शनिवार, 31 अक्तूबर 2015

धर्म में घृणा के लिए स्थान नहीं

एक मुझे स्मरण आता है कि एक आदमी एक घर में शब्दकोश बेचने के लिए गया है, डिक्शनरी बेच रहा है। घर की गृहिणी ने उसे टालने को कहा है कि शब्दकोश हमारे घर में है, वह सामने टेबल पर रखा है। हमें कोई और जरूरत नहीं है। लेकिन उस आदमी ने कहा कि देवी जी, क्षमा करें! वह शब्दकोश नहीं है, वह कोई धर्मग्रंथ मालूम होता है।

जैसा खाए अन्न वैसा हो मन

महाभारत का युद्ध चल रहा था। भीष्मपितामह अर्जुन के  बाणों से घायल हो बाणों से ही बनी हुई एक शय्या पर पड़े हुए थे।  कौरव और पांडव दल के लोग प्रतिदिन उनसे मिलना जाया करते थे।
एक दिन का प्रसंग है कि पांचों भाई और द्रौपदी चारो तरफ बैठे थे और पितामह उन्हें उपदेश दे रहे थे।  सभी श्रद्धापूर्वक उनके उपदेशों को सुन रहे थे कि अचानक द्रौपदी खिलखिलाकर कर हंस पड़ी। पितामह इस हरकत से बहुत आहात हो गए और उपदेश देना बंद कर दिया।  पांचों पांडवों  भी द्रौपदी के इस व्य्वहार से आश्चर्यचकित थे।  सभी बिलकुल  शांत हो गए।  कुछ क्षणोपरांत पितामह बोले , ” पुत्री

शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2015

करवाचौथ का उपवास



करवाचौथ ...
क्या ये उपवास
लोटा सकता है ?
उस विधवा के मांग का सिंदूर
जो कुछ दिन पहले
सीमा के पास रह रहे
उस नवेली दुल्हन की
सितारो वाली चुंदङी
उङा कर ले गये
क्या ये उपवास

अटल रहे सुहाग : करवा चौथ : कविता -इंजी .आशा शर्मा




गठबंधन की पावन गाँठों से यूँ खुद को बाँध लिया
मन वचनों से और कर्म से तन को मन साध लिया

याचक बन कर मात-पिता से सुता दान में माँगी थी
तेरे उसी भरोसे पर मैंने वो देहरी लाँघी थी

तू सूरज मैं धरा दीवानी अनुगामिनी संग चली
हँसी तुम्हारी भोर सुहानी तू रूठे तो साँझ ढली

चूड़ी, बिंदिया, कुमकुम, मेहँदी तुमसे सब सिंगार सजे
सांस की सरगम, धुन धड़कन की तुम झांझरिया संग बजे

माँग सजाई अरमानों से आँचल में ममता भर दी
आधा अंग बना कर अपना कमी सभी पूरी कर दी

तेरे साथ ही पूरा आँखों का हर सपन सलोना हो
प्रेम जोत से रोशन मेरे मन का कोना-कोना हो

चातक को केवल स्वाति की बूँदों का अभ्यास है
मेरे मन को भी बस तेरी स्नेह-सुधा की प्यास है

मेरी किन्हीं दुआओं से गर उम्र सुहाग पर चढ़ती है
पूजा और अर्चना से सांसों की डोरी बढ़ती है

एक नहीं सौ बार तुम्हारी खातिर मैं उपवास करूँ
माँनूँ सारी परम्परा हर रीति पर विश्वास करूँ

करवा चौथ का चाँद गवाही देगा अपने प्यार की
इस निश्छल से नाते पर ही नींव टिकी संसार की



इंजी. आशा शर्मा

गुरुवार, 29 अक्तूबर 2015

अटल रहे सुहाग : सातवीं कड़ी - रोचिका शर्मा की कवितायें



"एक झलक चंदा की "
, बदली तुम न बनो चिलमन
हो जाने दो दीदार
दिख जाने दो एक झलक
उस स्वर्णिम सजीले चाँद की
दे दूं मैं अरग और
माँग लूँ  संग
मेरे प्रिय का
यूँ तो हर दिन माँग लेती हूँ

बुधवार, 28 अक्तूबर 2015

अटल रहे सुहाग : सास -बहू और चलनी : लघुकथा : संजय वर्मा

                         
करवाचौथ के दिन पत्नी सज धज के पति का इंतजार कर रही  शाम को घर आएंगे तो  छत पर जाकर चलनी में चाँद /पति  का चेहरा देखूँगी । पत्नी ने गेहूँ की कोठी मे से धीरे से चलनी निकाल कर छत पर रख दी थी । चूँकि गांव में पर्दा प्रथा एवं सास-ससुर  से ज्यादातर काम सलाह लेकर ही करना होता है संयुक्त परिवार में सब  का ध्यान भी  होता है । और आँखों में शर्म का  पर्दा भी   होता है { पति को कोई कार्य के लिए बुलाना हो तो पायल ,चूड़ियों की खनक के इशारों  ,या खांस  कर ,या बच्चों के जरिये ही खबर देना होती । पति घर आये तो साहित्यकार के हिसाब से वो पत्नी से मिले तो कविता के रूप में करवा चौथ पे पत्नी को कविता की लाइन सुनाने लगे -"आकाश की आँखों में /रातों का सूरमा /सितारों की गलियों में /गुजरते रहे मेहमां/ मचलते हुए चाँद

अटल रहे सुहाग : छठी कड़ी : मैं आ रहा हूँ.....डॉ भारती वर्मा बौड़ाई



       मैं सदा उन अंकल-आंटी को साथ-साथ देखा करती थी। सब्जी लानी हो, डॉक्टर के पास जाना हो, पोस्टऑफिस, बैंक, बाज़ार जाना हो या अपनी बेटी के यहाँ जाना हो......हर जगह दोनों साथ जाते थे।उन्हें देख कर लगता था मानो एक प्राण दो शरीर हों। आज के भौतिकवादी समय को देखते हुए विश्वास नहीं होता था कि वृद्धावस्था में भी एक-दूसरे के प्रति इतना समर्पित प्रेम हो सकता है।

मंगलवार, 27 अक्तूबर 2015

प्रेरक कथा : क्या आप अपना कूड़ा दूसरों पर डालते हैं ?

एक  दिन  एक  आदमी  टैक्सी  से  एअरपोर्ट  जा  रहा  था . टैक्सी  वाला  कुछ  गुनगुनाते  हुए  बड़े  इत्मीनान  से  गाड़ी  चला  रहा  था कि अचानक  एक  दूसरी  कार  पार्किंग  से  निकल  कर  रोड  पर    गयी  , टैक्सी  वाले  ने  तेजी  से  ब्रेक  लगायी , गाड़ी  स्किड  करने  लगी  और  बस  एक -आध  इंच  से  सामने  वाली  कार  से  लड़ते -लड़ते  बची .
आदमी  ने  सोचा कि टैक्सी  वाला  कार  वाले  को

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अटल रहे सुहाग : पांचवीं कड़ी - कवितायें ,किरण सिंह




                      करवाचौथ पर विशेष " अटल रहे सुहाग " में  आइये आज पढ़ते हैं किरण सिंह की कवितायें ........
आसमाँ से चाँद
आसमाँ से चाँद फिर
लगा रहा है कक्षा
देना है आज हमें
धैर्य की परीक्षा
सोलह श्रॄंगार कर
व्रत उपवास कर

अटल रहे सुहाग : चौथी कड़ी : कहानी---" सरप्राइज "


रिया,,,, ,,, रिया,,,,,, बेटा सारा सामान रख लिया न पूजा का, बेटा सब इकट्ठा करो एक जगह ,,,,, थाली में, ,, तुमको जाना है न ,, पार्क में पूजा के वास्ते, ,,, हाँ , माँ मैने सब कुछ रख लिया, ,, माँ, आप कितनी अच्छी हो,,, सारी चीजों का ध्यान रखती हो,,,,,, ये कहते-कहते रिया माँ से लिपट गई थी । अनुराधा जो रिया की सास थीं, ,, वाकई में सास हो तो अनुराधा जैसी, ,,,,,,,।कितना ध्यान रखती थी रिया का,,,, क्योंकि बेटा सिद्धार्थ बाहर नेवी में जाॅव करता था, और नेवी वाले हर करवाचौथ पर पास में ही हो , ये संभव नहीं था ।अनुराधा इस व्रत की भावना को बहुत अच्छी तरह पहचानती थी,,,, इसी कारण, उसका उसका व्यवहार भी रिया के लिए पूर्ण समर्पित था ,,,।रिया उसकी बहू ही नहीं, ,,, एक बेटी, सहेली और हर सुख दुःख की साथी थी ,,,, आज दो दिनों से उसकी तैयारी करवा रहीं थी अनुराधा, ,।अच्छे से अच्छे मेहंदी वाले से मेहंदी लगवाना तो उनका सबसे बडा शौक था

सोमवार, 26 अक्तूबर 2015

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कुछ अनसुलझे रहस्य : ओशो


लुकमान के बाबत कहानी है कि वह एक-एक पौधे के पास जाकर पुछता था कि बता किस-किस बीमारी में तू काम आ सकता है। अब यह कहानी बिलकुल फिजूल हो गयी आज….कोई पौधे सेक्‍या मतलब इस बात का। लेकिन अभी पचास साल पहले तक हम नहीं मानते थे कि पौधे में प्राण हैइधर पचास साल में विज्ञान ने स्‍वीकार कियापौधे में प्राण है। इधर तीस साल पहले तक हम नहीं मानते थे कि पौधा श्‍वास लेता है। इधर तीस साल से हमने स्‍वीकार किया है कि पौधा श्‍वास लेता है। अभी पिछले पंद्रह साल तक हम नहीं मानते थे कि पौधा फील (अनुभव) करता है। अभी पंद्रह साल में हमने स्‍वीकार किया है कि पौधा अनुभूति भी करता है।

अटल रहे सुहाग : ( लघुकथा -व्रत ) शशि बंसल



" मीनू ! जल्दी से अपने पापा की थाली लगा दो," घर में कदम धरते ही आदेशात्मक स्वर में कहा मृणाल ने।
" पर मां ! मैंने तो खाना बनाया ही नहीं। भैया पिज्ज़ा ले आए थे," मीनू ने सहज स्वर में कहा तो मृणाल भड़क उठी ," एक दिन खाना न बना सकी तुम? हद है कामचोरी की।"
" आपने ही तो कहा था माँ कि लौटने में १२ या१ बज जायेंगे रात के ,इसलिए....."

रविवार, 25 अक्तूबर 2015

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अटल रहे सुहाग : ( कहानी ) एक दिन की नायिका : अपर्णा परवीन कुमार




वो गांव के बहार की तरफ टीलों से होते हुए भैरों जी के स्थान पर धोक देने और नए जीवन के लिए उनका आशीर्वाद लेने अपने बींद के पीछे पीछे आगे बढ़ रही थी और साथ ही पूरे दिल से अपने मन के ईश्वर को बार बार धन्यवाद भी दे रही थी .. उस ख़ुशी के लिए, उस अनुभव के लिए..... लाल प्योर जॉर्जट पर गोटा तारी के काम वाला उसका बेस (दुल्हन की पोशाक), ठेठ राजस्थानी स्टाइल में बने आड़, बाजूबंद, हथफूल, राखड़ी, शीशफूल, पाजेब अंगूठियां, लाल गोटे जड़ी जूतियां, और नाक के कांटे में जड़ा हीरा...... उस घडी वो  नायिका थी वहां कीउस गावं की, उन पगडंडियों की, और उन रेत के  टीलों की भी........ अपने बींद के पीछे पीछे वो  बिलकुल वैसे चल रही थी जैसे गावं में लाल जोड़े में,घूंघट में किसी नै नवीली बींदणी को चलना चाहिए था...

शनिवार, 24 अक्तूबर 2015

अटल रहे सुहाग : एक प्यार ऐसा भी





बस अब इन दिनो मे और जमकर मेहनत करनी है ये सोचता हुआ रामू अपना साईकिल रिक्शा खींचे  जा रहा था।पिछले 8-10हफ्तो से वो ज्यादा समय तक सवारी ले लेकर और पैसे कमाना चाह रहा था।अपनी धुन मे वो पिछले कितने समय से लगा हुआ था।
ले भाई !तेरे पैसे ये कहते हुए सवारी वाले ने उसे पैसे दिये।आज के कमाऐ  हुए पैसो  मे से कुछ रुपये अपने मित्र कन्हैया को देते हुआ बोला और कितने इकट्ठे करने होंगे? कन्हैया बोला यार कम से कम 1200-1300 रुपये तो होने चाहिये।अभी तो 950ही एकत्रित हुऐ है।और अब करवाचौथ को बचे भी दो दिन है।ठीक है कोई नही इन दो दिनो मे और ज्यादा मेहनत करुंगा कहकर रामू घर को चल पङा।

जीवन की प्राथमिकताएं




एक दिन एक प्रोफेसर अपनेँ कालेज के स्टुडेन्ट्स के सामनेँ हाथ मेँ खाली जार (काँच का बर्तन) लिये उपस्थित हूए। प्रोफेसर नेँ सभी स्टुडेन्ट्स के सामनेँ उस जार मेँ बड़े-बड़े कंकड़ पत्थर के टुकड़े डाले और वह काँच का बर्तन उन टुकड़ोँ से भर गया।

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शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2015

रिया स्पीक्स : दादी चली पुरूस्कार लौटाने




रिया के घर में सन्नाटा पसरा हुआ है | रिया के माता पिता की आँखों में आँसू  हैं | उन्हें समझ नहीं आ रहा है ,आखिर माजी ने ऐसा फैसला किया तो क्यों किया ? कितना फक्र था उन्हें अपने पर | बाल काले से सफ़ेद हो गए  , आँखें धस गयी , दो की जगह तीन पैर हो गए | इतना सब कुछ बदल गया पर नहीं बदला तो सिर्फ  उनके मुंह से हर आने -जाने वाले के सामने गर्व से कहा जाने वाला ये वाक्य "  तुम आज कल के बच्चे हमें क्या पढाओगे हमको ऐसा वैसा नहीं समझो ,हमें भी उतरी -पूरा साहित्य पुरोधा सम्मान मिल चुका है | पर अब वो उसे ही वापस करने पर तुली हैं | आखिर क्यों ? रिया से अपने माता -पिता का दुःख और अपने मन में उठते प्रश्न सहे नहीं गए तो उसने दादी से डायरेक्ट पूंछने का मन बना लिया |
रिया दादी के कमरे में घुसते हुए : दादी मेरी प्यारी दादी आप पुरुस्कार क्यों लौटा रही है | मम्मी -पापा कितने दुखी हैं |
दादी : पेपर दिखाते हुए , हे ! शिव , शिव ,शिव , देखा नहीं सब लौटा रहे है |हम सब का साथ देंगे |  यही चलन है | रिया : हां दादी पर वो तो ........

गुरुवार, 22 अक्तूबर 2015

विजयदशमी पर विशेष ;मेरे प्रभु लेकर धनुष फिर से आना






विजयदशमी पर विशेष ;मेरे प्रभु लेकर धनुष फिर से आना
                                                                  बुराई पर अच्छाई की जीत की प्रतीक  विजयदशमी पर    आज  फिर से हम रावण का पुतला जलाएंगे । राम अच्छाई के प्रतीक हैं रावण बुराई का ।यह हर्ष और उल्लास का पर्व है । बचपन में हम हर वर्ष मेला देखने जाते कुछ मिटटी के खिलौने , चूल्हा चकिया खरीदने , झूले झूलने के बाद खील , गट्टा और बताशा खाते हुए बेसब्री से प्रतीक्षा करते रावण दहन की । ठीक १०  बजे  बड़ी बड़ी आतिशबाजियों के साथ जब रावण का पुतला जलता तो हमारे हर्ष की सीमा न रहती । रावण दहन के बाद ताली बाजा कर हर्षित होते हुए घर लौटते थे और कल्पना करते थे की प्रतीक के नष्ट होते ही हर बुराई नष्ट हो जाएगी । पर बाल सुलभ स्वप्न पूरा नहीं होता । उम्र के साथ -साथ ये समझ में आया की   रावण के पुतले के दहन के बाद भी न जाने कीतने  रावण हमारे आस -पास यहाँ तक की हमारे अंदर जीवित हैं । फिर एक कल्पना जन्म लेती मन के किसी कोने  में । हां मन के किसी कोने में एक नन्ही बच्ची पुकारती हे राम ! फिर से आ जाओ ……… देखो न कितने रावण है उन्हें मारो……… शायद उसी समय आर्त  पुकार ने इस भजन की रचना करवा दी.


हराना है फिर आज रावण हराना
मेरे प्रभु लेकर धनुष फिरसे आना

दयावश जो लाँघे है लक्ष्मण की रेखा
नहीं जिसने रावण का असल रूप देखा
बचाना है भोली सिया को बचाना
मेरे प्रभु लेकर धनुष फिर से आना

सोमवार, 19 अक्तूबर 2015

पचास का नोट




एक  व्यक्ति  ऑफिस  में देर  रात तक काम  करने  के  बाद  थका -हारा घर  पहुंचा  . दरवाजा  खोलते  ही  उसने  देखा  कि  उसका  पांच  वर्षीय  बेटा  सोने  की  बजाये  उसका  इंतज़ार  कर  रहा  है .
अन्दर  घुसते  ही  बेटे  ने  पूछा —“ पापा  , क्या  मैं  आपसे  एक सवाल  पूछ  सकता  हूँ ?”
हाँ -हाँ  पूछो , क्या  पूछना  है ?” पिता  ने  कहा .
बेटा – “ पापा , आप  एक  घंटे  में  कितना  कमा लेते  हैं ?”
इससे  तुम्हारा  क्या  लेना  देना तुम  ऐसे  बेकार  के  सवाल  क्यों  कर  रहे  हो ?” पिता  ने  झुंझलाते  हुए  उत्तर  दिया .
बेटा – “ मैं  बस  यूँही जानना  चाहता  हूँ . प्लीज   बताइए  कि  आप  एक  घंटे   में  कितना  कमाते  हैं ?”
पिता  ने  गुस्से  से  उसकी  तरफ  देखते  हुए  कहा , “ 100 रुपये  .”
अच्छा ”, बेटे  ने  मासूमियत   से   सर  झुकाते   हुए  कहा -, “  पापा  क्या  आप  मुझे  50 रूपये  उधार  दे  सकते  हैं ?”