो कुछ पीछे छूट गया वो बुझ गया । जीवन के पथ पर जब दो लोग  एक साथ आगे बढ़ जाते हैं ,या विदा हो जाते हैं तो  जो  पीछे जो छूट जाते हैं वो बुझ जाते हैं ।क्या दिन संध्या के रूप में दुल्हन की तरह तैयार होता है और विदा हो जाता है रात के साथ ? रात  खिलते कमल के फूलों और कलरव करते पंक्षियों की बारात के आगमन पर  उगते भास्कर की रश्मियों की डोली में बैठकर विदा हो जाती है दिन के  साथ ?क्या विदाई ही जीवन सत्य है ,अवश्यसंभावी है ।   क्या यही है "किसी से मिलन किसी से जुदाई " मेरे पास अपने ही प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था ।
    अक्सर देखती थी किसी लड़की की विदा पर माँ और लड़की तो रोते ही थे बाकी सब नाते -रिश्तेदार जाने  क्यों रोते थे ,वो तो साथ में भी नहीं रहते थे । शायद वो जानते थे की विदाई ही जीवन का सच हैं । जीवन है तो कभी ङ्कभी कोई न कोई विदाई होनी ही है । हालाँकि हमारे  सखियों के ग्रुप में  अक्सर ऐसा होता था किन्हीं दो सखियों की मित्रता घनी हुई व् वो ग्रुप से अलग हुई ,अक्सर देखा था पर इसे विदाई नहीं माना  । तब तो इतना ही जानती थी कि विदाई लड़कियों की ही होती है। ……… जब भैया की शादी हुई तो भाभी को विदा करा कर लाये तब ये कहाँ जाना था की एक विदाई और हो रही है  …बहन के रूप में भाई पर अधिकार की ,आपस में बिताये जाने वाले समय की जो २ ४ घंटों से घटकर आरती की थाली में रखे राखी के धागे नन्ही सी रोली के टीके और अक्षत के चावलों में सिमट कर रह जाने वाले हैं ।
                    शायद वो भी एक विदाई ही थी जब उस स्कूल को छोड़ा था जहाँ बचपन से पढ़ रही थी । फेयर वेल का फंक्शन था । साड़ी लडकियाँ खाने में जुटी थी और हम कुछ सहेलियाँ रोने में । अजीब सा दुःख था……कल से नहीं आना है इस स्कूल में जहाँ रोज आने की आदत थी । तब हमारी प्रिंसिपल सिस्टर करेजिया ने जोर से घुड़की दी थी। फेल हो जाओ यहीं रह जाओगी । और हम आंसूं पोंछ कर विदा होने को तैयार हो गए ।

                             विदाई को कुछ कुछ समझा था अपनी बड़ी बहन की विदा पर । साथ खाना ,खेलना ,पढना सोना । छोटी होने के नाते कुछ आनावश्यक फायदे भी लेना  ....... कुछ अच्छा खाने का मन  कर रहा है " दीदी है ना ' ये दुप्पट्टा ठीक से पिन अप  नहीं है …  दीदी है ना । बर्थडे  पार्टी में क्या पहनूँ ....  दीदी है ना वो बताएगी । शादी बारात की ख़ुशी के बीच ये ध्यान ही नहीं गया कि दीदी घर छोड़ कर चल देगी । उस दिन आंसूओं के बीच प्रेम चन्द्र की दो  बैलों की जोड़ी बहुत याद आई । उफ़ ! क्या बीती होगी हीरा -मोती पर । मेरे तो सींग नहीं थे ………… होते तो भी क्या बाडा  तोड़कर बाहर भाग सकती थी ? जब  सीख गयी थी अकेले रहना ....... तब तक मेरी विदाई का समय आ गया । कहीं से टूटना कहीं जुड़ना । पराये घर में किसी को अहसास न होने देना " कि बहुत याद आ रही है  अम्माँ की , कोई भैया को बुला लायो ,कोई तो पापा से कह दो फोन कर लिया करे ,हमे संकोच लगता है । पर नहीं ....लड़कियों को तो पराये घर जाना ही होता है । रातो -रात बेटी से बहु की पायदान तय करते हुए एक अल्हड किशोरी से परिपक्व महिला बन जाना होता है ।   तब जाना था एक अधूरापन स्त्री की किस्मत से जुडा  होता है । जहाँ भी होती है आधी ही होती है ,कभी कहीं पूरी हो ही नहीं पाती । मायके में रहती है तो मन ससुराल में ,ससुराल में रहती है तो मन मायके में । धरती और आकाश भी क्षितिज पर मिल जाते हैं पर स्त्री के जीवन का कोई क्षितिज नहीं होता । वह जिंदगी भर भागती रहती है ,एड़ी चोटी  का जोर लगाती रहती है........ इन डॉ घरों के बीच ,यहाँ वहां कहीं हाँ कहीं  तो होगा उसका क्षितिज ……मुट्ठी भर भर ही सही ,चुटकी भर ही सही.............. हतभाग्य स्त्री का कोई क्षितिज नहीं होता । टॉलस्टॉय  की कहानी " हाउ मच लैंड ए मैन डस नीड " की तरह… क्षितिज  की तलाश चिता की राख में ही मिटती है ।
                           विचित्र है पर  विदाई सब की होती है ।  बेटे भी विदा होते हैं माँ से धीरे -धीरे ………कब अधिकार और प्रेम पत्नी के हवाले कर माँ के लिए केवल कर्तव्य बोध रह जाता है । किसी से मिलन किसी से जुदाई । और वो देखो समय का रथ भी तो डोली लिए तैयार रहता है हर समय .......... हर पल जो अभी है पलक झपकते ही आने वाले के साथ विदा हो जाता है.......... कभी न मिलने वाला एक अतीत छोड़कर ।
           बचपन से लेकर अब तक पता नहीं कितनी बार विदाई हुई । एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश एक शहर से दूसरे शहर । पर इन  सबसे ऊपर होती है अंतिम विदाई । आत्मा की दुल्हन .......  चिता की अग्नि के फेरे लेते हुए चल पड़ती है पर्मात्मा  के साथ  । भरे ह्रदय से ही विदा की रस्म तो निभानी ही है । आलता ,महावर ,बिछिया ,सिन्दूर और लाल चुनरी ................ कोई कमी न रह जाए दुल्हन के श्रृंगार में । विदाई ही शाश्वत है ………  पीछे छूट जाते हैं रोते बिलखते ,बच्चे परिवार,नाते रिश्तेदार आँखों में आँसू लिए । चल देती है दुल्हन। ………… क्या पता कितनी टूटी , कितनी व्याकुल । विदाई कितनी भी पीडादायक हो ,पर वही  सत्य है। अंत उसी गीत की पक्तियों से करूंगी जिससे आरभ किया था । शायद यही इस पीड़ा से उबरने का उपाय भी है ।

ये बोले समय की नदी का भाव
ये बाबुल की गलियाँ ये कागज़ की नाव
चली हो जो गोरी ,सुनो भूल जाओ
न फिर याद करना ,न फिर याद आना…………

वंदना बाजपेयी



शुक्रवार, 26 जून 2015

अटूट बंधन पत्रिका पर डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय 'प्रतीक 'की समीक्षा

                                                   
                                                               


"अटूट बंधन "पत्रिका पर हमें देश भर से प्रतिक्रियायें प्राप्त हो रही हैं ।किसी नयी पत्रिका को भारी संख्या  में  पाठकों के पत्रों का मिलना हमारे लिए हर्ष का विषय है वही यह हमारे उत्तरदायित्व को भी बढ़ता है कि हम आगे भी और अच्छा काम करे ।  जैसा कि हमारा स्लोगनहै "बदलें विचार बदलें दुनियाँ" हमारा पूरा प्रयास है की हम पत्रिका के माध्यम से लोगों में  सकारात्मक चिंतन विकसित करे ,उनका व्यक्तित्व विकास हो.... भारी संख्या में  सहयोगियों का पत्रिका से जुड़ना हमारे मनोबल को बढाता है और हमें यह अहसास कराता है हम सही दिशा में जा रहे हैं। आगे हमारी यह योजना है कि देश के हर जिले में अटूटबंधन लेखक-पाठक क्लब बने.... जहाँ साहित्य पर सकारात्मक चिंतन व्यक्तित्व विकास पर विस्तार से चर्चा की जा सके| यह अपनी तरह काअनूठा प्रयोग है और ख़ुशी की बात है की बहुतसे लोगोंने इसयोजना का स्वागत किया है व जुड़ने की ईक्षा जताई  है| उम्मीद है हमारी इस योजना को भी सभी का स्नेह व् सहयोग मिलेगा । गिरीश  चन्द्र पाण्डेय  प्रतीक जी जैसे साहित्य सेवी व् कर्मठ युवा रचनाकार एवं समीक्षक   की पत्रिका पर की गयी समीक्षा के लिए हम ह्रदय से आभार व्यक्त करते हैं । उनके द्वारा दिए गए सुझावों को हम अमल में लाने का प्रयास करेंगे  

कल अटूट बंधन पत्रिका प्राप्त हुई।पढ़ने बैठा तो पढता ही चला गया ।पत्रिका को पढ़कर ऐसा लगा जैसे जादू का पिटारा हो।सकारात्मकता से लवरेज।प्रेरक लेखो आलेखों का पुंज।यह अंक बहुत सुन्दर और संग्रहणीय बन पड़ा है।चिठ्ठी पत्री स्तम्भ यह बताता है की पत्रिका को लेकर पाठक चौकन्ना ही नहीं आशान्वित भी है।जहाँ वंदना जी के संपादकीय की सराहना सुरेश जी पटना द्वारा।और वहीँ एक पाठक की राय पत्रिका के पेज बढ़ाये जाएँ हरीश जी देहरादून द्वारा यह बताना की पत्रिका निष्पक्ष अपने लक्ष्यों की ओर अग्रसर है । प्रधान  संपादक ओमकार मणि त्रिपाठी जी का "दिल की "की बात संपादकीय को समृद्ध करता हुआ दीखता है।इनके लेख में जीवन में सकारात्मकता की पड़ताल जो जरूरी भी है।





वंदना दी की कलम हमेशा की तरह इस अंक में भी युवा जोश को आगाह करती दिखी कविता से शुरू किया गया संपादकीय "वो दुनिया कुछ और ही होती होगी........"पूरा संपादकीय इसी कविता में समेट लिया है।पुरानी पीढ़ी को भी इंगित करना नहीं भूली हैं।यह संपादकीय पूर्णतः मनोवैज्ञानिक सोच पर आधारित है जो प्रेरित भी करता है और आगाह भी।प्राची शुक्ला जी ने रंगो को अपने रंग से रंगने की भरपूर कोशिस की है।जीवन में रंगों का महत्व बताता यह लेख ।त्रिपाठी जी का बॉलीबुड में तांक झांक वाला सलमान की जेल और बेल का खेल एक करारा व्यंग्य ।डॉ परवीन केरल से शब्द और उसकी शक्ति की पड़ताल संग्रहणीय लेख।सतीश चंद्र शर्मा पंजाब का लेख घर का कबाड़ बढ़ाता अवसाद ।घर में पडी अवांछित चीजें हमें अवसाद की ओर धकेलती हैं यह लेख घर को अव्यवस्थित न होने दें और उसे सुव्यवस्थित होना चाहिए इसकी वकालत करता है।और यह सही भी है।वंदना जी की आवरण कथा खुद लिखें अपनी तकदीर पढी रोचकता से भरपूर है और युवाओं को प्रेरित करती है यह आवरण कथा है|




।प्रेमचंद जी मुम्बई के द्वारा व्यक्तित्व विकास पर आधारित लेख (जीतें मन की बाधा)सराहनीय है।पाठक को रिझाता है लेख ।सुरेन्द्र शुक्ल दिल्ली का रिश्ते नातों की पड़ताल पर लेख "रिश्तों में नोक झोंक"एक ऐसा लेख आपको लगेगा जैसे आपके लिए ही यह लिखा गया है।अशोक के.परूथी जी का व्यंग्य" पार्टी बनाम हम "राजनीती और लोकतंत्र के गड़बड़ झाले की पोल खोलता हुआ और रोचक है।काव्य जगत स्तम्भ तो इस अंक का लाजबाब है।कल्पना मिश्र बाजपेयी की (कविता माँ की चुप्पी)माँ चुप क्यों हो एक मार्मिक कविता है।शिखा श्याम जी की "स्त्री होना"यह लिखती हैं मुझे गर्व् है मैं स्त्री हूँ यह कविता स्त्री जागरूक हो रही है यह बताती है।मेरे परम मित्र और बड़े भाई चिंतामणि जोशी जी पिथौरागढ़ उत्तराखण्ड की कविता "खड़ी हैं स्त्रियां"एक सार गर्भित कृति है जिस कविता को आजकल साहित्यिक गलियारों में खूब सराहा जा रहा है।यह कविता लोक जीवन की जीती जागती मूर्ति बन पडी है पहाड़ की स्त्री को जानना है तो इसे पढ़िए।




सेनगुप्ता की कविता "लज्जा"अम्बरीष की सच को मैंने अब जाना है कंचन आरजू इलाहाबाद की "माँ "कविताएँ रोचक और सोचने को विवश करती दिखीं।नवीन त्रिपाठी जी की कहानी "प्रायश्चित्त"सराहनीय है।डॉ सन्ध्या जी की लघु कथा "सदाबहार "अच्छी लगी।बात जो दिल को छू गयी बहुत अच्छा प्रयास है।स्वास्थ्य स्तम्भ हमेशा की तरह लभकारी है सबको गर्मी से बचने के उपाय बताता हुआ ।डॉ आराधना जी का बाल मन में (बेकार न जाने दें बच्चों की छुट्टिया)अभिभावको के लिए प्रेरक लेख है।उपासना सियाग अबोहर का स्त्री विमर्श पर (महिलाओं में कर्कशता क्यों)सोचने को विवस करता आलेख ।नाम व भाग्य का सम्बन्ध लेख में त्रिपाठी जी की विवेचना सराहनीय है।


अंत में यही कह सकता हूँ अटूट केवल एक पत्रिका नहीं अन्तर्मन् की पुकार है हर वर्ग को समेटने का प्रयास किया गया है।हर समस्या को छूने का प्रयास किया गया है।बच्चों से लेकर बुजुर्गो तक सब इसको खुले मन से पढ़ सकते हैं।इसे आप अपनी मेज पर रखने में शर्म महसूस नहीं करेंगे।अपने बच्चों से इस पर आप खुलकर चर्चा कर सकते हैं।अपनी सकारात्मकता को बनाये रखने के लिए इसे जरूर पढ़ें।
अटूट जिसका अंग मैं भी हूँ एक सलाह सम्पादक मंडल के लिए पत्रिका के कवर पेज को शास्त्रीय आवरण देंगे तो और रोचक बनेगा पेज संख्या बढ़नी चाहिए।कहानी और व्यंग को और ज्यादा स्थान दें एक कॉलम पुस्तक समीक्षा का जरूर रखें।अटूट परिवार के बिचार संपादक को छोड़कर पिछले पृष्ठों में हों।कुल मिलाकर अटूट एक सम्पूर्ण वैचारिक,पारिवारिक,सकारात्मकता का गुलदस्ता है इसे अपने पुस्तकालय में सजाएँ।अटूट परिवार बधाई का पात्र है।
एक समीक्षा
"प्रतीक"डॉ गिरीश पाण्डेय
उत्तराखंड





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मंगलवार, 23 जून 2015

"एक दिन पिता के नाम "......कवितायें ही कवितायें






अटूट बंधन परिवार द्वारा आयोजित "एक दिन पिता के नाम 'श्रंखला में 
आप सब ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया इसके लिए हम आप सब रचनाकारों का ह्रदय से धन्यवाद करते हैं | हमारी कोशिश रही कि हम इस प्रतियोगिता में अच्छी से अच्छी रचनाओं को ब्लॉग पर प्रकाशित करे .... जिससे पाठकों को एक एक स्थान पर श्रेष्ठ सामग्री पढने को मिले | वैसे पिता के प्रति हर भाव अनमोल है हर शब्द अनूठा है हर वाक्य अतुलनीय है | ......... हम अपने आधार पर किसी भी भावना को कम या ज्यादा घोषित नहीं कर कर सकते थे पर लेखन कौशल और भावों की विविधता को व् रचनाकार के विजन को देखते हुए हमने ब्लॉग पर प्रकाशित की जाने वाली रचनाओं का चयन किया है | हमें प्राप्त होने वाली ५० से अधिक कविताओं में से हमने ७ का चयन किया है| आज प्रतियोगिता के अंतिम दिन आप संजना तिवारी , इंजी .आशा शर्मा ,तृप्ति वर्मा ,दीपिका कुमारी 'दीप्ति 'डॉ भारती वर्मा बौड़ाई ,रजा सिंह व् एस .एन गुप्ता की कवितायें पढेंगे | इस प्रतियोगिता के सफलता पूर्वक आयोजन के लिए "अटूट बंधन "परिवार रचनाकारों ,पाठकों व् निर्णायक मंडल के सदस्यों का ह्रदय से आभार व्यक्त करता है | 





पापा मैं आप जैसी

क्या इन यादों के लिए कोई शब्द भी हैं ? या इस पीड़ा के लिए कोई मरहम ?? मैं आपको खोजती हूँ जाने कहाँ - कहाँ ?? आप मृत्यु शया पर सज कर कब के जा चुके हो !! ये यकिन दिलाऊं भी तो खुद को कैसे ?? आईना देखती हूँ तो पाती हूँ ----- वही आँखे.... हाँ " पापा " आपकी वही आँखे ...... जिनसे नजरें मिलाना मुझे पाप लगता था आज चिपकी हैं मेरी ही आँखों पे ....। खुद को मुस्कुराते देखती हूँ तो.... महसूस होता है जैसे जैसे.... ये वही हुबहू चेहरा है आपका !!!!!! मुस्कुराता चेहरा ....।। जब कभी बच्चों को झिड़कती हूँ झूठे तो लगता है ये डांट.....?? ये तो वही डांट है जो कई बार आपने मुझे सुनाई थी झिड़कियों में ....।। मैं आपकी एक झलक नहीं पूर्ण व्यक्तित्व बन चुकी हूँ मेरे हाथ -पैर .. और उनकी सूजन भी.... उठना - बैठना - चलना और खीजना भी..... हाँ आप ही तो हैं मेरे भीतर -मेरे भीतर साँसे ले रहे हैं .... हैं ना ????? जानते हैं " पापा " नहीं देखती हूँ मैं खुद को रोते हुए क्योंकि आपकी ये लाडो नहीं देख पाएगी आपको खुद में रोते हुए...... नहीं देख पाउंगी मैं आपको रोते हुए .......
संजना तिवारी





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याद है मुझे पापा


एक अटूट बंधन है 
पिता का पुत्री से ,
माँ जननी तो पिता भाग्यविधाता,
पिता की यादें वो खुशियाँ मानो
ऊसर भूमि पर हरियावल।
याद है मुझे
पिता की सारी बातें
बिताए गए उनके साथ वो पल -पल
की हँसी, खेल, तमाशे, 
मेरा रूठ जाना उनका मनाना, 
मेरी एक एक जङता को पूरा करना।
याद है मुझे
मेरे वो तोहफे फ्रॉक, गाडियाँ व मिठाइयाँ, 
जिसे छिपा देते तकिये के नीचे
और ताकते दूर से, मानो खोज रहे
मेरे चेहरे की खुशियाँ।
याद है मुझे 
पिता के जीवन की पहली कामयाबी,
उनका बाइक खरीदना और 
मुझे पहले बैठा घुमाना ।
याद हैं मुझे
दिन भर खेल गर दुख जाते पैर 
मेरे तो पिता का उन्हें सहलाना।
याद हैं मुझे
हर रात खेल कही भी सो जाती मैं
पर आँखे खुलती तो पिता को ही
पास पाती मैं।
                   तृप्ति वर्मा



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तात नमन


समझ न पाया प्यार पिता का, बस माँ की ममता को जाना
पुत्र से जब पिता बना मैं, तब महत्ता इसकी पहचाना

लम्हा-लम्हा यादें सारी, पल भर में मैं जी गया
तुम्हे रुलाये सारे आंसू घूँट-घूँट मैं पी गया

जब भी मुख से मेरे कड़वे शब्द कोई फूटे होंगे
जाने उस नाज़ुक मन के कितने कौने टूटे होंगे

अनुशासन को सज़ा मान कर तुमको कोसा था पल-पल
इसी आवरण के भीतर था मेरा एक सुनहरा “कल”

लोरी नहीं सुनाई तो क्या, रातों को तो जागे थे
मेरे सपने सच करने, दिन-रात तुम्हीं तो भागे थे

ममता के आंचल में मैंने, संस्कारों का पाठ पढ़ा
हालातों से हार न माने, तुमने वो व्यक्तित्व गढ़ा

जमा-पूँजी जीवन भर की मुझ पर सहज लुटा डाली
फूल बनता देख कली को, खाली हाथ खिला माली

आज नहीं तुम साथ मेरे तब दर्द तुम्हारा जीता हूँ
सच्ची श्रध्दा सुमन सहित, तात नमन मैं करता हूँ



इंजी. आशा शर्मा




पिताजी प्रथम पुज्य भगवान (कविता)

मेरे सर पर उनकी साया है वे हैं मेरा आसमान।
मेरे लिए मेरे पिताजी  हैं प्रथम पुज्य भगवान।।

ऊंगली पकड़ के चलना सिखाया,
जीवन का हर मतलब समझाया,
मेरे मंजिल का उसने राह बताया,
आगे बढ़ने का मुझमें जोश जगाया,
उनके आशिर्वाद से हम पा लेंगे हर मकाम।
मेरे लिए मेरे पिताजी हैं प्रथम पुज्य भगवान।।

प्यार से भी कभी नहीं डाँटा,
बचपन में भी कभी न मारा,
कैसा है सौभाग्य ये मेरा,
बाबुल रुप में भगवान मिला,
इनके पावन चरणों में ही मेरा है  चारो धाम।
मेरे लिए मेरे पिताजी हैं प्रथम पुज्य भगवान।।

अपनी चाहत कभी न जताया,
धैर्य का उसने भंडार पाया,
वृक्ष बन देते शितल छाया,
स्वर्ग से सुंदर  घर बनाया,
मेरी यही तमन्ना है मैं बढ़ाऊं इनकी शान।
मेरे लिए मेरे पिताजी हैं प्रथम पुज्य भगवान।।

- दीपिका कुमारी दीप्ति (पटना)

DrBharati Varma Bourai
सबसे बड़ा
उपहार होता है पिता का 
ये दुनिया
जो उनके घर
जन्म लेकर मिलता है
हर बेटी को।
दुनिया दिखा कर
ऊँगली थामे
चलना सिखाये
बचपन की शरारतों में
 साथ देकर 
माँ की डाँट से बचाये
कैशौर्य की उड़ानों में
करे सावधान
युवावस्था के सपनों में
मार्गदर्शक बन 
चले साथ-साथ
सुख की छाया में भले ही
दूर से देखे चुपचाप
पर दुःख की धूप में
समाधान लिए
बने छायादार वृक्ष,
टूटते-गिरते क्षणों में
रखे कंधे पर हाथ
और कहे धीरे से कानों में
'तू चल, मैं हूँ तेरे साथ'
माँ के साथ भी
और माँ के बाद भी 
दिलाये मायके के होने का
सुदृढ़ अहसास,
उस बेटी का पिता
जब चला जाए अचानक,
तब, एक दिन तो क्या
 पूरा जीवन भी कम है 
पिता के लिए।



--डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई--

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पिता 
पिता एक शब्द नहीं 
एक सम्पूर्ण संसार है 
एक सुरक्षा है 
आश्वासन है 
कर्तव्य है 
अधिकार है। 
एक छाया है 
जिसके तले महफूज़ है 
बेफिक्र है। 

पिता का जो कुछ है 
अपना है ,
नहीं है कुछ उसका
जो संतान का है। 
उसकी श्रम ,सम्पति और अधिकार
अपने जाये के लिए है। 

माँ का सुहाग है
पिता ,
उसकी आशाओ ,आकांक्षाओं ,कल्पनाओ 
और भावनाओ  का 
केंद्र है पिता। 
जब तक पिता है 
तब तक माँ का अस्तित्व 
पिता के बगैर 
निर्जीव ,बेसहारा और 
असहाय है। 

परिवार की आन ,बाण और शान हैं 
पिता ,
माँ धरती 
तो पिता आकाश है। 
माँ का कोई विकल्प नहीं 
तो पिता की कोई सीमा नहीं होती। 

--------राजा सिंह 



SN Gupta
हे तात !
जिन राहों पर तुम चले वहां कहीं फूल नहीं होते थे
झंझावातों से टकराते थे वहां बस शूल बिछे होते थे

वर्षा सम अश्रु थे अंतस में मन सूना सूना रहता था
आशाएं थीं गहन सन्नाटॆ में श्वासों में विचलन था

बचपन क्या यौवन दोनों पर तूफ़ान सा  बरपा था
कहने को उजले दिन थे किन्तु तिमिर ही गहरा था

भावों की खेतों में तुमने कुछ अपने सपने बीजे थे
जो स्वेद-अश्रु मिश्रित पावन जल बूंदों ने सींचे थे

स्वप्न जो कल देखे तुमने आगत उनमें झलके था
ममता चमके थी नैनों में सब कुछ न्योछावर था

याद हमें है मंजर जब सब ठहरा ठहरा लगता था
अंजानी राहों पर चलना मन आशंकित करता था

तुम बन कर ऐसे मार्गदर्शी सद्ऱाह दिखा देते थे
प्रतिफल की चाह नहीं किंचित आगे बढ़ आते थे

मानवता की सीमाओं का जब भी लंघन होता है
हे तात ! तुम्हारा मार्ग सदैव अवलम्बन देता है !!


एस एन गुप्ता









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सोमवार, 22 जून 2015

"एक दिन पिता के नाम "......... लेख -सुमित्रा गुप्ता





।।ॐ।। 

 "एक दिन पिता के नाम  
         नारी-पुरूष का अटूट बन्धन बँधा और मर्यादित बंधन में,अजस्र प्रेम धारा से वीर्य-रज कण से,जो नये सृजन के रूप में अपने ही रूप का विस्तार हुआ,वह रूप सन्तान कहलायी।अपने प्रेम के प्राकट्य रूप पर दोनों ही हर्षित हो गये और माता पिता का एक नया नाम पाया। माँ यदि संतानको संवारती है तो पिता दुलारता है।माँ यदि धरती सी सहनशील,क्षमाशील और ममता भरी  है,तो पिता आकाश जैसा विस्तारितविशाल ह्रदय और पालक है।दोंनों ही जरूरी हैं,पर आज  हमें पिता की अहमियत दर्शानी है।तो सुनिये----
         घर की नींव,घर का मूल पिता रूप ही हैजिस तरह एक इमारत की मजबूती,  नींव पर दृढ़ता से टिकी रहती है,उसी तरह घर-परिवार कर्मठ पिता के कंधों पर टिका होता है।परिवार का मुखिया पिता ही होता है।हरेक की जरूरतें पूरी करते-करते उसका सारा जीवन यूँ ही बीत जाता है।कमानेवाला एक और खाने वाले अनेक।हांलाकि बाहर की भागम-भाग यदि पिता कर रहे होतें हैं,तो घर की व्यवस्था की  जद्दोजहद में माँ लगी रहती है।दोनों की ही भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है।आपको बहुत सुन्दर प्रभु के फरिश्तों की कहानी सुनाती हूँ--
         प्रभु ने जब अपने 'अंश रूप जीवको अपने से अलग करके पृथ्वी पर भेजना चाहा तो वह 'जीवबहुत दुखी हुआ और कहने लगा कि पृथ्वी पर मेरी रक्षा,भरण-पोषण,मेरे कार्यों में सहयोग,मेरी देखभाल कौन करेगा।मैं जब बहुत छोटा होऊँगा,तब कौन मेरे कार्य करेगा,तब भगवान बोले तेरीसहायता के लिये पृथ्वी पर मैं फरिश्ते भेज दूँगा। 'अंश रूप जीव'बोला, कार्य तो बहुत सारे होंगें,तो क्या इतने सारे कार्यों के सहयोग के लिये  इतने सारे फरिश्ते भेजेंगें एक जीव के लिये,तो बहुत सारे फरिश्ते हो जायेंगे दुनियाँ में।भगवान बोले नहीं,इतने कार्यों के सहयोग के लिये सिर्फ दो फरिश्ते हीकाफी हैं,  जो तेरे माता-पिता के रूप में हर तरह से तेरा सहयोग करेंगें।सो बच्चे के जनमते ही माता-पिता उसकी साफ-सफाई,भरण-पोषण और हर जरूरत को समझते हुये पूरे तन मन धन के साथ सहयोगी होते हैं।'अंश रूप जीव'बोला मैं उन फरिश्ते रूपी माँ-बाप का कर्ज कैसे चुकाऊँगा?तब प्रभुबोले तू उनकी आज्ञा मानना,कभी ऐसा कोई कार्य ना करना कि उनको दुःख पहुँचे,जब वे बूढ़े हो जायें,तब उनकी सेवा करना और जब तू भी बड़ा होकर माता-पिता का रूप लेगा,तो पूरा कर्ज तो नहीं,थोड़ा बहुत उतर जायेगा।माता-पिता का कर्ज तो संताने अपनी चमड़ी देकर भी नहीं उतार सकतीं।और विशेषकर माँ का।
आज के परिवेश में हम सभी कितना कर्ज-फर्ज अदा कर पा रहे हैं,ये हम सभी बखूबी जानते हैं।पिता खुद जो नहीं बन पाता,आर्थिक कमियों के कारणअपनी कठिन परिस्थियों के चलते,पर सन्तान के लिये जीवन की समस्त पूँजी दाँव पे लगाकर योग्य बनाने का  भरसक प्रयास करता रहताहै।''एक पिता ही ऐसा होता है,जो अपनी संतान को अपने से भी ज्यादा श्रेष्ठ बनाकर हारना चाहता है।''पिता अपने कन्धे पे बैठाकर पुत्र को कितना ऊँचा उठा देता है यानि पिता के कंधे पर बैठी संतान की ऊँचाई बढ़ जाती है। ऐसाकरके पिता अत्यन्त खुश होता है।ये मेरा भी अनुभव है।
कष्ट-पीड़ा होने पर हमारे मुख से अनायास उई माँ, माँ आदि शब्द निकल जाते हैं,लेकिन सड़क पर सामने से आते हुये ट्रक को देखकर कह उठते हैं बाप-रे-बाप।आर्थिक रूप से पिता ही हर तरह से सहयोगी होता है।किसी ने पिता के विषय में क्या खूब कहा है--------
वो पिता होता है-,वो पिता ही होता है
जो अपने बच्चों को अच्छे
विद्यालय में पढ़ाने के लिए दौड भाग करता है...
वो पिता ही होता हैं ।।
उधार लाकर Donation भरता है,
जरूरत पड़ी तो किसी के भी हाथ पैर भी पड़ता है।
वो पिता ही होता हैं ।।
हर कॅालेज में साथ साथ घूमता है,
बच्चे के रहने के लिए होस्टल ढूँढता है
वो पिता ही होता हैं ।।
स्वतः फटे-पुराने कपड़े पहनता है
और बच्चे के लिए नयी जीन्स टी-शर्ट लाता है
वो पिता ही होता है।।
बच्चे की एक आवाज सुनने के लिए
उसके फोन में पैसा भरता है
वो पिता ही होता है ।।
बच्चे के प्रेम विवाह के निर्णय पर
वो नाराज़ होता है और गुस्से में कहता है
सब ठीक से देख लिया है ना,
वो पिता ही होता है ।।
आपको कुछ समझता भी है?"
बेटे की ऐसी फटकार पर,
ह्रदय क्रंदन कर उठता है
वो पिता ही होता हैं ।।
बेटी की हर माँग को पूरी करता है
ऊँच-नीच,अच्छा-बुरा समझाता है
बुरी नज़रों से बचाता है
वो पिता ही होता हैं ।।
बेटी की विदाई पर,
आँसू ,तो पुरूष होने के कारण नहीं बहा पाता,
पर अंदर ही अंदर रोता बहुत है,
वो पिता होता है--वो पिता ही होता हैं ।।
  मेरी युवा पीढ़ी,पिता की अच्छाइयाँ अनन्त हैं।उनके प्रति अपने दायित्व को कभी ना भुलाना।वो हैं तो मजबूती है घर-परिवार में।किसी ने बहुत खूब कहा है-अभी तो जरूरतें पूरी होती हैं,ऐश तो बाप के राज में किया करते थे।ये लेख पिता के नाम समर्पित है।पिता मेरे प्यारे पिता।आपकी छत्र-छाया में, मैं महफूज रहूँ l आप हों तब भी और ना हों तब भी अप्रत्यक्ष रूप में।
ll पितृ देवो भव-चरण वंदन ll
सुमित्रा गुप्ता 

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