शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

गुरु पूर्णिमा पर विशेष:गुरु के बिना अधुरा है जीवन :दिनेश शर्मा






                  गुरु पूर्णिमा पर विशेष:

गुरु के बिना अधुरा है जीवन

गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर,
गुरु साक्षात् परमं ब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम:
अर्थात- गुरु ही ब्रह्मा है  , गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है. गुरु ही साक्षात परब्रह्म है. ऐसे गुरु को मैं प्रणाम करता हूं. उक्त वाक्य उस गुरु की महिमा का बखान करते हैं जो हमारे जीवन को सही राह पर ले जाते हैं.  गुरु के बिना यह जीवन बहुत अधूरा है. यूं तो हम इस समाज का हिस्सा हैं ही लेकिन हमें इस समाज के लायक बनाता है गुरु. शिक्षक दिवस के रूप में हम अपने शिक्षक को तो एक दिन देते हैं लेकिन गुरु जो ना सिर्फ शिक्षक होता है बल्कि हमें जीवन के हर मोड़ पर राह दिखाने वाला शख्स होता है उसको समर्पित  है यह दिन जिसे  गुरु पूर्णिमा कहा जाता है |
गुरु का दर्जा भगवान के बराबर माना जाता है क्योंकि गुरु, व्यक्ति और सर्वशक्तिमान के बीच एक कड़ी का काम करता है. संस्कृत के शब्द गु का अर्थ है अन्धकार, रु का अर्थ है उस अंधकार को मिटाने वाला.
आत्मबल को जगाने का काम गुरु ही करता है. गुरु  अपने आत्मबल द्वारा शिष्य में ऐसी प्रेरणाएं भरता है, जिससे कि वह अच्छे मार्ग पर चल सके. साधना मार्ग के अवरोधों एवं विघ्नों के निवारण में गुरु का असाधारण योगदान है. गुरु शिष्य को अंत: शक्ति से ही परिचित नहीं कराता, बल्कि उसे जागृत एवं विकसित करने के हर संभव उपाय भी बताता है.
जिन महान  जनों ने गुरु- शिष्य संबंधों की खोज की, उन्हें सामाजिक, साँसारिक संबंधों की सीमाओं के बारे में पूरा ज्ञान था। वे जानते थे कि सामान्य संसारी व्यक्ति चाहे वह हमारा कितना ही सगा या घनिष्ठ क्यों न हो, हमारा मार्गदर्शक नहीं हो सकता। इसके लिए परम प्रज्ञावान् एवं अनुभवी व्यक्ति की आवश्यकता है, भले ही वह साँसारिक दृष्टि से धन, पद अथवा प्रतिष्ठा रहित हो।

अनेक लोग तर्क प्रस्तुत करते हैं कि गुरु आवश्यक नहीं है, वास्तविक गुरु तो हमारे अंदर है। यह बात सैद्धांतिक रूप से सच भी है, परंतु हम में से ऐसे कितने लोग हैं जो अंतःकरण में स्थित सद्गुरु की आवाज को सुनते- समझते हैं। उसके निर्देशों को समझते एवं आचरण में लाते हैं। यह बात ध्यान में रखने योग्य है कि मनुष्य की मानसिक अवधारणाएँ सीमित एवं स्थूल है। मानव- मन विक्षुब्ध वासनाओं, इच्छाओं एवं महत्त्वाकाँक्षाओं का संगम है। इस हलचल के बीच अंतःस्थिति सद्गुरु की आवाज को सुनना भला कैसे संभव हो सकता है। उसकी आवाज तो नीरवता की, शांति की आवाज है। यदि हम अपनी नीरवता की इस आवाज को सुनना- समझना चाहते हैं, तो हमें अपने मन के आँतरिक कोलाहल को बंद करना पड़ेगा। परंतु हम तो सामान्यक्रम में अपने मन की संरचना ही नहीं समझते। हमें यह भी नहीं मालूम कि हम आसक्ति, क्रोध, ईर्ष्या, घृणा और वासना का अनुभव क्यों करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि हम कोलाहल को दबाने का जितना प्रयास करते हैं, उसकी  आवाज उतनी तीव्र होती चली जाती है।

इस आँतरिक अशाँति को रोकने के लिए ही हमें गुरु की आवश्यकता होती है। वे ही उन विधियों के विशेषज्ञ हैं, जिनके द्वारा शरीर, मन एवं अंतरात्मा का नियंत्रण व नियमन होता है। वे ही वह मार्ग दिखा सकते हैं जिस पर चलकर हम अपने मन की उन नकारात्मक प्रवृत्तियों को बदल सकते हैं, जो हमारे आत्मविकास में बाधा है।

गुरु ज्ञान की प्रज्वलित मशाल है। भौतिक शरीरधारी होने पर भी उनकी आत्मा उच्च एवं अज्ञात जगत् में विचरित रहती है। वह अपने लिए नहीं, बल्कि हमारे लिए इस धरती से जुड़े रहते हैं। उनका प्रयोजन स्वार्थ रहित है। उनकी न तो कोई इच्छा होती है और न ही आकाँक्षा। ये गुरु ही हमारे जीवन की पूर्णता होते हैं। वे पवित्रता, शांति, प्रेम एवं ज्ञान की साक्षात् मूर्ति हैं। वे साकार भी हैं और निराकार भी। देहधारी होने पर भी देहातीत हैं। देहत्याग देने पर भी उनका अस्तित्व मिटता नहीं, बल्कि और अधिक प्रखर हो जाता है।

उन्हें पाने के लिए, उनसे मिलने के लिए आवश्यक है हमारी चाहत। इसके लिए अनिवार्य है हमारे अपने अंतर्मन में उभरती तीव्र पुकार। गुरुपूर्णिमा  का महापर्व हममें से हर एक के लिए यही संदेश लेकर आया है कि हमारे गुरुदेव हम सबसे दूर नहीं है। वे देहधारी होने पर भी देहातीत थे और अब देह का त्याग कर देने पर तो सर्वव्यापी हो गए है। उनका सदा ही यह आश्वासन है कि उन्हें पुकारने वाला उनके अनुदानों से कभी भी वंचित नहीं रहेगा |
गुरु गोविन्द दोउ खड़े काके लगो पाय

बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय 

दिनेश शर्मा 

गोरखपुर (उत्तर प्रदेश )

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गुरुवार, 30 जुलाई 2015

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एक लेखक की दास्तान ..... प्रामाणिकता की जंग (व्यंग -विश्वजीत सपन )



एक लेखक की दास्तान

                 प्रामाणिकता की जंग

भारत देश में लेखकों की कमी है। यह बात मुझे तब पता चली, जब हूबहू मेरी ही रचना एक
प्रतिष्ठित पत्रिका में किसी और के नाम से छपी। आश्चर्यमिश्रित सदमे से मैं बेहाल हो गया। सोचने-समझने की शक्ति का बुरा हाल हो गया। दिन बहुत हो चुके थे, तो मैं लगभग भूल ही चुका था कि मैंने वह रचना उस प्रतिष्ठित पत्रिका को कब भेजी थी। किन्तु पढ़ते ही आँखों के रेटीनी परदे पर स्पष्ट चित्र उभर आया। कंप्यूटर खोलकर देखा। आठ महीने पहले भेजी थी, इस आस में कि संभवतः संपादक जी को पसंद आ जाए। उन्हें पसंद भी आई। जिसकी प्रसन्नता थी, किन्तु रचनाकार के स्थान किसी और का नाम देखकर गहरा सदमा लगा। जवानी का स्वास्थ्य था, दिल का दौरा नहीं पड़ा।
इस बेतरतीबी के युग में सब-कुछ उलट-पुलट हो चुका है। समय ही नहीं है किसी के पास। विशेषकर दूसरों के लिए और दूसरों की समस्याओं के लिए। फिर बड़ी और प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और विशेषकर उनके संपादकों के पास तो और भी नहीं। पहले यानी कुछ दशक पहले तक जब कोई रचना अस्वीकार की जाती थी तो वह सखेदवापस की प्रथा थी। इस सखेदी-प्रथासे मेरी मुलाक़ात एक बार नहीं अनेक बार हो चुकी थी। तब दुःख होता था, किन्तु सदमा नहीं लगता था। अब इस प्रथा का निधन हो गया है। आप अपनी रचना भेजकर आराम से भूल जाइए और प्रतीक्षा करते-करते अपनी आयु बढ़ा लीजिए। छपने के आसार तो कम ही हैं, सखेद वापस आने का तो है ही नहीं, क्योंकि प्रथा ही मृत्युलोक पहुँच गई है। मैं भी इसी भूल में बैठा हुआ था कि चाहे वह वापस आए न आए, किन्तु रचना तो मेरी ही है और एक ईमानदार लेखक की भाँति आशावान् बना रहा था। कभी न कभी संपादक जी की उड़ती-उड़ती नज़र तो पड़ेगी ही। और इसी कारण अन्य पत्र-पत्रिकाओं में न भेज सका था।
मेरे लिए असह्य दुर्घटना थी। क्या ऐसा भी हो सकता है? यह प्रश्न मेरे दिलो-दिमाग पर ऐसे-ऐसे प्रहार कर रहा था कि जैसे सैंकड़ों छुरियाँ बार-बार उन्हें खुरच रही हों। मैं सोचने-विचारने पर विवश था कि अब क्या किया जाए? रचना तो मेरी है, लेकिन किसी और के नाम से छपी है। तो फिर अपनी रचना को अपनी कैसे कहा जाए? समस्या गंभीर थी और अनूठी भी।
वैसे इस दुर्घटना से दो बातें सर्वथा प्रमाणित थीं। एक तो अच्छी रचना की कद्र अभी भी बाकी थी। गो कि मैं एक अच्छा रचनाकार प्रमाणित हो गया था। दूसरे किसी रचना का महत्त्व नहीं होता है, बल्कि रचनाकार का होता है। रचनाकार बड़ा तो रचना बड़ी, वरना सुन्दर रचना भी अरचना। अर्थात् रचनाकार का सुरीला नाम होना चाहिए, चाहे रचना बेसुरी ही क्यों न हो। इन दोनों ही सत्य में मैं कहीं भी फिट नहीं बैठता था। अतः अपनी रचना को अपनी कहने के उपायों पर विचार करने लगा। यह निकला मेरी गहरी सोच का निष्कर्ष। किन्तु, निष्कर्ष निकालना और उसे प्रमाणित करना दो अलग बातें होती हैं। मेरी समस्या दुर्लभ थी। मेरे लिए और साहित्य जगत् के लिए भी। मैं अब अक्सर सोचों में गुम रहने लगा। घर-बार सबसे खिन्न रहने लगा। कर्ता-धर्ता परेशान तो सभी बेहाल हो ही जाते हैं। असंतोष की आग ने मेरे घर की शान्ति को भी जला डाला। अब घर की चिक-चिक और दिल की हिच-हिच में मैं पिसता जा रहा था।
गहरे समुद्र-तल की भाँति गहरे मेरे संताप को देखकर एक दिन मेरे प्रिय मित्र मिलने आये। उन्हें मुझसे सहानुभूति थी। मेरे घावों पर मरहम लगाते हुए बोले - मित्र, आपकी तो एक छोटी-सी रचना का अपहरण हुआ है, इतना दुःख मत करो। लोग तो ऐसे अपहरणों के बाढ़-पीडि़त हैं।
रचना का अपहरण?’
मैं चैंक गया था। पहली बार सुना था।
चैंको नहीं मित्र। मेरे पास तो पूरी की पूरी किताबों तक के अपहरण के मामले हंै। एक नहीं बल्कि अनेक हैं।
क्या?’
अब तुमसे क्या छुपाना मित्र। तुम भी पीडि़तों में शामिल हो गए हो, तो तुम्हें इन मामलों को जानने का अधिकार भी प्राप्त हो गया है। मेरठ के एक प्रकाशक की गाथा का वर्णन करता हूँ।
मैं अवाक् अपने प्रिय मित्र का व्याख्यान सुन रहा था।
इनकी विशेषता है कि ये महाशय रचनाएँ मँगवाते हैं और कई बार लोग अपनी रचना लेकर इनके पास जाते भी हैं। समय बीतता जाता है यह सुनते-सुनते कि विशेषज्ञ उनके परीक्षण कर रहे हैं। महीनों और सालों बीत जाते हैं। बेचारा रचनाकार आखि़रकार अपनी रचना के बारे में भूल जाता है और फिर ये प्रकाशक महोदय उस रचना को अपने परिवार के किसी एक सदस्य के नाम पर उसका शीर्षक बदलकर छाप लेते हैं। यह कई दशकों से चल रहा है। अब उनके परिवार के चार सदस्य स्थापित लेखक बन चुके हैं। वैसे कभी-कभार वे दूसरों की रचनाओं का प्रकाशन भी कर लेते हैं ताकि प्रकाशक के तौर पर उनकी विश्वसनीयता बरक़रार रहे।
यह तो सरासर धोखाधड़ी है।
अब इसे जो कहना चाहो कह लो। ऐसा केवल मेरठ में होता हो, कोई एक प्रकाशक करता हो, तो भी कोई बात नहीं होती। अब तो यह उद्योग की भाँति पनप चुका है। सारे देश को निगल चुका है।
मुझे आश्चर्य भी हुआ और डर भी लगा कि मैंने भी कई रचनाएँ, कई पत्र-पत्रिकाओं को प्रेषित की हुई हैं। अगर मेरे साथ भी ऐसा हुआ, तो क्या होगा?
मेरा डर सही साबित हुआ, क्योंकि उसके बाद जो कुछ हुआ वह लगभग वैसा ही था जो मेरे प्रिय मित्र ने कहा था। धड़ाधड़ मेरी कई रचनायें और छपीं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उन्होंने बखूबी स्थान पाया। कभी पूरी की पूरी, तो कभी बेतरह काट-छाँटकर और कभी उसकी आत्मा का हनन कर। भाषा भी कुछ मेरी और कुछ किसी अन्य की। किन्तु, मेरे नाम का नामोनिशाँ कहीं नहीं था। संताप एवं पीड़ा के बादल फट पड़े। अपने सृजन के लिए दिल फूट-फूटकर रो पड़ा। मेरी रचना पराई होकर इठलाती तो दिल पर सैकड़ों सर्प लोटने लगते। वे जो भी थे आनंदित थे और मैं स्वयं को पहचानने के प्रयास में स्वयं को ही भूलने लगा था। फिर मैंने निश्चय किया कि नहीं, एक नवोदित और उदीयमान लेखक की पदवी से सँवरने का अवसर हाथ से न जाने दूँगा। स्वयं को लेखक बनने की होड़ से बाहर न होने हूँगा। अतः अपनी इस अजीबो-गरीब लड़ाई में कोल्हू के बैल की तरह जुट गया।
रचना जगत् में असांसारिकता की परम्परा सर्वथा विकराल और भयावह है, जहाँ उदीयमान लेखकों के मर्म को कोई नहीं समझता। वहाँ नाम और केवल नाम का ही बोलबाला होता है। और चोरी की रचना का तो समझिए कि एक गिरोह ही पलता है। ऐसे में मेरी खुद की प्रामाणिकता प्रश्नचिह्नित हो गई। मेरे पास पक्के सुबूत भी नहीं थे, वे सब मेरी रचनायें थीं। प्राचीन काल में पाण्डुलिपियाँ अपने हाथों से लिखी जाती थीं। अब इस कंप्यूटर के युग में वे दुर्लभ हो गई हंै। वैसे पाण्डुलिपियोें की प्रामाणिकता पर भी कच्ची मुहर ही होती है। लेकिन इसमें से तो मुहर ही गायब हो चुकी थी। फिर भी मैं एक सच्चे और ईमानदार लेखक की तरह लिखता गया और पत्र-पत्रिकाओं को भेजता गया। यह सोचकर कि ऊपरवाला सबको देखता है। वह मेरी ओर भी देखेगा। मेरी भी सुनेगा और एक दिन न्याय का पलड़ा अवश्य भारी होगा।
समय बीतता गया। इस दुःख के साथ जीने की आदत-सी पड़ गई थी। इस बीच समय के साथ मेरी ईमानदारी में भी दरार आ गई। और मैं अपनी एक रचना को कई पत्र-पत्रिकाओं में भेजने लगा। असफलताओं के अंबार लगा दो, सफलता अवश्य कदम चूमेगीकिसी ने कहा था। यही मेरा मूलमंत्र बन गया। तब मेरी रचनायें भी छपने लगीं। कहीं दस रचनाओं के बाद तो कहीं पन्द्रह रचनाओं के बाद। ख़ैर, जो भी हो अब मैं रचनाकार तो बन ही गया था। चाहे छोटा-मोटा ही। फिर एक दिन ऐसा हुआ कि मेरी एक रचना दो प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में एक साथ छपीं। एक मेरे नाम से और दूसरी किसी नामी-गिरामी रचनाकार के नाम से। यह तो कभी न कभी होना ही था। सो हो गया।
बस फिर क्या था? प्रामाणिकता की जंग छिड़ गई। मुकदमे दायर हो गए। मुझ पर नकल करने का आरोप लग गया। किसी रचनाकार के लिए यह सबसे बड़ी चुनौती थी कि उसे अपनी ही रचना की प्रामाणिकता साबित करनी थी। मैं जी-जान से जुट गया। वकीलों  के लिए यह अनोखी बात थी। इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था। वे चुस्कियाँ लेकर मुझसे प्रमाण पूछते थे और मज़ा लेकर मेरी रचनाओं का आनंद उठाते थे। आज तक जितनी रचनाएँ छपी थीं, कहीं भेजी थीं, उन पर बातें हुईं। विचार, कथ्य, शैली, विषयवस्तु, प्रवाह आदि-इत्यादि सभी पर विचार-विमर्श हुए। जिरह ऐसे हो रहा था जैसे दो खूँखार भेडि़ये शिकार को हड़पने के लिए चीर-फाड़ कर रहे हों। पत्र-पत्रिकाआंे, अख़बारों, टी.वी. चैनलों सभी प्रकार के मीडिया और आम जनता के लिए खासा मनोरंजक विषय था।
बरसों न्यायालयों की देहरी पर कानून, इज़्ज़त, लेखक, रचना और साहित्य की धज्जियाँ उड़ाई गईं। आखि़रकार फैसले का दिन भी आ गया। प्रतिष्ठित पत्रिका और प्रतिष्ठित रचनाकार की बात सहर्ष स्वीकार कर ली गई। मेरे द्वारा प्रस्तुत प्रत्येक साक्ष्य को अपर्याप्त माना गया और मैं नकलची प्रमाणित हो गया। मुझे अपनी ही रचना को नकलकर छपवाने के जुर्म में तीन हज़ार रुपये का जुर्माना और छह महीने की क़ैदे-बामशक़्क़त की सज़ा सुना दी गई। पहले से ही एक अदना लेखक और ऊपर से वकीलों एवं न्यायालयों के चक्कर ने मेरी हालत और भी पस्त कर दी थी। अतः जुर्माने की तीन हज़ार की राशि जुटा न पाया, तो अदालत ने मेरी माली हालत पर तरस खाकर मेरी सज़ा दस महीने में तब्दील कर दी। तब से अब तक कारागार में बैठा लेखन-कार्य कर रहा हूँ क्योंकि लेखन ही मेरा जीवन है, मेरा सब-कुछ है। साहित्य मेरी कमजोरी है और साहित्य-सेवा मेरा धर्म। यह अलग बात है कि न्यायालय को ऐसा कुछ भी प्रतीत न हो सका। वह तो प्रमाण पर अपनी नौका पार करती है और प्रमाण शक्तिशालियों की बपौती होती है।
अपनी व्यथा बताते-बताते मेरी आँखों से धाराप्रवाह आँसू प्रवाहित होने लगे। इस गंगा-जमुनी धारा से द्रवित होकर मेरा साक्षात्कार लेने आया वह पत्रकार, अपने कलमबद्ध हाथों से आँसू पांेछने पर विवश हो गया। मुझे प्रसन्नता हुई कि उसे मुझसे सहानुभूति थी। फिर वह मेरी बात जनता को पहुँचाने का प्रयास भी कर रहा था। मुझे प्रतीत हुआ कि वह भी मेरी ही जैसी किसी परिस्थिति से गुज़र रहा है। वरना आज के इस युग में सहानुभूति की फसल ही कहाँ उपजती है। तो मुझसे रहा नहीं गया।
एक बात औरमैंने कहा - आप मेरे दुःख में ऐसे शरीक हुए जैसे आँख और हाथ। जब हाथ कुछ करने को होता है तो आँख उसे बताती है और जब आँख दुःख में रोती हैं तो हाथ आँसू पोंछते हैं। आप भी इसी प्रकार मेरे आँसू पोछने आए हैं। अतः आपका बहुत-बहुत धन्यवाद्। आपसे इतना ही अनुरोध है कि इस ख़बर को अपने आँसू समझकर छापियेगा। ईश्वर आपका भला करेगा। साथ ही मेरी ओर से यह अपील ज़रूर कर दीजिएगा कि जो भी इसे पढ़े, सहानुभूति में दो आँसू अवश्य बहाए। मैं समझ लूँगा कि साहित्य-सेवा की कीमत मुझे मिल गई।

यह कहकर मैंने स्वयं को पुनः उस कालकोठरी के हवाले कर दिया, जहाँ मेरी प्रामाणिकता के समस्त प्रमाण धुल-धुलकर पूरी तरह अदृश्य हो गए थे

विश्वजीत सपन

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बुधवार, 29 जुलाई 2015

"अटूट बंधन" अंक -10 कवर पेज


हिसाब







हिसाब.....


एक व्यक्ति एक दिन बिना बताए काम पर नहीं गया.....
मालिक ने,सोचा इस कि तन्खाह बढ़ा दी जाये तो यह और दिल्चसपी से काम करेगा.....
और उसकी तन्खाह बढ़ा दी....
अगली बार जब उसको तन्खाह सेज़्यादा पैसे दिये तो वह कुछ नही बोला चुपचाप पैसे रख लिये.....
कुछ महीनों बाद वह फिर ग़ैर हाज़िर हो गया......
मालिक को बहुत ग़ुस्सा आया.....
सोचा इसकी तन्खाह बढ़ाने का क्या फायदा हुआ यह नहीं सुधरेगा और उस ने बढ़ी हुई तन्खाह कम कर दी और इस बार उसको पहले वाली ही तन्खाह दी......
वह इस बार भी चुपचाप ही रहा और जुबान से कुछ ना बोला....
तब मालिक को बड़ा ताज्जुब हुआ....
उसने उससे पूछा कि जब मैने तुम्हारे ग़ैरहाज़िर होने के बाद तुम्हारी तन्खाह बढा कर दी तुम कुछ नही बोले और आज तुम्हारी ग़ैर हाज़री पर तन्खाह कम कर के दी फिर भी खामोश ही रहे.....!!
इस की क्या वजह है..? उसने जवाब दिया....जब मै पहले ग़ैर हाज़िर हुआ था तो मेरे घर एक बच्चा पैदा हुआ था....!!
आपने मेरी तन्खाह बढ़ा कर दी तो मै समझ गया.....
परमात्मा ने उस बच्चे के हिस्से का पैसा  भेज दिया है......
और जब दोबारा मै ग़ैरहाजिर हुआ तो  मेरी माता जी का निधन हो गया था.....
जब आप ने मेरी तन्खाह कम दी तो मैने यह मान लिया की मेरी माँ अपने हिस्से का पैसा  अपने साथ ले गयीं.....
फिर मै इस पैसे  की ख़ातिर क्यों परेशान होऊँ जिस का ज़िम्मा ख़ुद परमात्मा ने ले रखा है......!


प्रेरक प्रसंग से 
संकलनकर्ता :दिव्या निगम 

चित्र गूगल से 

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मंगलवार, 28 जुलाई 2015

डॉ ए .पी .जे अब्दुल कलाम के अनमोल विचार









 डॉ ए. पी. जे अब्दुल कलाम के अनमोल विचार 


१)अपनी पहली सफलता के बाद आराम मत करो ,क्योंकि अगर तुम अब असफल हो गए तो लोगों को यह कहने का मौका मिलेगा कि तुम्हारी  पहली सफलता बस भाग्य के कारण थी |
२ )दुनियाँ के बेहतरीन दिमाग क्लास की आखिरी बेंच पर भी पाए जा सकते हैं |
३ ) अपने काम से प्यार करो कंपनी से नहीं ,क्या पता कब तुम्हारी कंपनी तुम्हे प्यार करना बंद कर दे |
४ )सपने वो नहीं जो आप सोते हुए देखते हैं बल्कि सपने वो हैं जिनके लिए आप सोना छोड़ दे |
५ )सब चिड़ियाँ बारिश में आश्रय ढूंढती हैं पर ईगल नहीं क्योंकि वो बादलों से ऊपर उड़ने लगती है | समस्याएं वहीँ हैं केवल आप का रवैया सारा अंतर उतपन्न  करता है |
६ )शिखर पर पहुचने के लिए शक्ति की जरूरत होती है |चाहे वो पर्वत का शिखर हो या कैरियर का |
७ )काला रंग निराशा का प्रतीक है पर इसी काले रंग का ब्लैक बोर्ड कितने विद्यार्थियों के जीवन में उजाला लाता है |
८ )कठिनाइयां आप के जीवन में इसलिए नहीं आती कि वो आप को नष्ट करे बल्कि इस लिए आती हैं कि आप आप की छुपी हुई क्षमताएं व् शक्ति बाहर निकल कर आ सके और कठिनाइयों को दिखा सके कि आप उनसे ज्यादा कठिन हैं |
९ ) स्वप्न देखो ,क्योंकि स्वप्न विचारों में बदलते हैं और विचार क्रिया में |
१० )अगर आप अपने काम को सलाम करते हैं तो आप को किसी के आगे झुकने की जरूरत नहीं हैं | अगर आप अपने काम के साथ बेईमानी करते हैं तो आप को हर किसी को सलाम करना पड़ेगा |
११ )हम सब के पास बराबर प्रतिभा नहीं होती है पर हम सब के पास अपनी प्रतिभा को निखारने के बराबर अवसर होते हैं |
१२ )आत्मविश्वास और कठोर परिश्रम  ही वो दवाएं हैं जो असफलता नमक बीमारी को दूर करती हैं
१३ ) सफलता वो है जब हमारे दस्तखत औटोग्राफ में बदल जाए |
१४  )किसी को परस्त कर देना बहुत आसान है पर किसी को जीत लेना बहुत मुश्किल |
१५ )इंतज़ार करने वालों को उतना ही मिलता है जितना कोशिश करने वाले पीछे छोड़ देते हैं |

अटूट बंधन परिवार की ओर से डॉ ए .पी जे .अब्दुल कलाम को भावभीनी श्रधांजली 

शनिवार, 25 जुलाई 2015

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अटूट बंधन विशिष्ट रत्न सम्मान हेतु प्रविष्टियाँ आमंत्रित


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हमें आप सब को यह बताते हुए अत्यंत हर्ष हो रहा है कि आप की प्रिय पत्रिका “अटूट बंधन “आगामी नवंबर में सफलता पूर्वक अपना एक पड़ाव पूरा करने के बाद नूतन वर्ष में कदम रखेगी | जैसा कि आप सब को विदित है कि “अटूट बंधन “ मात्र एक पत्रिका ही नहीं अपतु वैचारिक क्रांति का अभियान हैं ,हमारी परिकल्पना है “ एक स्वस्थ सकारात्मक विचारों से युक्त समाज की “ | अत : अटूट बंधन परिवार ने यह निर्णय लिया है कि वह विभिन्न ( साहित्य , समाज सेवा ,विज्ञानं ,कृषि ,विकलांग ,चिकित्सा ,शिक्षा आदि ) क्षेत्रों में उलेखनीय योगदान देने वाले २१ श्रेष्ठ कर्मठ व्यक्तियों को “अटूट बंधन विशिष्ट रत्न “ से सम्मानित करेगा | अगर आप या आप की जानकारी के किसी व्यक्ति ने किसी क्षेत्र में उलेखनीय योगदान दिया है तो आप अपनी( या अपनी जानकारी के व्यक्ति की ) “अटूट बंधन विशिष्ट रत्न सम्मान “हेतू प्रविष्टि भर सकते हैं | इसके लिए आप अपना पूरा परिचय , फोटो , सम्बंधित क्षेत्र में उलेखनीय काम का पूरा विवरण , पत्राचार का पता व् फोन नंबर हमें editor .atootbandhan@gmail.com पर 31 अगस्त तक भेजे |






शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

ममता




ममता


यूँ  तो  शीतल  को  अपने  ससुराल  में  सभी  भले  लगे  लेकिन  उसकी  बुआ सास की  लड़की  हर्षदा  न  जाने  क्यों  बहुत  अपनी-सी  लगती  थी|  हर्षदा उम्र  में  उससे  कम  थी पर  अत्यंत  परिपक्व  व  शालीन  थी |  साल दर साल  गुजरते  गए  पर  शीतल  को  माँ  बनने   का सौभाग्य  न  मिला |  मिले
 तो  बस  सवाल  ही  सवाल-  ससुराल  में  भी , मायके  में  भी|  हर्षदा उससे  सखी  का  सा  बर्ताव  करती |  शीतल  उसके  पास   रोकर  अपना  दाह शांत  कर  लेती |  शादी  कि  दसवीं  वर्षगाठ  पर  उसे  बहुत  बधाइयाँ मिली  पर  जब  उसने  अपनी  बहनों  से , ननदों  से  एक  बच्चा  उसकी  गोद में  डाल  देने  का  आग्रह  किया  तो  सबने  अपने  कारण  गिना  दिए |सास-ससुर  को  परिवार  से  बाहर  का  शिशु  गवारा  न  था |  उसके  आसुओं के  सागर   में  हर्षदा ने  यह  कहकर  एक  आशा  नौका  डाल  दी  कि भविष्य  में  वह  अपना  बच्चा  शीतल  को  देगी |
       विधि  का  विधान- जल्दी  ही  हर्षदा  के  विवाह  की  तारीख  पक्की हो  गई |  शीतल  ने  जब  उसे  उसका  वचन  याद   दिलाया  तो  हर्षदा  ने स्पष्ट  किया  कि  उसके  मंगेतर  नवीन  से  उसने  बात  की  है  और  उन दोनों  ने  फैसला  लिया  है  कि  वे  अपना  दूसरा  बच्चा  शीतल  को
देंगे |   पहला  बच्चा  वे  स्वयं  रखेंगे |  समय  पंख  लगाकर  उड़ा | तमाम इलाज  व  पूजा -पाठ  के  बाद  भी  शीतल  नाउम्मीद  ही  रही |  उधर हर्षदा   के  गर्भ  में  शीतल  की  उम्मीदें  पलने  लगी |  हर्षदा
सोचती  यदि  प्रथमतः  पुत्री  हुई , फिर  दुबारा  लड़का  हुआ  तो  वह भाभी  का  होगा  पर  क्या  उसके  सास-ससुर  पोते  का  मोह  छोड़  देंगे | फिर  उसे  तो  अपने  लिए  बेटी  ही  चाहिए  थी |  शिशु  चाहे  बेटा  हो
या  बेटी  पर  स्वस्थ ,सुंदर  व  तेजस्वी  हो |  उसके  चिंतन  का  तो अंत  ही  नहीं  था  पर  पूरे  नौ  महीने  उसने  शांतचित्त  हो ,प्रसन्नतापूर्वक  धार्मिक  ग्रंथो  का  अध्ययन  किया , सकारात्मक  भावो
का  पोषण  किया |


लेबर रूम  में  वह  आश्चर्यचकित  रह  गई  जब  अत्यंत  पीड़ा की  अवस्था में,  तंद्रा  में  उसे  समाचार  मिला  कि  उसने  जुड़वाँ  पुत्रों  को जन्म  दिया  है |   यह  किसी  चमत्कार  से  कम  न  था ।  जब  नवीन
उन्हें  देखने  आये  तो  उसने  संयत  स्वर  में  कहा  कि  भगवान  ने  एक बच्चा  भाभी  के  लिए  ही  भेजा  है |  हम  दोनों  को  ठीक-से   संभल भी नहीं  पायेंगे |  नवीन  ने  अपनी  माँ  की  झिझक  के  बावजूद  भी
स्वीकृति  दे  दी |  उसने  स्वयं  शीतल  को  फोन  किया |  जब  डॉक्टर बच्चो  का  चेक-अप  करके  बाहर  निकले  तो  हर्षदा  ने  नवीन  को  वार्ड में  बुलाया  और  गुरूजी  द्वारा  प्रदत्त  धागा  एक  बच्चे  की  कलाई
पर बांधा   और  बोली "ये  हमारा  अर्जुन  है  और  वो  रहा  शीतल  भाभी  का बेटा |" शीतल  के  तो  मानो  पैर  ही  जमीं  पर  नहीं  पड़  रहे  थे | गाजे-बाजे   के  साथ  वो  बेटे  को  घर  ले  गई |   अभी  तो  उसे
जन्मोत्सव  मनाकर  अपने  ढेरों  अरमान  पूरे  करने  थे |  हर्षदा  पर  तो मानो  उसने  आशीर्वाद  व  शुभकामना  की  झड़ी  ही  लगा  दी |
                                                                शीतल के  पास  तो  अब  कोई  बात  ही  नहीं  होती  थी सिवा  उसके  बेटे  वासु के  कार्यकलापों  के |  अब  वो  बैठना  सीख  गया , उसने  कब  पहली  बार
माँ  कहा - वो  बस  चहकती  ही  रहती |  हर्षदा  की  विशेष  देखभाल  व इलाज  करवाने  के  बाद  भी  अर्जुन  ठीक  से  चल  नहीं  पाता  था हालाँकि  मानसिक  रूप  से  वह  पूर्ण  परिपक्व  था |  नवीन  ने  इसे नियति  माना  कि वासु  भाभी  की  गोद  में  है |  पर  हर्षदा  हार  मानने वाली  नहीं  थी |  उसने  अर्जुन  को  पूर्ण  शिक्षा  दिलवाने  के  साथ साथ  उसके  रूचि  के  क्षेत्र  को  विकसित  किया |  उसने  जान  लिया  कि
 व्हील  चेयर  पर  निर्भर  होने  के  बावजूद  भी  अर्जुन  की  रूचि निशानेबाजी  में  है |  उसने  अपनी  जमापूंजी  से  घर  में  ही  शूटिंग रूम  बनवाया |  सुयोग्य  कोच  की  सेवायें  ली |  वो  निरंतर अर्जुन  को
प्रोत्साहित  करती|  उसे  लक्ष्य  के  प्रति  एकाग्र  होना  सिखाती | माँ -बेटे की  मेहनत  रंग  लाई  जब  छोटी  उम्र  में  ही  पेराओलम्पिक में  अर्जुन  ने  शूटिंग  में  स्वर्ण  पदक  जीतकर  देश  का  मान  बढ़ाया
|  गौरवान्वित  माता -पिता  एयरपोर्ट  के  रास्ते  में  थे , अपने विजेता  पुत्र  की  अगवानी के  लिए |  नवीन  ने  सहज  ही  पूछ  लिया हर्षदा, वासु  का पूर्ण  विकास  देखकर  कभी  तुम्हें  नियति  पर  क्षोभ
नहीं  हुआ ? " हर्षदा ने  आत्मविश्वास  के  साथ  जवाब  दिया "क्षोभ  कैसा? ये  मेरा  अपना  फैसला  था |  मैंने  आजतक  किसी  को  नहीं  बताया | डॉक्टर  ने  चेक -अप  बताया  कि  अर्जुन  शारीरिक  रूप से  कुछ  कमतर होगा  तभी  तो  गुरूजी  का  दिया  धागा  मैंने  उसे  बांधा  उसकी विशिष्ट  पहचान  के  लिए ।" नवीन  ने  प्रतिप्रश्न  किया "शीतल  भाभी  से  तुम्हें  इतना  स्नेह  था  पर  उन  पर  विश्वास  नहीं  था  कि  वोअर्जुन  को  उसकी  कमजोरी  की  वजह  से  पूर्ण  ममता  नहीं  देगी ?"हर्षदा गम्भीरतापूर्वक  मुस्कराई "शीतल  भाभी दयावश  ममता  तो  पूरी लुटाती  पर  मुझे  डर  था  कि कहीं  वो  उसे  भावनात्मक  व  मानसिक धरातल पर कमजोर  बना  देती |  उसकी प्रतिभा  को  निखार  नहीं  पाती।  मेरी  तरह  कठोर  नहीं  हो  पाती | "


             हर्षदा के  इस  रहस्योद्घाटन  पर  नवीन  अवाक्  था  पर  साथ  ही  नतमस्तक  था  अपनी  अर्धांगिनी  की  इस  दृढ़ता  पर , त्याग और समझदारी  पर |

रचना व्यास 
शिक्षा :         एम  ए (अंग्रेजी साहित्य  एवं  दर्शनशास्त्र),  एल एल
बी ,  एम बी ए

मेरी  प्रेरणा : जब  भीतर  का  द्र्ष्टापन  सधता  है  तो  लेखनी  स्वतः
प्रेरित  करती  है|


अटूट बंधन

भविष्य की योजना














बहुत पहले की बात है एक गरीब आदमी था जिसका नाम था दीनदयाल | वह  हर रोज बाजार में शक्कर बेचा करता था, वह थोक में 800 रूपये के भाव से एक बोरी शक्कर खरीदता था और इस प्रकार शक्कर थोक के भाव में आठ रूपये प्रति किलो पड़ती थी. बहुत ही अच्छी बात यह थी कि वह फूटपाथ पर ही आठ रूपये किलो में शक्कर बेच देता था|  सारा शहर उसी से शक्कर खरीदने की कोशिश करता था क्योंकि थोक के भाव में ही उन्हें फूटकर शक्कर और कहीं नहीं मिलती थी. दिन भर में वह शक्कर के दस बोरे बेच लेता था|  क्योंकि ग्राहक उसके दूकान को घेरे खड़े रहते थे.. लोगों ने जब उससे पुछा कि जब वह आठ रूपये किलो में खरीदता है और उसे आठ रूपये किलो पर ही बेच देता है तो उसके हाथ और क्या बचता है? उसने बड़ा ही सटीक जवाब दिया, “बोरा...” दीनदयाल का  लक्ष्य बहुत ही स्पष्ट था  वह बोरे को प्राप्त करने के लिए बोरा भर शक्कर बेचा करता था और जब वह रात को घर लौटता था तो उसके पास दास बोरे  होते थे जिन्हें अगले ही दिन वह बाजार में दस रूपये प्रति बोरी के हिसाब से बेच देता था और इसी तरह से वह सौ रूपये कमा लेता था | इस तरह उसे नुक्सान भी न होता और बाज़ार में उसकी साख भी बन गयी | धीरे धीरे जब उसने पैसे जोड़ कर अपनी दूकान खोली तो उसकी एक ईमानदार व्यापारी की छवि बन चुकी थी | जिसकी वजह से लोग उसकी दूकान पर पहले की तरह टूट पड़ते और वह शीघ्र ही धनवान बन गया |  


शिक्षा 

जिंदगी में हमें भी दीनदयाल की तरह अपने लक्ष्य स्पष्ट रखने चाहिए | हो सकता है जो काम हम कर रहे हैं उस का तात्कालिक फायदा न हो पर जो लोग भविष्य की यो
जना बना कर चलते हैं 
उन्हें अंततः लाभ ही होता है | 

संकलन कर्ता 
कविता  गुप्ता 

दिल्ली 

चित्र गूगल से साभार  

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