रविवार, 28 जून 2015

विदाई


                                           

जीवन भी कितना विचित्र है आज यूँ ही मुकेश का गाया  यह गीत कानों में पड  गया और मन की घडी के कांटे उलटे चलने लगे ।
ये शहनाईयाँ दे रही हैं  दुहाई ,
कोई चीज अपनी हुई है पराई
किसी से मिलन है किसी से जुदाई
नए रिश्तों ने तोडा नाता पुराना ...........

                                             बात तब की है जब मैं बहुत छोटी थी घर के पास से शहनाई की आवाज़ आ रही थी । थोड़ी देर सुनने के बाद एक अजीब सी बैचैनी हुई..... जैसे कुछ टूट रहा हैं कुछ जुड़ रहा है । आदतन अपने हर प्रश्न की तरह इस प्रश्न के साथ भी  माँ के पास  जाकर  मेरा अबोध मन पूँछ उठा " माँ ये कौन सा बाजा बज रहा है ,एक साथ ख़ुशी और दुःख दोनों महसूस हो रहा है । तब माँ ने सर पर हाथ फेर कर कहा था " ये शहनाई है। अंजू दीदी की विदाई हो रही है ना । इसलिए बज रही है । अब अंजू दीदी यहाँ नहीं रहेंगी अपने ससुराल में अपने पति के साथ रहेंगी । क्यों माँ आंटी -अंकल ऐसा क्यों कर रहे है क्यों अपनी बेटी को दूसरे के घर भेज रहे हैं । क्या सब बेटियां दूसरों के घर भेजी जाती हैं ? क्या मुझे भी आप दूसरे के घर भेज देंगी । माँ की आँखें नम हो गयी । हां बिटिया  ! हर लड़की की विदाई होती है । उसे दूसरे के घर जाना होता है । तुम्हारी भी होगी । मेरे घबराये चेहरे को देखकर माँ ने मेरे सर पर हाथ फेर कर किसी कविता की कुछ पक्तियाँ दोहरा दी । पता नहीं किसकी थी पर जो इस प्रकार हैं। .............

कहते हैं लोग बड़ी शुभ घडी हैं
शुभ घडी तो है पर कष्टदायक बड़ी है
जुदा  होता है ,इसमें टुकड़ा जिगर का
हटाना ही पड़ता है दीपक ये घर का
                                             उस दिन पहली बार समझ में आया था ये घर मेरा अपना नहीं है मुझे जाना पड़ेगा … कहीं और । पर बचपन की खेल कूद में कब का भूल गयी । एक दिन यूँही माँ ने आरती कर के रखी थी।तेज हवा का झोंका आया और वो बुझ गयी । मैं जोर से  चिल्लाई "माँ आरती बुझ गयी ,आरती बुझ गयी ". । माँ ने डाँट कर कहा " बुझ गयी नहीं कहते …  कहते हैं विदा हो गयी ।  माँ के शब्दों को मैं देर तक सोचती रही  आरती विदा हो गयी । कैसे ,कहाँ ,किसके साथ ……शायद प्रकाश  अन्धकार के साथ  विदा हो गया…… जो कुछ पीछे छूट गया वो बुझ गया । जीवन के पथ पर जब दो लोग  एक साथ आगे बढ़ जाते हैं ,या विदा हो जाते हैं तो  जो  पीछे जो छूट जाते हैं वो बुझ जाते हैं ।क्या दिन संध्या के रूप में दुल्हन की तरह तैयार होता है और विदा हो जाता है रात के साथ ? रात  खिलते कमल के फूलों और कलरव करते पंक्षियों की बारात के आगमन पर  उगते भास्कर की रश्मियों की डोली में बैठकर विदा हो जाती है दिन के  साथ ?क्या विदाई ही जीवन सत्य है ,अवश्यसंभावी है ।   क्या यही है "किसी से मिलन किसी से जुदाई " मेरे पास अपने ही प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था ।
    अक्सर देखती थी किसी लड़की की विदा पर माँ और लड़की तो रोते ही थे बाकी सब नाते -रिश्तेदार जाने  क्यों रोते थे ,वो तो साथ में भी नहीं रहते थे । शायद वो जानते थे की विदाई ही जीवन का सच हैं । जीवन है तो कभी ङ्कभी कोई न कोई विदाई होनी ही है । हालाँकि हमारे  सखियों के ग्रुप में  अक्सर ऐसा होता था किन्हीं दो सखियों की मित्रता घनी हुई व् वो ग्रुप से अलग हुई ,अक्सर देखा था पर इसे विदाई नहीं माना  । तब तो इतना ही जानती थी कि विदाई लड़कियों की ही होती है। ……… जब भैया की शादी हुई तो भाभी को विदा करा कर लाये तब ये कहाँ जाना था की एक विदाई और हो रही है  …बहन के रूप में भाई पर अधिकार की ,आपस में बिताये जाने वाले समय की जो २ ४ घंटों से घटकर आरती की थाली में रखे राखी के धागे नन्ही सी रोली के टीके और अक्षत के चावलों में सिमट कर रह जाने वाले हैं ।
                    शायद वो भी एक विदाई ही थी जब उस स्कूल को छोड़ा था जहाँ बचपन से पढ़ रही थी । फेयर वेल का फंक्शन था । साड़ी लडकियाँ खाने में जुटी थी और हम कुछ सहेलियाँ रोने में । अजीब सा दुःख था……कल से नहीं आना है इस स्कूल में जहाँ रोज आने की आदत थी । तब हमारी प्रिंसिपल सिस्टर करेजिया ने जोर से घुड़की दी थी। फेल हो जाओ यहीं रह जाओगी । और हम आंसूं पोंछ कर विदा होने को तैयार हो गए ।

                             विदाई को कुछ कुछ समझा था अपनी बड़ी बहन की विदा पर । साथ खाना ,खेलना ,पढना सोना । छोटी होने के नाते कुछ आनावश्यक फायदे भी लेना  ....... कुछ अच्छा खाने का मन  कर रहा है " दीदी है ना ' ये दुप्पट्टा ठीक से पिन अप  नहीं है …  दीदी है ना । बर्थडे  पार्टी में क्या पहनूँ ....  दीदी है ना वो बताएगी । शादी बारात की ख़ुशी के बीच ये ध्यान ही नहीं गया कि दीदी घर छोड़ कर चल देगी । उस दिन आंसूओं के बीच प्रेम चन्द्र की दो  बैलों की जोड़ी बहुत याद आई । उफ़ ! क्या बीती होगी हीरा -मोती पर । मेरे तो सींग नहीं थे ………… होते तो भी क्या बाडा  तोड़कर बाहर भाग सकती थी ? जब  सीख गयी थी अकेले रहना ....... तब तक मेरी विदाई का समय आ गया । कहीं से टूटना कहीं जुड़ना । पराये घर में किसी को अहसास न होने देना " कि बहुत याद आ रही है  अम्माँ की , कोई भैया को बुला लायो ,कोई तो पापा से कह दो फोन कर लिया करे ,हमे संकोच लगता है । पर नहीं ....लड़कियों को तो पराये घर जाना ही होता है । रातो -रात बेटी से बहु की पायदान तय करते हुए एक अल्हड किशोरी से परिपक्व महिला बन जाना होता है ।   तब जाना था एक अधूरापन स्त्री की किस्मत से जुडा  होता है । जहाँ भी होती है आधी ही होती है ,कभी कहीं पूरी हो ही नहीं पाती । मायके में रहती है तो मन ससुराल में ,ससुराल में रहती है तो मन मायके में । धरती और आकाश भी क्षितिज पर मिल जाते हैं पर स्त्री के जीवन का कोई क्षितिज नहीं होता । वह जिंदगी भर भागती रहती है ,एड़ी चोटी  का जोर लगाती रहती है........ इन डॉ घरों के बीच ,यहाँ वहां कहीं हाँ कहीं  तो होगा उसका क्षितिज ……मुट्ठी भर भर ही सही ,चुटकी भर ही सही.............. हतभाग्य स्त्री का कोई क्षितिज नहीं होता । टॉलस्टॉय  की कहानी " हाउ मच लैंड ए मैन डस नीड " की तरह… क्षितिज  की तलाश चिता की राख में ही मिटती है ।
                           विचित्र है पर  विदाई सब की होती है ।  बेटे भी विदा होते हैं माँ से धीरे -धीरे ………कब अधिकार और प्रेम पत्नी के हवाले कर माँ के लिए केवल कर्तव्य बोध रह जाता है । किसी से मिलन किसी से जुदाई । और वो देखो समय का रथ भी तो डोली लिए तैयार रहता है हर समय .......... हर पल जो अभी है पलक झपकते ही आने वाले के साथ विदा हो जाता है.......... कभी न मिलने वाला एक अतीत छोड़कर ।
           बचपन से लेकर अब तक पता नहीं कितनी बार विदाई हुई । एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश एक शहर से दूसरे शहर । पर इन  सबसे ऊपर होती है अंतिम विदाई । आत्मा की दुल्हन .......  चिता की अग्नि के फेरे लेते हुए चल पड़ती है पर्मात्मा  के साथ  । भरे ह्रदय से ही विदा की रस्म तो निभानी ही है । आलता ,महावर ,बिछिया ,सिन्दूर और लाल चुनरी ................ कोई कमी न रह जाए दुल्हन के श्रृंगार में । विदाई ही शाश्वत है ………  पीछे छूट जाते हैं रोते बिलखते ,बच्चे परिवार,नाते रिश्तेदार आँखों में आँसू लिए । चल देती है दुल्हन। ………… क्या पता कितनी टूटी , कितनी व्याकुल । विदाई कितनी भी पीडादायक हो ,पर वही  सत्य है। अंत उसी गीत की पक्तियों से करूंगी जिससे आरभ किया था । शायद यही इस पीड़ा से उबरने का उपाय भी है ।

ये बोले समय की नदी का भाव
ये बाबुल की गलियाँ ये कागज़ की नाव
चली हो जो गोरी ,सुनो भूल जाओ
न फिर याद करना ,न फिर याद आना…………

वंदना बाजपेयी



शुक्रवार, 26 जून 2015

अटूट बंधन पत्रिका पर डॉ गिरीश चन्द्र पाण्डेय 'प्रतीक 'की समीक्षा

                                                   
                                                               


"अटूट बंधन "पत्रिका पर हमें देश भर से प्रतिक्रियायें प्राप्त हो रही हैं ।किसी नयी पत्रिका को भारी संख्या  में  पाठकों के पत्रों का मिलना हमारे लिए हर्ष का विषय है वही यह हमारे उत्तरदायित्व को भी बढ़ता है कि हम आगे भी और अच्छा काम करे ।  जैसा कि हमारा स्लोगनहै "बदलें विचार बदलें दुनियाँ" हमारा पूरा प्रयास है की हम पत्रिका के माध्यम से लोगों में  सकारात्मक चिंतन विकसित करे ,उनका व्यक्तित्व विकास हो.... भारी संख्या में  सहयोगियों का पत्रिका से जुड़ना हमारे मनोबल को बढाता है और हमें यह अहसास कराता है हम सही दिशा में जा रहे हैं। आगे हमारी यह योजना है कि देश के हर जिले में अटूटबंधन लेखक-पाठक क्लब बने.... जहाँ साहित्य पर सकारात्मक चिंतन व्यक्तित्व विकास पर विस्तार से चर्चा की जा सके| यह अपनी तरह काअनूठा प्रयोग है और ख़ुशी की बात है की बहुतसे लोगोंने इसयोजना का स्वागत किया है व जुड़ने की ईक्षा जताई  है| उम्मीद है हमारी इस योजना को भी सभी का स्नेह व् सहयोग मिलेगा । गिरीश  चन्द्र पाण्डेय  प्रतीक जी जैसे साहित्य सेवी व् कर्मठ युवा रचनाकार एवं समीक्षक   की पत्रिका पर की गयी समीक्षा के लिए हम ह्रदय से आभार व्यक्त करते हैं । उनके द्वारा दिए गए सुझावों को हम अमल में लाने का प्रयास करेंगे  

कल अटूट बंधन पत्रिका प्राप्त हुई।पढ़ने बैठा तो पढता ही चला गया ।पत्रिका को पढ़कर ऐसा लगा जैसे जादू का पिटारा हो।सकारात्मकता से लवरेज।प्रेरक लेखो आलेखों का पुंज।यह अंक बहुत सुन्दर और संग्रहणीय बन पड़ा है।चिठ्ठी पत्री स्तम्भ यह बताता है की पत्रिका को लेकर पाठक चौकन्ना ही नहीं आशान्वित भी है।जहाँ वंदना जी के संपादकीय की सराहना सुरेश जी पटना द्वारा।और वहीँ एक पाठक की राय पत्रिका के पेज बढ़ाये जाएँ हरीश जी देहरादून द्वारा यह बताना की पत्रिका निष्पक्ष अपने लक्ष्यों की ओर अग्रसर है । प्रधान  संपादक ओमकार मणि त्रिपाठी जी का "दिल की "की बात संपादकीय को समृद्ध करता हुआ दीखता है।इनके लेख में जीवन में सकारात्मकता की पड़ताल जो जरूरी भी है।





वंदना दी की कलम हमेशा की तरह इस अंक में भी युवा जोश को आगाह करती दिखी कविता से शुरू किया गया संपादकीय "वो दुनिया कुछ और ही होती होगी........"पूरा संपादकीय इसी कविता में समेट लिया है।पुरानी पीढ़ी को भी इंगित करना नहीं भूली हैं।यह संपादकीय पूर्णतः मनोवैज्ञानिक सोच पर आधारित है जो प्रेरित भी करता है और आगाह भी।प्राची शुक्ला जी ने रंगो को अपने रंग से रंगने की भरपूर कोशिस की है।जीवन में रंगों का महत्व बताता यह लेख ।त्रिपाठी जी का बॉलीबुड में तांक झांक वाला सलमान की जेल और बेल का खेल एक करारा व्यंग्य ।डॉ परवीन केरल से शब्द और उसकी शक्ति की पड़ताल संग्रहणीय लेख।सतीश चंद्र शर्मा पंजाब का लेख घर का कबाड़ बढ़ाता अवसाद ।घर में पडी अवांछित चीजें हमें अवसाद की ओर धकेलती हैं यह लेख घर को अव्यवस्थित न होने दें और उसे सुव्यवस्थित होना चाहिए इसकी वकालत करता है।और यह सही भी है।वंदना जी की आवरण कथा खुद लिखें अपनी तकदीर पढी रोचकता से भरपूर है और युवाओं को प्रेरित करती है यह आवरण कथा है|




।प्रेमचंद जी मुम्बई के द्वारा व्यक्तित्व विकास पर आधारित लेख (जीतें मन की बाधा)सराहनीय है।पाठक को रिझाता है लेख ।सुरेन्द्र शुक्ल दिल्ली का रिश्ते नातों की पड़ताल पर लेख "रिश्तों में नोक झोंक"एक ऐसा लेख आपको लगेगा जैसे आपके लिए ही यह लिखा गया है।अशोक के.परूथी जी का व्यंग्य" पार्टी बनाम हम "राजनीती और लोकतंत्र के गड़बड़ झाले की पोल खोलता हुआ और रोचक है।काव्य जगत स्तम्भ तो इस अंक का लाजबाब है।कल्पना मिश्र बाजपेयी की (कविता माँ की चुप्पी)माँ चुप क्यों हो एक मार्मिक कविता है।शिखा श्याम जी की "स्त्री होना"यह लिखती हैं मुझे गर्व् है मैं स्त्री हूँ यह कविता स्त्री जागरूक हो रही है यह बताती है।मेरे परम मित्र और बड़े भाई चिंतामणि जोशी जी पिथौरागढ़ उत्तराखण्ड की कविता "खड़ी हैं स्त्रियां"एक सार गर्भित कृति है जिस कविता को आजकल साहित्यिक गलियारों में खूब सराहा जा रहा है।यह कविता लोक जीवन की जीती जागती मूर्ति बन पडी है पहाड़ की स्त्री को जानना है तो इसे पढ़िए।




सेनगुप्ता की कविता "लज्जा"अम्बरीष की सच को मैंने अब जाना है कंचन आरजू इलाहाबाद की "माँ "कविताएँ रोचक और सोचने को विवश करती दिखीं।नवीन त्रिपाठी जी की कहानी "प्रायश्चित्त"सराहनीय है।डॉ सन्ध्या जी की लघु कथा "सदाबहार "अच्छी लगी।बात जो दिल को छू गयी बहुत अच्छा प्रयास है।स्वास्थ्य स्तम्भ हमेशा की तरह लभकारी है सबको गर्मी से बचने के उपाय बताता हुआ ।डॉ आराधना जी का बाल मन में (बेकार न जाने दें बच्चों की छुट्टिया)अभिभावको के लिए प्रेरक लेख है।उपासना सियाग अबोहर का स्त्री विमर्श पर (महिलाओं में कर्कशता क्यों)सोचने को विवस करता आलेख ।नाम व भाग्य का सम्बन्ध लेख में त्रिपाठी जी की विवेचना सराहनीय है।


अंत में यही कह सकता हूँ अटूट केवल एक पत्रिका नहीं अन्तर्मन् की पुकार है हर वर्ग को समेटने का प्रयास किया गया है।हर समस्या को छूने का प्रयास किया गया है।बच्चों से लेकर बुजुर्गो तक सब इसको खुले मन से पढ़ सकते हैं।इसे आप अपनी मेज पर रखने में शर्म महसूस नहीं करेंगे।अपने बच्चों से इस पर आप खुलकर चर्चा कर सकते हैं।अपनी सकारात्मकता को बनाये रखने के लिए इसे जरूर पढ़ें।
अटूट जिसका अंग मैं भी हूँ एक सलाह सम्पादक मंडल के लिए पत्रिका के कवर पेज को शास्त्रीय आवरण देंगे तो और रोचक बनेगा पेज संख्या बढ़नी चाहिए।कहानी और व्यंग को और ज्यादा स्थान दें एक कॉलम पुस्तक समीक्षा का जरूर रखें।अटूट परिवार के बिचार संपादक को छोड़कर पिछले पृष्ठों में हों।कुल मिलाकर अटूट एक सम्पूर्ण वैचारिक,पारिवारिक,सकारात्मकता का गुलदस्ता है इसे अपने पुस्तकालय में सजाएँ।अटूट परिवार बधाई का पात्र है।
एक समीक्षा
"प्रतीक"डॉ गिरीश पाण्डेय
उत्तराखंड





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मंगलवार, 23 जून 2015

"एक दिन पिता के नाम "......कवितायें ही कवितायें






अटूट बंधन परिवार द्वारा आयोजित "एक दिन पिता के नाम 'श्रंखला में 
आप सब ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया इसके लिए हम आप सब रचनाकारों का ह्रदय से धन्यवाद करते हैं | हमारी कोशिश रही कि हम इस प्रतियोगिता में अच्छी से अच्छी रचनाओं को ब्लॉग पर प्रकाशित करे .... जिससे पाठकों को एक एक स्थान पर श्रेष्ठ सामग्री पढने को मिले | वैसे पिता के प्रति हर भाव अनमोल है हर शब्द अनूठा है हर वाक्य अतुलनीय है | ......... हम अपने आधार पर किसी भी भावना को कम या ज्यादा घोषित नहीं कर कर सकते थे पर लेखन कौशल और भावों की विविधता को व् रचनाकार के विजन को देखते हुए हमने ब्लॉग पर प्रकाशित की जाने वाली रचनाओं का चयन किया है | हमें प्राप्त होने वाली ५० से अधिक कविताओं में से हमने ७ का चयन किया है| आज प्रतियोगिता के अंतिम दिन आप संजना तिवारी , इंजी .आशा शर्मा ,तृप्ति वर्मा ,दीपिका कुमारी 'दीप्ति 'डॉ भारती वर्मा बौड़ाई ,रजा सिंह व् एस .एन गुप्ता की कवितायें पढेंगे | इस प्रतियोगिता के सफलता पूर्वक आयोजन के लिए "अटूट बंधन "परिवार रचनाकारों ,पाठकों व् निर्णायक मंडल के सदस्यों का ह्रदय से आभार व्यक्त करता है | 

सोमवार, 22 जून 2015

"एक दिन पिता के नाम "......... लेख -सुमित्रा गुप्ता





।।ॐ।। 

 "एक दिन पिता के नाम  
         नारी-पुरूष का अटूट बन्धन बँधा और मर्यादित बंधन में,अजस्र प्रेम धारा से वीर्य-रज कण से,जो नये सृजन के रूप में अपने ही रूप का विस्तार हुआ,वह रूप सन्तान कहलायी।अपने प्रेम के प्राकट्य रूप पर दोनों ही हर्षित हो गये और माता पिता का एक नया नाम पाया। माँ यदि संतानको संवारती है तो पिता दुलारता है।माँ यदि धरती सी सहनशील,क्षमाशील और ममता भरी  है,तो पिता आकाश जैसा विस्तारितविशाल ह्रदय और पालक है।दोंनों ही जरूरी हैं,पर आज  हमें पिता की अहमियत दर्शानी है।तो सुनिये----
         घर की नींव,घर का मूल पिता रूप ही हैजिस तरह एक इमारत की मजबूती,  नींव पर दृढ़ता से टिकी रहती है,उसी तरह घर-परिवार कर्मठ पिता के कंधों पर टिका होता है।परिवार का मुखिया पिता ही होता है।

शनिवार, 20 जून 2015

"एक दिन पिता के नाम ".........मेरे पापा ( संस्मरण -संध्या तिवारी )














मेरे पापा********                ( संस्मरण )
आंगन के कोने में खडे तुलसी वृक्ष पर मौसमी फल लगे ही रहते थे ।कभी अमरूद, कभी आम , कभी जामुन , कभी अंगूर ,,,,,,,,,,
मै जब भी सो कर उठती मुझे तुलसी में लगा कोई न कोई फल मिलता और मै खुशी से उछल पडती ।
एक दिन मैं जागी और कोई फल न देख बहुत दुखी हुई मैने पापा से शिकायत की।
"देखो पापा आज तुलसी जी ने कोई फल नहीं दिया । "
पापा ने मम्मी को सख्त हिदायत दी"  कि अपनी तुलसी मैया से कहो कि मेरी बच्ची के लिये रोज एक फल दें ।"
मम्मी ने हंस कर कहा ; " जो हुकुम मेरे आका।"

"एक दिन पिता के नाम "......... गडा धन (कहानी- निधि जैन )

                             



"गड़ा धन"

"चल बे उठ.... बहुत सो लिया... सर पर सूरज चढ़ आया पर तेरी नींद है कि पूरी होने का नाम ही न लेती।" राजू का बाप उसे झिंझोड़ते हुए बोला।
"अरे सोने तो दो... बेचारा कितना थका हारा आता है। खड़े खड़े पैर दुखने लगते और करता भी किसके लिए है...घर के लिए ही न कुछ देर और सो लेने दो.."
"अरे करता है तो कौन सा एहसान करता है...खुद भी रोटी तोड़ता है चार टाइम", फिर से लड़के को लतियाता है,"उठ बे हरामी ...देर हो जायेगी तो सेठ अलग मारेगा..."
लात घलने से और चें चें पें पें से नींद तो खुल ही गई थी। आँखे  मलता दारूबाज बाप को घूरता गुसलखाने की ओर जाने लगा।
"एssss हरामी को देखो तो कैसे आँखें निकाल रहा जैसे काट के खा जाएगा मुझे.."
"अरे क्यू सुबह सुबह जली कटी बक रहे हो"
"अच्छा मैं बक रहा हूँ और जो तेरा लाडेसर घूर रहा मुझे वो..."और एक लात राजू की माँ को भी मिल गई।
    लड़का जल्दी जल्दी इस नर्क से निकल जाने की फिराक में है और बाप सबको काम पर लगाकर बोतल से मुंह धोने की फिराक में।

शुक्रवार, 19 जून 2015

"एक दिन पिता के नाम ".......उसके बाद ( कहानी-उपासना सियाग )



                                         





उसके बाद 

गाँव दीना सर में आज एक अजीब सी ख़ामोशी थी लेकिन लोगों के मन में एक हड़कंपथा। होठों पर ताले लगे हुए थे और मनों में कोलाहल मचा  था। कोई भी बोलना नहीं चाह रहा था लेकिन अंतर्मन शोर से फटा जा रहा था। दरवाज़े बंद थे घरों के लेकिन खिडकियों की ओट  से झांकते दहशत ज़दा चेहरे थे ...!
आखिर ऐसा क्या हुआ है आज गाँव में जो इतनी रहस्यमय चुप्पी है ...!
अब कोई अपना मुहं कैसे खोले भला ...!किसकी इतनी हिम्मत थी !
      गाँव की गलियों के सन्नाटे को चीरती एक जीप एक बड़ी सी हवेली के आगे रुकी। यह हवेली चौधरी रणवीर सिंह की है। जीप से उतरने वाला भी चौधरी रणवीर सिंह ही है। उसकी आँखे जैसे अंगारे उगल रही हो  चेहरा तमतमाया हुआ है। चाल  में तेज़ी है जैसे बहुत आक्रोशित हो ,विजयी भाव तो फिर भी नहीं थे चेहरे पर। एक हार ही नज़र आ रही थी।
     अचानक सामने उनकी पत्नी सुमित्रा आ खड़ी हुई और सवालिया नज़रों से ताकने लगी। सुमित्रा को जवाब मिल तो गया था लेकिन उनके मुंह   से ही सुनना चाह  रही थी।जवाब क्या देते वह ...! एक हाथ से झटक दिया उसे और आगे बढ़  कर कुर्सी पर बैठ गए।

गुरुवार, 18 जून 2015

"एक दिन पिता के नाम "....कुछ भूली बिसरी यादें (संस्मरण -अशोक के.परुथी


कुछ भूली बिसरी यादें 


"त्वदीयवस्तुयोगींद्रतुम्यमेवसम्पर्य

              धर्मप्रेमी, नियमनिष्ठ, साहित्यरसिक!"
पिता-दिवस सभी को मुबारक। वह सभी लोग खुशनसीब हैं जिनके सिर पर उनके पिता का साया है और उन्हें उनका आशीर्वाद प्राप्त है!
पिता का वर्ष में सिर्फ एक ही दिन क्यूँ
, बल्कि  हर दिन आदर और सत्कार होना चाहिये।
         व्याखान की सामग्री के रूप में श्लोकों, दोहों, टोटकों, व्यंग्य, कथा-कहानियोंआदिको संग्रह करने की रूचि मुझे प्रारम्भ से ही रही है।  इसका सारे का सारा श्रेय मेरे पूज्य पिताजी को जाता है, उन्होने जो ज्ञान-दान मुझे दियावह जीवन में मेरे लिए अविस्मरणीयऔरअमूल्यहै।

      मुझे ही नही बल्कि परिवार के न्य सदस्यों के कण-कण में भी उन का यह उपकार छिपा हैपिताजी के स्नेह तथा वात्सल्य से लाभान्वित होकर ही मैं लेखन की दिशा मेंअग्रसर हो सका हूँ!
पिताजी असूलोंकेबड़ेपाबंदथे, एक ईमानदारऔरमेहनतीइंसानथे।उन्होने  हमारी माताजी, जो पेशे से एक अध्यापिका थी, के सहयोग से हम पाँचभाई बहिनो का अपनी हैसियत से बढ़कर लालन-पालनकिया

बुधवार, 17 जून 2015

"एक दिन पिता के नाम "....डर (कहानी -रोचिका शर्मा )


                        




डर


रीना एक पढ़ी-लिखी एवं समझदार लड़की थी । जैसे ही उसके रिश्ते  की बातें घर में होने लगीं उसके मन में एक डर घर करने लगा , वह था ससुराल का डर। वह तो अरेंज्ड मॅरेज के नाम से पहले से ही डरती थी । फिर भी कुँवारी तो नहीं रह सकती थी । दुनिया की प्रथा है विवाह ! निभानी तो पड़ेगी । यह सोच उसने अपने पिताजी को बता दिया कैसा लड़का चाहिए । फिर क्या था पिताजी ढूँढने लगे पढ़ा-लिखा एवं खुले विचारों वाला लड़का । बड़ी लाडली थी वह अपने पिता की । एक दिन लड़का व उसके परिवार वाले उसे देखने आए । गोरा रंग, सुन्दर कद-काठी एवं रहन-सहन देख लड़का तो जैसे उस पर मोहित हो गया ।

मंगलवार, 16 जून 2015

"एक दिन पिता के नाम "... लघु कथा(याद पापा की ) :मीना पाठक

                         










"एक दिन पिता के नाम" 
याद पापा की --

“पापा आप कहाँ चले गये थे मुझे छोड़ कर" अनन्या अपने पापा की उंगुली थामे मचल कर बोली
"मैं तारों के पास गया था, अब वही मेरा घर है बेटा" साथ चलते हुए पापा बोले
"तो मुझे भी ले चलो न पापा तारो के पास !" पापा की तरफ़ देख कर बोली अनन्या
"नहीं नहीं..तुम्हें यहीं रह कर तारा की तरह चमकना है" पापा ने कहा
"पर पापा, मैं आप के बिना नही रह सकती, मुझे ले चलो अपने साथ या आप ही आ जाओ यहाँ |"

सोमवार, 15 जून 2015

"एक दिन पिता के नाम " ----वो २२ दिन ( संस्मरण -वंदना गुप्ता )

                                         






"एक  दिन  पिता के नाम  "

आपकी ज़िन्दगी 
आपकी साँसें 
जब तक रहेंगी 
तब तक 
हर दिन पिता को समर्पित होगा 

वो हैं तो तुम हो 
उनके होने से ही 
तुम अस्तित्व में आये 

फिर कैसे संभव है 
एक दिन पिता के नाम करना ?

गुरुवार, 11 जून 2015

आयुष झा "आस्तीक " की स्त्री विषयक कवितायें


                                   


आयुष झा "आस्तीक " ने अल्प समय में कवितों के माध्यम से अपनी पहचान बना ली है | वह विविध विषों पर लिखते हैं | विषयों पर उनकी सोच और पकड़ काबिले तारीफ़ है | आज कल स्त्रियों पर बहुत लिखा जा रहा है एक तरफ जहाँ स्त्रियों के लेखन में उनका भोग हुआ यथार्थ है वही जब पुरुष स्त्रियों के बारे में लिखते हैं तो अंतर्मन की गहराइयों में जाकर स्त्री मन की संवेदनाओं को पकड़ने का प्रयास करते हैं | और काफी हद तक सफल भी होते हैं | आज हम" अटूट बंधन "आयुष झा "आस्तीक की कुछ स्त्री विषयक कवितायें लाये हैं |जिसमें उन्होंने नारी मनोभावों को चित्रित करने का प्रयास किया है | वो इसमें कहाँ तक सफल है ....पढ़ कर देखिये 

ससूराल की ड्योढी पर 
प्रथम कदम रखते ही 
नींव डालती है वो 
घूंघट प्रथा की /जब 
अपनी अल्हडपन को 
जुल्फों में गूँठ कर/ सहेज 
लेती है वो 
अपने आवारा ख्यालों को 
घूंघट में छिपा कर ..... 
अपनी ख्वाहिशों को 
आँचल की खूट में 
बाँध कर वो 
जब भी बुहारती है आँगन 
एक मुट्ठी उम्मीदें 
छिडक आती है 
वो कबूतरों के झूंड में .... 
मूंडेर पर बैठा काला कलूटा 
कन्हा कौआ अनुलोम-विलोम





                   



.उपवास रखने वाली 
जिद्दी तुनकमिजाज औरतें 
______________________ 

अविवाहीत लडकी से 
संपुर्ण स्त्री बनने का सफर 
सात कदमों का होता है 
लेकीन प्रत्येक कदम पर 
त्याग सर्मपण और 
समझौता के पाठ को 
वो रटती है बार-बार .... 
मायके से सीख कर आती है 
वो हरेक संस्कार पाठ जो 
माँ की परनानी ने 
सीखलाया था 
उनकी नानी की माँ को कभी ... 
ससूराल की ड्योढी पर 
प्रथम कदम रखते ही 
नींव डालती है वो 
घूंघट प्रथा की /जब 
अपनी अल्हडपन को 
जुल्फों में गूँठ कर/ सहेज 
लेती है वो 
अपने आवारा ख्यालों को 
घूंघट में छिपा कर ..... 
अपनी ख्वाहिशों को 
आँचल की खूट में 
बाँध कर वो 
जब भी बुहारती है आँगन 
एक मुट्ठी उम्मीदें 
छिडक आती है 
वो कबूतरों के झूंड में .... 
मूंडेर पर बैठा काला कलूटा 
कन्हा कौआ अनुलोम-विलोम 
करता है तब /जब 
कौआ की साँसे 
परावर्तित होती है 
स्त्री की पारर्दशी पीठ से 
टकरा कर .... 
जीद रखने वाली 
अनब्याही लडकीयां 
होती है जिद्दी 
विवाह के बाद भी/ बस जीद 
के नाम को बदल कर 
मौनव्रत या उपवास 
रख दिया जाता है / अन्यथा 
पुरूष तो शौख से माँसाहार होते हैं 
स्त्रीयों के निराहार 
होने पर भी.. 
सप्ताह के सातो दिन सूर्य देव 
से शनी महाराज तक का 
उपवास/ पुजा अर्चना 
सब के सब 
बेटे/पति के खातीर .... 
जबकी बेटी बचपन से ही 
पढने लगती है 
नियम और शर्तें 
स्त्री बनने की ! 
और पूर्णतः बन ही तो 
जाती है एक संपुर्ण स्त्री 
वो ससूराल में जाकर.... 
आखीर बेटे/पति के लिए 
ही क्युं ? 
हाँ हाँ बोलो ना 
चुप क्युं हो ? 
बेटीयों के चिरंजीवी होने की 
क्यूं नही की जाती है कामना... 
अगर उपवास रखने से ही 
होता है 
सब कुशल मंगल ! 
तो अखंड सौभाग्यवती भवः 
का आर्शीवाद देने वाला 
पिता/मंगल सूत्र पहनाने 
वाला पति 
आखीर क्युं नही रह पाता है 
एक साँझ भी भूखा.... 
सुनो , 
मेरी हरेक स्त्री विमर्श 
कविता की नायिका 
कहलाने का 
हक अदा करने वाली 
जिद्दी तुनकमिजाज औरतों ! 
देखो ! 
हाँ देखो , 
तुम ना स्त्री-स्त्री 
संस्कार-संस्कार 
खेल कर 
अब देह गलाना बंद करो .... 
मर्यादा की नोंक पर टाँक कर 
जो अपनी ख्वाहिशों के पंख 
कतर लिए थे तुमने/ 
अरी बाँझ तो नही हो ना ! 
तो सुनो ! 
इसे जनमने दो फिर से..... 
स्त्री होने के नियम शर्तों को 
संशोधित करके/ 
बचा लो तुम 
स्त्रीत्व की कोख को 
झूलसने से पहले ही ......





 लडकियों के शयनकक्ष में 
__________________
 
लडकियों के शयनकक्ष में 
होती है तीन खिडकियां 
दो दरवाजे 
तीन तकिए और 
तीन लिफाफे भी ... 
दो लिफाफे खाली और 
तिसरे में तीन चिट्ठीयां ... 
पहले लिफाफ में 
माँ के नाम की 
चिट्ठी डाल कर वो पोस्ट 
करना चाहती है ! 
जिसमें लडकी 
भागना चाहती है 
घर छोड कर ... 
दुसरे खाली लिफाफे में 
वो एक चिट्ठी 
प्रेयस के नाम से 
करती है प्रेषीत... 
जिसमें अपनी विवशता का 
उल्लेख करते हुए 
लडकी घर छोडने में 
जताती है असमर्थता .... 
तीसरे लिफाफे के 
तीनों चिट्ठीयों में 
वो खयाली पुलाव पकाती है 
अपने भूत-वर्तमान और 
भविष्य के बारे में ... 
अतीत को अपने चादर के 
सिलवटों में छुपा कर भी 
वो अपने प्रथम प्रेम को 
कभी भूल नही पाती है 
शायद ... 
जो उसे टीसती है जब भी 
वो लिखती है 
एक और चिट्ठी 
अपने सपनों के शहजादे 
के नाम से.... 
उनके सेहत,सपने और 
आर्थीक ब्योरा का भी 
जिक्र होता है उसमें ... 
अचानक से 
सामने वाले दरवाजे से 
भांपती है वो माँ की दस्तक । 
तो वही पिछले दरवाजे पर 
वो महसूसती है 
प्रेयस के देह के गंध को ..... 
लडकी पृथक हो जाती है 
अब तीन हिस्से में ! 
एक हिस्से को बिस्तर पर 
रख कर, 
माथा तकिए पर टीकाए हुए , 
दुसरा तकिया पेट के नीचे 
रख कर 
वो ढूँढती है पेट र्दद के 
बहाने ..... 
तीसरे तकीए में 
सारी चिट्ठीयां छुपा कर 
अब लडकी बन जाती है 
औरत .... 
जुल्फों को सहेज कर 
मंद मंद मुस्कुराते हुए 
वो लिपटना चाहती है माँ से ... 
तीसरे हिस्से में लडकी 
बन जाती है एक मनमौजी 
मतवाली लडकी ! 
थोडी पगली जिद्दी और 
शरारती भी... 
वो दिवानी के तरह अब 
बरामदे के तरफ वाली 
खिडकी की 
सिटकनी खोल कर 
ख्वाहिशों की बारीश में 
भींगना चाहती है ...... 
प्रेयस चाॅकलेटी मेघ बन कर 
जब भी बरसता है 
खिडकी पर ! 
वो लडकी पारदर्शी सीसे को 
अनवरत चुमते हुए 
मनचली बिजली 
बन जाती है ..... 
अलंकृत होती है वो 
हवाओं में एहसास रोपते हुए ।



 चालीस पार की हुनरमंद औरतें 
________________

इतनी हुनरमंद होती है ये औरतें 
कि भरने को तो भर सकती हैं 
ये चलनी में भी टटका पानी। 
मगर घड़ा भर बसिया पइन से 
लीपते पोतते नहाते हुए यह धुआँ धुकर कर 
बहा देती है 
स्वयं की अनसुलझी ख्वाहिशें। 
रेगिस्तान को उलीछ कर सेर- 
सवा सेर 
माछ पकड़ने के लिए तत्पर रहती है ये 
औरतें! 
कभी बाढ़ कभी सुखाड़ 
मगर उर्वर रहती है ये औरतें। 
ख्वाहिशों की विपरीत दिशा में 
मन मसोस कर 
वृताकार पथ पर गोल गोल चक्कर 
लगाती हुई 
ये औरतें 
पसारती बुहारती रहती है 
उम्मीदों की खेसारी चिकना। 
फिसलना पसंद है इन्हें 
अपनी जिजीविषा को सँभालने के 
लिए। 
आईने के समक्ष 
घूस में अदाएँ दिखलाते हुए उसे कर 
लेती है राज़ी 
झूठी तारीफ़ें करने के लिए। 
आँखों के नीचे के काले धब्बे 
को जीभ दिखला कर 
और चेहरे पर पसरे सन्नाटे को 
रतजगा रूमानी 
ख़्वाबों की निशानी का नाम देकर 
स्वयं को झूठी सांत्वना देती रहती है 
ये औरतें! 
कि दरअसल यही तो है वो लक्षण 
कि वो दिन प्रतिदिन हो रही है 
बचपना से जवानी की ओर अग्रसर। 
पर अफ़सोस कि इस 
झूठी सांत्वना को भजा-भजा कर 
उम्मीदों का डिबीया लेसते हुए मन 
ही मन खाता रहता उन्हें 
घुप्प अँधेरा होने का डर। 
डरने लगती है ये एकांत में भूत-भूत 
चिल्लाते हुए! 
जब बढ़ती उम्र सौतन बन कर मुँह 
चमकाती है इन्हें। 
सुनो ऐ 
चालीस पार की हुनरमंद औरतें!! 
अपनी उम्र को रख दो तुम संदुकची में 
छिपा कर! 
कबूतरों में बाँट 
दो ज़िम्मेदारियों का कंकड़! 
पुनः ख़्वाबों को सिझने दो मध्यम 
आँच पर 
अपनी ख़्वाहिशों से अनवांछित 
अनसुलझी उलझनों को पसा कर 
सहेज कर बाँध लो 
आँचल की खूँट में। 
कहो कब तक दलडती रहोगी 
यूं अपनी छाती पर दलहन 
सुनो 
देह गलाना छोड दो तुम 
व्यर्थ की चिंता और नियम धियम 
का पसरहट्टा सजा कर। 
हाँ सुनो ऐ 
चालीस पार की हुनरमंद औरतें! 
तुम हो जादूगरनी 
क्या यह तुमको पता है ? 
तुम्हारे देह की गंध से 
ठंड में भी बादल का पनिहयाना 
अजी टोना टनका नहीं 
तो यह कहो और क्या है? 
हाँक कर गाछ-पात 
तुम नाप सकती हो नभ को 
बस हौसला चाहिए 
इस पिंजरे की खग को। 
नियम शर्तो के पिंजरे को 
कुतर दो ऐ चुहिया 
बस स्वयं को पहचानो 
तुम हो सावित्री 
हाँ तुम्हीं हो अनसुइया। 
हाँ सचमुच पतिवत्रा हो तुम 
ऐ पवित्र जाहनुतनया! 
बस खुश रहो तुम हमेशा 
भाड़ में जाए यह दुनिया। 



खानदानी घरेलू औरतें 
________________

खानदानी घरेलू औरतों के 
पहनावा- ओढावा में 
छुपा होता है 
इनके खानदानी होने का रहस्य .... 
पुरानी ही सही 
पर मैली कूचैली ना हो 
साडी/ 
हाँ लेकिन साडी पहनने का ढंग 
जरूर हो पुराना/ उल्टा आँचल 
लेने से हद तक परहेज ही 
करना चाहेगी ये औरतें .... 
यहाँ तक की पल्लू ओढने का 
अंदाज उइमा 
जैसे की मूँह दिखाई का रस्म 
अदा करके आई हो अभी के अभी... 
घूँघट में खनकने वाली 
चौवन्नीयाँ मुस्कान से 
खूदरा/रैजकी बटोर कर 
कंगाल पति हो जाता है अमीर .... 
और खरीद लाता है 
अलता/ ऐसनो-पाउडर के साथ 
एक गुच्छा रीवन भी .... 
नही करती है मौल मौलाई 
वो सिन्दूरीया से 
सिन्दूर/टिकूली खरीदने में 
हाँ लेकीन कपडीया से 
सूती साडी खरीद लेती है 
वो टैरी काॅसा के मुल्य में .... 
सीफन पहनने वाली सहेलियाँ 
जब भी उकसाएगी इन्हे 
सिल्क पहनने के लिए / 
मूँह बना कर जोरजेट साडी तक 
को नकार कर/ झट से 
गिना देगी सूती के आरामदायक 
और टीकाऊ होने का तर्क ..... 
खानदानी घरेलू औरतें 
छुपाना सीख जाती है 
वो अनगिनत बातें / 
अपनी विवशता जिनसे की 
परिवार के ईज्जत पर कोई 
प्रश्नचिन्ह(?) या हलन्त 
ना उकेरा जाए ... 
पीठ पिछे टीका टिप्पणी ना हो 
जिनसे स्त्री धर्म और 
खानदान के मर्यादा के बारे में .... 
खानदानी घरेलू औरतों के खान पान 
से 
स्पष्ट होता है खानदान का स्तर ... 
रसोई घर से दूर सडक तक 
गमकती रहती है 
इनके खानदानी होने 
की सौंढी खुशबू .... 
नून के अभाव में सवा कनमा 
संस्कार मिला कर भूजती है 
वो भिंडी का भुजीया .... 
बच्चे अधसिज्जू भुजीया को 
टूकूरषटूकूर निहार कर /सीख लेते हैं 
नमकहलाल होने का महत्वपूर्ण पाठ .... 
डेढ ठेपी तेल में तलती नही 
बल्कि वो छाँक लेती है पापड / 
अपने खानदानी सास-ससूर को 
महरूम रखना चाहती है 
वो घर की आर्थीक हालात से .... 
नेबो वला ललका चाय 
ही सही लेकीन 
भौर-साँझ ओसारा वला 
गोलकमरा में 
अडोसी-पडोसी तक को 
औषधी की तरह 
काढा बना कर बँटवाती है 
ये खानदानी औरतें ..... 
आखिरी चार रोटी में चीनी भर कर 
जब वो बनाती है चीनी पुडी / 
खटीया पर बुढिया सास 
खाँसने लगती है जोर-जोर से ..... 
स्थायी रोग को दवाई/महलम से 
नही बल्कि अपने अपनापन के 
एहसास से दूर भगा देती है 
यह असाधारण ईलाज करके.. 
इसलिए बुढिया की पीठ पर 
पौने घंटे तक आटे गूँठती रहती है 
ये संस्कारी औरतें... 
खानदानी घरेलू औरतें 
माँ के पेट से ही सीख कर 
आती है प्रेम करना... 
हाँ प्रेम को जिवीत 
रखना सीखलाती है ये 
माँ/ पत्नी/ बहन/बेटी/सास 
और बहू के रूप में ...... 
सुनो, 
किसी भी कमसीन लडकी की 
शौखी आवारगी अल्हडपन का 
जब भी होगा जिक्र /मैं बसंत 
उकेरना चाहूंगा 
अपनी हरेक प्रेम कविता में ....... 
और तब एक प्रेयसी के रूप में 
रोपती रहना तुम 
संस्कार का पौधा ..... 
जब मैं प्रेयस बन कर 
सीखलाउंगा तुम्हें 
आधुनीक तरीके से प्रेम करना ... 

......आयुष झा आस्तीक.....
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(समस्त चित्र गूगल से साभार )

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