शुक्रवार, 17 मार्च 2017

साहसी महिलायें हर क्षेत्र में बदलाव की मिसाल कायम कर रही हैं- प्रदीप कुमार सिंह



             विश्व की साहसी महिलायें हर क्षेत्र में मिसाल कायम कर रही हैं। कुछ ऐसी बहादुर तथा विश्वास से भरी बेटियों से रूबरू होते हैं, जिन्होंने समाज में बदलाव और महिला सम्मान के लिए सराहनीय तथा अनुकरणीय मिसाल पेश की है। देश में डीजल इंजन ट्रेन चलाने वाली पहली महिला मुमताज काजी हो या पश्चिम बंगाल में बाल और महिला तस्करी के खिलाफ आवाज उठाने वाली अनोयारा खातून। ऐसी कई आम महिलाएं हैं जो भले ही बहुत लोकप्रिय न हो लेकिन उन्हें इस साल नारी शक्ति पुरस्कार के लिए चुना गया। राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च को 30 महिलाओं को पुरस्कृत किया। पुरस्कार पाने वालों में नागालैण्ड की महिला पत्रकार बानो हारालू भी शामिल है जो नागालैण्ड में पर्यावरण संरक्षण के लिए काम कर रही है। उत्तराखण्ड की दिव्या रावत ग्रामीणों के साथ मशरूम की खेती को विकसित करने की भूमिका निभा रही है। छत्तीसगढ़ पुलिस में कांस्टेबल स्मिता तांडी ने 2015 में जीवनदीप समूह बनाया जो गरीबों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए आर्थिक मदद करता है।
            सऊदी में कार चलाने तो फ्रांस में समान वेतन के अधिकार के लिए। पाकिस्तान में घरेलू हिंसा तो अमेरिका में राजनेताओं की भद्दी टिप्पणियों से बचने को। दुनिया के कई देशों में आधी आबादी बड़ी-बड़ी लड़ाइयां लड़ रही हंै। बीते साल मई में पाकिस्तान के काउंसिल आॅफ इस्लामिक आइडियोलाॅजी ने एक प्रस्ताव पेश कर पत्नियों की पिटाई को जायज ठहराया। इसके बाद ट्विटर पर ट्राईबीटिंगमीलाइटली अभियान शुरू हो गया। हजारों महिलाओं ने फोटो के साथ संदेश पोस्ट कर लिखे कि जैसे पति ने पीटा तो उसके हाथ तोड़ दूंगी। अमेरिका में इस साल 21 जनवरी की तारीख सबसे बड़े महिला आंदोलन की गवाह बनी। वाशिंगटन शहर में लाखों महिलाएं गुलाबी टोपी पहने सड़कों पर उतरीं। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्डो ट्रंप की महिला विरोधी टिप्पणियों का कड़ा विरोध किया। दुनियाभर में लाखों महिलाओं ने सोशल मीडिया पर उनका समर्थन किया।
            तुर्की के इस्तांबुल में नवंबर 2016 में हजारों महिलाओं ने उस बिल का विरोध किया जिसमें यह प्रावधान था कि यदि किसी नाबालिग लड़की से दुष्कर्म का आरोपी उससे शादी कर ले तो उसे सजा नहीं दी जाएगी। इसके विरोध में महिलाओं ने नारे लगाऐ। फिलहाल बिल वापस ले लिया गया पर महिलाएं दुष्कर्मियों को कड़ी सजा देने की मांग पर डटी हैं। चीन में फरवरी 2017 में एक महिला संगठन का सोशल मीडिया अकाउंट बंद कर दिया गया। इस अकाउंट में संगठन ने ए डे बिदाउट वूमेन शीर्षक से एक लेख पोस्ट किया था। साथ में अमेरिकी महिलाओं के प्रदर्शन की तस्वीर भी जारी की थी। चीनी महिलाएं सोशल मीडिया पर विचार व्यक्त करने की आजादी मांग रही हैं।
            बिहार की सुधा वर्गीज विकास और महिला सशक्तीकरण की पर्याय बन चुकी हैं। वर्गीज ने जीवन मुसहर जाति के विकास में समर्पित कर दिया है। इसके लिए सरकार ने 2006 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। पटना से सटे मनेर में दो लड़कियों पर इसलिए तेजाब डाल दिया गया क्योंकि वे दबंगों की छेड़खानी का विरोध करती थी। महाराष्ट्र की वर्षा जवलगेकर ने इस हमले की शिकार चंचल का साथ दिया। एक बार वर्षा पर भी हमला हुआ। तब से वे परिवर्तन केन्द्र से जुड़कर तेजाब पीड़ितों को इंसाफ दिलाने का काम कर रही हैं। उन्होंने एक पीआईएल अप्रैल 2013 में दर्ज की।  दिसम्बर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि तेजाब पीड़िता को विकलांग का दर्जा और मुआवजा 13 लाख रूपये दिए जाएं।
            देहरादून में ढोल की थाप इस पहाड़ी इलाके में महिला सशक्तीकरण की गूंज पैदा कर रही है। गायिका माधुरी बड़थ्वाल ने पहली बार महिलाओं का ढोल बैंड बनाया है। आकाशवाणी में 32 साल काम करने बाद माधुरी जब रिटायर होकर दून आई तब उन्होंने बीस ऐसी महिला सहयोगियों का ग्रुप तैयार कर लिया है जो ढोल वादन में पारंगत हो रही हैं। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर की अतिया साबरी तीन तलाक के खिलाफ आवाज बुलंद कर सुप्रीम कोर्ट पहुंची। अतिया का निकाह 5 मार्च 2012 को हरिद्वार के वाजिद अली से हुआ। दो बेटियां होने पर पति ने एक पत्र भेजकर तलाक दे दिया। अतिया ने आठ जनवरी 2017 को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। अतिया के मुताबिक, निकाह और तलाक के वक्त पति-पत्नी की सहमति जरूरी है। मगर पति ने तलाक के वक्त सहमति नहीं ली। महिलाएं घर बैठे ईमेल से भी किसी भी मामले की शिकायत दर्ज करवा सकती हैं। इसके लिए उन्हें थाने आने की जरूरत नहीं है।
            कहते है कि मारने वाले का हाथ पकड़ा जा सकता है, मगर कहने वाले की जुबान नहीं। जीवन में कुछ करना या बनना चाहते हैं, तो यह सोचो कि लोग क्या कहेंगे? हाॅलीवुड की एक सुप्रसिद्ध अभिनेत्री के शब्दों में - हर आवाज को यदि हम सुनंेगे, तो हम वे सब नहीं कर पायेंगे, जो हम करना चाहते हैं। मैंने इसी सूत्र को अपनाया है और मैं संतुष्ट हूं। हर समय लोगों की सोच की चिंता करते रहने से हमारी इच्छाएं दम तोड़ने लगती हैं। जब हम स्वयं से संतुष्ट हैं, तो फिर लोगों की बातों से बिल्कुल विचलित न हों। भारत की पहली महिला फायर फाइटर हर्षिणी कान्हेकर, जो नेशनल फायर सर्विसेज काॅलेज की पहली ग्रेजुएट हैं, कहती हैं कि मुझ पर भी लोगों ने बहुत आरोप लगाए। लेकिन मैंने लोगों की बातों पर ध्यान नहीं दिया और अपनी पूरी ऊर्जा फाइटर बनाने में लगा दी। आग पर काबू पाने वाली हर्षिणी आज महिलाओं की प्रेरणास्रोत हैं। महिलाएं हैं तो दुनिया है। हर पल, हर समय खुद को महत्वपूर्ण समझें, औरत का जितना सम्मान होगा दुनिया उतनी ही खूबसूरत होगी। समय के साथ माहौल में भी काफी बदलाव आया है। पुरूषों की सोच भी बदली है।
            काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्री सदानंद साही के अनुसार लगभग एक दशक पहले में विश्वविद्यालय के महिला अध्ययन कंेद्र से जुड़ा था। उस दौर में हमने महिला अध्ययन में पाठ्यक्रम आदि बनाए। तब हमें कुछ पुरूष सहकर्मियों की टिप्पणियां हैरत में डाल देतीं। वे कहते रहते कि कहां फंसे हो, महिलाएं वैसे ही बेहाथ हो गई हैं, आप लोग महिला अध्ययन कराकर और दिमाग खराब कर रहे हैं। तब मुझे लगा कि महिला अध्ययन की जरूरत महिलाओं से ज्यादा पुरूषों को है।
            श्री साही के अनुसार अभी जब एक नवयुवती गुरमेहर कौर ने कहा कि वह किसी से डरती नहीं है, तो हंगामा बरपा हो गया। क्या हमारा समाज अब भी इतना परिपक्व नहीं हुआ है कि वह किसी निडर लड़की के अस्तित्व को स्वीकार कर सके? गुरमेहर के जिस वीडियो को आधार बनाकर उनके खिलाफ वातावरण बनाया गया, उस वीडियो में वह एक ऐसे समाज की कल्पना करती दिखती हैं, जिसमें घृणा और युद्ध के लिए स्थान नहीं है। और क्यों न करें? युद्ध व आतंकवाद का सबसे बड़ा खामियाजा स्त्री को ही तो भुगतना पड़ता है। आतंकवाद का विरोध करने के लिए विश्व ने मलाला यूसुफजई का अभिनंदन किया। ऐसे में, यदि गुरमेहर युद्ध के उन्माद का विरोध करते दिखाई देती है तो आगे बढ़ हमें उनका अभिनंदन करना चाहिए। एक उदात्त व मानवीय दुनिया रचने की दिशा में हमें ठोस कदम उठाने चाहिए। 
            दिल्ली की डाॅ. किरण मार्टिन ने अपने अनुभव का शेयर करते हुए बताया कि मैं एक डाॅक्टर हूं और शुरू से ही मुझमें गरीब और बेसहारा लोगों की सेवा करने की भावना रही है। वर्ष 1988 की बात है। अचानक मुझे एक दिन पता चला कि दक्षिण दिल्ली की झुग्गी-बस्तियों में हैजा फैल गया है, जिस कारण स्थिति गंभीर हैं। मैंने उसी समय वहां का रूख किया। पर झुग्गी में घुसते ही मैं स्तब्ध रह गई। उससे पहले मैं कभी झुग्गी के अंदर नहीं गई थी। वहां चारों तरफ गंदगी बिखरी थी। बच्चे गंदगी के पास ही खेल रहे थे। मैंने तत्काल किसी से एक मेज मांगा और एक पेड़ के नीचे बैठ गई। पेड़ के नीचे बैठकर ही बीमारों का इलाज किया।
            डाॅ. किरण मार्टिन ने उसी झुग्गी बस्ती में एक छोटे से कमरे में अपनी क्लीनिक खोली। कुछ दिनों तक वहां काम करने के बाद मैंने खासकर वहां की औरतों की दशा सुधारने के लिए आशा सोसाइटी की स्थापना की। मैंने वहां की औरतों को कम्युनिटी हेल्थ वर्कर के रूप में तैयार करना शुरू किया। मैंने उन्हें पौष्टिक भोजन, साफ-सफाई, खुले मंे शौच की आदत छोड़ने और बच्चों के टीकाकरण के बारे में समझाया। आज हर झुग्गी बस्ती में एक आशा सोसाइटी है, जहां एक क्लीनिक है। आशा सोसाइटी के हस्तक्षेप से दिल्ली की झुग्गी-बस्तियों में नवजात मृत्यु दर तो घटी ही है, प्रसव के समय माताओं की मृत्यु के मामले भी न के बराबर रह गए हैं। आज मैं दिल्ली की करीब साठ झुग्गी-बस्तियों में घूमती हूं। वहां के पांच लाख से अधिक मरीज मेरी देख-रेख में ठीक हुए हैं। अब झुग्गियों में रहने वाले लोगों का जीवन स्तर सुधरा है और उनकी आय भी बढ़ी है। 
  प्रदीप कुमार सिंह,
 शैक्षिक एवं वैश्विक चिन्तक           


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