मंगलवार, 31 जनवरी 2017

एक महानसती थी “पद्मिनी”








लेखक:-पंकज प्रखर

एक सती जिसने अपने सतीत्व की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया उसकी मृत्यु के सैकड़ोंवर्ष बाद उसके विषय में अनर्गल बात करना उसकी अस्मिता को तार-तार करना कहां तक उचित है | ये समय वास्तव में संस्कृति के ह्रास का समय है कुछ मुर्ख इतिहास को झूठलाने का प्रयत्न करने में लगे हुए है अब देखिये एक सर फिरे का कहना है अलाउद्दीन और सती पद्मिनी में प्रेम सम्बन्ध थे जिनका कोई भी प्रमाण इतिहास की किसी पुस्तक में नही मिलता| लेकिन इस विषय पर अब तक हमारे सेंसर बोर्ड का कोई भी पक्ष नही रखा गया है वास्तव में ये सोचनीय है |रानी पद्मिनी का इतिहास में कुछ इस प्रकार वर्णन आता है की “पद्मिनी अद्भुत सौन्दर्य की साम्राज्ञीथी और उसका विवाह राणा रतनसिंह से हुआ था एक बार राणा रतन सिंह ने अपने दरबार से एक संगीतज्ञ को उसके अनैतिक व्यवहार के कारण अपमानित कर राजसभा से निकाल दिया | वो संगीतज्ञ अलाउद्दीन खिलजी के पास गया और उसने पद्मिनी के रूप सौन्दर्य का कामुक वर्णन किया | जिसे सुनकर अलाउद्दीन खिलजी प्रभावित हुआ और उसने रानी पद्मिनी को प्राप्त करने की ठान ली | इस उद्देश्य से वो राणा रतन सिंह के यहाँ अतिथि बन कर गया राणा रतन सिंह ने उसका सत्कार कियालेकिनअलाउद्दीन ने जब रतनसिंह की महारानी पद्मिनी से मिलने की इच्छा प्रकट की तो रत्न सिंह ने साफ़ मना कर दिया क्योंकि ये उनके वंश परम्परा के अनुकूल नही था |

व्यंग्य लेख -चुनावी घोषणापत्र






-रंगनाथ द्विवेदी। जज कालोनी,मियाँपुर जौनपुर। मै आज कई वर्षो से हर पार्टी के चुनावी घोषणापत्र को---काफी भावुक तरीके से पढ़ता व सुनता हु लेकिन हर मर्तबा मेरे हिस्से "एक ना खत्म होने वाला विस्फोटक दुख हाथ आता है,और वे दुख मेरे लिये विश्व के प्रथम दुख की तरह है" अर्थात--घोषणापत्र के किसी भी क्रम मे वे लाइन आज तक नही दिखी कि इस देश अर्थात प्रदेश के कुँवारो के लिये,खासकर जो विषम आर्थिक तंगी की वजह से"स्त्री-पुरुष के अश्वमेध मिलन से वंचित है -उन पिड़ित कुँवारो को हमारी सरकार बनते ही,सर्वप्रथम उन्हे एक योग्य व सुशील कन्या की व्यवस्था कर वैवाहिक जीवन से आहलादित किया जायेगा"।

सोमवार, 30 जनवरी 2017

हम सबकी जिम्मेदारी, मिलकर बनाये दुनियाँ प्यारी


          



प्रदीप कुमार सिंह पाल’,
शैक्षिक एवं वैश्विक चिन्तक


  मानव जाति के अन्नदाता किसान को जमीन को कागजी दांव-पेच से आगे एक महान उद्देश्य से भरे जीवन की तरह देखना चाहिए। कागजी दांव-पेच को हम एक किसान की सांसारिक माया कह सकते हैं, लेकिन अब जमीन पर पौधे लगाने की योजना है, ताकि हमारा सांसारिक मोह केवल जमीनी कागज का न रहे, बल्कि जीवन का एक मकसद बनकर अन्नदाता तथा प्रकृति-पर्यावरण से भी जुड़ा रहे। किसान को अपने उत्तम खेती के पेशे का उसे पूरा आनंद उठाना है। सब्सिडी का लोभ और कर्ज की लालसा किसान को कमजोर करती है। जमीन बेचने की लत से छुटकारा तभी मिलेगा, जब हम धरती की गोद में खेलेंगे, पौधे लगाएंगे। जमीन-धरती हमारी माता है। परमात्मा हमारी आत्मा का पिता है। केवल धरती मां के एक टूकड़े से नहीं वरन् पूरी धरती मां से प्रेम करना है। धरती मां की गोद में खेलकूद कर हम बड़े होते हैं। धरती मां को हमने बमों से घायल कर दिया है। शक्तिशाली देशों की परमाणु बमों के होड़ तथा प्रदुषण धरती की हवा, पानी तथा फसल जहरीली होती जा रही है।
                     अक्सर हमारी पूरी उम्र गुजर जाती है और यह तय ही नहीं कर पाते कि हम यहां हैं क्यों? इससे हमारी जीवन की गुणवत्ता दोयम दर्जे की हो जाती है। गुणवत्ता सुधारनी है, तो हमें पहले-पहल बस इतना करना चाहिए कि इसका एक उद्देश्य तय करें।

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

सुविचार - चाणक्य नीति


सुविचार - अवसर


सुविचार - मत बदलिए


सुविचार - अपनी कहानी के लेखक


सुविचार - सफलता का मूल्य


सुविचार -आशा


सुविचार - किताबें


सुविचार - बदलाव


सुविचार - अहमियत


सुविचार - रिश्ते


सुविचार - रिश्ते



सुविचार - युद्ध


सुविचार - मुक्ति


सुविचार - यकीन


सुविचार - खुद से प्यार



बुधवार, 18 जनवरी 2017

मरुस्थली चिड़िया के सिर्फ तुम

       
     

सुबह से ही अस्पताल में मरीजों का तांता लगा हुआ था ।चाय पीना तो छोड़ो लू जाने की भी फुरसत नहीं मिल रही थी । जाने कहाँ से ये मरीजों का छत्ता टूटकर भिनभिना रहा था ।हालाँकि किसी भी डाक्टर को मरीज बुरे नहीं लगते लेकिन आज अक्की आने वाली थी और मैं उसे तसल्ली से चेक करना चाहता था । जब से सुबह उसकी माँ से बात हुई थी मैं असमंजस में था ।उसके एक हाथ को दो महीने पहले मगरमच्छ चबा गया है और वो गहरे सदमे में मानों गुम सी हो गयी है, ये सुनकर ही मेरे दिमाग के सारे पाइप टपर-टप-टप करने लगे थे ।
                   बहुत मामूली सी दिखने वाली अक्की भीतर से इतनी संवेदनशील और संयमी हो सकती है कोई सोच भी नहीं सकता ।कोई क्या !!!! मैं खुद भी तो उसे छ सालों से जानता हूँ पर कभी उसके जीवन को पढ़ नहीं पाया ।   

आखिरी भूल




लाख कोशिशों के बाद भी माधवी स्वयं को संयत नहीं कर पा रही थी, मन की उद्विग्नता चरम पर थी l जाते हुए जेठ की प्रचण्ड तपन लहुलुहान मन की पीड़ा से एकाकार होकर जैसे आज जीते जी उसे जला देना चाहते थे l शाम के सात बजने वाले थे पर बाहर दिशाओं में हलकी उजास अब तक कायम थी, यह उजास जैसे माधवी की आँखों में, बदन में शोलों की तरह चुभने लगा l वह छुप जाना चाहती थी, अँधेरे में कहीं गुम हो जाना चाहती थी, घर परिवार समाज सबकी नज़रों से दूर, यहाँ तक कि अपने आप से भी दूर … ओझल हो जाना चाहती थी l
दोनों बच्चे पढ़ रहे थे, सास-ससुर ड्राइंग रूम में टीवी देख रहे थे, वह किचेन में खाना बना रही थी पर हाथों के कम्पन से आज सारे काम हीं गलत हुए जा रहे थे l माँ का चेहरा और बातें ज़ेहन से हट हीं नहीं रही थी … विचारों के कश्मकश और रसोईघर के धुएँ में उसका दम घुटने लगा … पसीने में तरबतर हुई वह हाँफती हुई किचन से निकलकर आँगन में आ गयी l

ऐसे थे हमारे कल्लू भईया! (एक सच्ची कहानी)


बात 1986 की है मैं उस समय हाईस्कूल का छात्र हुआ करता था। मेरी दोस्ती हुई राजीव मिश्रा नाम के एक सहपाठी के साथ। प्यार से उन्हें लोग टिल्लू भाई पुकारा करते थे। टिल्लू के साथ दोस्ती के बाद मैंने उनकी दो आदतों को अपनी आदतों में शामिल कर लिया। एक था उनके नाई अयूब भाई से बाल कटवाना और दूसरा उनके साथ मल्हू भाई के दुकान पर रोज जाकर दोहरा खाना। दोहरा खाने का एक सबसे बड़ा फायदा यह था कि घर पर किसी को पता नहीं चलता था कि मैं दोहरा (पान में पड़ने वाला मीठा मसाला) खाता हूँ। चूंकि इसमें पान, चूना या कत्था जैसी कोई चीज नहीं होती थी इसलिए मुँह में कुछ लगता नहीं था और मै घर अपनी माता जी से डांट खाने से बच जाता था।
मल्हू भईया के तीन और भाई थे। सबसे बड़े ज्ञान भईया, उसके बाद कल्लू भईया और सबसे छोट थे दिनेष। टिल्लू की दोस्ती और मल्हू भाई के दोहरे से मुझे ऐसा प्यार हुआ कि मैं शाम को कोचिंग से सीधे मल्हू भाई की दुकान पर पहुंच जाता और कुछ समय वहीं पर टिल्लू के साथ बिताता। धीरे-धीरे मल्हू भाई के साथ ही साथ उनके सभी भाईयों से मेरी दोस्ती हो गई।

घरेलू पति



विशेष सोच रहा हैं। आने का सम्भावित समय निकल गया हैं।………अब तो सात भी बज चुके हैं। शंका-कुशंका डेरा डालने लगी थीं।………अणिमा अब तक निश्चय ही आ जाती हैं । फिर आज क्या हुआ ? अनहोनी की आशंका से वह ग्रस्त होता जा रहा है।……… एक नजर किटटू पर जाती है और फिर दूसरी नजर बेबी पर आकर ठहर जाती हैं।………. अगले ही पल उसकी निगाह घड़ी की टिक-टिक पर स्थिर हो जाती और वहाॅ से उसके कान टिक-टिक से इतर कुछ और सुनने को तत्पर होते हैं, शायद काल बेल की आवाज या दरवाजे की ठक-ठक।……ऐसा कुछ भी आभास नहीं होता है, निराश वापस कमरे पर आकर घूमने लगती है।……..उसका मन किया उसे काल करी जाये, परन्तु ठिठक गया। अणिमा का रिसपांस ऐसे मामलों में काफी तल्ख होता है और उसकी काल करने कह भावना को ठेस लगेगी। उसकी काल अपना अर्थ खो देगी और परिवाद को जन्म देगी और उसकी चिंता परिहास बनकर रह जायेगी। आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर चलेगा और वातावरण कलुषित हो जायेगा। इन्तजार करते है।

अंधी खोहों के परे


सांझ की धुंध में, रात की स्याही घुलने लगी थी. सर्दहवाओं के खंजर, सन्नाटे में सांय- सांय करते…उनकी बर्फीली चुभन, बदन में उतरती हुई. बाहर ही क्यों, भीतर का मौसम भी सर्द था. मल्लिका को झुरझुरी सी हुई. गोपी की किताबेंसहेजते हुए, दृष्टि खिड़की पर जा टिकी. जागेश अंकल की अर्थी सजने लगी थी. ‘स्यापा’ करने वाली स्त्रियों के साथ, रीति आंटी भी आयीं और अंकल की देह पर, पछाड़ खा- खाकर गिरने लगीं. उनका विलाप तमाम ‘आरोह- अवरोह’ के साथ, मातम की बेसुरी धुन जैसा था. वह ‘नौटंकी’ देख- सुनकर, उसे जुगुप्सा होने लगी.
रीति ने दोहाजू जागेश से ब्याह, इस आश्वासन पर किया था कि उनके बच्चों को, अपने बच्चों सा लाड़ देगी. लेकिन ब्याह के चंद दिनों में ही उसने, अपना असल रंग दिखा दिया. घर अस्त – व्यस्त हो गया. बच्चों की देखभाल तो दूर; वह खुद को भी संभाल न सकी…

अस्तित्व


अम्बा … पर्वतों की छाँव पिथौरागढ़ में रहनेवाली है । उसकी पांच बेटियां व एक बेटा सुधीर है । बचपन से ही पांच बहिनों में सबसे छोटा सुधीर माँ का बेहद दुलारा था । सुधीर को आज भी वो दिन याद है जब वह चार वर्ष का था और उसके पिता की खाई में गिरने से मृत्यु हो गई थी । माँ का चूड़ियाँ तोडना … रोना तड़पना … आज भी उसकी आँखें नम कर देता है ।कितनी अकेली हो गयी थी वो |बिलकुल टूट सी गयी थी |
पहाड़ों पर रहने वाले ही जानते हैं की उनकी जिंदगी कितनी कठिन होती है | पर्वतों पर रहने वालों को पर्वत सा ही कलेजा चाहिए | तभी तो अम्बा ने बड़ी हिम्मत से घर को संभाला । कम उम्र , पति का वियोग , बच्चों की जिम्मेदारी … लड़कियों की शादी की चिंता ऊपर से स्वयं उसका अल्प शिक्षित होना । पर वो अटल दुःख के इन थपेड़ों से टकराती रही । पर इस पहाड़ के अन्दर एक नदी भी बहती थी , बिलकुल मीठे पानी की , अपने बच्चों की खातिर , तभी तो दिन – रात मेहनत करके दूसरों के खेतों में मजदूरी करके वह जब घर आती तो सुधीर को अपनी गोदी में लिटा कर लोरी सुनाना नहीं भूलती ।पहाड़ी लोक लोक गीत और उनकी मिठास …. सुधीर भी बहार से कठोर और अन्दर से मुलायम होता चला गया |

पतुरिया


“अम्मा मैं बहुत अच्छे नम्बर से पास हो गई हूँ । अब मैं भी पी सी एस अधिकारी बन गयी ।”
बेटी दुर्गा ने अपने पी सी एस की परीक्षा उत्तीर्ण करने की सूचना को जैसे ही नैना को बताया नैना की आँखों से आंसू छल छला कर बहने लगे ।
“अरी मोरी बिटिया बस तुमका ही देखि देखि ई जिंदगी ई परान जिन्दा रहल । ” आज हमार सपना पूरा हो गइल । तोरे पढाई माँ आपन पूरा गहना गीठी सब बेच देहली हम । दू बीघा खेत बिक गइल । चार बीघा गिरो रखल बा । आज तू पास हो गइलू त समझा भगवान हमरो पतुरिया जात के सुन लिहलें ।
दुर्गा को गले लगा कर काफी देर तक नैना रोती रही । माँ को देख कर दुर्गा की आँखों में भी आंसू आ गए ।दुर्गा की आँखों के सामने वह बचपन का सारा मंजर घूम गया था । लोग बड़ी हिकारत भरी नजरों से देखते थे । माँ का समाज में कोई सम्मान नही था । गांव में आने वाले लोग घूर घूर के जाते थे । नैना ने बहुत साफ शब्दों में सबको बता दिया था बेटी नाच गाना नही सीखेगी । स्कूल जायेगी और साहब बनेगी । गाव का वह माहौल जिसमे पढाई से कोई लेना देना ही नही था । अंत में माँ ने सरकारी स्कूल के छात्रावास में रखकर पढ़ने का अवसर दिलाया ।

फिर एक बार


फैक्ट्री कासालाना जलसा होना था. तीन ही सप्ताह बच रहे थे. कायापलट जरूरी हो गया;बाउंड्री और फर्श की मरम्मत और कहीं कहीं रंग- रोगन भी. आखिर मंत्री महोदय को आना था. दरोदीवार को मुनासिब निखार चाहिए.अधिकाँश कार्यक्रम, वहीं प्रेक्षागृह में होने थे. उधर का सूरतेहालभी दुरुस्त करना था. ए. सी. और माइक के पेंच कसे जाने थे. युद्धस्तर पर काम चलने लगा;ओवरसियर राघव को सांस तक लेने की फुर्सत नहीं. ऐसे में,नुक्कड़- नाटक वालों का कहर… लाउडस्पीकर पर कानफोडू, नाटकीय सम्वाद!! प्रवेश- द्वार पर आये दिन, उनका जमावड़ा रहता. अर्दली बोल रहा था- यह मजदूरों को भड़काने की साज़िश है. नुक्कड़- नाटिका के ज्यादातर विषय, समाजवाद के इर्द गिर्द घूमते.
एक दिन तो हद हो गयी. कोई जनाना आवाज़ चीख चीखकर कह रही थी, “बोलो कितना और खटेंगे– रोटी के झमेले में??होम करेंगेसपने कब तक – बेगारी के चूल्हे में?!

बेबस बुढापा


उमा के कॉलेज की छुट्टी आज साढे चार बजे ही हो गई। वैसे तो कॉलेज का समय एक से छः बजे तक है, परन्तु आज कॉलेज के ट्रस्टी दीनानाथ जी का आकस्मिक निधन हो जाने की वजह से छुट्टी डेढ घण्टा पहले ही कर दी गई। यूं तो यह खबर बहुत दुःखद थी, पर उमा यह सोचकर काफी खुश थी कि चलो कम-से-कम आज का यह डेढ-दो घण्टा वह अपने दद्दू के साथ बिता पायेगी। रोज तो इतनी भागमभाग रहती है कि दस मिनट भी उनके पास बैठ पाने की फुर्सत नहीं मिल पाती। मम्मी, पापा, मैं सब कितना बिजी रहते हैं कि दद्दू के लिये जरा भी वक्त नहीं निकाल पाते। दद्दू अकेले बहुत बोर हो जाते होंग। पर करें भी तो क्या? हम सब की भी तो कितनी मजबूरियां हैं। शहरों में वक्त तो इस तरह कम पडता जा रहा है जिस तरह सहरा में पानी। एक बडा शहर कितना वक्त छीन लेता है ना हमसे….. जो वक्त हमारे अपनों के लिए होता है…. और वो इंसान कितना अकेला पड जाता है जो इस शहरी भागमभाग का हिस्सा नहीं है…?

तबादले का सच


शालिनी का आज दफ्तर में पहला दिन था। सुबह से काम कुछ न किया था बस परिचय का दौर ही चल रहा था।बड़े साहब छुट्टी पर थे सो पूरा दफ्तर समूह बनाकर खिड़कियों से छन-छन कर आती धूप का आनन्द ले रहा था और बातशाला बना हुआ था। उसने पाया कि वो एक अकेली महिला नहीं है दफतरि में ! रमा जी भी हैं उनके साथ ।जो कि जीवन के 50 बसंत देख चुकी हैं और पिछले 10 वर्षों से इसी दफ्तर में होने के कारण अब अपना दफ्तरी आकर्षण शायद खो चुकी थीं। इसीलिए शालिनी पर सबकी आस बंधी थी कि शायद दफ्तर के रूखे रसहीन माहौल में कोई बदलाव आएगा।
पूरे दफ्तर पर वेलेन्टाइन का भूत सवार था । हर कोई एक दूसरे की चुटकियाँ ले रहा था। राम बाबू उम्र में सबसे बड़े थे वहाँ । वो बीते ज़माने का पुलिंदा खोलकरबैठे थे। उनकी जीभ किसी चतुर सिपाही की तरह गुटके की सुपारियों को मुंह के कोने -कोने से ढूंढ कर दांतों के हवाले कर रही थी ।

किट्टी पार्टी


आज रमा के यहाँ किट्टी पार्टी थी। हर महीने होने वाली किट्टी पार्टी का अपना ही एक अलग उत्साह रखता था। लगभग तीस महिलाओं का समूह था यह। सभी सखियाँ -सहेलियां आ रही थी। महकती -गमकती मुस्कुराती, पर्स संभालती, बालों को सेट करती एक -एक करती पहुँच रही थी। आँखों पर पतली सी काज़ल और लबों पर भी एक रंगीन लकीर खींच कर जता रही थी मानो कुछ देर के लिए चिंताओं और ग़मों को एक लक्ष्मण रेखा के भीतर धकेल दिया हो। हर कोई बस जी लेना चाहती थी कुछ पल। तरो ताज़ा होने के लिए कुछ महिलाओं के लिए यह पार्टी कम नहीं थी। हालाँकि कई महिलाओं की तो कई और भी किट्टी पार्टी थी।
गर्म-गर्म खाने और पीने का दौर चल रहा था। एक खुशगवार सा माहौल था।
अचानक लीना ने एक खबर सुनानी शुरू की , ” कल मैंने विदेश की एक खबर पढ़ी, उसमे लिखा था एक जोड़े ने शादी के उन्नीस घंटे बाद ही तलाक ले लिया …!” बड़ी हैरान हो कर थोड़ी आँखे विस्फारित सी हो कर वह कह रही थी।
सभी महिलाएं खिलखिलाकर हंस पड़ी।

मंगलवार, 17 जनवरी 2017

विश्व में शांति की स्थापना के लिए महिलाओं को सशक्त बनायें!





डाॅ. भारती गांधी,
शिक्षाविद् एवं संस्थापक-संचालिका,
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
किसी भी बालक के व्यक्तित्व निर्माण में ‘माँ’ की ही मुख्य भूमिका:- 
कोई भी बच्चा सबसे ज्यादा समय अपनी माँ के सम्पर्क में रहता है और माँ उसे जैसा चाहे बना देती है। इस सम्बन्ध में एक कहानी मुझे याद आ रही है जिसमें एक माता मदालसा थी वो बहुत सुन्दर थी। वे ऋषि कन्या थी। एक बार जंगल से गुजरते समय एक राजा ने ऋषि कन्या की सुन्दरता पर मोहित होकर उनसे विवाह का प्रस्ताव किया। इस पर उन ऋषि कन्या ने उस राजा से कहा कि ‘‘मैं आपसे शादी तो कर लूगी पर मेरी शर्त यह है कि जो बच्चे होगे उनको शिक्षा मैं अपने तरीके से दूगी।’’ राजा उसकी सुन्दरता से इतनी ज्यादा प्रभावित थे कि उन्होंने ऋषि कन्या की बात मान ली। शादी के बाद जब बच्चा पैदा हुआ तो उस महिला ने अपने बच्चे को सिखाया कि बुद्धोजी, शुद्धोजी और निरंकारी जी। मायने तुम बुद्ध हो। तुम शुद्ध हो और तुम निरंकारी हो। आगे चलकर यह बच्चा महान संत बन गया। उस जमाने में जो बच्चा संत बन जाते थे उन्हें हिमालय पर्वत पर भेज दिया जाता था। इसी प्रकार दूसरे बच्चे को भी हिमालय भेज दिया गया। राजा ने जब देखा कि उसके बच्चे संत बनते जा रहंे हैं तो उन्होंने रानी से प्रार्थना की कि ‘महारानी कृपा करके एक बच्चे को तो ऐसी शिक्षा दो जो कि आगे चलकर इस राज्य को संभालें।’ इसके बाद जब बच्चा हुआ तो महारानी ने उसे ऐसी शिक्षा दी कि वो राज्य को चलाने वाला बन गया। बाद में हिमालय पर्वत से आकर उसके दोनों भाईयों ने अच्छे सिद्धांतों पर राज्य को चलाने में अपने भाई का साथ दिया।

नकाब घूँघट और टैटू





घूँघट और टैटू |हालांकि आपको ये तीनों बेमेल दिख रहे होंगे | कुछ लोग इसे धर्म से जोड़ने का प्रयास भी कर सकते हैं | पर इनका सम्बन्ध धर्म से नहीं लिंग से है | जी हां ! इनका सम्बन्ध स्त्री से हैं , उसकी सुन्दरता से भयभीत होकर उसे छुपाने से है | एक अपराधबोध जो युगों से समाज स्त्रियों के मन में भरता रहा है | जहाँ सुन्दर दिखना अपराध है |सब जानते हैं की पुरुषों की आपराधिक मानसिकता पर लगाम लागने के लिए स्त्री घुंघट या नकाब में अपना चेहरा ढकने को विवश होती रही |पर आज मैं विशेष रूप से बात करना चाहती हूँ टैटू की |और उससे जुडी स्त्री शोषण की दास्तान की |

दोषी कौन ?




किरण सिंह , पटना
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आए दिन नारी संवेदना के स्वर गूंजते रहते हैं …..द्रवित करते रहते हैं हॄदय को ….छलक ही आते हैं आँखों से अश्रुधार ….परन्तु प्रश्न यह उठता है कि आखिर दोषी कौन है …..पुरुष या स्वयं नारी ?
कहाँ होता है महिलाओं की शोषण घर या बाहर ?
किससे करें फरियाद ……किससे माँगे अपना हक …… …. पिता से जिसे पुत्री के जन्म के साथ ही …उसकी सुरक्षा और विवाह की चिन्ता सताने लगी थी . या भाई से जिसने खेल खेल में भी अपनी बहन की सुरक्षा का ध्यान रखा….. तभी तो वो ससुराल में सबकुछ सह लेती हैं हँसते हुए कि उनके पिता और भाई के सम्मान में कोई आँच नहीं आए ! वो तो नैहर से विदा होते ही समय चावल से भरा अंजुरी पीछे बिखेरती हुई चल देती हैं कुछ यादों को अपने दिल में समेटे ससुराल को सजाने संवारने ……रोती हैं फिर सम्हल जाती हैं क्यों कि बचपन से ही सुनती जो आई हैं कि बेटियाँ दूसरे घर की अमानत हैं !

हमारी ब्रा का स्ट्रैप देख कर तुम्हारी नसे क्यों तन जाती हैं भाई




अरे! तुमने ब्रा ऐसे ही खुले में सूखने को डाल दी?’ तौलिये से ढंको इसे। ऐसा एक मां अपनी 13-14 साल की बेटी को उलाहने के अंदाज में कहती है।
‘तुम्हारी ब्रा का स्ट्रैप दिख रहा है’, कहते हुए एक लड़की अपनी सहेली के कुर्ते को आगे खींचकर ब्रा का स्ट्रैप ढंक देती है।
‘सुनो! किसी को बताना मत कि तुम्हें पीरियड्स शुरू हो गए हैं।’
‘ढंग से दुपट्टा लो, इसे गले में क्यों लपेट रखा है?’
‘लड़की की फोटो साड़ी में भेजिएगा।‘
‘हमें अपने बेटे के लिए सुशील, गोरी, खूबसूरत, पढ़ी-लिखी, घरेलू लड़की चाहिए।‘
‘नकद कितना देंगे? बारातियों के स्वागत में कोई कमी नहीं होनी चाहिए।‘
‘दिन भर घर में रहती हो। काम क्या करती हो तुम? बाहर जाकर कमाना पड़े तो पता चले।‘

शांति से ओत -प्रोत नारी युग के आगमन की शुरुआत हो चुकी है




डाॅ. जगदीश गाँधी, शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक,
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
(1) संयुक्त राष्ट्र संघ की महिला सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल:-
संयुक्त राष्ट्र संघ ने प्रतिवर्ष 8 मार्च को अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की है। अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का उद्देष्य विष्व के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के प्रति सम्मान, प्रषंसा और प्यार प्रकट करते हुए इस दिन को महिलाओं के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक उपलब्धियों के उपलक्ष्य में उत्सव के तौर पर मनाया जाता है। आज विज्ञान, अंतरिक्ष, खेल, साहित्य, चिकित्सा, षिक्षा, राजनीति, समाज सेवा, बैंकिंग, उद्योग, प्रषासन, सिनेमा आदि ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं हैं जहाँ महिलाओं ने अपना वर्चस्व न कायम किया हो। वास्तव में आज विष्व समाज में महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक हिस्सेदारी पहले से काफी बढ़ गई है। महिलाओं ने महत्वपूर्ण व असरदार भूमिकाएँ निभा कर न सिर्फ पुरूषों के वर्चस्व को तोड़ा है, बल्कि पुरूष प्रधान समाज का ध्यान भी अपनी ओर आकर्षित किया है। लेकिन इसके साथ ही साथ आज समाज में आज चारों तरफ लड़कियों तथा महिलाओं पर घरेलू हिंसा, रेप, बलात्कार, भू्रण हत्याऐं आदि की घटनायें भी लगातार बढ़ती ही जा रहीं हैं।

तेज दौड़ने के लिए जरूरी है धीमी रफ़्तार


एक पुरानी अंग्रेजी कहावत है ,“go slow to go fast “अगर आप आगे बढ़ना चाहते हैं तो अपनी शुरूआती गति थोड़ी धीमी रखिये | आपको सुनने में बहुत अजीब लग रहा होगा | पर याद करिए बचपन में पढ़ी कछुए और खरगोश की कहानी | कछुआ धीमे चलता है और रेस जीत जाता है | वहीँ शुरू में सरपट दौड़ने वाला खरगोश ऊंघता रह जाता है | ये कहानी मात्र प्रतीकात्मक है | जहाँ खरगोश के ऊँघने और हारने के अपने अपने सन्दर्भ में कई कारण समझे जा सकते हैं | जैसा की बिल गेट्स कहते हैं ,” किसी भी कम्पनी के सफल होने के लिए ये कार्ययोजना जरूरी नहीं है की हम पहले साल कितना तेज दौड़ेंगे , बल्कि ये जरूरी है की हम दस साल में कितना दौड़ लेंगे |आप जरूर जानना चाहते होंगे की कैसे आप धीमे दौड़ते हुए तेज दौड़ने वाले धावक सिद्ध होते हैं , तो जरा in कारणों पर गौर करिए |

जरूरी है मन का अँधेरा दूर होना


भारतीय संस्कृति में अक्टूबर नवम्बर माह का विशेष महत्त्व है,क्योंकि यह महीना प्रकाशपर्व दीपावली लेकर आता है.दीपावली अँधेरे पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है भौतिक रूप से दीपावली हर साल सिर्फ एक साँझ की रौशनी लेकर आती है और साल भर के लिए चली जाती है,किन्तु प्रतीकात्मक रूप से उसका सन्देश चिरकालिक है.प्रतिवर्ष दीपपर्व हमें यही सन्देश देता है कि अँधेरा चाहे कितना ही सघन क्यों न हो,चाहे कितना ही व्यापक क्यों न हो और चाहे कितना ही भयावह क्यों न हो,लेकिन उसे पराजित होना ही पड़ता है.एक छोटा सा दीप अँधेरे को दूर करके प्रकाश का साम्राज्य स्थापित कर देता है.
अंधेरे का खुद का कोई अस्तित्व नहीं होता,खुद का कोई बल नहीं होता,खुद की कोई सत्ता नहीं होती.

विचार मनुष्य की संपत्ति हैं




"जिस हृदय में विवेक का, विचार का दीपक जलता है वह हृदय मंदिर तुल्य है।"

विचार शून्य व्यक्ति, उचित अनुचित, हित-अहित का निर्णय नहीं कर सकता। विचारांध को स्वयं बांह्माड भी सुखी नहीं कर सकते। मानव जीवन ही ऐसा जीवन है, जिसमें विचार करने की क्षमता है, विचार मनुष्य की संपत्ति है। विचार का अर्थ केवल सोचना भर नहीं है, सोचने के आगे की प्रक्रिया है। विचार से सत्य-असत्य, हित-अहित का विश्लेषण करने की प्रवृत्ति बढती है। विचार जब मन में बार-बार उठता है और मन व संस्कारों को प्रभावित करता है तो वह भावना का रूप धारण करता है। विचार पूर्व रूप है, भावना उत्तर-रूप है। जीवन निर्माण में विचार का महत्व चिंतन और भावना के रूप में है।

जरूरी है मनुष्य के भीतर बेचैनी पैदा होना



कुछ नया जानने , कुछ अनोखा रचने की बेचैनी ही वजह से ही विज्ञानं का अस्तित्व है |कब आकाश  पर निकले तारों को देख कर मनुष्य को बेचैनी हुई होगी की जाने क्या है क्षितिज के पार | तभी जन्म लिया ज्योतिष व खगोल शास्त्र ने | और खोल के रख दिए ग्रहों उपग्रहों के अनगिनत भेद | यह बेचनी ही तो थी जो उसे पानी से बिजली और बिजली के दम पर ऊँची – ऊँची अट्टालिकाओं में पानी चढाने की सहूलियत देती चली गयी | यह सच है की विज्ञानं की बदौलत मानव आज ” अपने एनिमल किगडम ” से ऊपर उठ कर सफलता के अंतरिक्ष पर बिठा दिया | विज्ञानं की बदौलत प्रगति के तमाम सोपानों को हासिल करने के बावजूद आज के आदमी की मानसिकता में बहुत बड़ा अंतर नहीं आया है.

सोमवार, 16 जनवरी 2017

तन की सुंदरता में आकर्षण, मन की सुंदरता में विश्वास



सुंदर काया और मोहक रूप क्षणिक आकर्षण पैदा कर सकते हैं लेकिन आंतरिक सुंदरता सामने वाले के मन को हमेशा के लिए वशीभूत कर लेती है। जो लोग रूप पर टिके रह जाते हैं वे अपनी आंतरिक क्षमताओं की तलाश नहीं कर पाते। रूप उनके लिए एक ऐसा जाल बन जाता है जिसे तोडऩा आसान नहीं होता। इसके उलट शरीर से निर्विकार रह कर मन की ताकत पर एकाग्र रहने वाले लोग महानता के शिखर चढ़ जाते हैं। 

सहानुभूति नहीं समानुभूति रखें


क्यों न हम लें मान, हम हैं
चल रहे ऐसी डगर पर,
हर पथिक जिस पर अकेला,
दुख नहीं बँटते परस्पर,
दूसरों की वेदना में
वेदना जो है दिखाता,
वेदना से मुक्ति का निज
हर्ष केवल वह छिपाता;
तुम दुखी हो तो सुखी मैं
विश्व का अभिशाप भारी!
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूँ?
सुप्रसिद्ध कवि हरिवंश राय बच्चन की यह पंक्तियाँ संवेदनाओं के व्यापार की पर्त खोल कर रख देती हैं | सदियों से कहा जाता है की दुःख कहने सुनने से कम हो जाता है पर क्या वास्तव में ? शायद नहीं | वो बड़े ही सौभाग्यशाली लोग होते हैं जिनको दुःख बांटने के लिए कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाता है जो उनके साथ समानुभूति रखता हो |वहाँ शायद कह लेने से दुःख बांटता हो | परन्तु ज्यादातर मामलों में यह बढ़ जाता है | संवेदनाओं का आदान -प्रदान को महज औपचारिक रह गया है |
दुख कहने-सुनने से बंटता है। डिप्रेशन के खिलाफ कारगर हथियार की तरह काम करने वाली यह सूक्ति

रिश्तों की तस्वीर का एक पहलू


इस संसार में हर व्यक्ति और वस्तु गुण-दोष से युक्त है,लेकिन रिश्तों की दुनिया में यह नियम लागू नहीं हो पाता। मन और आत्मा के धरातल पर रिश्ते जब प्रगाढ होते हैं,तो सिर्फ गुण ही गुण दिखाई देते हैं और दोष दिखना बंद हो जाते हैं या दूसरे शब्दों में कहें,तो जब किसी को किसी में दोष दिखाई देना बंद हो जाएं,तो वह रिश्ता प्रगाढता के चरम पर होता है। इसीलिए दुनिया के सबसे बडे और महान मां के रिश्ते में अक्सर यह देखने को मिलता है कि बेटा कितना ही बुरा क्यों न हो,मां को बेटे की बुराइयां नजर नहीं आतीं।
जब हम किसी से मिलते हैं,तो उसके तन या मन के आधार पर आकर्षित या विकर्षित होते हैं। तन का आकर्षण दीर्घावधि तक नहीं रह सकता,क्योंकि तन की एक निर्धारित आयु है और यौवन के चरम पर पहुंचने के बाद दिन-ब-दिन तन की चमक फीकी पडने लगती है।लेकिन जब किसी का मन और आत्मा आकर्षण का केन्द्र बनता है,किसी के विचार मन को भाने लगते हैं,तो उसका तन कैसा भी हो,सर्वाधिक सुन्दर लगने लगता है

अपनों की पहचान बुरे समय में नहीं अच्छे समय में भी होती है


आम तौर पर यही माना जाता है कि जो बुरे वक्त में विपदा के समय साथ दे,वही सच्चा मित्र या हितैषी होता है.यह बात कुछ हद तक सही भी है,लेकिन तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है.कई बार ऐसा भी होता है कि जब आप परेशान या दुखी होते हैं,तो लोग सहानुभूतिवश भी आपके साथ खड़े हो जाते हैं.कई बार तो ऐसा भी होता है कि आपको सख्त रूप से नापसंद करने वाले लोग भी बुरे समय में आपके साथ सहानुभूति जताने लगते हैं,लेकिन जैसे ही आपका बुरा समय दूर हुआ और अच्छा समय आने लगा ,तो वही लोग फिर विरोध का झंडा उठा लेते हैं.

सकारात्मक चिंतन और व्यक्तित्व विकास एक ही सिक्के के दो पहलू






सकारात्मक चिंतन और व्यक्तित्व विकास एक ही सिक्के के दो पहलू हैं | जो एक साथ आतें हैं |दरसल जब लोग पर्सनाल्टी शब्द का प्रयोग करतें है तो वह इसे शारीरिक आकर्षण या सुन्दर व्यक्तित्व के रूप में लेते हैं | पर यह पर्सनालिटी का बहुत संकुचित रूप हुआ | वास्तव में पर्सनॅलिटी सिर्फ़ शारीरिक गुणों से ही नही बल्कि विचारों और व्यवहार से भी मिल कर बनती है | जो हमारे व्यवहार और समाज में हमारे समायोजन को भी निर्धारित करती है | इसका निरंतर विकास किया जा सकता है | सिर्फ सुन्दर या बुद्धिमान होना एक बात है | पर व्यक्तित्व का अर्थ है हम अपने पोस्चर ( आसन ) व् गेस्चर ( इशारों ) द्वारा अपने ज्ञान का सही उपयोग कैसे कर पातें हैं की हमारी बात प्रभावशाली लगने लगे | व्यक्तिव को निखारने का सबसे आसान व् खूबसूरत तरीका ये है की व्यक्ति अपने देखने का तरीका या नजरिया बदल दे | एक सच्चाई है की व्यक्ति अपनी आँखों से नहीं दिमाग से देखता है |

सुख -दुःख के पार है आनंद


दुख को कोई नहीं चाहता। हर कोई सुख की खोज में भटकता रहता है। यह मान लिए गया है कि दुख के लिए कोई
प्रयास करने जरूरत नहीं होती है। वह तो हमारे आसपास ही रहता है, उसे देखने के लिए गर्दन उठाने की भी जरूरत
नहीं है। लेकिन भारतीय परंपराएं, शास्त्र और दर्शन इससे सहमत नहीं हैं। वे इस बारे में कुछ और ही कहते हैं।
ज्यादातर ग्रंथ एक स्वर से कहते हैं कि सुख हमारा स्वभाव है। वह कहीं बाहर नहीं है।
अष्टावक्र ने तो यहां तक कहा है कि ‘हमेशा सुख से जियो, सुख से उठो और बैठो, तब दुनिया जिसे दुख कहती है,
उसे भी सुख की तरह महसूस करने लगोगे।’
हमारा मन जिस सुख के पीछे पागल है, उसके पीछे धन-संपत्ति का बोध है। ऐश्वर्य उसका लक्ष्य है।
हम यह भूल जाना चाहते हैं कि सुख और दुख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दुख को भूलने और नकारने की क्षमता
अपने अंदर पैदा करना चाहते हैं। तभी तो ओशो ने कहा था, ‘सुख की खोज एक बुनियादी भूल है। दुख को अस्वीकार
कर सुख को तलाशना गलत है, क्योंकि सुख दुख का ही हिस्सा है। जो ऐसी भूल करते हैं, वे उन लोगों में हैं, जो
जन्म खोजते हैं और मरना नहीं चाहते, जवानी तो खोजते हैं, मगर बूढ़ा होना नहीं चाहते।

सतरंगिनी - ओमकार मणि त्रिपाठी की सात कवितायें








1...

आखिर 
कब तक....? 
डूबे रहोगे 
सिर्फ बौद्धिक व्यभिचार में
वक्त पुकार रहा है
समस्याओं के उपचार
की बाट जोह रहे हैं लोग
अब मिथ्याचार नहीं,
बल्कि समाधान के आधार तलाशो

क्‍या सिखाता है कमल का फूल?



कमल के फूल को योग और अध्‍यात्‍म में एक प्रतीक के रूप में देखा जाता है। योगिक शब्दावली में बोध व अवबोधन के अलग- अलग पहलुओं को हमेशा से कमल के तरह-तरह के फूलों से तुलना की गई है। शरीर के सात मूल चक्रों के लिए कमल के सात तरह के फूलों को प्रतीक चिह्न माना गया है।
कमल के फूल को एक प्रतीक के रूप में इसलिए चुना गया है क्योंकि जहां कहीं कीचड़ और दलदल बहुत गाढ़ा होता है वहां कमल का फूल बहुत अच्छी तरह से खिल कर बड़ा होता है। जहां कहीं पानी गंदा हो और मल-कीचड़ से भरा हो, कमल वहीं पर सबसे बढ़िया उगता है। जीवन ऐसा ही है। आप दुनिया में कहीं भी जायें, और तो और अपने मन के अंदर भी, हर तरह की गंदगी और कूड़ा-करकट भरा मिलेगा। अगर कोई कहे कि उसके अंदर मैल नहीं है तो फिर या तो उसने अपने अंदर नहीं झांका या फिर वह सच नहीं बोल रहा है, क्योंकि मन तो आपके वश में है ही नहीं। इसने वह सब-कुछ बटोर लिया है जो उसके रास्ते आया है। आपके पास यह विकल्प तो है कि आप इसका इस्तेमाल कैसे करें लेकिन यह विकल्प नहीं है कि आपका मन क्या बटोरे और क्या छोड़े। आपके मन में जमा हो रही चीजों को ले कर आपके पास कोई विकल्प नहीं है। आप बस यही तय कर सकते हैं कि आप किस तरह से अपने मन की जमापूंजी का इस्तेमाल करें। दुनिया में हर तरह की गंदगी और कूड़ा-करकट है और यह सारा मैल, यह सारा कूड़ा आपके मन में समाता ही रहता है।

बिना गुनाह की सजा भुगत रहे हैं शिक्षा मित्र







उत्तर प्रदेश में सहायक शिक्षक के रूप में समायोजित किये गए शिक्षामित्रो को एक साथ कई समस्याओं का सामना करना
पड़ रहा है.जहाँ एक ओर प्रदेश में 1.35 लाख सहायक अध्यापक बने शिक्षामित्रो का समायोजन हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है,वहीँ
प्रदेश सरकार ने अब उनके वेतन पर भी रोक लगा दी है.वेतन पर रोक लगने से शिक्षामित्रो के त्यौहार फीके हो गए हैं.जहाँ
अन्य लोग दीपपर्व की तैयारियां कर रहे हैं,वंही शिक्षामित्र इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि उनकी नौकरी रहेगी या
जाएगी.एनसीईटी से कुछ राहत मिलने की खबरे जरूर आयी हैं,लेकिन जब तक कोई ठोस निर्णय न हो जाये,तब तक शिक्षामित्र दुविधा
में ही रहेंगे.

आओ मिलकर दिए जलाए








भारतीय संस्कृति में नवम्बर माह का विशेष महत्व् है,क्योंकि यह महीना प्रकाशपर्व दीपावली लेकर आता है.दीपावली अँधेरे पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है और यह एक सुखद संयोग ही है कि एक वर्ष पहले आपकी प्रिय पत्रिका ” अटूट बंधन “का प्रकाशन इसी माह की पहली तारीख से शुरू किया गया था.भौतिक रूप से दीपावली हर साल सिर्फ एक साँझ की रौशनी लेकर आती है और साल भर के लिए चली जाती है,किन्तु प्रतीकात्मक रूप से उसका सन्देश चिरकालिक है.प्रतिवर्ष दीपपर्व हमें यही सन्देश देता है कि अँधेरा चाहे कितना ही सघन क्यों न हो,चाहे कितना ही व्यापक क्यों न हो और चाहे कितना ही भयावह क्यों न हो,लेकिन उसे पराजित होना ही पड़ता है.एक छोटा सा दीप अँधेरे को दूर करके प्रकाश का साम्राज्य स्थापित कर देता है.

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

एक हमसफ़र


प्रतापगढ़ से लालगंज का सफर बहुत कष्टदायक था। मेटाडेार यात्रियों से खचाखच भरी थी और तेज ठंड में भी उमस और उलझन महसूस हो रही थी। हर तरह की सांसें एक दूसरे से उलझ रही थी और एक ऐसी गंध का निर्माण कर रही थी, जो असहनीय होती जा रही थी। पाद की गंध, इत्र की सुगन्ध और सांसों से झिरती, प्याज, लहसुन, सिगरेट-बीड़ी और तम्बाकू-खैनी की रसगंध एकसार होकर बेचैन किए थी।
ं मैं अपनी किस्मत का कोस रहा था कि पहले मैं ड्राइवर की बगल वाली सीट पर बैठा था, अकेला। परन्तु जब ड्राइवर कम कंडक्टर ने एक-एक करके तीन आदमी उस सीट पर बैठाये तो मैं झुंझला कर बोल उठा, आप गाड़ी कैसे चलाओगे,? खुद कहाॅ बैठोगे?
‘यह मेरा काम है, मैं कर लूंगा।‘ं उसने गर्वमिश्रित साधिकार घोषणा कीं। मैं असमंजस में आ कर पीछे बैठना ही बेहतर समझा। वहाॅ, कमोवेश गिरने का डर तो नहीं रहेगा। और उस समय पीछे की सीटें पूर्णरूपेण भरी नहीं थीं, और मुझे तनिक भी आशंका नहीं थी कि पीछे की स्थिति भी बदतर हो जायेगी। वैसे भी ड्राइवर के साथ वाली जगह पर इस इलाके के प्रभावशाली लोग ही बैठते थें। इस जगह पर उनका अघोषित आरक्षण था। मुझ जैसे का उनके साथ बैठना उन्हें असहज बना रहा था। एक दो बार ईशारों से और वाक्यों से मुझे पीछे आराम से बैठने की सलाह, ड्राइवर और तथाकथित उच्च लोग दे चुके थे। परन्तु वहाॅ बैठकर मैं भी अपने को विशिष्ट समझने का भाव लिए था।ं मेरे वहाॅ से उतर कर पीछे चले जाने से उन लोगों के चेहरे से हार्दिक संतुष्टि का भाव प्रगट हो रहा था।