गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

दुयालू बनो


अपरिभाषित है प्रेम


संसार में तरह-तरह के व्यक्ति हैं … सभी में अलग अलग कुछ विशेष गुण होते हैं….. जिसे व्यक्तित्व कहते हैं….. कुछ विशेष व्यक्तित्व विशेष व्यक्ति को अपनी तरफ आकर्षित करता है….. यही आकर्षण जब एक दूसरे के विचारों में मेल, पाता है….. एक-दूसरे के लिए त्याग का भाव अनुभव करता है , एक-दूसरे के लिए समर्पित हो जाना चाहता है…. एक दूसरे के प्रसन्नता में प्रसन्नता अनुभव करता है….. एक दूसरे का साथ पाकर सुरक्षित तथा प्रसन्न अनुभव करता है……एक दूसरे पर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देना चाहता है…. उसका एक दूसरे से सिर्फ सिर्फ़ शारीरिक या मानसिक ही नहीं आत्मा का आत्मा से मिलन हो जाता वही प्रेम है..!
, प्रेम हृदय की ऐसी अनुभूति है जो जन्म के साथ ही ईश्वर से उपहार स्वरूप प्राप्त हुआ है..! या यूँ कहें कि माँ के गर्भ में ही प्रेम का भाव पल्लवित एवं पुष्पित हुआ है..! चूंकि संतानें अपने माता-पिता के प्रेम की उपज हैं तो यह भी कहा जा सकता हैं कि माँ के गर्भ में आने से पूर्व ही प्रेम की धारा बह रही होगी जो रक्त में प्रवाहित है…! प्रेम अस्तित्व है.. अवलम्ब है… समर्पण है… निः स्वार्थ भाव से चाहत है…. जिसे हम सिर्फ अनुभव कर सकते हैं..प्रेम अपने आप में ही पूर्ण है..जिसे . शब्दों में अभिव्यक्त करना थोड़ा कठिन है… फिर भी हम अल्प बुद्धि लिखने चले हैं प्रेम की परिभाषा..!

आध्यात्मिक चेतना के अभाव में मनुष्य कभी भी सुखी नहीं रह सकता!







- डाॅ. (श्रीमती) भारती गाँधी,
शिक्षाविद् एवं संस्थापिका-निदेशिका,
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
मानव जीवन का उद्देश्य प्रभु को प्राप्त करना और प्रभु शिक्षाओं पर चलना है:
            जिस प्रकार से किसी भी देश को चलाने के लिए संविधान की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार से मनुष्य को अपना निजी जीवन चलाने के लिए व अपना सामाजिक जीवन चलाने के लिए धर्म की आवश्यकता है। अगर वह इसमें सही प्रकार से सामंजस्य करता है तो वह आध्यात्मिक कहलाता है। अध्यात्म का मतलब यह नहीं होता कि दुनियाँ से बिलकुल दूर जाकर के जंगल में पहाड़ों की कन्दराओं में जाकर बैठ जाओं। धर्म का मतलब होता है अपने जीवन को इस प्रकार से संचालित करना कि मानव अपने जीवन के उद्देश्य को प्राप्त कर सके। मानव जीवन का उद्देश्य है प्रभु को प्राप्त करना और उसकी शिक्षाओं पर चलना। इस प्रकार जैसे-जैसे हमारे जीवन में धर्म आता जायेंगा वैसे-वैसे हम आध्यात्मिक होते जायेंगे।

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

प्रेम के रंग हज़ार -डूबे सो हो पार





रजनी भारद्धाज
जयपुर ( राजस्थान )
प्रेम जीवन के विविध रंगों और ढंगों में समाई सघन अनुभूति है…माँ का वात्सल्य से परिपूर्ण प्रेम ,पिता का अव्यक्त कर्म में परिलक्षित प्रेम , बहिन का अनुराग से ओत प्रोत प्रेम , भाई का अनुरक्ति में भीगा प्रेम ,मित्र का अपनत्व भाव में रचा बसा प्रेम और एक स्त्री व पुरुष के बीच प्रस्फुटित होता , पल्लवित होता ,मन को मुक्त करता , हर स्पंदन में खुद को भरता नैसर्गिक प्रेम जो रचता है जीवन को और देता है उसे नये तर्जुमान.
प्रेम महज कन्टेंट्स ( विषय वस्तु ) नही है बल्कि यह एक सतत प्रवाहमयी प्रक्रिया है जो निरंतर एक स्थिति से दूसरी स्थिति में परिवर्तित होती रहती है और जो जीवन के विभिन्न पहलुओं को छूता हुआ निरंतर गतिमान रहता है.प्रेम समय की धुरी पे घूमता हुआ नए नए कलेवर धारण करता है .
सृष्टि के सृजन में समाता रहा है खुद को प्रेम
प्रेम एक अछूता सा विषय पर हर जीवन को छूता हुआ.जीवन्त करता हुआ सदियों से अनेकानेक प्रतिमानों को,आदर्शों को , काव्यों को श्रृंगारित करता हुआ जीवों के हर रूप को ,ध्वनित करता हुआ हर पुकार को ..निश्छल वात्सल्य से लेकर झुर्रियों के अनुभवों के अनुराग में पलता है प्रेम.

" मेरी बेटी....मेरी वैलेंटाइन "



            कहते हैं कि बेटियाँ माँ की परछाई होती है। एक-दूसरे की प्राण होती हैं। एक जन्म देकर माँ बनती है तो दूसरी जन्म पाकर बेटी। दोनों एक-दूसरे को पाकर पूर्ण होती हैं, इसी से एक-दूसरे की पूरक बन जाती है। बिना कहे समझ जाती हैं दिल की बात, आवाज़ से ही जान जाती हैं कि दुःख की बदरी सी मन-प्राणों पर छाई है या कोई ख़ुशी छलकी जा रही है। इसका अनुभव अपनी माँ की बेटी बन कर खूब बटोरा, और अब अपनी बेटी की माँ बन कर फिर वही सब जीने का अवसर मिला है। ओस की निर्मल बूँद सी होती हैं बेटियाँ... जो अपने निश्छल प्यार की शीतलता से जीवन में खुशियों का अंबार लगाए रखती हैं, घर को अपनी खिलखिलाहट और चहचहाट से गुँजायमान रखती हैं कि उदासी पसरने ही नहीं पाती। कभी गुनगुनाती हैं, कभी कुछ पकाती हैं, कभी सब उलट-पुलट कर घर को सजाने-सँवारने लगती हैं, तो कभी पूरे घर को आसमान पर उठाए फिरती हैं।सखी-सहेली बनती है तो माँ से बतियाने की कोई सीमा ही नहीं रहती।अतिथि आ जाए तो आतिथ्य की जिम्मेदारी से मुक्त कर स्वयं लग जाती है।

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

वैलेंटाइन डे पर विशेष - 10 best love quotes


२ ....

वैलेंटाइन डे स्पेशल – आई लव यू “यानी जादू की झप्पी







लेखिका – श्रीमती सरबानी सेनगुप्ता
अरे भाई ! वेलेंटाइन डे आ गया | प्यार भरे दिलों की धड़कने तेज़ हो गयीं | आई लव यू “ थोडा सा सकुचाई सी शरमाई सी मन ही मन मुस्कुराते हुए सोचने लगी , “ लो वो दिन भी आ गया जब सब अपने अपने वैलेंटाइन से मनुहार करते हुए मेरा इस्तेमाल करेंगे | मैं इस मुँह से उस मुँह तक सैर करती नज़र आऊँगी | “
बात भी सही है जादू की झप्पी का बुखार एक न उतरने वाला बुखार है | आई लव यू डेंगू की तरह फैलता जा रहा है | यह वाक्य अपने आप में बड़ा मीठा और वजनी है |
“ तीन शब्दों से बना ये वाक्य है कमाल का
जिसे भी कह दो वो हो जाए आपका “

सही में इस वाक्य का चमत्कार देखिये | दूर बैठे लोग भी आप के हो जायेंगे | पर इस चमत्कारी वाक्य को ले कर लोगों में अलग –अलग धारणाएं और भ्रांतियाँ हैं | कुछ लोग आई लव यू का केवल एक ही मतलब निकालते हैं | वो है पति –पत्नी या प्रेमी प्रेमिका के बीच बोला जाने वाला | अरे भाई ये वो मिठाई है जो हम अपने माता –पिता , भाई बंधू सभी को खिला सकते हैं |

वैलेंटाइन डे युवाओं का एक दिवालियापन








                                                                        लेखक:- पंकज प्रखर
प्रेम शब्दों का मोहताज़ नही होता प्रेमी की एक नज़र उसकी एक मुस्कुराहट सब बयां कर देती है, प्रेमी के हृदय को तृप्त करने वाला प्रेम ईश्वर का ही रूप है| एक शेर मुझे याद आता है की....
                                     बात आँखों की सुनो दिल में उतर जाती है
                                       जुबां का क्या है ये कभी भी मुकर जाती है ||”
इस शेर के बाद आज के लेख की शुरुआत एक कहानी से करता हूँ कहते है किसी देश में कोई राजा हुआ जिसने अपनी सेना को सशक्त और मजबूत बनाने के लिए अपने सैनिकों के विवाह करने पर रोक लगा दी थी जिसके कारन समाज में व्यभिचार फैलने लगा सैनिक अपनी शारीरिक आवश्यकताओं को अनैतिक रूप से पूरा करने लगे जिसका समाज पर बुरा प्रभाव पढने लगा ऐसे में उस राज्य में एक व्यक्ति हुआ अब वो संत था या क्या था इसका इतिहास कहीं नही मिला लेकिन हाँ उसने उस समय प्रताड़ित किये गये इन सैनिकों की सहायता की और समाज को नैतिक पतन से बचाने के लिए सैनिकों को चोरी छिपे विवाह करने के लिए उत्साहित किया. उसका  परिणाम ये हुआ की राजा नाराज़ हो गया और उसने उस व्यक्ति की हत्या करवा दी तब से ही पश्चिम के लोग उस मृतात्मा को याद करने के लिए इस दिवस को वलेंतिन डे के रूप में मनाते है . जिसका हमारी तरफ से कोई विरोध नही है लेकिन इस दिवस के नाम पर बाज़ारों में पैसे की जो लूट होती है या कहें भारतीय संस्कारों का पतन होता है, अश्लीलता और फूहड़ता के जो दृश्य उत्पन्न होते है उनसे हमारा विरोध है |

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

धर्म तथा विज्ञान का समन्वय इस युग की आवश्यकता है!






- प्रदीप कुमार सिंह पाल’, 
शैक्षिक एवं वैश्विक चिन्तक
            हमारे मन में प्रश्न उठता है कि यदि ईश्वर है तो संसार में इतना अज्ञान, मारा-मारी, असमानता तथा दुःख क्यों है? क्या समाज को नियंत्रण में रखने के लिए कुछ विचारशील लोगों ने ईश्वर की अवधारणा को अपनी कल्पना द्वारा जन्म दिया है? जैसे बच्चों को प्रायः डराने के लिए मां कहती है कि जल्दी सो जाओ नहीं तो शैतान आकर तुम्हें उठा ले जायेगा। बालक भोला-भाला होता है वह मां की बात सच मानकर शैतान के डर से सो जाता है। इसी प्रकार अतीतकाल में गुफाओं से बाहर आकर कुछ बुद्धिमान लोगों ने कुछ कम बुद्धिमान लोगों को शिक्षा दी होगी कि बुरे काम करने से पाप होता है तथा अच्छे काम करने से पुण्य मिलता है। मानव की समझ के अनुसार प्रेरणादायी कथाओं तथा मूर्तियों-प्रतिमाओं के रूप में ईश्वर की पूजा के प्रचलन को बढ़ाया गया होगा। ऐसे बुद्धिमान लोगों की इसके पीछे लोक कल्याण की भावना रही होगी। इसी के बाद जाति के भेदभाव, रंग-भेद, अमीर-गरीब जैसी सामाजिक तथा धार्मिक कुरीतियों के युग की शुरूआत हुई होगी।
            इस अन्याय को देखकर कृष्ण की प्रखर प्रज्ञा व्याकुल हो उठी होगी। संसार में फैले अन्याय को रोकने तथा न्याय की स्थापना के लिए उस युग में न्यायालय के अभाव में उन्हें अन्तिम विकल्प के रूप में महाभारत युद्ध की रचना करनी पड़ी होगी। किसी रोगी, वृद्ध, मृत्यु तथा धार्मिक पाखण्ड को देखकर सिद्धार्थ जैसे बालक की मानवीय संवेदना जागी होगी। सिद्धार्थ इस अज्ञान से मनुष्य को मुक्त कराने के लिए ज्ञान की खोज में निकल पड़े। वह वर्तमान तथा सत्य में ठहर गये

लव पर बेस्ट व्हाट्स एप स्टेटस







क्या क्या रंग दिखाती है जिंदगी क्या खूब इक्तेफ़ाक होता है,
प्यार में ऊम्र नही होती पर हर ऊम्र में प्यार होता है.


कौन कहता है कि मुसाफिर ज़ख़्मी नहीं होते,
रास्ते गवाह है बस गवाही नहीं देते.

तुम्हे कैसे पता चलता है की तुम प्रेम में हो ?- ओशो





आदमी के व्यक्तित्व के तीन तल हैं: उसका शरीर विज्ञान, उसका शरीर, उसका मनोविज्ञान, उसका मन और उसका अंतरतम या शाश्वत आत्मा। प्रेम इन तीनों तलों पर हो सकता है लेकिन उसकी गुणवत्ताएं अलग होंगी। शरीर के तल पर वह मात्र कामुकता होती है। तुम भले ही उसे प्रेम कहो क्योंकि शब्द प्रेम काव्यात्म लगता है, सुंदर लगता है। लेकिन निन्यानबे प्रतिशत लोग उनके सैक्स को प्रेम कहते हैं। सैक्स जैविक है, शारीरिक है। तुम्हारी केमिस्ट्री, तुम्हारे हार्मोन, सभी भौतिक तत्व उसमें संलग्न हैं। 
तुम एक स्त्री या एक पुरुष के प्रेम में पड़ते हो, क्या तुम सही-सही बता सकते हो कि इस स्त्री ने तुम्हें क्यों आकर्षित किया? निश्चय ही तुम उसकी आत्मा नहीं देख सकते, तुमने अभी तक अपनी आत्मा को ही नहीं देखा है। तुम उसका मनोविज्ञान भी नहीं देख सकते क्योंकि किसी का मन पढ़ना आसान काम नहीं है। तो तुमने इस स्त्री में क्या देखा? तुम्हारे शरीर विज्ञान में, तुम्हारे हार्मोन में कुछ ऐसा है जो इस स्त्री के शरीर विज्ञान की ओर, उसके हार्मोन की ओर, उसकी केमिस्ट्री की ओर आकर्षित हुआ है। यह प्रेम प्रसंग नहीं है, यह रासायनिक प्रसंग है।

बदलाव


बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

तूफ़ान से पहले





बहुत  समय  पहले  की  बात  है , आइस्लैंड के उत्तरी छोर पर  एक  किसान  रहता  था . उसे  अपने  खेत  में  काम  करने  वालों  की  बड़ी  ज़रुरत  रहती  थी  लेकिन  ऐसी  खतरनाक  जगह , जहाँ  आये  दिन  आंधी  –तूफ़ान  आते  रहते हों , कोई  काम  करने  को  तैयार  नहीं  होता  था .
किसान  ने  एक  दिन  शहर  के  अखबार  में  इश्तहार  दिया  कि  उसे   खेत  में   काम  करने  वाले एक मजदूर की  ज़रुरत  है . किसान से मिलने कई  लोग  आये  लेकिन  जो भी  उस  जगह  के  बारे  में  सुनता  , वो काम  करने  से  मन  कर  देता . अंततः  एक  सामान्य  कद  का  पतला -दुबला  अधेड़  व्यक्ति  किसान  के  पास  पहुंचा .
किसान  ने  उससे  पूछा  , “ क्या  तुम  इन  परिस्थितयों  में   काम  कर  सकते  हो ?”

पहचान


स्वीकृति


मित्रता


ध्यान


सोंच


बुराई



मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

खुशनुमा जिंदगी के रहस्य


रोज डे - गुलाब पर सुविचार






ये आप पर है की आप शिकायत करें की गुलाब के साथ कांटे होते हैं या ख़ुशी व्यक्त करे की काँटों के साथ गुलाब भी होते हैं |
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लाल गुलाब मौन रह कर भी प्रेम की वो भाषा बोलता है जिसे केवल दिल सुन  सकता है |
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एक गुलाब की सुन्दरता व् सुंगंध केवल कुछ क्षण ही ठहरती है पर इसकी यादें हमेशा महकती रहती हैं |
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शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

नयी सुबह



साधना सिंह 
   गोरखपुर
दिन भर मेहमानों की आवाजाही , ऊपर से रात से तबीयत खराब थी भारती की..  फिर भी कोई कोताही नही बरती खातिरदारी मे । सुबह का नाश्ता,  दोपहर का लंच और रात कौ रात का डिनर.. कमर मानो टुट ही गयी थी । आखिरकार मेहमान गये तो सास को खाना देकर थोडी देर पीठ सीधी करने कमरे मे गयी तो बच्चो ने पुरा घर बिखेरा था ..एक दम से झल्ला उठी पर क्या करती .. रूम ठीक किया और आँखे बंद करके लेट गयी । पतिदेव अभी आये नहीं थे । आज जाने क्यों सोच का सिरा अतीत की तरफ भाग रहा था । 
       12 साल पहले शादी करके छोटी उम्र मे बड़े -बडे़ अरमान लेकर इस संयुक्त परिवार मे आयी थी । सबका दिल जीतने की उम्मीद से पर यो इतना आसान कहाँ होता है ये बाद मे समझ आया । जितना करती लोग थोडी और उम्मीद कर लेते ये सोचे बिना कि उसके भी तो कुछ अरमान है। सारा रसोई उसके उपर छोड दी गयी..  मायके मे कभी उसने इतना काम किया नही था जाहिर है कुछ गलतियाँ हो ही जाती जैसे नमक का डब्बा टाइट नहीं बंद हुआ या चीनी चायपत्ती का डब्बा स्लैब पर छुट गया । वही जेठानी को लिये बडी बात थी ।  रोटी तो उससे कभी अच्छी बन ही नहीं पायी ।

विश्व कैंसर दिवस-ैंआवश्यकता है कैंसर के खिलाफ इस युद्ध में साथ खड़े होने की





आज विश्व कैंसर दिवस है | आज मेडिकल साइंस के इतने विकास के बाद भी कैंसर एक ऐसे बिमारी है | जिसका नाम भी भयभीत करता है |परन्तु ये भी सच है की शुरूआती स्टेज में कैंसर का इलाज़ बहुत आसन है | यहाँ तक की स्टेज ३ और 4 के मरीजों को भी डॉक्टर्स ने पूरी तरह ठीक किया है | पर ये एक कठिन लड़ाई होती है जिसमें मरीज को बहुत हिम्मत व् हौसले की जरूरत होती है |सबसे पहले तो यह समझना होगा की कैंसर मात्र एक शब्द है ये कोई डेथ सेंटेंस नहीं है

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

प्रत्येक क्षण में बहुत कुछ नया है!


- प्रदीप कुमार सिंह पाल’,
शैक्षिक एवं वैश्विक चिन्तक
            यदि हमारे अंदर पुराने का आग्रह है तो जीवन में सब पुराना हो जाएगा। जीवन मंे यदि हम पुराने का आग्रह छोड़ दें तो इस नये वर्ष 2017 का प्रत्येक दिन नया दिन तथा प्रत्येक क्षण नया क्षण होगा। कोई व्यक्ति जो निरंतर नए में जीने लगे, तो उसकी खुशी का हम कोई अंदाजा नहीं लगा सकते। हमारे अंदर यह जज्बा होना चाहिए कि इस क्षण में नया क्या है? यदि यह जज्बा हो तो ऐसा कोई भी क्षण नहीं है, जिसमें कुछ नया न आ रहा हो। हम नए को खोजें, थोड़ा देखें कि यह ऊर्जावान तथा जीवनदायी सूरज कभी उगा था? हम चकित खड़े रह जाएंगे कि हम अब तक इस भ्रम में ही जी रहे थे कि रोज वही ऊर्जावान तथा जीवनदायी सूरज उगता है। हम अपने जीवन में निरन्तर यह खोज जारी रखे कि नया क्या है? हमारा फोकस पुराने पर है या नये पर है यह इस बात पर सब कुछ निर्भर करता है। हम हर चीज में नया खोजने का स्वभाव विकसित करे। हमारा पूरा फोक्स नई वस्तुओं से जीवन को नया करने पर नहीं वरन् स्वयं के दृष्टिकोण को नया करने पर होना चाहिए। प्रत्येक क्षण को नया बनाने के इस विचार को हकीकत में बदलने की क्षमता ही नेतृत्व की असली विशेषता है।

नन्हे कदम


स्वागत है ऋतुराज


 "वसंत ऋतु "

फिर पद चाप
 सुनाई पड़ रहे
 वसंत ऋतु के आगमन के
 जब वसुंधरा
बदलेगी स्वेत साडी
करेगी श्रृंगार
उल्लसित वातावरण में
झूमने लगेंगे
मदन -रति

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

मृत्यु संसार से अपने ‘असली वतन’ जाने की वापिसी यात्रा है!


(जब जन्म शुभ है तो मृत्यु अशुभ कैसे हो सकती है?)
- डा0 जगदीश गांधी, संस्थापक-प्रबन्धक
सिटी मोन्टेसरी स्कूल,
लखनऊ
(1) जीवन-मृत्यु के पीछे परमपिता परमात्मा का महान उद्देश्य छिपा है:-
इस सत्य को जानना चाहिए कि शरीर से अलग होने पर भी आत्मा तब तक प्रगति करती जायेगी जब तक वह परमात्मा से एक ऐसी अवस्था में मिलन को प्राप्त नहीं कर लेती जिसे सदियों की क्रान्तियाँ और दुनिया के परिवर्तन भी बदल नहीं सकते। यह तब तक अमर रहेगी जब तक प्रभु का साम्राज्य, उसकी सार्वभौमिकता और उसकी शक्ति है। यह प्रभु के चिह्नों और गुणों को प्रकट और उसकी प्रेममयी कृपा और आशीषों का संवहन करेगी। बहाई धर्म के संस्थापक बहाउल्लाह कहते हंै कि हमें यह जानना चाहिए कि प्रत्येक श्रवणेंद्रीय, अगर सदैव पवित्र और निर्दोष बनी रही हो तो अवश्य ही प्रत्येक दिशा से उच्चरित होने वाले इन पवित्र शब्दों को हर समय सुनेगी। सत्य ही, हम ईश्वर के हैं और उसके पास ही वापस हो जायेंगे। मनुष्य की शारीरिक मृत्यु के रहस्यों और उसकी असली वतन अर्थात दिव्य लोक की अनन्त यात्रा को प्रकट नहीं किया गया है। माता के गर्भ में बच्चे के शरीर में परमात्मा के अंश के रूप में आत्मा प्रवेश करती है। जिसे लोग मृत्यु कहते हैं, वह देह का अन्त है। शरीर मिट्टी से बना है वह मृत्यु के पश्चात मिट्टी में मिल जाता है। परमात्मा से उनके अंश के रूप में आत्मा संसार में मानव शरीर में आयी थी मृत्यु के पश्चात आत्मा शरीर से निकलकर अपने असली वतन (दिव्य लोक) वापिस लौट जाती है। मृत्यु संसार से अपने असली वतनजाने की वापिसी यात्रा है!

आधुनिकता के इस दौर में संस्कृति सेसमझौता क्यों








लेखक :- पंकज प्रखर
आज एक बच्चे से लेकर 80 वर्ष का बुज़ुर्ग आधुनिकता की अंधी दौध में लगा हुआ है आज हम पश्चिमी हवाओं के झंझावत में फंसे हुए है |पश्चिमी देशो ने हमे बरगलाया है और हम इतने मुर्ख की उससे प्रभावित होकर इस दिशा की और भागे जा रहे है जिसका कोई अंत नही है |वास्तव में देखा जाए तो हमारा स्वयं  का कोई विवेक नही है हम जैसा देख लेते है वैसा ही बनने का प्रयत्नं करने लगते है निश्चित रूप से यह हमारी संस्कृति के ह्रास का समय है जिस तेज गति से पाश्चात्य संस्कृति का चलन बढ़ रहा है, उससे लगता है कि वह समय दूर नहीं, जब हम पाश्चात्य संस्‍कृति के गुलाम बन जायेंगे और अपनी पवित्र पावन भारतीय संस्कृति, भारतीय परम्परा सम्पूर्ण रूप से विलुप्त हो जायेगी, गुमनामी के अंधेरों में खो जायेगी। आज मनोरंजन के नाप पर बुद्धू बॉक्स से केवल अश्लीलता और फूहड़पंन का ही प्रसारण हो रहा है हमें मनोरंजन के नाम पर क्या दिया जा रहा  है मारधाड़, खुन खराबा, पर फिल्माए गए दृश्य मनोरंजन के नाम पर मानवीय गुणों, भारतीय संस्कृति व कला का गला घोट रहे हैं।माना की आधुनिक होना आज के दौर की मांग हैं और शायद अनिवार्यता भी है, लेकिन यह कहना भी गलत ना होगा कि यह एक तरह का फैशन है। आज हर शख्स आधुनिक व मॉर्डन बनने के लिये हर तरह की कोशिश कर रहा है, मगर फैशन व आधुनिकता का वास्तविक अर्थ जानने वालों की संख्या न के बराबर होगी, और है भी, तो उसे उंगलियों पर गिना जा सकता है। क्या आधुनिकता हमारे कपड़ों, भाषा, हेयर स्टाइल एवं बाहरी व्यक्तित्व से ही संबंध रखती है? शायद नही।

सफलता के लिए खतरा उठाये


लक्ष्य


बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

"सोल मेट "

       



                 
   "अब  छिपकली की तरह दीवार से चिपकी रहोगी क्या ?
बहुत हो गयी रोशनदान की सफाई !चलो नीचे उतरो।"  व्हील चेयर खिसकाती हुए अम्मा ने थोड़ा डांटने के स्वर में सुधा से कहा। ३२ वर्षीय सुधा जो आज पूरी तरह घर साफ़ करने के मूड में थी , मुस्कुराते हुए बोली ,"बस अम्माँ दो मिनट और ,रोज़ -रोज़ कहाँ चढ़ती हूँ?" तभी छोटा भाई अनिकेत(गप्पू) दुपट्टा खींचते हुए बोला "दीदी भूख लगी है खाना दो ना। सुधा दुपट्टा छुड़ाते हुए बोली ,"अले ! मेरे बेटू को भूख लगी है दीदी अभी खाना देती है।" हाँ बच्चा ही तो है २८ वर्षीय अनिकेत ………जिसकी मानसिक बुद्धि ५ साल के बच्चे के बराबर है। और सुधा माँ है ……व्हील चेयर पर सवार माँ की ,मानसिक विकलांग भाई की ,और थैलीसीमिया मेजर से जूझती बहन की………………… एक ३२ वर्षीय अविवाहित माँ।
                      "अविवाहित" यह शब्द मध्यम वर्गीय
समाज में किसी लड़की के माथे पर लगा वो दाग है  जिसे कोई कितना भी धोना चाहे छूटता नहीं। पर यह उसका खुद का लिया हुआ निर्णय नहीं था ,परिस्तिथियों ने उसे ऐसा निर्णय लेने पर विवश कर दिया था।  जहाँ लड़की के हांथों की मेहँदी  माता -पिता के लिए कर्ज की दीवार बन कर खड़ी हो जाती है। वहाँ उसे कौन ब्याहता………… जिसके साथ उसे तीन -तीन प्राणियों का  बोझ ढोना पड़े। सच तो यही था कड़वा सा सच।
                  ऐसा नहीं है की सुधा का मन किसी जीवन साथी को पाने के लिए न किया हो , सखी सहेलियों की अपने -अपने जीवन साथी के साथ प्यार भरी मनुहार उसे विचलित करती थी पर उसने अपने मन को एक बड़े तहखाने में बंद कर ताला लगा दिया था। नहीं सोचना है तो नहीं सोचना है।  उसका जीवन कठोर कर्तव्य के लिए हुआ है ………पगली को यह कहाँ पता था कि खुशबू ,हवाएं , और प्रेम कहीं रोके से रुकें हैं ?

आज हमारे नन्हें-मुन्नों को संस्कार कौन दे रहा है? माँ? दादी माँ? या टी0वी0 और सिनेमा?






- डा0 जगदीश गांधी, प्रसिद्ध शिक्षाविद् एवं
संस्थापक-प्रबन्धक, सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
(1) आज हमारे नन्हें-मुन्नों को संस्कार कौन दे रहा है?:-
                वर्तमान समय मंे परिवार शब्द का अर्थ केवल हम दो हमारे दो तक ही सीमित हुआ जान पड़ता हैं। परिवार में दादी-दादी, ताऊ-ताई, चाचा-चाची, आदि जैसे शब्दों को उपयोग अब केवल पुराने समय की कहानियों को सुनाने के लिए ही किया जाता है। अब दादी और नानी के द्वारा कहानियाँ सुनाने की घटना पुराने समय की बात जान पड़ती है। अब बच्चे टी0वी, डी0वी0डी0, कम्प्यूटर, इण्टरनेट आदि के साथ बड़े हो रहे हैं। परिवार में बच्चों को जो संस्कार पहले उनके दादा-दादीमाँ-बाप तथा परिवार के अन्य बड़ेे सदस्यों के माध्यम से उन्हें मिल रहे थे, वे संस्कार अब उन्हें टी0वी0 और सिनेमा के माध्यम से मिल रहे हैं।
(2) घर की चारदीवारी के अंदर भी बच्चा अब सुरक्षित नहीं है:-
                आज हमने अपने घरों में रंगीन केबिल टी0वी0 के रूप में बच्चों के लिए एक हेड मास्टर नियुक्त कर लिया है। बाल तथा युवा पीढ़ी इस हेड मास्टर रूपी बक्से से अच्छी बातों की तुलना में बुरी बातें ज्यादा सीख रहे हैं। टी0वी0 की पहुँच अब बच्चों के पढ़ाई के कमरे तथा बेडरूम तक हो गयी है। यह बड़ी ही सोचनीय एवं खतरनाक स्थिति है। दिन-प्रतिदिन टी0वी0 के माध्यम से फ्री सेक्स, हिंसा, लूटपाट, निराशा, अवसाद तथा