शनिवार, 14 नवंबर 2015

बच्चों पर अनमोल विचार




* बच्चे वो जीवित सन्देश हैं जो हम इस दुनिया को देते हैं जब हम नहीं होंगे ........ नील पोस्टमैंन

*बच्चे जब भी कुछ नया सीखते हैं तो वो नाचते हैं यह बताता है की संसार में कुछ भी संगीत के बिना नहीं है ....विलियम स्टैफोर्ड
* किसी टूटे हुए आदमी को दुबारा जोड़ने से बेहतर है  बज्बूत बच्चों को बनाना ...........फेडरिक डौगलेस

* बच्चों की आँखों के आगे ७ वंडर नहीं ७ अरब वंडर होते हैं |

बाल दिवस पर विशेष कविता : पढो और बढ़ो :डॉ भारती वर्मा बौड़ाई

पढ़ो,
बढ़ो,
जीवन के
दुर्गम पर्वत चढ़ो।
मिलें
बाधाएँ
रौंद उन्हें
नव पथ गढ़ो।

बाल दिवस पर विशेष : कविता हामिद की दिवाली : संगम वर्मा


दादी! ओ दादी!
कौन ? कौन है,
जो दादी पुकार रहा है ?
अरे दादी! मैं, "हामिद"
अरे हामिद!
(ख़ुशी से स्वर भरते हुए )
तू कहाँ चला गया था बेटा ?
देख न.……
कैसे तेरी बाट में ये आँखें 

शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

भाई दूज : भाई बहन पर अनमोल विचार





* केवल एक भाई एक पिता की तरह प्यार कर सकता है , बहन  की तरह चिढ़ा सकता हें , माँ की तरह देखभाल कर सकता है और दोस्त की तरह साथ दे सकता है |

* भाई -बहन का रिश्ता वो रिश्ता है जो दूर होने पर भी दिल के तारों से बंधा रहता है |

* भाई बहन सदा उतने ही करीब रहते हैं जितना हाँथ और पाँव

* दुनिया में कोई प्यार ऐसा नहीं है जैसा भाई के प्रति  प्यार है , दुनिया में कोई प्यार ऐसा नहीं है जैसा भाई का प्यार है|
* दोस्त आते और जाते हैं पर भाई -बहन सदा के लिए हैं |

* भाई -बहन वो बचपन है जो कभी जाता नहीं है  

सोमवार, 9 नवंबर 2015

आओ जलाए साहित्य दीप : लक्ष्मीजी का आशीर्वाद-संजय वर्मा 'दृष्टि '





दीपावली के दिन लक्ष्मी ,गणेश के साथ कुबेर की भी पूजा की जाती है । विघ्न विनाशक ,मंगलकर्ता ,ऐश्वर्य ,भोतिक सुखों ,धन -धान्य ,शांति प्रदान करने के साथ साथ विपत्तियों को हरने वाले लक्ष्मी ,गणेश ,कुबेर का महापूजन अतिफलदायी होता है । 
प्राचीन ग्रंथों में लक्ष्मी जी के साथ अलक्ष्मी जी का भी उल्लेख मिलता है । अलक्ष्मी जी को "नृति "नाम से भी जाना जाता है तथा दरिद्रा के नाम से पुकारा जाता है । लक्ष्मी जी के प्रभाव का मार्ग धन -संपत्ति ,प्रगति का होता है वही अलक्ष्मीजी दरिद्रता ,पतन,अंधकार,का प्रतीक होती है । लक्ष्मी जी और अलक्ष्मी जी (दरिद्रा )में संवाद हुआ । दोनों एक दूसरे का विरोध करते हुए कहने लगी -"में बड़ी हूँ । " लक्ष्मीजी ने कहा कि देहधारियों का कुल शील और जीवन में ही हूँ । मेरे बिना वे जीते हुए भी मृतक के समान है । 

रविवार, 8 नवंबर 2015

आओ जलायें साहित्य दीप : 13 फरवरी 2006 ( संस्मरण -किरण सिंह )



वेदना पिघल कर आँखों से छलकने को आतुर थीं.. पलकें अश्रुओं को सम्हालने में खुद को असहाय महसूस कर रही थीं...जी चाहता था कि कोई अकेला कुछ देर के लिए छोड़ देता कि जी भर के रो लेती..........फिर भी अभिनय कला में निपुण अधर मुस्कुराने में सफल हो रहीं थीं ..बहादुरी का खिताब जो मिला था उन्हें....! कैसे कोई समझ सकता था कि होठों को मुस्कुराने के लिए कितना परिश्रम करना पड़ रहा था...! किसी को क्या पता था कि सर्जरी से पहले सबसे हँस हँस कर मिलना और बच्चों के साथ घूमने निकलना , रेस्तरां में मनपसंद खाना खाते समय मेरे हृदय के पन्नों पर मस्तिष्क लेखनी बार बार एक पत्र लिख लिख कर फाड़ रही थी... कि मेरे जाने के बाद.................!

ग्यारह फरवरी २००६ रात करीब आठ बजे बहन का फोन आया... पति ने बात करने के लिए कहा तब आखिरकार छलक ही पड़े थे नयनों से नीर.... और रूला ही दिए थे मेरे पूरे परिवार को... नहीं सो पाई थी  उस रात को मैं .. कि सुबह ओपेन हार्ट सर्जरी होना था.... सुबह स्ट्रेचर आता है... उसपर मुझे लेटा दिया जाता है.... कुछ दूर चलकर स्ट्रेचर वापस आता है कि सर्जरी आज नहीं होगा......! कुछ लोगों ने तो अफवाह फैला दिया था कि डॉक्टर नरेश त्रेहान इंडिया पाकिस्तान का क्रिकेट मैच देखने पाकिस्तान जा रहे हैं..!
सर्जरी से तो डर ही रही थी... मुझे क बहाना मिल गया था हॉस्पिटल से भागने का........ गुस्से से चिल्ला पड़ी थी मैं .. डॉक्टरों की टीम आ पहुंची थी मुझे समझाने के लिए....... तभी डॉक्टर नरेश त्रेहान भी आ पहुंचे थे......और समझाने लगे थे कि मुझे इमर्जेंसी में बाहर जाना पड़ रहा है... मैं चाहता हूँ कि मेरे प्रेजेन्स में ही आपकी सर्जरी हो............... .....!
१३ फरवरी 2006 सुबह करीब ९ बजे स्कार्ट हार्ट हॉस्पिटल की नर्स ने जब स्ट्रेचर पर लिटाया और ऑपरेशन थियेटर की तरफ ले जाने लगी थी तो मुझे लग रहा था कि जल्लाद रुपी परिचारिकाएं मुझे फांसी के तख्ते तक ले जा रही हैं......... हृदय की धड़कने और भी तेजी से धड़क रही थी....

शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

सद्विचार


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आओ जलायें साहित्य दीप : कवितायें -रोचिका शर्मा


                                         अटूट बंधन के दीप महोत्सव " आओ जलायें साहित्य दीप के अंतर्गत आज पढ़िए रोचिका शर्मा की तीन कवितायें बलात्कार : एक सवाल , बाल श्रम व् आओ नयी एक पौध लगायें | 


बलात्कार  ! एक सवाल


आज फिर अख़बार था चीखता , हो गया बलात्कार कहीं कोई
ओढ़ कर चादर बेहयाई की , अपनी हवस बुझा गया फिर कोई
नारेबाज़ी शुरू हो गयी , बैठे संगठन अनशन पे
लगे उछालने कीचड़ नेता , विपक्ष दलों के दामन पे
कहीं हो रही कानाफूसी , क्यूँ लड़की को दी थी छूट इतनी
कर रहे टिप्पणी पहनावे पर, वह पहनती  थी स्कर्ट मिनी
सबने अपने मन की गाई , बिन जाने हालात हादसे के
नुची देह मीडिया ने दिखाई , न दिखे चिथड़ेउसकी  रूह के
घिनौने सवाल अदालत ने पूछे , दिल का दर्द न पूछे कोई
थक कर मात-पिता  भी कोसें , तू पैदा इस घर क्यूँ होई

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

आओ जलाए साहित्य दीप : मिटाए भीतरी अन्धकार ( लेख -संगीता सिंह भावना )



हम हर वर्ष दीपावली मनाते हैं | हर घर ,हर आंगन,हर गाँव ,हर बस्ती एक जगमग रौशनी से नहा उठती है | यूँ लगता है जैसे सारा संसार एक अलग ही पोशाक धारण कर लिया है | इस दिन मिट्टी के दिये में दीप जलाने की मान्यता है | क्योंकि मिट्टी के दिये में हमारी मिट्टी की खुश्बू है,मिट्टी का दिया हमारा आदर्श है,हमारे जीवन की दिशा है,संस्कारों की सीख है,संकल्प की प्रेरणा है और लक्ष्य तक पहुँचने का सबसे अच्छा माध्यम है | दीपावली अपने आप में बेहद ही रौशनी से परिपूर्ण आस्था का त्यौहार है पर इसकी सार्थकता तभी पूर्ण है जब हमारे मन के भीतर का अंधकार भी दूर हो | यह त्यौहार भले ही सांस्कृतिक त्यौहार है पर ऐतिहासिक महापुरुषों के प्रसंग से भी इस पर्व की महता जुडी है | दीपावली लौकिकता के साथ-साथ आध्यात्मिकता का भी अनूठा पर्व है | 'अंधकार से प्रकाश की ओर प्रशस्त' ही  इस पर्व का मूल मतलब है 

बुधवार, 4 नवंबर 2015

आओ जलाए साहित्य दीप : भावनाओं की सरहदें कब होंगी ( कहानी : संजना तिवारी




पना देश हो या विदेश , सुबह की जगमगाहट में कमी नहीं आती । चिड़ियाँ अपने नियत समय पर रोजगार के लिए जाना नहीं भूलतीं । पवन हौले-हौले वीणा की धुन सी अपने प्रियतम बावरे से लिपटना नहीं भूलती , कलियाँ मुस्कुराना और तितलियाँ मटकना नहीं भूलती । ठीक उसी तरह कम्जर्फ़ इंसान अपनी ईर्ष्या , दरिंदगी और वाहियात स्वभाव को नहीं भूलते । कोई नई सुबह उनको सुकूं नहीं देती और कोई रात प्यार से उनके पहलू में नहीं सोती । रिहाना का भी कुछ ऐसा ही हाल था । जब से मोहम्मद ने आंध्रा से आई लक्ष्मी को घर में रख लिया था उसकी रगों का खूं वहशी हो गया था । हालांकि रिहाना के लिए ये कोई नई बात नहीं थी, अलग-अलग औरतों की अलग-अलग खूबी उसे हमेशा बेचैन कर देती हैं लेकिन इस बार........लक्ष्मी के लम्बे बाल, ऊँचा कद , पर्वत सी उठी सीने की गोलाइयां , केसरी रंग , पलकों के बोझ से दबी आँखे और आवाज़ उसे कई-कई मौत मार रहे थे । दिन और रात बस एक ही ख़्वाब उसे डस रहा था की मोहम्मद लक्ष्मी की ओर झुके जा रहे हैं ।

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

अटूट बंधन वर्ष २ अंक -१ का कवर पेज


चूडियाँ ( कहानी -वंदना बाजपेयी )




न जाने क्यों आज उसका चेहरा आँखों के आगे से हट नहीं रहा है ,चाहे  कितना भी मन बटाने के लिए , अपने को अन्य कामों में व्यस्त कर लू , या टी वी ऑन करके अपना मनपसंद कार्यक्रम देख कर उसे भूलने की कोशिश करू , -बार बार उसका मासूम चेहरा , खिलखिलाती हँसी  और हाँ खनकती चूड़ियाँ मेरा ध्यान अपनी ऒर वैसे ही खीच ले जाती है जैसे तेज हवा का झोका किसी तिनके को उड़ा  ले जाये। ..........  आज कितने वर्षो बाद मिली थी वो , आह !वो भी इस रूप में..... इस हालत में।  बचपन से जानती थी उसे , हमारे  घर से दो घर छोड़ कर रहने वाले शर्मा  अंकल के यहाँ किरायेदार बनकर आये थे वो लोग।

सोमवार, 2 नवंबर 2015

सद्विचार


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आओ जलाए साहित्य दीप : एक वर्ष : अटूट बंधन के साथ


प्रिय अटूट बंधन
              आज तुम एक वर्ष के हुए और इसी के साथ हमारी मित्रता भी एक वर्ष की हुई। एक वर्ष की इस यात्रा में विभिन्न, पर नित नए कलेवर में नए-नए साहित्यिक पुष्प लिए तुम जब-जब हमारे सम्मुख आए....हमें सम्मोहित करते गए, अपने आकर्षण में बांधते गए। एक-एक कड़ी के रूप में सदस्य जुड़ते रहे कि आज अटूट बंधन परिवार के रूप में हम तुम्हें अपने संग लिए औरों के सम्मुख थोड़ा गर्व से, थोड़ा प्यार से इठलाते हुए, इतरा कर चलते हैं मानो कह रहे हों कि देखा हमारी एक वर्ष की यात्रा का यह मनोरम रूप कि अब इस यात्रा के दूसरे अध्याय को लिखने की और बढ़े जा रहे हैं।

रविवार, 1 नवंबर 2015

जन्म दिन की शुभकामनाएं " अटूट बंधन "




आज आपकी प्रिय पत्रिका " अटूट बंधन" एकवर्ष पूरा कर दूसरे वर्ष में प्रवेश कर रही हैं| जिस तरह आप सब ने स्नेह व् आशीर्वाद देकर पत्रिका को प्रथम वर्ष में ही देश की लोकप्रिय पत्रिकाओ में शामिल कर दिया है | उसके लिए पूरा " अटूट बंधन ग्रुप " आप सब का आभारी है| आशा है आगे भी आपका साथ हमें इसी प्रकार मिलता रहेगा |

आओ जलाए साहित्य दीप - मेरा लड़की होना.... कहानी शशि श्रीवास्तव




सुनील और माधवी आज फिर सेंट्रल पार्क में मिले थे। आज शहर के पार्क में एकांत क्षणों में सुनील माधवी के सिर पर हाथ फेरते हुए अत्यन्त भावुक हो उठा था। सुनील पहले ही दिन से माधवी के रूप-सौंदर्य और उसके व्यक्तित्व पर फिदा था। यही वजह थी कि अपनी एक महीने की मुलाकात में ही उसने उससे शादी करने का मन बना लिया था। सुनील व माधवी की पहली मुलाकात मुंबई में ही लोकल ट्रेन में हुई थी।

आओ जलाए साहित्य दीप - हायकू एवं हाइगा ( डॉ .रमा द्विवेदी )


                                       आओ जलाए सहती दीप में प्रस्तुत हैं वरिष्ठ  साहित्यकार डॉ . रमा द्विवेदी  जी के हायकू .........

“ आओ जलायें साहित्य दीप “ 
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`दीपावली' हाइकु एवं हाइगा