शनिवार, 30 अप्रैल 2016

इंतजार






इन्तजार 
कोई भी करे 
किसी का भी करे 
पीड़ादायी और कष्टदायी ही होता है 
लेकिन बदनसीब होते हैं वो लोग 
जिनकी जिन्दगी में किसी के इन्तजार
का अधिकार नहीं होता
क्योंकि इन्तजार 

शनिवार, 23 अप्रैल 2016

विश्व पुस्तक दिवस पर सुविचार

१ .. विश्व एक पुस्तक है जो घूमते नहीं वह केवल पन्ने पढ़ते हैं |
२ …अभी तक किन्ही दो व्यक्तियों ने एक ही किताब नहीं पढ़ी है |
३ … जब कोई अति विद्वान व्यक्ति मिल जाए तो पूछना , ” आप ने कौन सी किताबें पढ़ी हैं |
४ …किताबों के बिना कमरा जैसे आत्मा के बिना शरीर

गुल्ली - डंडा- प्रेमचंद्र






हमारे अँग्रेजी दोस्त मानें या न मानें मैं तो यही कहूँगा कि गुल्ली-डंडा सब खेलों का राजा है। अब भी कभी लड़कों को गुल्ली-डंडा खेलते देखता हूँ, तो जी लोट-पोट हो जाता है कि इनके साथ जाकर खेलने लगूँ। न लान की जरूरत, न कोर्ट की, न नेट की, न थापी की। मजे से किसी पेड़ से एक टहनी काट ली, गुल्ली बना ली, और दो आदमी भी आ जाए, तो खेल शुरू हो गया।
विलायती खेलों में सबसे बड़ा ऐब है कि उसके सामान महँगे होते हैं। जब तक कम-से-कम एक सैकड़ा न खर्च कीजिए, खिलाड़ियों में शुमार ही नहीं हो पाता। यहाँ गुल्ली-डंडा है कि बना हर्र-फिटकरी के चोखा रंग देता है; पर हम अँगरेजी चीजों के पीछे ऐसे दीवाने हो रहे हैं कि अपनी सभी चीजों से अरूचि हो गई। स्कूलों में हरेक लड़के से तीन-चार रूपये सालाना केवल खेलने की फीस ली जाती है। किसी को यह नहीं सूझता कि भारतीय खेल खिलाएँ, जो बिना दाम-कौड़ी के खेले जाते हैं। अँगरेजी खेल उनके लिए हैं, जिनके पास धन है। गरीब लड़कों

कुछ हाइकू.......पृथ्वी दिवस पर






(1) धरा दिवस
      लगें वृक्ष असंख्य
      करें प्रतिज्ञा।

(२) माता धरती
      करें चिंता इसकी
      शिशु समान।

(3) कहे समय
      रहेगी न धरती
      करोगे क्या?

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

महावीर जयंती पर विशेष - मिच्छामी दुक्कड़म - आत्म शुद्धि का द्वार


आज महावीर स्वामी की जयंती पर हम जैन धर्म के की एक विशेष परंपरा के बारे में बात कर रहे हैं | ये परंपरा है ... क्षमा मांगने की और क्षमा करने की | हम कितनी ही प्रेरक कथों में पढ़ते हैं की जब तक हम अतीत के बोझ को सर पर लिए हुए चलते हैं तब तक जीवन में आगे नहीं बढ़ा जा सकता | पर कहीं न कहीं हम सब इसे लेकर चलते हैं | अतीत के बोझों में जो बोझ सबसे भरी होता है वो होता है कही सुनी बातों का बोझ | जाने अनजाने हम कितनी बातों से आहत होते रहते हैं , या किसी दूसरे को आहात करते रहते हैं इसका स्वयं हमें भी पता नहीं होता | पर जीवन पर्यंत ये बाते अपने सर पर लिए रहते हैं जो शूल की तरह चुभती रहती है | फिर आत्म उन्नति हो कैसे जब अतीत खींच रहा हो | बस एक छोटी सी क्षमा मांगने और देने से सब कितना आसान हो जाता है | जैन धर्म के अनुयायी एक ऐसा ही पर्व मानते हैं जिसे पर्यूषण पर्व कहते हैं | पर्यूषण पर्व , जैन धर्म के प्रमुख पर्वों में से एक है. श्वेताम्बर जैन इसे 8

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

चार साधू





एक शहर में चार साधु आए।
एक साधु शहर के चौराहे पर जाकर बैठ गया, दूसरा घंटाघर में,तीसरा कचहरी में और चौथा साधु शमशान में जाकर बैठ गया।चौराहे पर बैठे साधु से लोगों ने पूछा, बाबाजी आप यहां आकर क्यों बैठे हो? क्या कोई अच्छी जगह नहीं मिली? साधु ने कहां यहां चारों दिशा से लोग आते है और चारों दिशाओं मे जाते हैं। किसी आदमी को रोको तो वह कहता है कि रुकने का समय नहीं हैं, जरुरी काम पर जाना है। अब यह पता नहीं लगता कि जरुरी काम किस दिशा में है इसलिए यह जगह बढिय़ा दिखती है। घंटाघर पर बैठे साधु से लोगों ने पूछा बाबा। यहां क्यों बैठे हो?
साधु ने कहा घड़ी की सुइयां दिनभर घूमती है परंतु बारह बजते ही हाथ जोड़ देती है कि बस हमारे पास इतना ही समय है, अधिक कहां से लाएं? घंटा बजता है तो वह बताता है कि तुम्हारी उम्र में से एक घंटा और कम हो गया। जीवन का समय सीमित है। हमें यह जगह बढिय़ा दिखती है। 

ईश्वर का काम काज




एक बार भगवान से उनका सेवक कहता है, भगवान- आप एक जगह खड़े-खड़े थक गये होंगे,
एक दिन के लिए मैं आपकी जगह मूर्ति बन कर खड़ा हो जाता हूं, आप मेरा रूप धारण कर घूम आओ l
भगवान मान जाते हैं, लेकिन शर्त रखते हैं कि जो
भी लोग प्रार्थना करने आयें, तुम बस उनकी प्रार्थना सुन लेना कुछ बोलना नहीं,
मैंने उन सभी के लिए प्लानिंग कर रखी है, सेवक मान जाता है l
सबसे पहले मंदिर में बिजनेस मैन आता है और कहता है, भगवान मैंने एक नयी फैक्ट्री
डाली है, उसे खूब सफल करना l

रविवार, 17 अप्रैल 2016

"सुशांत सुप्रिय के काव्य संग्रह - इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं "की शहंशाह आलम की समीक्षा " गहरी रात के एकांत की कविताएँ



        




    #  समीक्षा आलेख : " गहरी रात के एकांत की कविताएँ "
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         कोई छायाकार रात की नींद में जाकर जिन दृश्यों के बारे में सोचता है , उन दृश्यों को दिन में कैमरे में क़ैद करते हुए वह अपनी नींद को सार्थक करता है । ठीक उसी तरह एक कवि दिन में देखे , भोगे हुए यथार्थ को गहरी रात के एकांत में काग़ज़-क़लम लिए अपना कवि-धर्म समझकर प्रकट करता है । सुपरिचित कवि सुशांत सुप्रिय ऐसे ही कवियों में हैं जो पूरी ईमानदारी व मासूमियत से अपने देखे , भोगे हुए यथार्थ को अपनी कविताओं में दर्ज़ करते चले जाते हैं :
          मैंने अपनी बाल्कनी के गमले में
          वयस्क हाथ बो दिए
          वहाँ कोई फूल नहीं निकला
          किंतु मेरे घर का सारा सामान
          चोरी होने लगा ( मासूमियत / पृ. 9 ) ।

शब्द सारांश का भव्य वार्षिकोत्सव एवं पुस्तक लोकार्पण समारोह


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शब्द सारांश का भव्य वार्षिकोत्सव एवं पुस्तक लोकार्पण समारोह दस अप्रैल रविवार को नगर की प्रसिद्ध साहित्य एवं सामाजिक संस्था शब्द सारांश का द्वितीय वार्षिकोत्सव संपन्न हुआ .कार्यक्रम का शुभारम्भ देह्दानी डॉ रामावतार शर्मा ,तहसीलदार एवं साहित्यकार राकेश त्यागी ,डॉ राजेन्द्र मिलन ,एवं डॉ अमी आधार ने दीप प्रज्ज्वलित करके किया .उसके बाद पुष्प माला ,सम्मान वस्त्र एवं श्री फल से अतिथियों का स्वागत किया गया कार्यक्रम के संचालन की डोर मेरठ की गायिका और संचालक डॉ शुभम त्यागी ने थामी .कार्यक्रम के प्रथम सत्र में संस्था अध्यक्ष सपना मांगलिक द्वारा संपादित कहानी संग्रह बातें अनकही एवं उनके ही द्वरा रचित हाइकु संग्रह "बोन्साई "का विमोचन किया गया .पुस्तकों की समीक्षा के क्रम में डॉ अमी आधार ने पुस्तक बोन्साई के हाइकु की भूरी भूरी प्रशंसा करते हुए

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

डॉ. बी आर आंबेडकर के अनमोल विचार






* एक  सफल  क्रांति  के लिए  सिर्फ  असंतोष  का  होना  पर्याप्त  नहीं  है .जिसकी  आवश्यकता   है  वो  है  न्याय  एवं   राजनीतिक  और  सामाजिक  अधिकारों  में  गहरी  आस्था
*इतिहास  बताता  है  कि  जहाँ  नैतिकता  और  अर्थशाश्त्र   के  बीच  संघर्ष  होता  है  वहां  जीत  हमेशा  अर्थशाश्त्र   की  होती  है . निहित  स्वार्थों   को  तब  तक  स्वेच्छा  से  नहीं  छोड़ा   गया  है  जब  तक  कि  मजबूर  करने  के  लिए  पर्याप्त  बल  ना  लगाया  गया  हो .

गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

आज गंगा स्नान की नहीं गंगा को स्नान कराने की आवश्यकता है ........तो पीछे क्यों हटे ?


आज गंगा स्नान की नहीं , गंगा को स्नान करने की जरूरत है … तो पीछे क्यों हटे ?

गंगा ... पतित पावनी गंगा ... विष्णु के कमंडल से निकली  , शिव जी की जटाओ में समाते हुए  भागीरथ प्रयास के द्वारा धरती पर उतरी | गगा  शब्द कहते ही हम भारतीयों को ममता का एक गहरा अहसास होता है | और क्यों न हो माँ की तरह हम भारतवासियों को पालती जो रही है गंगा  | मैं उन भाग्यशाली लोगों में हूँ जिनका बचपन गंगा  के तट पर बसे शहरों में बीता | अपने बचपन के बारे में जब भी कुछ सोचती हूँ तो कानपुर में बहती गंगा और बिठूर याद आ जाता है | छोटे बड़े हर आयोजन में बिठूर जाने की पारिवारिक परंपरा रही है | हम उत्साह से जाते | कल -कल बहती धारा के अप्रतिम सौंदर्य को पुन : पुन : देखने की इच्छा तो थी ही , साथ ही बड़ों द्वरा अवचेतन मन पर अंकित किया हुआ किसी अज्ञात पुन्य को पाने का लोभ भी था | जाने कितनी स्मृतियाँ मांस पटल पर अंकित हैं | पर निर्मल पावन गंगा प्रदूषण का दंश भी झेल रही है | इसका अहसास जब हुआ तब उम्र में समझदारी नहीं थी पर मासूम मन इतना तो समझता ही था की  माँ कह कर माँ को अपमानित करना एक निकृष्ट काम है |

मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

फेसबुक एप - ये फेसबुक है ये सब जानती है


 





आपको एक पुरानी फिल्म जरूर याद होगी | नाम था शतरंज के खिलाड़ी | वो नवाबों के ज़माने की फिल्म थी | पर यहाँ मैं फिल्म की बात नहीं करना चाहता | मैं बात करना चाहता हूँ खेल शतरंज की | काफी नवाबी खेल हुआ करता था | उस समय लोग जिनके पास समय होता था वह इसे खेला करते थे | एक एक चाल सोचने में मिया चार पांच घंटे लग जाते | वजीर तो वजीर पैदल भी २ २ घंटे टस से मस नहीं होता | गोया पान खाते रहो और पीक थूकते -थूकते सुबह से शाम हो जायेगी | वो जमाना गया , फिर आया ताश का जमाना , नहले पर दहला डालते घंटे चुटकियों में कट जाते | पान खाने और पीक थूकने की आदत ने यहाँ भी खूब साथ निभाया |
हम भारतीय तो उसी में खुश थे | तभी मार्क जुकरबर्ग फेसबुक लेकर आ गए | कहा रिश्ते नातेदारों को एक सूत्र में बाँध कर रखेंगे | दूर रह कर भी पास रहेंगे | बस सब दौड़ पड़े कोई एक आई डी से, २ -४ कोई फेक आई डी से | ५ रिश्तेदारों के

रविवार, 10 अप्रैल 2016

अजय चन्द्रवंशी की लघु कवितायें






#तटस्थ#
वह कशमकश में है
वह किस तरफ है
क्योकि उसे मालूम है
वह किस तरफ है


#गाली और क्रांति#
वह सब को गाली देता है
व्यवस्था को
समाज को
खुद को भी
उसके लिये
गाली ही क्रांति है


#एक......#
वह मंच पर
दहाड़ता है
और जमीन पर
हांफता है


#ज़मीनी कवि#
उसकी रचना में
सिर्फ जमीन होती है
कविता कही नही


#आलिंगन#
उसने गले लगाया
मै सिहरा नही
चीख उठा!!

#सत्यवादी#
वह हमेशा
सच बोलता है
इसलिये
कभी बोलता नही

#सच्चे वीर#
वे सच्चे वीर थे
उन्होंने
केवल पुरुषों की
हत्या की
स्त्रियों और बच्चों को
छोड़ दिया


#दर्द#
मेरे दिल में उठा
मैंने ही महसूस किया
मै ही तड़पा
मुझी से खत्म हुआ


#खुद्दार#
वह रोज ऐलान करता है
वह बिका नही है
इस तरह
रोज़ बेचता है
अपने 'न बिकने' को



#देशभक्त#
वह देशभक्त है
इसलिये
कुछ नही करता
सिवा देशभक्ति के
अजय चन्द्रवंशी
  छत्तीसगढ़ 

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

परी का गिफ्ट



दीपक  छठी कक्षा  का विद्यार्थी  था। वह जब क्लास में होता तब बाहर खेलने के बारे में सोचता और जब खेलने का मौका मिलता तो वो कहीं घूमने के बारे में सोचता…इस तरह वह कभी भी प्रेजेंट मोमेंट को एन्जॉय नहीं करता बल्कि कुछ न कुछ आगे का सोचा करता। उसके घर वाले और दोस्त भी उसकी इस आदत से परेशान थे।
एक बार दीपक  अकेले ही पास के जंगलों में घूमने निकल गया। थोड़ी देर चलने के बाद उसे थकान हो गयी और वह वहीं नरम घासों पर लेट गया। जल्द ही उसे नींद आ गयी और वह सो गया।
सोने के कुछ देर बाद एक आवाज़ आई-“ दीपक . दीपक …”

सद्विचार


शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

अटूट बंधन वर्ष -२ अंक -६ सम्पादकीय :समग्र जीवन की सफलता


समग्र जीवन की  सफलता

जब जानी थी
सुख –दुःख की परिभाषा
तब बड़ी ही सावधानी से खींच दिया था
एक वृत्त
सुख के चारों ओर
की कहीं मिल न जाए
सुख के चटख रंगों में
दुःख के स्याह रंग
और मैं एक सजग प्रहरी की भांति
अनवरत रही युद्ध रत
अंधेरों के खिलाफ
पर जीवन तो परिधि पर ही बीत गया

अटूट बंधन वर्ष -२ अंक -५ सम्पादकीय : किसी का जाना ...कभी जाना नहीं होता



किसी का जाना ....कभी जाना नहीं होता
लाल –पीले हरे नीले
रंगों से इतर
कुछ अलग ही होते हैं
रिश्तों के रंग
जहाँ चलतें हैं सापेक्षता के सिद्धांत
की पल पल बनते बिगड़ते
त्रिकोंड़ो में
साथ –साथ आगे बढ़ी हुई रेखायें
नहीं ले पाती हैं कोई आकर
की दृश्य –अदृश्य रूप में