शुक्रवार, 10 मार्च 2017

होली के रंग - हास्य कविताओं के संग





जल्दी से कर लीजिये हंसने का अभ्यास
इस बार की होली तो होगी खासमखास
दाँतन बीच दबाइए लौंग इलायची सौंफ
बत्तीसी जब दिखे तो मुँह से आये न बास

                                                                                         होली और हास्य में चोली दामन का साथ है | रंगों और गुझिया के साथ अगर भांग का भी स्वाद हो तो कहने ही क्या  |  टेंशन करने के लिए तोपूरा साल है पर बेवकूफियों पर हंसने का मौका तो एक बार होली पर ही मिलता है , न सिर्फ दूसरों  की बल्कि खुद की |  तो रंगने रंगाने के इस त्यौहार में हम भी पिचकारी ले कर तैयार हैं ............... स्र्र्रर्र्र्रर ... जी हां ! हमारी पिचकारी से निकल पड़े हैं हास्य कविताओं के रंग | आइये आप भी रंग जाइए | आप सही को होली की हार्दिक शुभकामनायें 
      वंदना बाजपेयी
होली पर शैल चतुर्वेदी की तीन हास्य कवितायें 
माँ पर गया है
“बोल बेटा बोल
क्या खाएगा?
चॉकलेट?
नहीं!
आमलेट!
नहीं!
सेव-पपड़ी खाएगा?
नहीं!
जानता हूँ
माँ पर गया है न
मेरी खोपड़ी खाएगा?”
बीस बच्चों का बाप
प्रदर्शनी में
एक तम्बू के सामने
जोकर लगा था चिल्लाने में-
“आइए
बीस फुट लम्बा सांप देखिये एक आने में।”
तभी एक सज्जन पधारे
आधे पके थे
आधे कच्चे
साथ में थे बीस बच्चे
जोकर बोला – “बाहर क्यों खड़े हैं आप
भीतर देखिए बीस फुट लम्बा सांप
तोता गाता है
फ़िल्मी गाना
टिकिट सिर्फ एक आना।”
सज्जन बोले-“मेरे साथ तो बीस बच्चे हैं”
जोकर बोला-“बहुत अच्छे हैं
ये सब क्या आपके है?”
सज्जन बोले-
“जी हाँ, मुझ बदनसीब बाप के है।”
जोकर बोला-“जल्दी आइए
अपने बच्चों सहित
भीतर जाइए।”
सज्जन के भीतर जाते ही
जोकर प्रसन्न दीखने लगा
ज़ोरो से चीखने लगा-
“आइए, आइए
केवल दो आने में
तमाशे का मज़ा उठाइए
बीस फुट लंबा सांप देखिये
और साथ में
बीस बच्चों वाला बाप देखिये।”
तलाश नए विषय की
मत पूछिए कि आजकल क्या कर रहे हैं?
बस, पुरानी कविताओं में
नया रंग भर रहे हैं
लेकिन कितना ही भर लो
सब बेकार है
आज का श्रोता बड़ा समझदार है
फौरन ताड़ लेता है
अच्छे-अच्छे रंग बाज़ों का
हुलिया बिगाड़ देता है।
भगवान भला करें उन नेताओं का
जिनके भरोसे हमने
दर बरस निकाल लिए
और बाल बच्चे पाल लिए
किसी नेता की दाढ़ी से
कविता की गाड़ी खींचते रहे
किसी के मरे हुए पानी से
शब्दों की फुलवारी सींचते रहे
किसी के चरित्र पर चोट करते रहे
धोती को फाड़कर लंगोट करते रहे
कब तक फाड़ते!
घिसे हुए नेता की आरती
कब तक उतारते?
अब राजनीति में क्या रक्खा है
क्योंकि हर विरोधी
हक्का बक्का है।
उधर मैदान खाली है
और इधर मंच पर
कविता है, न ताली है।
चली हुई कविता को
कितना और चलाए
समझ में नहीं आता
नया विषय कहाँ से लाए?
एक मित्र ने सलाह दी-
“गीतों की पेरोडी सुनाओ।”
हमने जवाब दिया-
“पेरोडी पापुलर गीतों की बनाई जाती है
और हमें बताते हुए शर्म आती है
कि पिछले तीस बरसों में
एक ही गीत पापुलर हुआ
(कारवां ग़ुज़र गया ग़ुबार देखते रहे)
और उसकी इतनी पैरोडियाँ बन चुकी हैं
कि आने वाली पीढियाँ
पता लगाते-लगाते खत्म हो जएंगी
कि मूल गीत कौन-सा है।”
वह बोला-“फ़िल्मी गीतों की पैरोडी कैसी रहेगी?”
हमने कहा-“आजकल के फ़िल्मी गीत भी क्या हैं
(दे दे प्यार दे, प्यार दे, प्यार दे दे दे दे प्यार दे)
ऐसे गीत की पैरोडी ऐसी लगेगी
जैसे कोई कैबरे डाँसर
नाचते-नाचते कपड़े उतार दे।”
वह बोला-“न्यूज़ पेपर पढ़ो
देश में हज़ारो दुर्घटनाए हो रही है
उन पर लिखो।”
हमने कहा-“समाचार!
कहाँ हड़ताल हुई, कहाँ दंगा
कौन शहीद हुआ
कौन नंगा
यही पता लगाते-लगाते
सुबह से शाम हो जाती है
और समाचार पुराना पड़ते ही
कविता बेनाम हो जाती है।”
वह बोला-“हमारे देश की
सदाबहार समस्या है-डाकू।”
हमने कहा-“अगर किसी डाकू ने
मार दिया चाकू
तो बच्चे अनाथ हो जाएंगे।
भूख से परेशान होकर
डाकुओं के साथ हो जाएंगे।”
वह बोला-“चोर।”
हमनें कहा-“चोरों को छेड़ना भी
ख़तरे से खाली नहीं है
क्योंकि चोर इस ज़माने में
सम्मानित शब्द है
गाली नहीं है।”
वह बोला-“आसाम”
हमने कहा-“सलाह तो नेक है
लेकिन लिखने वाले सैकड़ो हैं
और विषय एक है।
पता ही नहीं चलता
कि कौन सी कविता किसकी है!
नहीं भैया
आसाम बहुत रिस्की है।
वह बोला-“ख़ालिस्तान!”
हमने कहा-“कविता का नहीं
कृपाण का मामला है
खत्म हो जाए इसी में भला है।”
वह बोला-“पुलीस”
हमने कहा-“पुलीस का सम्बन्ध चोरों से है
हम कवि हैं
अपनी छवि नहीं बिगाड़ेंगे
कूड़े को क़लम से नहीं बुहारेंगे।
वह बोला-“भ्रष्टाचार!”
हमने कहा-“एक ऐसा झाड़
जिसकी डालियाँ नीचे
और जड़ उपर है
उसे किसका डर है?”
वह बोला-“चुटकुले कवि सम्मेलनों की नाक हो गए हैं।”
हमने कहा-“वे भी आजकल
बहुत चालाक हो गए हैं।”
एक लावारिस चुटकुले को हमने
पाल पोस कर बड़ा किया
मगर ऐन वक्त पर ऐंठ गया
हमें अँगूठा दिखा कर
दूसरे की गोद में बैठ गया।
हमने पूछा तो बोला
‘माफ करना अंकल जी
यहाँ मेरे कई भाई बन्द हैं
आपके यहाँ अकेला फँस गया था।
तालियों तक के लिए तरस गया था।’
और चुटकुला बिना ताली के
ठीक उसी तरह है
जैसे जीजा बिना साली के
और गुंड़ा बिना गाली के।”
वह बोला-“फिर तो एक ही विषय बचा है
बीबी!”
हमने कहा-“बीबी का मज़ाक उड़ाएंगे
तो बच्चो के संस्कार बिगड़ जाएंगे।”
वह बोला-“संस्कार की चिंता करोगे
तो धन्धा कैसे करोगे
ऊपर उठने की कोशिश की
तो नीचे गिरोगे
जैसे भी बने
लोगों को हँसाओ
दाल रोटी खाओ
प्रभु के गुण गाओ।”
शैल चतुर्वेदी 

काका हाथरसी की कवितायें 
हिंदी की दुर्दशा -काका हाथरसी
बटुकदत्त से कह रहे, लटुकदत्त आचार्य
सुना? रूस में हो गई है हिंदी अनिवार्य
है हिंदी अनिवार्य, राष्ट्रभाषा के चाचा-
बनने वालों के मुँह पर क्या पड़ा तमाचा
कहँ ‘ काका ‘ , जो ऐश कर रहे रजधानी में
नहीं डूब सकते क्या चुल्लू भर पानी में
पुत्र छदम्मीलाल से, बोले श्री मनहूस
हिंदी पढ़नी होये तो, जाओ बेटे रूस
जाओ बेटे रूस, भली आई आज़ादी
इंग्लिश रानी हुई हिंद में, हिंदी बाँदी
कहँ ‘ काका ‘ कविराय, ध्येय को भेजो लानत
अवसरवादी बनो, स्वार्थ की करो वक़ालत
मोटी पत्नी…
ढाई मन से कम नहीं, तौल सके तो तौल।
किसी-किसी के भाग्य में, लिखी ठौस फ़ुटबौल।
लिखी ठौस फ़ुटबौल, न करती घर का धंधा।
आठ बज गये किंतु पलंग पर पड़ा पुलंदा।
कह ‘ काका ‘ कविराय, खाय वह ठूंसमठूंसा।
यदि ऊपर गिर पड़े, बना दे पति का भूसा।
पुलिस-महिमा…
पड़ा – पड़ा क्या कर रहा, रे मूरख नादान
दर्पण रख कर सामने , निज स्वरूप पहचान
निज स्वरूप पह्चान , नुमाइश मेले वाले
झुक – झुक करें सलाम , खोमचे – ठेले वाले
कहँ ‘ काका ‘ कवि , सब्ज़ी – मेवा और इमरती
चरना चाहे मुफ़्त , पुलिस में हो जा भरती
कोतवाल बन जाये तो , हो जाये कल्यान
मानव की तो क्या चले , डर जाये भगवान
डर जाये भगवान , बनाओ मूँछे ऐसीं
इँठी हुईं , जनरल अयूब रखते हैं जैसीं
कहँ ‘ काका ‘, जिस समय करोगे धारण वर्दी
ख़ुद आ जाये ऐंठ – अकड़ – सख़्ती – बेदर्दी
शान – मान – व्यक्तित्व का करना चाहो विकास
गाली देने का करो , नित नियमित अभ्यास
नित नियमित अभ्यास , कंठ को कड़क बनाओ
बेगुनाह को चोर , चोर को शाह बताओ
‘ काका ‘, सीखो रंग – ढंग पीने – खाने के
‘ रिश्वत लेना पाप ‘ लिखा बाहर थाने के
मुर्ग़ी और नेता…
नेता अखरोट से बोले किसमिस लाल
हुज़ूर हल कीजिये मेरा एक सवाल
मेरा एक सवाल, समझ में बात न भरती
मुर्ग़ी अंडे के ऊपर क्यों बैठा करती
नेता ने कहा, प्रबंध शीघ्र ही करवा देंगे
मुर्ग़ी के कमरे में एक कुर्सी डलवा देंगे
काका हाथरसी 


२..............


फागुन है 
मदभरी गुनगुनी धुप मे फागुन है,
आम की अमराई,कोयल की कूक में फागुन है।
ढ़लती उम्र मे कोई पढ़ रहा दोहे,
कोई कह रहा गोरी!तुम्हारे रुप मे फागुन है।
प्रीत के,प्यार के हर कही बरस रहे रंग,
फिर भी किसी विरहन के हूक मे फागुन है।
कोई हथेली से मल रहा गुलाल,
तो कही किसी प्रेमी के चूक मे फागुन है।
ढ़ोल की थाप पे मेरा झुम रहा मन,
हाय!रंग—कितने शुरुर मे फागुन है।
रंगनाथ द्विवेदी।
एड़वोकेट कालोनी,जौनपुर
३...............



टेलीफोन और मोबाइल की बातें 
अ ............
मै टेलीफोन सम धीर प्रिये,तुम मोबाइल सी चंचल हो
मै एक जगह पड़ा रहता प्रिये,तुम चंचल सी तितली हो
मै एक ही राग में गाता हूँ प्रिये ,तुम नए गीत सुनाती हो
मै टेबल का राजा हूँ प्रिये ,तुम जेब और पर्स की रानी हो
मै हूँ अनपढ़ सा प्रिये,तुम पढ़ी लिखी संदेशो की दीवानी हो
ब  …………
जिन्दगी अब तो हमारी मोबाईल हो गई
भागदोड मे तनिक सुस्तालू सोचता हूँ मगर
रिंगटोनों से अब तो रातें भी हेरान हो गई |
बढती महंगाई मे बेलेंस देखना आदत हो गई
रिसीव काल हो तो सब ठीक है मगर
डायल हो तो दिल से जुबां की बातें छोटी हो गई |
मिस्काल मारने की कला तो जेसे चलन हो गई
पकड़म -पाटी खेल कहे शब्दों का इसे हम मगर
लगने लगा जेसे शब्दों की प्रीत पराई हो गई |
पहले -आप पहले -आप की अदा लखनवी हो गई
यदि पहले उसने उठा लिया तो ठीक मगर
मेरे पहले उठाने पर माथे की लकीरे चार हो गई |
मिस्काल से झूठ बोलना तो आदत सी हो गई
बढती महंगाई का दोष अब किसे दे मगर
हमारी आवाजे भी तो अब उधार हो गई |
दिए जाने वाले कोरे आश्वासनों की भरमार हो गई
अब रहा भी तो नहीं जाता है मोबाईल के बिना
गुहार करते रहने की तो जेसे आदत बेकार हो गई |
मोबाईल ग़ुम हो जाने से जिन्दगी घनचक्कर हो गई
हरेक का पता किस -किस से पूछें मगर
बिना नम्बरों के तो जेसे जिन्दगी रफूचक्कर हो गई

स ..........
*संजय वर्मा “दृष्टी ”
जिन्दगी अब तो हमारी मोबाईल हो गई
भागदोड मे तनिक सुस्तालू सोचता हूँ मगर
रिंगटोनों से अब तो रातें भी हेरान हो गई |
बढती महंगाई मे बेलेंस देखना आदत हो गई
रिसीव काल हो तो सब ठीक है मगर
डायल हो तो दिल से जुबां की बातें छोटी हो गई |
मिस्काल मारने की कला तो जेसे चलन हो गई
पकड़म -पाटी खेल कहे शब्दों का इसे हम मगर
लगने लगा जेसे शब्दों की प्रीत पराई हो गई |
पहले -आप पहले -आप की अदा लखनवी हो गई
यदि पहले उसने उठा लिया तो ठीक मगर
मेरे पहले उठाने पर माथे की लकीरे चार हो गई |
मिस्काल से झूठ बोलना तो आदत सी हो गई
बढती महंगाई का दोष अब किसे दे मगर
हमारी आवाजे भी तो अब उधार हो गई |
दिए जाने वाले कोरे आश्वासनों की भरमार हो गई
अब रहा भी तो नहीं जाता है मोबाईल के बिना
गुहार करते रहने की तो जेसे आदत बेकार हो गई |
मोबाईल ग़ुम हो जाने से जिन्दगी घनचक्कर हो गई
हरेक का पता किस -किस से पूछें मगर
बिना नम्बरों के तो जेसे जिन्दगी रफूचक्कर हो गई
*संजय वर्मा “दृष्टी ”
मनावर (धार )

4.................
लघु हास्य कवितायें 

एक)
होली?
अगर 23 मार्च नै
फेर होली आवे सैं
तो म्हारे प्रदेश
हरियाणा में
जो कुछ दिन पहलां हौली
वह के था ?
दो)
अहसास!
मुझे
उनकी यह बात
बहुत अखरती है,
मुझे…
समय से पहले
बुढा करती हैं
मेरी …
आत्मा को,
झंझोड्ती है
जब…
कुछ हम-उम्र महिलायें,
दो-तीन बच्चो वाली अम्मायें
मुझे…
अंकल-अंकल करती हैं!
तीन)
“समस्या का समाधान”
सुनो, मेरे बेटा, मेरे अज़ीज़!
न जाने आज सुबह
किस मनहूस का मुंह देखकर उठा था मैं
कि सारा दिन खाना नही हुआ नसीब!
यह सुनकर ‘आन द स्पाट’ बोला मेरा बेटा –
“मेरे पूज्य पिता जी,
चाहते हो ‘गर’ अपनी समस्या का निवारण तो मेरी मानो और
सबसे पहले अपने ‘बेडरूम’ की दीवार से लगे आईने को दो हटा!”
अशोक परूथी “मतवाला”
5..................

फाग 
आज मुंडेर पर
गोरैया ने दी दस्तक
सोया सा था मन
अचानक जग उठा
खिड़की से झांका
रंग बसंती
सरसों फली
भँवरे ने पँख फै�ला
ली तरुण अंगडाई
खुल गई देखो
सर्दी के गठबंधन वाली
मुश्किल गांठे
आमोदप्रमोद को मन चाहे
खेले अंबीर गुलाल
तुझसे पूछ रहा गोरैया मै
फगुनाहट ले आई जो
शीतल कर गई————-
मेरा तन बदन
फगुआना हो गया हूँ
लगता हैं ——–फागुन मे
फगुआ आया रे
दीपक शर्मा अत्री दीपक शर्मा
कुरुक्षेत्र

६..................
आज तुम्हारी काहे प्रीतम 
कभी शब्दों से तीर चलाते
कभी चलाते गोली
आज तुम्हारी काहे प्रीतम
मीठी हो गई बोली……………….
रस में डूब गए तुम ही
या रस घोले हो स्वर में
जादू किया किसी ने तुमपर
या हो नव उमंग में
मैं गारियाती और तुम मीठे
गीत गाए हमजोली
आज तुम्हारी काहे ………….?
भीग गए प्रीत रस रंग में
हिय की पीर भूली उमंग मैं
बहे फागुन बयार मनभावन
खुशियां लेकर आई संग में
मन मतवाला भी बौराए
ज्यों खाए भंग की गोली
आज तुम्हारी काहे ……………..?
ईर्ष्या द्वेष की होलिका जली
निराशाएँ , कुण्ठा भाग चली
नव आशा की किरणें मन में
नव स्वप्न नयनों में पलीं
प्रीत रंग भर – भर पिचकारी
आई गुलाल उड़ावत टोली
आज तुम्हारी काहे…………..?
**********************
किरण सिंह 

फिर से रंग लो जीवन 
सुनो सखी , उठो
बिखरे सपनों से बाहर
एक नयी शुरुआत करो
किस बात का खामियाजा भर रही हो
शायद …
मन ही मन सुबक रही हो
कालिख भरी रात तो बीत ही चुकी
नयी धूप , नया सवेरा
पेंड़ों पर चहकते पंछियों का डेरा
उमंग से भरे फूल देख रहे हैं तुम्हें
फिर तुम क्यों न भूली अपनी भूल
प्रेम ही तो किया था
ऐतबार के फूल अंजुली में भरकर आगे बढ़ी थीं
टुकड़े हुए अरमानों के महल
पर यही तो अंत नहीं है
इस विशालकाय भुवन में
एक कोना तुम्हारा है
जहाँ सतरंगी रंगों को
उमंग की पिचकारी में भरकर
दोनों बाहें फैलाकर
कोई बना सहारा है
आओ सखी आओ
अपने मन की होलिका जलाओ
दर्द तड़फ के मटमैले आंसू
धो डालो इस होली में
फिर इन्द्रधनुष के सारे रंग
भरो अपनी झोली में
सरबानी सेनगुप्ता

सॉरी मम्मी हमको सुनाई ही दिया नहीं 
बच्चे…………………….और वो भी आज की जनरेशन के .बाप रे बाप ……………
आजकल के बच्चों ने कंप्यूटर ,मोबाइल ,लैपटॉप आदि को अपना दोस्त बना लिया है ।मोबाइल और लैपटॉप पर गाने सुनना तो जैसे उनका नित्य कर्म बन गया है.घर हो या बाहर, अक्सर बच्चे कानों में इअर फ़ोन लगाये मिल जाते हैं .सबसे ज्यादा हालात घर में ख़राब हैं । पहले तो बच्चे कुछ सुनते नहीं, यदि डांटो तो झट से सॉरी बोल देते हैं । इस वजह से हम मम्मी लोग कितनात्रस्त रहते हैं , इस व्यथा को मैंने कविता का रूप दिया है ।
सॉरी मम्मी हमको सुनाई दिया ही नहीं …………….

सुबह जब हम मंदिर में ईश्वर को मना रहे
दूध वाले भईया बाहर घंटी बजा रहे
जैसे तैसे पूजा छोड़ देखा बच्चे संग हैं
दोनों कान उनके द्वारपालों से बंद हैं
गुस्से में पूछा तुमने दूध क्यों लिया नहीं
सॉरी मम्मी हमको सुनाई ही दिया नहीं ………..

दूध चढ़ा हम सब्जी लेने को चले गए
बच्चो से गैस बंद करने को कह गए
लौट कर आये देखा घर सारा महक रहा
काला काला बर्तन था गैस पर चमक रहा
दूध तो गया ही गया रबड़ी भी रही नहीं
सॉरी मम्मी हमको सुनाई ही दिया नहीं ………..

बच्चों का प्रोजेक्ट बड़ी मेहनत से बनवाया
घंटे- डेढ़ घंटे सारा प्रोसीजर समझाया
दूजे दिन बोले मम्मी फिर समझाइये
ज्ञान को हमारे आप और भी बढाइये
कल था समझाया तुमने कुछ क्यों किया नहीं
सॉरी मम्मी हमको सुनाई ही दिया नहीं ।……..

सोने चले कहा अब हम से न बोलना
सेल्समेन आये दरवाज़ा नहीं खोलना
झपकी लगी ही थी की बच्चे उठा रहे
मम्मी , साबुन वाले अंकल बुला रहे
कहा गेट से ही उन्हें क्यों दफा किया नहीं
सॉरी मम्मी हमको सुनाई ही दिया नहीं ।……………
गुस्से में जब हम लाल हो जाते हैं
बच्चों पर चाहे जितना चिल्लाते हैं
पर जवाब बच्चे कभी भी नहीं देते हैं
श्रवण कुमार को भी मात कर देते हैं
इस अनोखी बात का है राज़ भी छिपा नहीं
सॉरी बच्चों तुमको सुनाई ही दिया नहीं ……………..

वंदना बाजपेयी






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