शनिवार, 24 सितंबर 2016

फीलिंग लॉस्ट : जब लगे सब खत्म हो गया है





वंदना बाजपेयी
आज मैं लिखने जा रही हूँ उन तमाम निराश हताश लोगों के बारे में जो जीवन में किसी मोड़ पर चलते – चलते अचानक से रुक गए हैं | जिन्हें गंभीर अकेलेपन ने घेर लिया है और जिन्हें लगता है की जिंदगी यहीं पर खत्म हो गयी है |सारे सपने , सारे रिश्ते , सारी संभावनाएं खत्म हो गयीं | यही वो समय है जब बेहद अकेलापन महसूस होता है | ऐसे ही कुछ चेहरे शब्दों और भावों के साथ मेरी आँखों के आगे तैर रहे हैं , जहाँ जिन्दगी अचानक से अटक गयी थी और उसका कोई दूसरा छोर नज़र ही नहीं आ रहा था ……..
* निशा जी , दो बच्चों की माँ , जब उसके सामने पति का दूसरा प्रेम प्रसंग सामने आया तो उसे लगा जैसे सब कुछ खत्म हो गया है | अपनी सारी त्याग , तपस्या प्रेम सब कुछ बेमानी लगने लगा | उस पर समाज का ताना ,” पति को सँभालने का हुनर नहीं आता , वर्ना क्यों वो दूसरी के पास जाता ” , जले पर नमक छिडकने के लिए पर्याप्त था | मृत्यु ही विकल्प दिखती , पर उसे जीना था , अपनी लाश से खुद ही नकालकर … अपने बच्चों के लिए |
*सुजाता , एक जीनियस स्टूडेंट जिसकी आँखों में बहुत सारे सपने थे | पर क्योकर उसका पढाई से मन हटता चला गया | वो खुद भी नहीं समझ पायी |

बुधवार, 21 सितंबर 2016

"अंतर "- अभिव्यक्ति का या भावनाओं का - ( समीक्षा - कहानी संग्रह : अंतर )







सही अर्थों में पूछा जाए तो स्वाभाविक लेखन अन्दर की एक बेचैनी है जो कब कहाँ कैसे एक धारा  के रूप में बह निकलेगी ये लेखक स्वयं भी नहीं जानता | वो धारा तो  भावनाओं  का सतत प्रवाह हैं , हां शब्दों और शैली के आधार पर हम उसे कविता कहानी लेख व्यंग कुछ भी नाम दें | ये सब मैं इस लिए लिख रही हूँ क्योंकि अशोक परूथी जी से मेरा पहला परिचय एक व्यंग के माध्यम से हुआ था | “ राम नाम सत्य है “ नामक व्यंग  उन्होंने हमारी पत्रिका “ अटूट बंधन “ के लिए भेजा था | रोचक शैली में लिखे हुए व्यंग को हमने प्रकाशित भी किया था | हमें पाठकों की प्रसंशा  के कई ई मेल मिले | उसके बाद एक सिलसिला शुरू हो गया | और अशोक जी के व्यंग मासिक पत्रिका “ अटूट बंधन “ व् हमारे दैनिक समाचार पत्र सच का हौसला में नियमित अंतराल पर प्रकाशित होने लगे | उन्हें  व्यंग विधा में एक बडे  पाठक वर्ग से सराहना मिली |

ये तिराहा हर औरत के सामने सदा से था है और रहेगा -







" तिराहा "एक ऐसा शब्द जो रहस्यमयी तो है ही  सहज ही आकर्षित भी करता है | हम सब अनेक बार अपने जीवन में इस तिराहे पर खुद को खड़ा पाते हैं | किसी भी मार्ग का चयन जीवन के परिणाम को ही बदल देता है | पर यहाँ  मैं बात कर रहीं हूँ वीणा वत्सल जी के उपन्यास “ तिराहा “की | जिसको मैंने अभी -अभी पढ़ा हैं | और पढने के बाद उस पर कुछ शब्द लिखने की गहरी इच्छा उत्पन्न हुई | “ तिराहा “   वीणा वत्सल सिंह जी का पहला उपन्यास है परन्तु कहीं से भी कमजोर नहीं पड़ता | कथा में सहज प्रवाह है व् लेखन में कसाव जिसके कारण पाठक उपन्यास  को पन्ने दर पन्ने पढता जाता है | आगे क्या हुआ जानने की इच्छा बनी रहती हैं |मेरा अपना मानना  है की किसी उपन्यास का सरल होना उसके लोकप्रिय होने की पहली शर्त है |
               “ तिराहा “ की कहानी तीन महिला पत्रों के इर्द गिर्द घूमती है | जहाँ एक ओर मुख्य नायिका अमृता है जो डॉक्टर होने के साथ साथ सभ्य , शालीन महिला भी है | और बेहद संकोची भी | सिद्धार्थ का प्रेम उसकी छुपी हुई प्रतिभाओं को निखारने में सहायक होता है

डॉ. रमा द्विवेदी के साहित्य में “भविष्य की नारी कल्पना” - शिल्पी “मंजरी”










“स्त्री विमर्श” एक ज्वलंत विषय के रूप में प्राचीन काल से ही किसी न किसी बहाने, प्रत्यक्ष या परोक्ष परिचर्चा का बिन्दु रहा है- समाजशास्त्रियों के लिए, राजनीतिज्ञों के लिए और साहित्य के लिए भी। तथापि पिछले ५०-६० वर्षों से यह स्त्री विमर्श, “नारी मुक्ति आन्दोलन” के नाम पर एक नए रूप में सार्वजानिक रूप से एक ज्वलंत मुद्दा बना हुआ है जिसे यूरोप में अस्तित्ववादी चिन्तक सीमोन-दि-वाउवा और अमेरिका में बेट्टी फ्रीडन जैसी प्रतिभाशाली और नारी अधिकारों की प्रखर प्रवक्ताओं से इस “नारी मुक्ति आन्दोलन” को पर्याप्त बल मिला और वैचारिक आयत के रूप में यह आन्दोलन अपना विस्तार करता हुआ पाश्चात्य सभ्यता, पाश्चात्य वेश-भूषा और पाश्चात्य सोच का स्वरूप धारण कर इस देश के युवा वर्ग में लोकप्रिय हुआ जिसे न्यूनाधिक समर्थन समाज से भी मिला एक समानांतर नवीन वैचारिक चिंतन, लेखन और राजनीतिक स्तर पर, साथ ही क्रिया-प्रतिक्रिया के रूप में इस विमर्श के पक्ष और विपक्ष में रह-रह कर उच्चस्वर उठते रहे और लगभग एक दशक से यह विमर्श “नारी सशक्तिकरण” के नाम से लगातार चर्चा और लेखन का प्रमुख बिन्दु रहा है जिसमें किशोर मनोविकृति ने आग में घी का कार्य किया। यह स्त्री विमर्श अब अपने परंपरागत स्वरूप तक ही सीमित न रहा, सत्ता की राजनीति ने इसे संसद में भी गुंजायमान कर दिया और दिल्ली की “दामिनी प्रकरण” से तो न्यायपालिका भी परोक्ष रूप से इस विमर्श में सम्मिलित हो गयी। भविष्य की फसल वर्तमान के बीज में गुम्फित होती है, अतएव भविष्य की योजनाओं और परिकल्पनाओं की एक भावी योजनाओं की रूपरेखा सर्वत्र अब एक आकार लेती दीखने लगी है– समाज में भी, राजनीति में भी और साहित्य में भी।

बुधवार, 14 सितंबर 2016

हिंदी दिवस पर विशेष - हिंदी जब अंग्रेज हुई





वंदना बाजपेयी
सबसे पहले तो आप सभी को आज हिंदी दिवस की बधाई |पर जैसा की हमारे यहाँ किसी के जन्म पर और जन्म दिवस पर बधाई गाने का रिवाज़ है | तो मैं भी अपने लेख की शुरुआत एक बधाई गीत से करती हूँ ……….
१ .. पहली बधाई हिंदी के उत्थान के लिए काम करने वाले उन लोगों को जिनके बच्चे अंग्रेजी मीडियम के स्कूलों में पढ़ते हैं |

२ …दूसरी बधाई उन प्रकाशकों को जो हिंदी के नाम पर बड़ा सरकारी अनुदान प्राप्त कर के बैकों व् सरकारी लाइब्रेरियों की शोभा बढाते हैं | जिन्हें शायद कोई नहीं पढता |

३… तीसरी और विशेष बधाई उन तमाम हिंदी की पत्र – पत्रिकाओ व् वेबसाइट मालिकों को जो हिंदी न तो ठीक से पढ़ सकते हैं , न बोल सकते हैं न लिख सकते हैं फिर भी हिंदी के उत्थान के नाम पर हिंदी की पत्रिका या वेबसाइट के व्यवसाय में उतर पड़े |

सोमवार, 5 सितंबर 2016

शिक्षक दिवस पर विशेष :मैं जानता था बेटी....( संस्मरण )


    





डॉ . भारती वर्मा 'बौड़ाई '
  ये तब की बात है जब मैं पांचवीं कक्षा में पढ़ती थी। एक सप्ताह में संस्कृत विषय के नौ पीरियड हुआ करते थे। मध्याह्न के तीन पीरियड में संस्कृत के गुरु जी सबकी लिखाई अच्छी हो, इसके लिए वे पुस्तक का एक पूरा पाठ लिखवा कर देखा करते थे। कक्षा के कुछ छात्र तो इस अंतिम पीरियड में भाग जाते, कुछ अधूरा पाठ लिख कर दिखाते थे। मेरी लिखाई अच्छी थी। मैं पूरा पथ लिखती, दिखाती और सदा वेरी गुड पाती थी। उन शैतान विद्यार्थियों की देखा-देखी मैंने भी लिखाई के पीरियड में आधा पाठ लिख कर दिखाना आरंभ किया और गुरु

शिक्षक दिवसपर विशेष : गुरू चरण सीखें



बैठ कर हम  गुरू चरण सीखे सभी
मान दे कर गुरू को सदा पूजे सभी
ज्ञान की नई विधा  सीख लें रोज हम
आज शिक्षक दिवस हम मनाये सभी

रविवार, 4 सितंबर 2016

पति -पत्नी के बीच सात्विक प्रेम को बढाता है तीज






विवाह की बस एक गाँठ दो अनजान - अपरिचित लोगोंको एक बंधन में बांध देती है जिसमें तन ही नहीं मन और आत्मा भी बंध  जाते हैं | जिससे ये प्रेम जिस्मानी नहीं रूहानी हो जाता है | वैसे भी कहते हैं जोड़े आसमान में बनाये जाते हैं | हमारे देश में तो पति पत्नी का रिश्ता जन्म - जन्मान्तर का माना जाता है |जिसके साथ जिन्दगी के हर छोटे से छोटे सुख - दुःख , अच्छे  - बुरे सब पल  बिताने हैं वो कोई अपरिचित तो नहीं हो सकता | उन दोनों को मिलाने में कोई न कोई दैवीय धागे जरूर काम करते हैं | | पति -पत्नी  बीच मनाये जाने वाले ये सारे व्रत त्यौहार उसी  सात्विक प्रेम को याद दिला कर  , प्रेम की रूहानी अनुभूति को तरोताजा कर देते हैं |ऐसा ही एक त्यौहार है तीज |