रविवार, 30 अगस्त 2015

रक्षा बंधन स्पेशल - फॉरवर्ड लोग

 


आज सजल बहुत खुश था। पूरे आठ साल बाद आज रक्षाबंधन के दिन मीनल दीदी उसकी कलाई पर राखी बांधेगी। वो जब दसवीं कक्षा में था, मीनल दीदी ने कॉलेज की पढ़ाई के साथ पार्टटाइम जॉब शुरू कर दी थी। पापा -मम्मी ने रोक था कि जॉब के साथ वह पढ़ाई उतनी तन्मयता से नहीं कर पायेगी। पर मीनल को शुरू से ही ढेर सारे कपड़े, घड़ियाँ व महंगे मोबाइल्स का शौक था। उसने जल्दी ही इन्स्टालमेन्ट पर स्कूटी भी ले ली थी। पढाई पूरी होने पर जब उसके लिए विवाह प्रस्ताव आने लगे तो उसने घोषणा कर दी कि वह अपने बॉस से शादी करेगी। उसी दिन घर के दरवाजे उसके लिए बंद हो गए। इसी साल जॉब लगने की ख़ुशी में सजल ने पापा -मम्मी को मनाया था कि उसकी पहली कमाई में दीदी का भी हक़ है अतः वह राखी बंधवाने दीदी के घर जायेगा।

शनिवार, 29 अगस्त 2015

एक पाती भी /बहन के नाम ( निशा कुलश्रेष्ठ )









एक चिट्ठी भाई के नाम.. 
प्रिय  भाई अतुल 
तुम्हे याद है जब हम छोटे थे तब तुम हमेशा राखी पर रूठ जाया करते थे|  तुम्हारे रूठ जाने के  अपने कारण होते थे.. जहाँ  हमें राखी का इन्तजार रहता था  वहां तुम्हे राखी पर हमेशा भन्नाहट रहती थी तुम्हे याद है न?
        हमेशा हम बहिने राखी पर तुम्हारे पीछे पीछे राखी लिए घूमती रहती थीं और तुम आगे आगे टेड़े टेड़े चलते जाते थे , तुम्हारा कहना होता था कि हम बहिने राखी तुमसे पैसे लेने के लिए बांधती हैं :)  और तुम्हे नाराजगी इस बात से भी थी कि इन्हें पैसे भी दो  और इनके पैर भी छुओ हा हाहा हा. भाई क्या दिन थे वो भी| मुझे याद है तब मैं तुम्हे खूब मनाती थी राखी बंधवाने को सुबह से शाम हो जाती थी  |
 तुम तरह तरह से ब्लैकमेल करते थे पता है कैसे कैसे?  तुम कहते थे   मुझे झूला झुलाओ  पहले तब बंधवाऊँगा राखी |  और तब मैं तुम्हे खूब देर देर तक झूला झुलाती थी | कभी कहते मेरे लिए पानी लेकर आओ | और फिर  भी उसके बाद भी तुम इसी मिज़ाज में जीते थे.......... नहीं बंधवाउंगा तब तुमको पापा से जब शिकायत करने की धमकी दी जाती थी तब  कहीं राखी  बंधवाते थे तुम  :)  वो भी दिन थे कभी भाई..अब जब पापा नहीं हैं तो उनके जाने के बाद वर्षों बाद मैं तुम्हे राखी बाँधूँगी....... सब होंगे... पर हमारे पापा होंगे अब कभी........ किसी भी त्यौहार पर :'( 
   पता है भाई... कल जब तुम्हे फोन किया मैंने और पापा को याद कर खूब रोई तुम भले ही मुझसे मीलों दूर थे... पर तुम्हारे इस कथन ने  " जीजी तुम चुप हो जाओ......... मैं हूँ न अब पापा नहीं हैं तो क्या मैं बड़ा   हूँ न अब... सब ठीक होगा धीरे धीरे... तुम परेशां मत हो"  | मुझे जो हिम्मत दी है न , वह हर उपहार से बड़ी है | 
 तुम सभी भाई सदा खुश रहो | तुम्हारी उम्र लम्बी हो यही दुआ करतीहूँ | 

निशा कुलश्रेष्ठ 





अटूट बंधन अंक -११ का कवर पेज

अटूट बंधन के सभी पाठकों को " रक्षाबंधन " की हार्दिक शुभकामनाएं

एक पाती भाई / बहन के नाम ( शिवानी जैन शर्मा )













"प्यार मुझे जो तुमसे है
वो इस धागे को कहना है
भूल न जाना प्यारे भैया
बाट देखती बहना है"
शादी के बाद कुछ जमा 2-3 बार ही भैया-भाभी जी की कलाई पर अपने हाथ से राखी बांध पाई हूं।
कुछ तो दूरी, कुछ पारिवारिक मजबूरी ...
आभारी हूं डाक विभाग और कोरियर कम्पनियों की जो हर साल सही वक्त पर मेरी राखियां उन तक पहुंचा देते हैं ।
आप सभी को रक्षाबंधन की बहुत बहुत शुभकामनाएं
😊
atoot bandhan

शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

एक पाती भाई/बहन के नाम ( कल्पना मिश्रा बाजपेयी )






प्रिय भाई !!
सदैव खुश रहो !!
कुशल से रहते हुए तुम्हारी कुशलता के लिए निरंतर प्रार्थनारत रहती हूँ ,ईश्वर तुम्हें लंबी आयु प्रदान करे तुम हमेशा की तरह मुस्कराते रहो। लंबे अंतराल के बाद आज अटूट-बंधन ने मुझे चिट्ठी लिखने के लिए फिर से मजबूर कर दिया पुराने दिन याद आ गए,जब डाकिये का इंतजार घर के सदस्य के जितना होता था उसकी साइकल अपने फाटक कि तरफ मुड़ी नहीं कि भाग कर माँ को सबसे पहले संदेश मैं ही देती थी और माँ भी अपना सारा काम छोड़ फाटक तक दौड़ी चली आती थी ।तेरी चिट्ठी कि खुशी में मुझे एक बिलकुल फ्री वाली हग्गी मिल जाती थी ।  
ये रिश्ते कैसे होते है भाई ?जब पास होते है तो उनकी अहमियत पता नहीं चलती दूर होते ही, अपनी चंगुल से छूटने नहीं देते। जमाने हो गए तुम्हारे पत्र को पढे हुए ,तुम्हें याद है ना भाई जब तुम हॉस्टल से पत्र लिखते थे तो पूरे एक हफ्ते तक तुम्हारा पत्र कभी माँ द्वारा कभी मेरे द्वारा पढ़ा जाता था । एक एक शब्द में तुम बोलते से दिखाई पड़ते थे, भला हो इन मोबाइल के चलन को मिठास ही खत्म कर दी रिश्तों की खैर ....................
 अच्छा चलो, बताओ हम सब का राज दुलारा अपने राज दुलारों के साथ कैसा है ?देख भाई सावन आ गया,संग ले आया है वही पुराने सावन की मीठी याद जब मैंने माँ की कढ़ाई वाली रेशमी धागों की कई नलकियों को गुच्छे में तब्दील कर दिया था ,राखी बनाने के चक्कर में तब माँ ने गुस्से होने के बजाय एक गीत गुनगुनाया.... तार न टूटे भाई बहन के प्यार का ................ हम दोनों को गले लगा कर माँ ने एक साथ हमारे माथे सूंघे थे ।
देख पढ़ते-पढ़ते रोना नहीं तेरी गीली आँखें बरदास्त नहीं होती है मुझसे, अच्छा बता ना मेरी राखी तुझे मिली या नहीं अगर राखी पहुँचने में देर हो जाए तो तू वही पुरानी राखी फिर से बांध लेना, वैसे भी उस राखी जितना खारापन अब कहाँ ......... J मैं यहाँ कान्हा जी के हाथ में राखी बांध दूँगी तेरे नाम की क्योंकि तू भी कृष्ण से कम नहीं है मेरे लिए .... .......मेरे प्यारे भाई !!! और हाँ मिठाई तू अपनी पसंद की खा लेना वो भी अपने पैसे से  हा हा हा चल अब तो हंस दे बहुत हो लिया भावुक हंसो हंसो हाँ ये हुई न बात शेरों वाली खुश रह J
पत्र के अंत में पुनः भाभी बच्चों और तुमको ढेरों शुभाशीष चिरंजीव रहो तुम सब इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी लेखनी को विराम दे रही हूँ ।

तुम्हारी दीदी 


            atoot bandhan

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एक पाती भाई /बहन के नाम ( संगीता सिंह भावना )















मेरे भाई,, 

आज मैं तुमसे शादी के करीब इक्कीस साल बाद कुछ कहना चाहती हूँ | कहने का मन तो कई बार हुआ पर लगा यह उचित अवसर नहीं है | भाई,,मैं जब-जब मायके आई तुमने मुझे बहुत मान  दिया | वैसे तो मैं तुमसे पाँच साल बड़ी हूँ पर तुमने हमेशा बड़े भाई का फर्ज निभाया ,,मेरी हर परेशानियों पर तुम्हें खुद से ज्यादा परेशान होते देखा और मेरी खुशी के हर क्षण मे तुम साथ रहे | मुझे आज भी अच्छी तरह से याद है ,जब मैं एक बार विदा होकर अपने पिया के घर को आ रही थी ,तुम मलेरिया-टाइफाइड दोनों से बुरी तरह से त्रस्त थे,तुम्हारा बुखार उतरता ही नहीं था और मेरे जाने का समय हो गया ,जब मैं तुमसे मिलने गई तो तुम चादर ओढ़कर सो रहे थे मैंने जैसे ही चादर उठाया तुम रो पड़े ,,मैं भी फफक पड़ी और सोचने लगी कि बेटियाँ इतनी मजबूर क्यों होती हैं .......??? मैं चाहकर भी तुम्हारे पास नहीं रूक पाई क्योंकि मेरी सास बीमार थी और मेरा वहाँ होना ज्यादा जरूरी था | 
भाई ,तुम्हें शायद याद होगा जब '' माँ'' बीमार थी ,तुमने मुझे फोन से बताया कि माँ बहुत बीमार है और मैं वाराणसी लेकर आ रहा हूँ | माँ जो कि मौत के बहुत करीब पहुँच गई थी ,ऐसा डाक्टरों का कहना था ,पर तुम तन-मन -धन से लगे रहे ,हम दोनों की ड्यूटी हॉस्पिटल में लगी थी पर तुम दोनों ड्यूटी निभाते और मुझे जबरन घर भेज देते | मैं घर आ तो जाती लेकिन मेरा मन मुझे अंदर ही अंदर परेशान करता क्योंकि तुम छोटे जो थे | मैं कभी-कभी सोचती कि भगवान न करे अगर माँ को कुछ हो गया तो तुम अकेले उस अंतहीन पीड़ा को कैसे संभालोगे पर मैं कर भी क्या सकती थी तुम तो मुझे वहाँ रुकने ही नहीं देते थे   और अंत में तुम्हारे हौसले की जीत हुई ,जिसका नतीजा है कि आज माँ हमारे साथ है | कहने को तो कई ऐसे मंजर आए जब तुमने बड़े भाई जैसा फर्ज अदा किया पर मैं शायद वह सब कहकर या याद दिलाकर तुम्हारे मन को दुखी नहीं करना चाहती क्योंकि मैं जानती हूँ जब तुम यह पत्र पढ़ रहे होगे तुम्हारे आँखों में आँसुओं की नमी तैर रही होगी |
जल्द ही रक्षा-बंधन आने वाला है ,मेरे भाई तुम सदा सलामत रहो और हाँ जो बात कहनी थी वो ये है कि तुम हर जन्म में मेरे भैया बनकर आना | 

                                                                 तुम्हारी बहना 
                                                                    संगीता 

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

एक पाती भाई /बहन के नाम (संजीत कुमार शुक्ला )











रक्षा बंधन का त्यौहार हो और बहनों के बारे में कुछ लिखना हो , तो  मन भावुक न हो ,ऐसा तो हो ही नहीं सकता | आज ऐसी ही कुछ मन : स्तिथि है | भाई -बहन का रिश्ता अनेकों रिश्तों को समेटे हुए है .... माँ ,बहन ,गुरु और दोस्त ... इस रिश्ते में जहाँ गुड की मिठास है , ईमली की खटास है और मिर्ची का तीखापन है | कुल मिला कर कम्पलीट फ़ूड पैकेज | बहन का रिश्ता एक ऐसा सेफ  रिश्ता है जहाँ आप जितना मर्जी रूठ जाइए ... सॉरी बोल कर मनाने बहने ही आएँगी | अगर खुदा न खास्ता बड़ी हों तो ... तो अपनी पाँचों अंगुलियाँ घी में | सौभाग्य से मेरी दोनों बहने मुझसे बड़ी हैं | पर ये पक्का है कि वो मुझे कभी बड़ा नहीं होने देंगीं | मुझे पूरा यकीं  है कि जब मेरे बाल सफ़ेद हो जायेंगे , कमर झुक जायेगी और हाथों में लाठी आ जायेंगी ( कुल मिलाकर हम एक रेस्पेक्ट्फुल कंडिशन में होंगे ) तब भी मेरी दोनों दीदीयाँ ये कहने से नहीं चुकेंगी | चुप हो जाओ अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है ,अक्ल कितनी है तुम्हे | और हम अपना हाई स्कूल सर्टिफिकेट लिए बैठे रह जायेंगे | खैर उस सजा में एक अपना मजा भी है | बचपन की कितनी बातें हैं | वो साथ साथ खेलना ,  लड़ाई - झगडे ,वो रूठना मनाना , और सबसे ज्यादा जब माँ कह देती कि तुम लोग बात -बात पर झगड़ पड़ते हो , अब आपस में बात मत करना , जो पहले बोलेगा उसी की पिटाई हो जायेगी | उफ़ ! माँ की ये सजा सबसे खतरनाक होती थी | कितनी बेचैनी होती थी बिना बोले | अपनी गलती नज़र आने लगती थी बेकार ही झगडा किया , ये चुप्पी बर्दाश्त नहीं होती | सीज फायर की घोषणा के बाद शुरू होता बोलने का सिलसिला | तब इतना बोलते कि ऐसा लगता जैसे जन्मों से नहीं बोले हों | जाने कितनी यादें चलचित्र की तरह चली आ रही हैं , विराम तो लगाना ही होगा |मेरी दोनों बहने दूर दूसरे शहरों में  हैं, आ नहीं पाएंगी | पर उनका भेजी हुई स्नेह से भीगी  राखी  मुझ तक पहुँच गयी है | ये अहसास ही तो हैं जो दूर रह कर भी हमें वायर लेस कनेक्शन से  गहरे जोड़े रखते हैं | फिर भी कभी -कभी मन वापस उस बचपन वाले रक्षा बंधन में लौट जाना चाहता है जब मैं राखी बंधवा कर  नेग के पैसे ले कर चिढाते हुए भागता था ... और पीछे -पीछे  बहने भागती थी ," मम्मी देखो मेरे पैसे दे नहीं रहा है " | लीजिये हम तो फिर भावुक हो गए | इसी भावुकता में हमें एक कविता याद आ गयी | पता नहीं किसने लिखी है ,पर है मेरे दिल के करीब ....................

कैसी भी हो एक
बहन होनी चाहिये..........।
.
बड़ी हो तो माँ- बाप से बचाने वाली.
छोटी हो तो हमारे पीठ पिछे छुपने वाली..........॥
.
बड़ी हो तो चुपचाप हमारे पाँकेट मे पैसे रखने वाली,
छोटी हो तो चुपचाप पैसे निकाल लेने वाली.........॥
.
छोटी हो या बड़ी,
छोटी- छोटी बातों पे लड़ने वाली,एक बहन होनी चाहिये.......॥

                                                                       
बड़ी हो तो ,गलती पे हमारे कान खींचने वाली,
छोटी हो तो अपनी गलती पर,साँरी भईया कहने
वाली...
खुद से ज्यादा हमे प्यार करने वाली एक बहन होनी चाहिये.... ....॥ "

                                                          आप सभी को रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनाएं| 

      संजीत कुमार शुक्ला 

अटूट बंधन

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एक पाती भाई /बहन के नाम ( संजय वर्मा )











रक्षा बंधन के दिन आते ही बड़ी बहन की बाते याद आती है |बचपन मे गर्मियों की छुट्टियों मे नाना -नानी के यहाँ जाते ही थे जो आजादी हमें नाना -नानी के यहाँ पर मिलती उसकी बात ही कुछ और रहती थी | दीदी बड़ी होने से उनका हमारे पर रोब रहता था वो हर बात समझाइश की देती , बड़ी दीदी होने के नाते हमें मानना पड़ती थी | सुबह -सुबह जब हम सोये रहते तब नानाजी बाजार से इमरती लाते और फूलों के गमलों की टहनियों पर इमरतियो को टांग देते थे , हमें उठाते और कहते की देखों गमले मे इमरती लगी है हमे उस समय इतनी भी समझ नहीं थी की भला इमरती भी लगती है क्या ? दीदी ,नानाजी की बात को समझ जाती और चुप रहती |हम बन जाते एक नंबर के बेवकूफ | दीदी मुझे "बेटी- बेटा" फिल्म का गीत गाकर सुनाती - "आज कल मे ढल गया दिन हुआ तमाम तू भी सोजा ......" और मै दीदी का गाना सुनकर जाने क्यों रोने लग जाता था | जब की उस गाने की मुझमे समझ भी नहीं थी | दीदी मेरी कमजोरी को समझ गई जब भी मै मस्ती करता दीदी मुझे डाटने के बजाए गाना सूना देती और मै रोने लग जाता | नाना -नानी अब नहीं रहे | समय बीतता गया और हम भी बड़े हो गये मगर यादे बड़ी नहीं हो पाई | दीदी की शादी हो जाने से वो अब हमारे साथ नहीं है किन्तु बचपन की यादें तो याद आती ही है | रक्षा बंधन पर जब दीदी राखी मेरे लिए भेजती या खुद आती तो मुझे रुलाने वाला गाने की पंक्तिया गा कर सुनाती या लिख कर अवश्य भेजती और मै बचपन की दुनिया मे वापस चले जाता | और जब कभी रेडियो या टी.वी. पर गाना बजता/दिखता है तो आज भी मेरी आँखों मे बचपन की यादों के आंसू डबडबाने लग जाते है | ख़ुशी के त्यौहार पर रंग बिरंगी राखी अपने हाथो मे बंधवाकर , माथे पर तिलक लगवाकर ,मिठाई एक दुसरे को खिलाकर बहन की सहायता करने का संकल्प लेते है तो लगने लगता है कि पावन त्यौहार रक्षा बंधन और भी निखर गया है और मन बचपन की यादों को भी फिर से संजोने लग गया है|
संजय वर्मा "दृष्टि " १२५ ,शहीद भगत सिंग मार्ग मनावर (धार )454446

atoot bandhan

बुधवार, 26 अगस्त 2015

एक पाती भाई /बहन के नाम (किरण सिंह )










चिट्ठी भाई के नाम
***************
भैया
पिछले रक्षाबंधन पर
जैसे ही मैंने नैहर की
चौकठ पर
रखा पांव
बड़े नेह से भौजाई
लिए खड़ी थी हांथो में
थाल
सजाकर
जुड़ा हमारा
हॄदय
खुशी से आया
नयन भर
हमने
दिया आशीष
मन भर
सजा रहे भाई का
आंगन
भरा रहे भाभी का
आँचल
रहे अखंड
सौभाग्य
हमारा
नैहर रहे
आबाद
भैया तुम रखना भाभी का
खयाल
कभी मत होने देना
उदास
भाभी तेरे घर की
लक्ष्मी है
और तुम हो
घर के सम्राट
माँ भी हैं तेरे साथ
उन्हें भी देना मान
सम्मान
सिर्फ़ तुमसे है
इतना आस
पापा का बढ़ाना
नाम
*********************
©कॉपीराइट किरण सिंह


atoot bandhan

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कभी कभी आप को लोगों से उम्मीद छोड़ देनी पड़ती है, इसलिए नहीं कि आप परवाह नहीं करते, बल्कि इसलिए कि वे परवाह नहीं करते.
यदि आप मानसिक शांति के बदले में साम्राज्य भी प्राप्त करते हैं तो भी आप पराजित ही हैं.
अपनी खराब आदतों पर जीत हासिल करने के समान जीवन में कोई और आनन्द नहीं होता है.
आज की शुरुआत कल के टूटे टुकड़ों से न करें.

एक पाती भाई /बहन के नाम ( अर्चना नायडू )







''रक्षा -बंधन ; एक भावान्जलि  ''

एक थी , छोटी सी अल्हड़  मासूम बहना। … 
छोड़ आई अपना बचपन ,तेरे अँगना ,
बारिश की बूंदो सी  पावन स्मृतियाँ ,
 नादाँ आँखे उसकी  उन्मुक्त  भोली हँसी, ....
क्या भैया !   तुमने उसे देखा है कही ,………… !

छोटी सी फ्राक की छोटी सी जेब में ,
पांच पैसे की टाफी की छीना -छपटी  में ,
मुँह फूलती उसकी ,शैतानी हरकते 
स्लेट के  अ आ  के  बीच ,मीठी शरारते 
क्या ?… तुम उसे याद करते हो कभी ,.... !

दिनभर, अपनी कानी गुड़िया संग खेलती ,
माँ की गोद  में पालथी मारे बैठती ,
,जहा दो चोटियों संग माँ गूंथती ,
हिदायतों भरी दुनियादारी की बातें ,
बोलो भैया ,!वो मंजर भूल तो नहीं जाओगे कभी.… ,!

आज तेरे उसी घर - आँगन में,
ठहर जाये ,वैसी ही मुस्कानों की कतारे ,
हंसी -ठहाकों की लम्बी महफिले ,
हम भाई-बहनो के यादो से भींगी बातें ,
और ख़त्म ना हो खुशियो की ये सौगाते कभी भी,…  !

राखी के सतरंगे धागो में गूँथे हुए अरमान ,
तुमने दिए ,मेरे सपनो को अनोखे रंग ,
और ख्वाईशों को दिए सुनहरे पंख ,
और अब सफेद होते बालो के संग ,
स्नेह की रंगत कम न होने देना कभी.… !

माथे पर तिलक सजाकर ,नेह डोर बांधकर,
भैया मेरे ,राखी के बंधन को निभाना ,
छोटी बहन को ना भुलाना ,
इस बिसरे गीत के संग ,
अपनी आँखे नम न करना कभी   .... !

 आँखों में , मीठी यादो में बसाये रखना,
इस पगली बहना का पगला सा प्यार  ,
यही याद दिलाने आता है एक दिन ,
बूंदो से भींगा यह प्यारा  त्यौहार,
बस ,भैया तुम मुझे भूला ना देना, कभी। ....  '''

ई. अर्चना नायडू 
जबलपुर 

अटूट बंधन

मंगलवार, 25 अगस्त 2015

एक पाती भाई/बहन के नाम ( डॉ भारती वर्मा बौड़ाई )

एक पाती भाई /बहन के नाम (वंदना बाजपेयी )











भैया ,
कितना समय हो गया है तुमको देखे हुए | पर बचपन की सारी बातें सारी शरारतें अभी भी जेहन में ताज़ा है | वो तुम्हारा माँ की डांट से बचने के लिए मेरे पीछे छुप जाना| वो मेज के नीचे घर बना कर खेलना | और वो लड़ाई भी जिसमें तुमने मेरी सबसे प्यारी गुड़ियाँ तोड़ दी थी | कितना रोई थी मैं | पूरा दिन बात नहीं की थी तुमसे | तुम भी बस टुकुर -टुकुर ताकते रहे थे "सॉरी भी नहीं बोला था | बहुत नाराज़ थी मैं तुमसे | पर सारी नाराजगी दूर हो गयी जब सोने के समय बिस्तर पर गयी तो तकिय्रे के नीचे ढेर सारी टोफियाँ व् रजाई खोली तो उसकी परतों में सॉरी की ढेर सारी पर्चियाँ | और बीच में एक रोती हुई लड़की का कार्टून | कितना हँसी थी मैं | तभी बीच में तुम आ गए अपराधी की तरह हाथ जोड़े हुए | कैसे न मॉफ करती | बहन में माँ जो छिपी होती है | फिर अगले पल झगडा .......... कार्टून में मेरी ही शक्ल क्यों बनायी, अपनी क्यों नहीं तुम कौन सा बड़े अच्छे दिखते हो|| वो तुम्हारा एग्जाम जब तुम हाथ झाड कर खड़े हो गए " दीदी कुछ नहीं आता और मैं रात भर तुम्हे पढ़ाती रही| कितनी बार मूर्ख आलसी कहा था तुम्हे | तुम चुप-चाप डांट खाते रहे | ऐंठना नहीं गलती भी तुम्हारी ही थी | पर जब रिजल्ट में पूरे नंबर आये तो आँखे छलक गयी थी मेरी | " राजा भैया , कितना होशियार है , एक दिन पढ़ कर ही पूरे नंबर ले आया | गदगद हो गयी थी मैं जब तुमने झट से पैर छू कर कहा था " दीदी ये तुम्हारी ही मेहनत का परिणाम है | केवल राखी के धागे ही नहीं | यादों के कितने धागे समेटने हैं | अबकी बरस .......... राखी बंधवाने आयोगे न भैया
वंदना बाजपेयी 



एक पाती भाई /बहन के नाम (डॉली अग्रवाल )









जाने कितने जज्बात को 
समेटे है , स्नेह की ये डोर 
वो संग हँसना - खिलखिलाना 
नोक -झोंक , रूठना मनाना 
वो शरारत भरी अठखेलियां 
भईया बहुत कुछ याद आता है
एक तुम्हारी याद के साथ ||

डॉली अग्रवाल 


अटूट बंधन

सोमवार, 24 अगस्त 2015

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एक पाती भाई /बहन के नाम ( विभा रानी श्रीवास्तव )








पूजनीय भैया
                   सादर प्रणाम
यहाँ सब कुशल है । आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है आप लोग भी सकुशल होंगे ।
                                 दोनों भाभी व बाबू से बात हुई तो मैं अति उत्साह में बोली कि इस बार मैं किसी को राखी नहीं भेजूंगी ।। शनिवार दिन है ; बैंक आधे दिन का होता है तो राखी के कारण वो आधा दिन भी छुट्टी में , छोटे भैया की छुट्टी । आप इसी साल रिटायर्ड किये हैं तो छुट्टी ही छुट्टी । बाबू टूर ले लेगा ; दूसरे दिन रविवार तो किसी को कोई समस्या नहीं , आसानी से आना हो सकता है ।
                                जब से होश सम्भाली हूँ ; राखी और जन्मदिन हर्षोल्लास से मनाती आई हूँ लेकिन दोनों एक दिन कभी नहीं मनाई , पड़ा ही नहीं न किसी साल एक दिन ही । इस साल एक दिन पड़ने से अति उत्साहित हूँ ; एकदम छोटी सी बेबी फिर जीने लगी है , उम्र का क्या वो तो भूलने में लगी है ।
                                                    जैसे जैसे दिन नजदीक आने लगे सोच बचपने पर हावी होने लगे ; अगले पल का ठिकाना नहीं ; सावन का मौसम तबीयत किसी की खराब हो सकती है । ये तो जबरदस्ती हो गई न विवश करना ; वो भी इमोशनल ब्लैकमेलिंग । ब्याही बहना का एक हद होता है , भाभी का कुछ प्रोग्राम हो सकता है । किसी कारणवश कोई भाई ना आ पाये और मैं राखी भी न भेजूं तो तब अफसोस का क्या फायदा होगा ।
                                       राखी भेज रही हूँ लेकिन नाउम्मीद नहीं हूँ । प्रतीक्षा तो नैनों को रहती है , आस में दिल होता है । कमबख्त दिमाग बहुत सोचता है ।
            
                   व्यग्र बहना
                ले अक्षत व डोरी
                   ताके ड्योढ़ी
सबको यथायोग्य प्रणामाशीष बोल देंगे मेरी ओर से
                                आशीष की आकांक्षी
                        आपकी छोटी बहना
                               बेबी

अटूट बंधन

रविवार, 23 अगस्त 2015

हाय रे ! प्याज ....... वंदना बाजपेयी



हैलो भईया।

हाल ना पूछो मेरा भईया
कैसे तुम्हें बताऊँ
सब्जी मंडी में खड़ी हुई हूँ
चक्कर खा गिर ना जाऊं।
ठेले में सब्जी को देखकर
आहें मैं भरती हूँ
बचपन के वो प्याज भरे दिन
याद किया करती हूँ।

अस्सी  रूपये किलो प्याज हो गया
एक सौ बीस  में सेब है आता
इस दोनों में हो गया जैसे
भाई - बहन का नाता।
तन्खवाह तो बढती है भैया पर
खर्च और बढ़ जाता
इसीलिए तो आम आदमी
आम ही रह जाता।

सही कह गए ऋषि - मुनि 
वेद  ऋचा में गाकर
धर्म भ्रष्ट मत करना अपना
प्याज लहसुन खाकर।
दूरदर्शी थे वो पहले से ही 
सब जानते थे
प्याज की कीमत के भविष्य को
सतयुग में भी पहचानते थे।

अब पछताती हूँ क्यों मैंने
बात ना उनकी मानी
जाने कैसे शुरू हुई
ये प्याज से प्रेम कहानी।
ऐसा धोखा देगा मुझको
समझ नहीं मैं पायी
पहले काटने पर था रुलाता
अब देख आँख भर आई।

अबकी भईया रक्षा बंधन में
जब मेरे घर आना
तोहफे  के बदले साथ में अपने
कुछ प्याज लेते आना।
दो मुझको आशीर्वाद की
रोज़ प्याज मैं खाऊं
प्याज पकोड़े, प्याज की चटनी
प्याज़ की दाल पकाऊं।

अब रखती हूँ  भैया मुझको
वापस घर भी है जाना
खाली थैले से निकाल कर
कुछ है आज पकाना।

वंदना बाजपेयी 


शनिवार, 22 अगस्त 2015

आधी आबादी :कितनी कैद कितनी आज़ाद (उपासना सियाग )







औरत होना ही अपने आप में एक ताकत है ..



          नारी विमर्श , नारी -चिंतन या नारी की चिंता करते हुए लेखन , हमेशा से ही  होड़   का विषय रहा है। हर किसी को चिंता रहती है नारी के उत्थान की ,उसकी प्रगति की .पर कोई पुरुष या मैं कहूँगी कोई नारी भी , अपने दिल पर हाथ रख कर बताये और सच ही बताये कि  क्या कोई भी किसी को अपने से आगे  बढ़ते देख सकता है। यहाँ हर कोई प्रतियोगी है. फिर सिर्फ नारी की बात क्यूँ की जाये !
          एक औरत अपने जीवन में कितने रूप धारण करती है, बेटी से ले कर दादी तक। उसका हर रूप शक्ति स्वरूप ही है। बस कमी है तो अपने अन्दर की शक्ति को पहचानने की। ना जाने क्यूँ वह कस्तूरी मृग की तरह इधर -उधर भागती -भटकती रहती है। जबकि  खुशबु रूपी ताकत तो स्वयम उसमे ही समाहित है। सदियाँ गवाह है जब भी नारी ने प्रतिरोध किया है तो उसे न्याय अवश्य ही मिला है। 
      सबसे पहले तो मुझे " महिला-दिवस " मनाने  पर ही आपत्ति है. क्यूँ बताया जाये के नारी कमजोर है  और उसके लिए कुछ किया जाये। कुछ विद्वान जन का मत होता है  , एक महिला जो विभिन्न रूप में होती है उसका आभार प्रकट करने के लिए ही यह दिन मनाया जाता है।  ऐसी मानसिकता पर मुझे हंसी आती है . एक दिन आभार और बाकी साल क्या ....? फिर तो यह शहरी   क्षेत्रों तक ही सीमित हो कर ही रहता है।  मैं स्वयं ग्रामीण क्षेत्र से हूँ। एक अपने परिवेश की महिला से कह बैठी , " आज तो महिला दिवस है ...!" वो हंस पड़ी और बोली , " अच्छा बाकी दिन हमारे नहीं होते क्या...? " यह भी सोचने वाली बात है के बाकी दिन नारी, नारी ही तो है ...!
         हमारे आस -पास नज़र दौडाएं तो बहुत सारी महिलाये दिख जाएगी ,मैं यहाँ आधुनिकाओं की बात नहीं कर रही हूँ . मैं बात कर रही हूँ ग्रामीण क्षेत्रीय या मजदूर -वर्ग की महिलाओं की , जो रोज़ ना जाने कितनी चिंताए ले कर सोती है और सुबह उठते ही कल की चिंता भूल कर आने वाले कल की चिंता में जुट जाती है। वह  आज में तो जीती ही नहीं। जिस दिन वह अपने , आज की चिंता करेगी वही दिन उसके लिए होगा।  उसके लिए उसका देश , उसका घर और उसके देश का प्रधानमंत्री उसका पति ही होता है।  और विपक्ष उसके ससुराल वाले ही बस ! अब ऐसे महिला के लिए क्या चिंता की जाये जब उसे ही पता नहीं उसके लिए क्या सही है या गलत।  उसे अपने बुनियादी हकों के बारे में भी पता नहीं है बस फ़र्ज़ के नाम पर घिसी -पिटी   मान्यताएं ही निभाए जा रही है। यहाँ  तो हम बात कर सकते हैं कि ये  महिलाएं अशिक्षित है और उन्हें अपने बुनियादी हको के बारे में कोई भी जानकारी ही नहीं है।  बस जानवरों की तरह हांकी ही जा रही है। 
   लेकिन शहर की आधुनिक और उच्च -शिक्षित महिलाओं की बात की जाये तो उनको अपने हक़ के बार में तो पता चल गया है लेकिन अपने फ़र्ज़ ही भूले जा रही है।  वे  विदेशी संस्कृति की ओर  बढती जा रही है।  बढती महत्वकांक्षाएँ और आगे बढ़ने की होड़ में ये अपना स्त्रीत्व और कभी जान तक गवां बैठती है ऐसे बहुत सारे उदहारण है हमारे सामने।  
     मुझे दोनों ही क्षेत्रो की नारियों से शिकायत है।  दोनों को ही  पुरुष रूपी मसीहा का  इंतजार रहता है कि कोई आएगा और उसका उद्धार करेगा।  पंजाबी में एक कहावत का भावार्थ है " जिसने राजा महाराजाओं को और महान संतो को जन्म दिया है उसे बुरा किस लिए कहें !" और यह सच भी है। 
     कहा जाता है नारी जैसा कठोर नहीं और नारी जैसा कोई नरम नहीं है. तो वह किसलिए अपनी शक्ति भूल गई ! पुरुष को वह जन्म देती है तो क्यूँ  नहीं अपने अनुरूप  उसे ढाल देती. किसलिए वह पुरुष कि सत्ता के आगे झुक जाती है। 
         जब तक एक नारी अपनी स्वभावगत ईर्ष्या से मुक्त नहीं होगी . तब तक वह आगे बढ़ ही नहीं सकती . चाहे परिवार हो या कोई कार्य क्षेत्र महिलाये आगे बढती महिलाओं को रोकने में एक महिला ही बाधा डालती है . पुरुष तो सिर्फ मौके का फायदा ही उठाता है। 
औरतें, औरतों की दुश्मन
होती है .
ये शब्द तो पुरुषों के ही है ,बस
कहलवाया गया है औरतों के
मुहं से .......
...
 और कहला कर उनके दिमाग मे
बैठा दिया गया है ....

लेकिन औरतें ,औरतों की दुश्मन

कब हुई है भला ......

जितना वो एक दूसरी को समझ सकती 

है ,उतना और कौन समझता है .......

उसकी उदासी में ,तकलीफ में ,

उसके दुःख में कौन मरहम लगाती है ....



  मैं यहाँ पुरुषों की बात नहीं करुगी कि उन्होंने औरतों पर कितने जुल्म किये और क्यूँ और कैसे. 

बल्कि मैं तो कहूँगी , औरतों  ने सहन ही क्यूँ किये. यह ठीक है , पुरुष और स्त्री कि शारीरिक क्षमता अलग -

अलग है. आत्म बल और बुद्धि बल में किसी भी पुरुष सेए स्त्री कहीं भी कमतर नहीं  फिर उसने क्यूँ एक 

पुरुष को केन्द्रित कर आपस में अपने स्वरूप को मिटाने  को तुली है। 

     मुझे विद्वान  जनों के एक कथन  पर हंसी आती है और हैरानी भी होती है , जब वे कहते है ," समाज में 

ऐसी व्यवस्था हो जिससे स्त्रियों का स्तर सुधरे." समाज सिर्फ पुरुषों से ही तो नहीं बनता .यहाँ भी तो औरतों 

की  भागीदारी होती है।  फिर  वे क्यूँ पुरुषों पर ही छोड़ देती है कि  उनके बारे में फैसला ले। 

      मेरे विचार से शुरुआत हर नारी को अपने ही घर से करनी होगी।  उसे ही अपने घर बेटी को , उसका 

हक़ और फ़र्ज़ दोनों याद दिलाने के साथ -साथ उसे अपने मान -सम्मान कि रक्षा करना भी सिखाये। 

अपने बेटों को नारी जाति का सम्मान करना सिखाये। 

बात जरा सी है और
 समझ नहीं आती ...
जब एक माँ अपनी 
बेटी को दुपट्टा में इज्ज़त 
 सँभालने का तरीका
 समझाती है ,
तो वह अपने बेटे को
राह चलती किसी की
बेटी की इज्ज़त करना
क्यूँ नहीं सिखलाती ....
       कई बार हम देखते ( टीवी में ) और सुनते है ,रात को कोई लड़की  या महिला   पर  जुल्म होने की  बात को।  तो सबसे पहले यही ख्याल आता है और कह भी बैठते हैं कि वह  इतनी देर रात गए वहां क्या लेने गयी थी।  तब मेरे जहन में यही सवाल उठता है , अगर किसी अत्याचारी पुरुष के परिवार की कोई  सदस्य या कोई उनके जानकारी की महिला या लड़की होती  तो क्या वह उसके साथ भी ऐसा ही दुराचार करता ?क्यूँ कि कहीं ना कही पुरुष में एक पाशविक प्रवृत्ति भी होती है जो उसे एक नारी को दमन करने पर उकसाती है। उसे , एक स्त्री जो कि माँ होती है अपने संस्कारों से दमित कर सकती है।  अब ये भी कहा जा सकता है के कोई भी स्त्री क्या अपने बेटे को दुराचारी बनाती है ...!  कोई भी माँ अपने बेटे को गलत शिक्षा तो नहीं देती। फिर यह सब नारी के प्रति बढ़ता अत्याचार क्यूँ हो रहा है. ! क्यूँ कि वह ना अपना सम्मान करती है ना ही और ना ही किसी अन्य स्त्री का मान करना सिखाती है !
      बात वहीँ घूम फिर कर आ जाती है कि जो कस्तूरी रूपी अपनी शक्ति  वह अपने में छुपा कर  एक  तृषित मृग की  भाँती फिरती है, वह और कहीं नहीं है, उसी के अन्दर ही है।  उसे सिर्फ वह ही ढूंढ़ सकती है।  सरकार हो या कोई संस्थाए कोई भी क्या करेगी जब नारी स्वयं ही जागरूक नहीं होगी। उसे आत्म -केन्द्रित होने से बचना चाहिए। अस आवाज़ उठा कर देखना चाहिए। जरूरत है बस एक जज्बे की !
नारी शायद तुम हारने लगी हो
क्या सच में अपने को अबला
ही समझने लगी हो ........
ईश्वर ने तुम्हें  अबला नहीं
सृजना ही बनाया था ,
तुम यह कैसी कुसंस्कारी ,
खरपतवार
का सृजन करने लगी हो ,
जो तुम्हारी ही लगाई ,
फूलों कि क्यारी का
विनाश कर रही है....
तुम क्यूँ अपना ही
स्वरूप अपने ही हाथों से
मिटाने लगी हो ....
नारी जो कभी ना हारी थी , अब  हारने लगी हो , शायद ...!


उपासना सियाग 

atoot bandhan

शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

आधी आबादी कितनी कैद कितनी आज़ाद







जरूरी है सम्मान 
कैद उतनी ही जितना कि कोई एक पंछी खुले पिंजरे मे हो  मगर उसके पंख काट दिए गए हों | 
या एक विस्तृत विषय है जिसपर संक्षिप्त में कहना नाइंसाफी होगी | माँ की कोख में जब कोई बच्चा  होता है,  तो अमूमन उसे नहीं पता होता की उसके गर्भ में पलने वाला बच्चा बेटा है या बेटी | जन्म लेते ही आधार बन जाता है परिवार की खुशियों का एक बेटे का जन्म लेना | और मैं कहूँगी कि ब भी हम कहीं न कहीं पाते हैं कि बेटियों के जन्मते ही परिवार मायूस सा हो जाता है | 
बेटियां बड़ी होती हैं स्कुल जाती हैं तमाम सारे परिवार से मिले निर्देशों के साथ | मध्यम वर्गीय परिवारों में अक्सर जो बेटियों के साथ जुडी हर घटना को उंच नीच से तोलते हैं | किससे  बात करोगी,  किस से मिलोगी,  किसके साथ उठो बैठोगी,  के साथ उसकी दिशा और दशा शुरू से बाँध  दी जाती है |इसमें उनका भी दोष नहीं , ये समाज शुरू से पुरुष प्रधान समाज रहा है सो हर क्षेत्र में दबदबा  पुरुष ने ही रखा है | 
मुझे हैरानी होती है तब , जब अक्सर मेरे आसपास के पुरुष ये सवाल करते हैं कि हर बड़े काम को परुष ही निभा पाते हैं | जैसे बड़ी दावतें हों तो वहां खाना पुरुष ही पकाते हैं | टेलर्स अच्छे पुरुष ही होते हैं | स्पोर्ट्स में पुरुष , अंतरिक्ष में पुरुष , आसमान में पुरुष , ...  बसों में ड्राईवर पुरुष  बगैरह बगैरह  आफिसों में भी .... | यहाँ तक कि मंदिरों में पुजारी भी पुरुष | 
 मैं उन्हें बताना चाहती हूँ कि इन सभी क्षेत्रों में जहाँ भी महिलाओं को मौके मिले हैं उन्होंने अपने अस्तित्व को जताया है | चाहे वह कोई भी क्षेत्र हो कॉरपोरेट्स ऑफिस  .... मेट्रो , स्पोर्ट्स ., अन्तरिक्ष ,...  कुकिंग . पहाड़ों पर चढ़ना ..... जहाँ भी अवसर मिले हैं स्त्री  ने अपने आपको साबित  किया है  | 
मुझे लगता है हमें सोच बदलने की जरूरत है बस | जहाँ बचपन से बेटियों को नसीहतें दी  जाती हैं संस्कार दिए जाते हैं उसी तरह बेटों को भी सिखाया जाए कम से कम स्त्री का सम्मान करना  तो अवश्य | जिस तरह बेटों को निडरता का पाठ पढाया जाता है उसी तरह बेटियों को भी निडर बनाया जाए | 
जिस तरह बेटियों का सम्मान उनकी अस्मिता शुचिता को उनकी देह से जोड़ कर देखा जाता है | उसी तरह बेटों को उनका मान रखना सिखाया जाना चाहिए | 
ये क्या कि प्रताड़ित पुरुष करे और मान सम्मान  एक स्त्री का चला जाए | बलात्कार किसी स्त्री का हो मुंह स्त्री ही छुपाये . क्यों नहीं सिखाया जाता किसी बेटी को सर उठा कर जीना ?? क्यों नहीं सिखाया जाता बेटों को आधी आबादी को सम्मान देना ?? 

निशा कुलश्रेष्ठ