मंगलवार, 23 अगस्त 2016

कुछ चुनिन्दा शेर









मेरा मशवरा है यही  की तोड़ दो उसे 
जिस आईने में ऐब अपने दिखाई न दें 



कहती है मेरे साथ कब्र में भी जायेगी 
इतना प्यार करती है मुझसे तन्हाई मेरी

सच की राहों में देखे हैं कांटे बहुत,







सच की राहों में देखे हैं कांटे बहुत,
पर,कदम अपने कभी डगमगाए नहीं।
बदचलन है जमाने की चलती हवा,
इसलिए दीप हमने जलाए नहीं

जिन्दगी कुछ यूं तन्हा होने लगी है










जिन्दगी कुछ यूं तन्हा होने लगी है
अंधेरों से भी दोस्ती होने लगी है 
चमकते उजालों से लगता है डर
हर शमां वेबफा सी लगने लगी है 

विचार मनुष्य की संपत्ति हैं







ओमकार मणि त्रिपाठी
प्रधान संपादक – अटूट बंधन एवं सच का हौसला
जिस हृदय में विवेक का, विचार का दीपक जलता है वह हृदय मंदिर तुल्य है। विचार शून्य व्यक्ति, उचित अनुचित, हित-अहित का निर्णय नहीं कर सकता। विचारांध को स्वयं बांह्माड भी सुखी नहीं कर सकते। मानव जीवन ही ऐसा जीवन है, जिसमें विचार करने की क्षमता है, विचार मनुष्य की संपत्ति है। विचार का अर्थ केवल सोचना भर नहीं है, सोचने के आगे की प्रक्रिया है। विचार से सत्य-असत्य, हित-अहित का विश्लेषण करने की प्रवृत्ति बढती है। विचार जब मन में बार-बार उठता है और मन व संस्कारों को प्रभावित करता है

रविवार, 21 अगस्त 2016

लघुकथा - कला






तुम्हारा क्या … दिन भर घर में रहती हो … कोई काम धंधा तो है नहीं … यहाँ बक बक वहां बक बक … आराम ही आराम है … बस पड़े पड़े समय काटो । एक हम हैं दिन भर गधे की तरह काम करते रहते हैं ।
ये कहते हुए श्रीनाथ जी ऑफिस के लिए निकल गए ।
अनन्या आँखों में आंसू लिए खड़ी रही । ज्यादा पढ़ी लिखी वो है नहीं … घर के कामों के अलावा उसके पास जो भी समय होता कभी टीवी चला लेती कभी किसी को फ़ोन मिला लेती … आखिर समय तो काटना ही था ।
पर पति पढ़ा लिखा पुरुष है …. ऊंची पदवी , नाम , उसके पास समय का सर्वथा अभाव रहता है । जो थोडा बहुत समय मिलता भी है वह आने जाने वाले खा जाते हैं ।

शनिवार, 20 अगस्त 2016

हमारी ब्रा के स्ट्रैप को देखकर तुम्हारी नसें क्यों तन जाती हैं " भाई "




अरे! तुमने ब्रा ऐसे ही खुले में सूखने को डाल दी?’ तौलिये से ढंको इसे। ऐसा एक मां अपनी 13-14 साल की बेटी को उलाहने के अंदाज में कहती है।
‘तुम्हारी ब्रा का स्ट्रैप दिख रहा है’, कहते हुए एक लड़की अपनी सहेली के कुर्ते को आगे खींचकर ब्रा का स्ट्रैप ढंक देती है।
‘सुनो! किसी को बताना मत कि तुम्हें पीरियड्स शुरू हो गए हैं।’
‘ढंग से दुपट्टा लो, इसे गले में क्यों लपेट रखा है?’
‘लड़की की फोटो साड़ी में भेजिएगा।‘
‘हमें अपने बेटे के लिए सुशील, गोरी, खूबसूरत, पढ़ी-लिखी, घरेलू लड़की चाहिए।‘
‘नकद कितना देंगे? बारातियों के स्वागत में कोई कमी नहीं होनी चाहिए।‘
‘दिन भर घर में रहती हो। काम क्या करती हो तुम? बाहर जाकर कमाना पड़े तो पता चले।‘
‘मैं नौकरी कर रहा हूं ना, तुम्हें बाहर खटने की क्या जरूरत? अच्छा, चलो ठीक है, घर में ब्यूटी पार्लर खोल लेना।‘

गुरुवार, 18 अगस्त 2016

रक्षा बंधन -भाई बहन के प्यार पर हावी बाज़ार





मेरे भैया मेरे चंदा मरे अनमोल रतन
तेरे बदले मैं ज़माने की कोई चीज न लूँ
                              रेडियो पर बहुत ही भावनात्मक मधुर गीत बज रहा है | गीत को सुन कर बहुत सारी भावनाऐ   मन में उमड़ आई | वो बचपन का प्यार ,लड़ना –झगड़ना ,रूठना मानना | भाई –बहन का प्यार ऐसा ही होता है |इस  एक रिश्ते में न जाने कितने रिश्ते समाये हैं ,बहन ,बहन तो है ही ,माँ भी है और दोस्त भी | तभी तो खट्टी –मीठी कितनी सारी यादें लेकर बहने ससुराल विदा होते समय भाइयों से ये वादा लेना नहीं भूलती कि “भैया साल भर मौका मिले न मिले पर रक्षा बंधन के दिन मुझसे मिलने जरूर आना , और भाई भी अश्रुपूरित नेत्रों से हामी बहर कर बहन को विदा कर देता | दूर –दूर रहते हुए भी निश्छल प्रेम की एक सरस्वती दोनों के बीच बहती रहती ,और ये पावन  रिश्ता सदा हरा भरा रहता है |

सोमवार, 8 अगस्त 2016

जोरू का गुलाम





राधा आटा गूंधते गूंधते बडबडा रही थी " पता नहीं क्या ज्योतिष पढ रखी है इस आदमी ने हर बात झट से मान जाता है । उसका भी मन करता है रूठने का , और फिर थोडी नानुकुर के बाद मान जाने का । अभी कल कहा सर में दर्द है तो फौरन से झाडू पौंछा बरतन सब करके बैठ गया सर दबाने आराम पाकर थोड़ा आंखें क्या बंद की लगा पैर दबाने । पता नहीं इस आदमी में स्वाभिमान नाम की कोई चीज है कि नहीं । पिताजी ने न जाने किस लल्लू को पल्लू में बांध दिया । " 
तभी आहट हुई तो देखा विनोद बेसिन पर हाथ धो रहे थे । उसने पूछा " सब्जी नहीं लाये क्या । "
विनोद झुंझलाकर बाहर की तरफ जाते हुए बोला " जोरू का गुलाम समझ रखा है क्या , सामने सडक पर तो मिलती है खुद क्यों नहीं ले आती । " 

सपेरे की बिटिया


कभी पढ़ने आती थी हमारे स्कूल में,
सपेरो की बस्ती से---------------
एक सपेरे की बिटिया।
वे तमाम किस्से सुनाती थी साँपो के अक्सर,
वे खुद भी साँपो से खेलना जानती थी,
पर वे मासुम नही जानती थी,
इंसानी साँपो का जहर,

बैरी_सावन


मन के दबे से दर्द जगाने
फिर से बैरी सावन आया।
सूना आँगन सूनी बगिया
माना नहीं है कोई घर में
यादें कहती मुझे बुलाकर
हम भी तो रहती हैं घर में

सोमवार, 1 अगस्त 2016

मीना कुमारी -एक दर्द भरी ग़ज़ल





वंदना बाजपेयी
चिंदी चिंदी दिन मिला , तन्हाँ तनहा रात मिली
जितना जिसका आँचल था , उतनी उसको सौगात मिली 

मीना कुमारी के ये शब्द महज़ शब्द नहीं हैं |ये उनके जीवन की दर्द भरी दास्ताँ है | हर दिल अजीज ट्रेजडी क्वीन मीना कुमारी का जीवन सच्चे प्यार के लिए तरसती एक ऐसे ग़ज़ल बन कर रह गया जिसको गा सकना उनके लिए भी संभव नहीं रह सका | तभी तो उसकी अदाकारी के तमाम चाहने वालों के होते हुए भी नाम और शोहरत के आसमान पर बैठी एक उदास और वीरान जिंदगी अपने मन के आकाश की रिक्तता को समेटे महज ४० वर्ष की आयु में इस दुनिया को अलविदा कह कर चली गयी |जब भी मैं मीना कुमारी के बारे में सोंचती हूँ तो मुझे याद आती है दिल एक मंदिर में पति और प्रेमी के बीच झूलती मासूम स्त्री , कभी औलाद और पति के प्रेम के लिए तडपती ” साहब बीबी और गुलाम की छोटी बहू तो कभी दूसरे की संतान पर ममता लुटाती ” चिराग कहाँ , रौशनी कहाँ की नायिका | पर मेरी सुई अटक जाती है उस पाकीजा पर जो गाती है , ” ये चिराग बुझ रहे हैं , मेरे साथ जलते -जलते ……….. बुझते हुए चिरागों के साथ बुझती हुई मीना कुमारी की हर अदाकारी बेहतरीन है | क्योंकि कहीं न कहीं ये सारे पात्र उनकी जिंदगी का हिस्सा हैं |चलो दिलदार चलो , चाँद के पार चलो गाने वाली मीना कुमारी न जाने कौन सा चाँद पाने की आरज़ू लिए चाँद के पार चली गयी | इसके लिए मीना के इर्दगिर्द कुछ रिश्तेदार, कुछ चाहने वाले और कुछ उनकी दौलत पर नजर गढ़ाए वे लोग हैं, जिन्हें ट्रेजेडी क्वीन की अकाल मौत के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है