बुधवार, 9 अगस्त 2017

दर्द से कहीं ज्यादा दर्द की सोंच दर्दनाक होती है






दर्द की कल्पना उसकी तकलीफ को दोगना कर देती है | क्यों न हम खुशियों की कल्पना कर उसे दोगुना करें – रॉबिन हौब 

             एक क्लिनिक का दृश्य डॉक्टर ने बच्चे से कहा कि उसे बिमारी ठीक करने के लिए  इंजेक्शन लगेगा और वो बच्चा जोर – जोर से रोने लगा |नर्स मरीजों को इंजेक्शन लगा रही थी |  उसकी बारी आने में अभी समय था | बच्चे का रोना बदस्तूर जारी था | उसके माता – पिता उसे बहुत समझाने की कोशिश कर रहे थे की बस एक मिनट को सुई चुभेगी और तुम्हे पता भी नहीं चलेगा | फिर तुम्हारी बीमारी ठीक हो जायेगी | पर बच्चा सुई और उसकी कल्पना करने में उलझा रहा | वो लगातार सुई से चुभने वाले दर्द की कल्पना कर दर्द महसूस कर रोता रहा | जब उसकी बारी आई तो नर्स को हाथ में इंजेक्शन लिए देख उसने पूरी तरह प्रतिरोध करना शुरू किया |



 नर्स समझदार थी | मुस्कुरा कर बोली ,” ठीक है मैं इंजेक्शन नहीं लगाउंगी | पर क्या तुमने हमारे हॉस्पिटल की नीले पंखों वाली सबसे बेहतर चिड़िया देखी  है | वो देखो ! जैसे ही बच्चा चिड़िया देखने लगा | नर्स ने इंजेक्शन लगा दिया | बच्चा हतप्रभ था | सुई तो एक सेकंड चुभ कर निकल गयी थी | वही सुई जिसके चुभने के भय से वो घंटा  भर पहले से रो रहा था |

                वो बच्चा था पर क्या हम सब भी ऐसे ही बच्चे नहीं हैं | क्या हम सब आने वाले कल में होने वाली घटनाओं के बारे में सोंच – सोंच कर इतने भयभीत नहीं रहते की अपने आज को नष्ट किये रहते हैं | वास्तव में देखा जाए तो जीवन में जितनी भी समस्याएं हैं | उनमें से कुछ एक को छोड़कर कल्पना में ज्यादा डरावनी होती हैं | हम बुरे से बुरे की कल्पना करते हैं और भयभीत हो जाते हैं |


बुरे से बुरा सोंचने के कारण  एक नकारात्मक्ता  का  का वातावरण बनता है | यह नकारात्मकता गुस्से झुन्झुलाह्ट या चिडचिडेपन के रूप में नज़र आती हैं | जो न केवल हमारे वर्तमान को प्रभावित करती है बल्कि हमारे रिश्तों को भी ख़राब कर देती है |कभी आपने महसूस किया है की हम अपने अनेक रिश्ते केवल इस कारण खो देते हैं क्योंकि हम उनकी छोटी से छोटी बात का आकलन करते हैं | और उन्के बारे में बुरे से बुरी राय बनाते हैं |फलानी चाची अपनी परेशानी से जूझ रही है | हमारे घर जाते ही उन्होंने वेलकम स्माइल नहीं दिया | हमने उनसे उनकी समस्या पूंछने के बाजे मन ही मन धारणा बना ली की वो तो हमारी नयी गाडी , साडी या पर्स देखर जल - भुन गयीं | इस कारण हमें देख कर मुस्कुराई भी नहीं | अगली बार बदला लेने की बारी हमारी | वो हमारे घर आयेंगी तो हम भी नहीं मुस्कुराएंगे | 


इस तरह बात साफ़ करने के स्थान पर  उस राय के कारण हम खुद ही एक दूरी बढाने लगते हैं |  जिसका दूरगामी प्रभाव पड़ता है |रिश्ता कच्चे धागे सा टूट जाता है | रिश्तों की भीड़ में हम अकेले होते जा रहे हैं | पर इसका दोष क्या हमारे सर नहीं है | बात केवल किसी के घर जाने की नहीं है | बच्चा पढ़ेगा कैसे , लड़की देर से आई कहीं बिगड़ न गयी हो , हेल्थ प्रोग्राम देख कर बार बार सोंचना की कहीं यह बिमारी हमें तो नहीं है या हमें न हो जाए | सब मिलकर एक नकारात्मक वातावरण बनाते हैं | हो सकता है ऐसा कुछ न हो पर हम सोंच में उन विपरीत परिस्तिथियों को साक्षात महसूस करने लगते हैं | भय और नकारात्मकता का वातावरण बना लेते हैं | 



क्यों नहीं हम हर  बात में कोई अच्छाई  ढूंढें या कम से कम संदेह  का लाभ दे दें | देखा जाए तो  भविष्य की कल्पना एक ऐसा हथियार है ,जो ईश्वर प्रदत्त वरदान है |  जिससे हम आने वाले खतरे के प्रति सचेत होकर अपनी तैयारी कर सके न की बुरे से बुरा सोंच कर वास्तविक परिस्तिथियों से कहीं ज्यादा तकलीफ भोग सकें| 

अब जैसा की  श्री देसाई का तरीका है |उनके सीने के पास एक गाँठ महसूस हुई | जब डॉक्टर को दिखाने गए तो  डॉक्टर ने उसको बायोप्सी करने को कहा | उसकी पत्नी चिंतित हो गयी | बुरे से बुरे की कल्पना कर वो रोने लगीं |श्री देसाई ने  हँसकर  अपनी पत्नी से कहा | अभी क्यों चिंता कर रही हो | अभी कैंसर निकला तो नहीं | हो सकता है गाँठ बिनाइन हो और कैंसर निकले ही ना | फिर ये सारे  आँसूं बेकार हो जायेंगें |अभी  का पल तो मत खोओ  | 

कल  जो होना है वो होना है | तो क्यों न हम अच्छी से अच्छी कल्पना करके अपने वर्तमान को दोगुनी खुशियों से भर दें | 




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