शनिवार, 18 मार्च 2017

बस्तों के बोझ तले दबता बचपन


   
           
जब सुकुमार छोटे बच्चों को बस्ते के बोझ से झुका स्कूल जाते देखतीं हूँ तो सोचती हूँ कि देश मेरांआजाद हो गया पर भारतीय मानस अभी तक परतन्त्र है क्योंकि अंग्रेज भारत छोड़ गये लेकिन अभिभावकों में अपने बालक को सीबीएसई स्कूल में पढ़ा अव्वल कहलाने की चाह स्वतंत्र भारत में भी पूर्णरूपेण जिंदा है । नौनिहालों को देख बरबस ये पंक्तियां फूट पड़ती है -------
      आज  शिक्षा निगल रही बचपन
बोझ बस्ते का कमर तोड़ रहा
       क्यों करते हो इनसे अत्याचार
भरने दो अब हिरनों सी कूदाल

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

साहसी महिलायें हर क्षेत्र में बदलाव की मिसाल कायम कर रही हैं- प्रदीप कुमार सिंह



             विश्व की साहसी महिलायें हर क्षेत्र में मिसाल कायम कर रही हैं। कुछ ऐसी बहादुर तथा विश्वास से भरी बेटियों से रूबरू होते हैं, जिन्होंने समाज में बदलाव और महिला सम्मान के लिए सराहनीय तथा अनुकरणीय मिसाल पेश की है। देश में डीजल इंजन ट्रेन चलाने वाली पहली महिला मुमताज काजी हो या पश्चिम बंगाल में बाल और महिला तस्करी के खिलाफ आवाज उठाने वाली अनोयारा खातून। ऐसी कई आम महिलाएं हैं जो भले ही बहुत लोकप्रिय न हो लेकिन उन्हें इस साल नारी शक्ति पुरस्कार के लिए चुना गया। राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च को 30 महिलाओं को पुरस्कृत किया। पुरस्कार पाने वालों में नागालैण्ड की महिला पत्रकार बानो हारालू भी शामिल है जो नागालैण्ड में पर्यावरण संरक्षण के लिए काम कर रही है। उत्तराखण्ड की दिव्या रावत ग्रामीणों के साथ मशरूम की खेती को विकसित करने की भूमिका निभा रही है। छत्तीसगढ़ पुलिस में कांस्टेबल स्मिता तांडी ने 2015 में जीवनदीप समूह बनाया जो गरीबों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए आर्थिक मदद करता है।

गुरुवार, 16 मार्च 2017

बड़े भाग्य से मानव शरीर मिला है!-डाॅ. जगदीश गाँधी







-डाॅ. जगदीश गाँधी, शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक,
सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ
(1) मानव जीवन अनमोल उपहार है:-
            आज के युग तथा आज की परिस्थितियों में विश्व मंे सफल होने के लिए बच्चों को टोटल क्वालिटी पर्सन (टी0क्यू0पी0) बनाने के लिए स्कूल को जीवन की तीन वास्तविकताओं भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक शिक्षायें देने वाला समाज के प्रकाश का केन्द्र अवश्य बनना चाहिए। टोटल क्वालिटी पर्सन ही टोटल क्वालिटी मैनेजर बनकर विश्व में बदलाव ला सकता है। उद्देश्यहीन तथा दिशाविहीन शिक्षा बालक को परमात्मा के ज्ञान से दूर कर देती है। उद्देश्यहीन शिक्षा एक बालक को विचारहीन, अबुद्धिमान, नास्तिक, टोटल डिफेक्टिव पर्सन, टोटल डिफेक्टिव मैनेजर तथा जीवन में असफल बनायेगी। तुलसीदास जी कहते है - ‘‘बड़े भाग्य मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सदग्रंथनि पावा।। अर्थात बड़े भाग्य से, अनके जन्मों के पुण्य से यह मनुष्य शरीर मिला है। इसलिए हम इसी पल से सजग हो जाएं कि यह कहीं व्यर्थ न चला जाये। हिन्दू धर्म के अनुसार 84 लाख पशु योनियों में जन्म लेने के बाद अपनी आत्मा का विकास करने के लिए एक सुअवसर के रूप में मानव जन्म मिला है। यदि मानव जीवन में रहकर भी हमने अपनी आत्मा का विकास नहीं किया तो पुनः 84 लाख पशु योनियों में जन्म लेकर उसके कष्ट भोगने होंगे। यह स्थिति कौड़ी में मानव जीवन के अनमोल उपहार को खोने के समान है। यह सिलसिला जन्म-जन्म तक चलता रहता है। 

शुक्रवार, 10 मार्च 2017

राम नाम सत्य है


मेरी मौत 9 जून 2051 को होगी? यह तारीख एक ‘वेब-साइट’ वालों ने मेरे लिये निकाली है! है, भगवान, तेरे घर में भी आज इन ‘आईडेंटिटी थेफ्ट’ वालों ने कुछ सुरक्षित नही छोड़ा! साँठ-गांठ करके अब यह लोग हमारी मौत का रिकॉर्ड भी तुम्हारे यहाँ से ले आये हैं! एक रहस्य था और उसमे भी कितना रोमांच था कि एक दिन मेरी डार्लिंग, मेरे सपनो की रानी, मेरी मौत, मेरे पास आएगी और मुझे सजनी की तरह आकर अपने आगोश में भर लेगी और मैं आनंदित होकर सदा के लिए अपनी आँखें मूँद लूँगा। अब कर लों बात…यह रहस्य और रोमांस भी गया!
सन दो हज़ार इक्वञ्जा के जून महीने के नौवें दिन 24 घंटे के अंदर किसी भी वक्त मुझे मौत आ सकती है! अगर यह कमबख्त मेरे मरने का समय भी बता देते तो मैं उस दिन थोड़ा और सकून से मर जाता..। नहा-धोकर धूप-बती कर लेता .अपनी दाढ़ी-शेव बनाकर समय पर तैयार हो जाता। मेरे घर वाले भी चैन से अपना नाश्ता-लंच कर लेते या फिर अपना खाना-पीना उस घड़ी से कुछ आगे-पीछे कर लेते जब यमदूत अपना वाहन मुझे ढोने के लिए लाने वाले थे! अपने घर वालों से सफर में भूख लगने पर खाने के लिए कुछ ‘टिफन’ में ‘पेक’ करने का आग्रह कर लेता …न जाने कितना लंबा सफर हो…और न जाने कब जाकर किस पहर मुंह के रास्ते पेट में कोई निवाला जाये? कौन जानता है की ऊपर वाले के उधर भी कोर्ट-कचहरी जैसा ही होता हो और घर से अपनी रोटी बांध कर ले जानी होती हो? या

जय बाबा पाखंडी


ऐशो आराम बाबा बड़े बड़े दावे किया करते थे कि वह ईश्वर से साक्षात्कार करते है.भक्तों को भगवान् की कृपा मुहैया करते हैं .लेकिन वह भक्त का किस भगवान् से साक्षात्कार करवाते हैं इसका भंडाफोड़ उन्ही के जब एक भक्त ने किया तो वह सारे इलेक्ट्रोनिक एवं प्रिंट मीडिया वाले जो कभी उनके प्रोग्राम पीक टाइम में टेलीकास्ट करते थे और वर्गीकृत पेज पर उनके विज्ञापन छाप मोटी कमाई करते थे .उनके पीछे पूरी तरह नहा धोकर पड गए .पुलिस ने भी फ़िल्मी पुलिस के ढील का पेंच वाला आवरण उतार पूरी मुस्तैदी से उन्हें व् उनके रंगरसिया पुत्र उर्फ़ लगभग पूरे देश का इल्लीगल जमाई माफ़ करें छेडछाड साईं को तुरंत गिरफ्तार कर लिया छेड़छाड़ साईं तो अपनी घटिया बुद्धि से छेड़छाड़ कर भाग निकलने में कामयाब हो गया मगर भागते चोर की लंगोटी की तरह ऐशो आराम लपेटे में आ गया .बाबा गिडगिडाते हुए अपनी मिमियाती आबाज में अपने भक्तों को भरोसा बनाये रखने की अपील करते हुए यह तर्क दे रहा था “भक्तो बाबा ने तुम्हे परम साक्षात्कार (बलात्कार)करवाया ,निस्संतानो की गोद हरी (या भरी)आपके नीरस जीवन में आत्मिक आनंद का रस प्रदान किया (कौनसा रस?)आप अपने बाबा पर भरोसा रखिये इश्वर जानता है सब देख रहा है (इश्वर से देखा नहीं गया तभी तो तुम्हे जेल पहुँचाया बाबा )”

न उम्र की सीमा हो


आज फिर दिमागी केंचुए कुछ सक्रिय हुए जब नज़र पड़ोस में रहने वाले चुकुंदीलाल जी पर पड़ी, 85 साल के श्री चुकुंदीलाल पुरातत्व विभाग में रखे किसी स्मृति चिन्ह से प्रतीत होते है, 85 साल की बांकी उम्र में नकली दांतों के साथ दन्तुरित मुस्कान बिखेरते अपनी आधी चाँद को जब सहलाते है तो पुराने हीरो बारी बारी मानस पटल पर आकर अपने स्टाइल में मुस्कुराते है ! अभी कुछ महीने पहले ही इस बांकी उम्र में श्री चुकुंदीलाल 26 साल की डॉली (जो अपनी जीरों साइज़ फिगर से सभी के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है, यानी बोले तो पूरे मुहल्ले की आँखों का नूर )….के साथ विवाह के अटूट बंधन में बंधे है, डॉली के शुभ चरण चुकुंदीलाल के उजाड़ जीवन में क्या पड़े चहुँ तरफ हरियाली छा गई है, और उनका बांकपन और निखर आया है, आजकल जनाब डेनिम जीन्स और टी शर्ट में घूमते नज़र आते है, और अपनी हर अदा पर इतराते है, उन्हें देख बेमेल विवाह पर बहुत से प्रश्न हमारे जेहन में मंडराने लगे काले बादलों से …..हमने जब डॉली को देखा तो तपाक से पूछा कि छोटी उम्र के सभी पुरुष क्या वनवास वासी हो गए है ? या कुंवारे कम उम्र युवकों का अकाल पड़ा है ? जो तुमने इतनी उम्र के पुरुष से विवाह किया और उसके बाद कैसे इतनी खुश नज़र आती हो ?

होली के रंग - हास्य कविताओं के संग





जल्दी से कर लीजिये हंसने का अभ्यास
इस बार की होली तो होगी खासमखास
दाँतन बीच दबाइए लौंग इलायची सौंफ
बत्तीसी जब दिखे तो मुँह से आये न बास

                                                                                         होली और हास्य में चोली दामन का साथ है | रंगों और गुझिया के साथ अगर भांग का भी स्वाद हो तो कहने ही क्या  |  टेंशन करने के लिए तोपूरा साल है पर बेवकूफियों पर हंसने का मौका तो एक बार होली पर ही मिलता है , न सिर्फ दूसरों  की बल्कि खुद की |  तो रंगने रंगाने के इस त्यौहार में हम भी पिचकारी ले कर तैयार हैं ............... स्र्र्रर्र्र्रर ... जी हां ! हमारी पिचकारी से निकल पड़े हैं हास्य कविताओं के रंग | आइये आप भी रंग जाइए | आप सही को होली की हार्दिक शुभकामनायें 
      वंदना बाजपेयी

गुरुवार, 9 मार्च 2017

जाएँ तो जाएँ कहाँ





ज्यों ही मकान मालिक ने हमें मकान खाली करने का सुप्रीम ‘ऑर्डर दिया, हमारी तो बोलती ही बंद हो गई। नए सिरे से मकान ढूँढने की फिर से नई समस्या! उफ, नये मालिक अपना मकान किराये पर देने से पहले क्या-क्या शर्ते रखते हैं और कैसे-कैसे सवाल करते हैं। तौबा, मेरी तौबा, मैं बाज़ आया किराये के लिए खाली मकान ढूंढने से! मकान किराए पर देने से पहले यह नामुराद लोग ‘हम छड़ो’ को ऐसे देखते है जैसे ‘हम’ कोई उग्रवादी हों या फिर उनकी जवान लड़की ले उड़ेंगे!
जब से मकान मालिक ने एक महीने में मकान खाली करने का ‘नोटिस’ दिया है तब से मैं तो ठीक से खाना भी नही खा पाया। सब कुछ भूल बैठा हूँ। मेरी ‘लुक’ ऐसी हो गई है जैसे मेरी गाय चोरी हो गई हो! सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि मेरे पास दो हफ्ते का समय रह गया है और अभी तक कोई मनपसंद मकान किसी मनपसंद मोहल्ले में नही दिखा। ‘रंडी के जवाई की तरह’ फिर से घूमना पड़ेगा, मकान की तलाश में! – बस यही एक सौच मुझे खाये जा रही है!

दूरदर्शी दूधवाला


दूध में पानी बहुत होता है, इसके लिए अपने दूधिये को गालियां मत दें बल्कि उस का शुक्रिया करें कि उसने आपको आज तक हृदय-रोग से कुछ हद तक बचाये रखा! विकसित देशों में भी लोग स्वस्थ्या कारणो से एक प्रतिशत या दो प्रतिशत दूध का ही इस्तेमाल करते हैं, बाकी पानी ही होता है।
विदेशों में खालिस दूध (100 प्रतिशत) दूध का इस्तेमाल हम देसी लोग दही बनाने या नहाने (बालों में लगाने) के लिए ही इस्तेमाल करते हैं! अब समझ में आया आपको कि हमारा ग्वाला इन गौरों से कितना ज्यादा समझदार है या था! वर्षों से वह अपनी इस सामाजिक कल्याण की ज़िम्मेवारी को बखूबी निभा रहा है! आपके पूछने पर वह दूध में पानी मिलाकर दूध बेचने की बात को हमेशा नकारता है … आपके फायदे के लिए वह झूठी कसमें खाता है…भला क्यूँ? …क्योंकि वह इस बात में विश्वास करता है — नेकी कर कूएं में डाल!

देश पी. एल . वी ( पुरुस्कार लौटाओ वायरस )की चपेट में




सच का हौसला की विशेष रिपोर्ट
सर्दी का मौसम दस्तक दे चूका है पर अभी भी देश का राजनैतिक तापमान बहुत गर्म है | हमारे विशेष संवाददाता के अनुसार ये जो पुरूस्कार लौटाने का नया चलन चला है | उसने सबको अपनी चपेट में ले लिया है | रोज़ -रोज़ पुरूस्कार लौटाने की ख़बरों से देश के अलग -अलग वर्गों के लोगों पर क्या असर पड़ा है | यह देखने के लिए राष्ट्रीय दैनिक समाचार पात्र “सच का हौसला” की टीम ने देश के हर उम्र , वर्ग के लोगों से बातचीत की | नतीजे चौकाने वाले हैं | आइये आप को भी इस अभूतपूर्व सर्वे की जानकारी दे दे |
सबसे पहले सच का हौसला की टीम बच्चों के स्कूल में गयी | अधिकतर छोटे बच्चे रोते नज़र आये | बच्चों को टॉफ़ी चोकलेट से बहला कर पूंछा तो बच्चे बोले , ” आंटी ये पुरूस्कार लौटने वाले लोग अच्छे नहीं हैं | क्यों के उत्तर में बच्चे सुबकते हुए बोले ,” पहले तो हमें केवल उन्ही लोगों के नाम याद करने पड़ते थे जिन्हें पुरूस्कार मिला था अब उनके भी रटने पड़ेंगे जिन्होंने लौटाए |

कवि और कल्पना


कविता भी क्या चीज़ है! कल्पना की उड़ान कवि को किसी दूसरी ही दुनियाँ मे पंहुचा देती है। एक कवि की दुनियाँ और एक उस व्यक्ति की दुनियाँ! यह इंसान कभी भी एक दुनियाँ से निकल कर दूसरी दुनियाँ मे ऐसे आता जाता रहता है, जैसे कोई एक कमरे से दूसरे कमरे मे जाता हो। मनोविज्ञान की कुछ अधकचरी जानकारी होने से मुझे कभी कभी लगता है कि कंहीं कुछ कवि स्प्लिट पर्सनैलिटी के विकार से तो ग्रसित नहीं होते। ठहरिये, मै उदाहरण देकर समझाती हूँ।
हमारे एक भाई समान कवि मित्र हैं ,बहुत ही सुन्दर मर्मस्पर्शी कविता लिखते हैं। शब्दों का ऐसा जाल बुनते हैं कि पढ़ते ही वाह! क्या ख़ूब लिखा है, ज़बान पर आ जाता है। श्रंगार के वियोग पक्ष मे उन्हे महारथ हासिल है। दअरसल वो कभी किसी चौराहे पर किसी से बिछड गये थे, कई दशक पहले, पर कविता भाई साहब अभी तक उनही पर लिख रहें हैं। अरे भई, जिसके साथ आप ख़ुशहाल ज़िन्दगी बिता रहे, जो आपकी पत्नी है, आपके बच्चों की माँ है उस पर क्यो कुछ नहीं लिखते तो वो कहते हैं। –

मेरी बत्तीसी


चौराहे पर दो लड़के लड़ रहे थे। एक ने दूसरे को धमकी दी , “ओये, चुप कर जा…नही तां इक ऐसा घुसुन्न दऊँ कि तेरे छती-दे-छ्ती दंद बाहर आ डिगन गे!”
वही खड़े एक तमाशखोर ने जब यह सुना तो उसने आग में घी डाला, “ओये मुरखा तेनु एह वी नही पता कि साडे बती दंद होनदे ने, छत्ती नही …!”
तो पहला बोला, “मेनू एह पता है…नाले मैनू पता सी, तू वी मेरे नाल पंगा लेंगा…एस करके मैं ‘चार दंद तेरे वी गिन के उसनू दस्से ने!”
दाँतो के डाक्टर के पास जाने का समय बेगम ने ही लिया था। डॉक्टर ईलाज के लिए चार सौ डालर मांग रहा था लेकिन रामदुलारी फीस कम करवाने के लिये उससे सक्रिय रूप से बातचीत कर रही थी! वह उसे पचास डालर लेने के लिये रज़ामंद कर रही थी। लेकिन डाक्टर 75 डालर पर अटका पड़ा था।
डाक्टर का कहना था,” मेम, एक शर्त पर मैं पचास डालर ले सकता हूँ …दाँत निकालने से पहले दर्द की कोई दवा नही दूँगा …फिर उसने व्याख्या की – दर्द की दवा बहुत महंगी है, इतने पैसों में तो मैं मरीज को दाँतो को सुण करने वाली दवा की एक बूंद भी नही दे सकता। मरीज दर्द से चीखेगा, चिलायेगा, तड़फेगा, पीड़ा के मारे ‘डेंटल चेयर’ से उठ उठ कर बाहर आयेगा, बिना धड़ वाले मुर्गे की तरह छटपटायेगा… यह तो मरीज के साथ ज़ुल्म होगा और हाँ मेरी सेक्रेटरी मंजु दाँत निकालेगी जिसने इससे पहले कभी किसी का दांत नही निकाला …अब पीड़ा का आप खुद अंदाज़ा लगा लें!”

क्या मेरी रजा की जरूरत नहीं थी ?


तीन तलाक पर आधारित कहानी 



उफ़ ! क्या दिन थे वो | जब बनी थी तुम्हारी शरीके हयात | तुम्हारे जीवन में भरने को रंग सुर्ख जोड़े में किया था तुम्हारे घर में प्रवेश , जीवन भर साथ निभाने के वादे के साथ | पूरे परिवार के बीच बैठे हुए जब – जब टकरा जाती थी तुमसे नज़र तो मारे हया के मेरे लिबास से भी ज्यादा सुर्ख लाल हो जाते थे मेरे गाल …… और बन जाता हमारे बीच एक अनदेखा सा सेतु | जिसमें बहता था हमारा प्रेम निशब्द और मौन सा | पर सब के बीच बात करे तो कैसे ? फिर नौकरी की जद्दोजहद में तुम्हारा घर से दूर जाना | बात होती भी तो कैसे | मैं यहाँ तडपती और तुम वहां | समाधान तुम्ही ने निकाला था | | जब मेरे जन्मदिन पर तोहफे के रूप में मेरी हथेली पर रख दिया था तुमने एक मोबाइल और मुस्कुरा कर कहा था | अब बस हमेशा मैं तुमसे एक घंटी की दूरी पर रहूँगा | सही कहा था तुमने जब भी घंटी बजती | बज उठते थे दो दिल | बज उठते थे जज्बातों के हजारों सितार |बज उठता था हमारे तुम्हारे बीच का प्रेम | होती थी घंटों बातें |

सास पसंद नहीं करती तो इसमें महिलाओं की गलती नहीं





हाल ही में चेतन भगत द्वारा भारतीय महिलाओं के लिए लिखा गया पत्र, सोशल मीडिया पर खासा वायरल हो रहा है। यह पत्र दरअसल एक अध्ययन की रिपोर्ट के जवाब में लिखा गया है, जिसमें यह खुलासा किया गया है कि भारतीय महिलाएं, विश्व की अन्य महिलाओं की तुलना में सबसे ज्यादा तनाव में होती हैं। चेतन भगत का कहना है कि हम महिलाओं के साथ क्या कर रहे हैं, मैं पक्ष ले रहा हूं, लेकिन भारतीय महिलाएं दुनिया की सबसे खूबसूरत महिलाएं हैं। एक मां, बहन, बेटी, सहकर्मी, पत्नी या प्रेमिका के रूप में हम उन्हें प्रेम करते हैं। क्या आप महिलाओं के बगैर जीवन की कल्पना कर सकते हैं? जानें, कौन सी 5 सलाह दी चेतन भगत ने महिलाओं को…

फंदे - फंदे बुनती है प्यार


गर्मी का दरवाज़ा बंद होते ही आसमान के झरोखे से उतर आई है गुलाबी सर्दी | जिसके आते ही पुराने दीवान कुलबुलाने लगे | फिर से निकल आये स्वेटर , कम्बल और रजाइयां और साथ ही साथ पिछले साल संभाल कर रखी गयी सलाइयाँ |खरीद कर आ गई नयी ऊन | फिर से पड़ गए फंदे कुछ उलटे कुछ सीधे , मिलाये जाने लगे रंग , कुछ चटख कुछ शांत , चंचल हो उठी मौन अंगुलियाँ , सरपट दौड़ती लगी किसी संगतराश की तरह , ढालने लगी आकार आकार , पत्थर से नहीं मुलायम धागों से ……… और बुने जाने लगे स्वेटर |

आखिर क्यों छुपाती है महिलायें पैसे


मोदी सरकार द्वारा बड़े नोटों को बंद करने के फैसले के बाद लोग अपने घर में रखे ५०० व् हज़ार के नोटों को गिनने में लग गए | हर व्यक्ति की कोशिश यह थी की इन नोटों को एक जगह इकट्ठा करके या तो बदला जाए या बैंक में जमा किया जाए | इसी खोजबीन में घर की महिलाओ द्वारा साड़ी की तहों में , चूड़ी के डिब्बों में , रसोई की दराजों में रखे गए नोट भी घर के पुरुषों को सौंपे गए | बस घरों में उन् नोटों का मिलना था की घर के पुरुषों ने उसे मजाकिया लहजे में काला धन करार दे दिया | सोशल मीडिया पर भी हास – परिहास के किस्से आते रहे | तमाम कार्टून अपने तथाकथित रूप से घर की महिलाओं द्वारा छुपाये गए काला धन के निकल जाने पर बनाए जाते रहे | महिलाओ ने भी अपने ऊपर बने इन व्यंगों को खुल कर शेयर किया | परन्तु अगर एक स्त्री के नज़रिए से देखूँ तो इस तरह महिलाओं द्वारा आपदा प्रबंधन के लिए जमा की गयी राशि को काला धन करार देना सर्वथा गलत है |

तला राशि -कोड़े खाने की सजा पाने के बाद जीता फीयरलेस वुमैन का ख़िताब




औरतें आज जिस बंद अँधेरे तहखाने से नुकल कर आज़ादी की सनस लेने की दिशा में अगसर हुई हैं | उसके पीछे कई औरतों का हाथ है | ये वो औरतें हैं जिन्होंने सामाजिक नियमों की अवहेलना करते हुए | वो काम करने की हिम्मत दिखाई जिसके लिए न सिर्फ उन्हें रोका गया बल्कि सजा भी सरेआम दी गयी |

तीन तलाक - औरतों और तक्की पसंद पुरुषों को स्वयं आगे आना होगा


तीन तलाक एक ऐसा मुद्दा जिस पर आजकल बहुत कुछ बोला जा रहा है , लिखा जा रहा है और जब मैंने इस पर कलम उठाने की कोशिश की तब मेरे जेहन में न कोई धर्म था , न सम्प्रदाय अगर थी तो सिर्फ और सिर्फ औरतें | उनमें कुछ वो भी थी , जो लोगों के लिए अखबार की खबर थी पर मैं उन्हें करीब से जानती थी | जानती थी उनके आंसूं उनका दर्द और तलाक के बाद की उनकी तकलीफें |वास्तव में तलाक , तलाक , तलाक …. तीन शब्द नहीं तीन खंजर हैं जो एक रिश्ते एक पल में क़त्ल कर देते हैं |यह सच है की तलाक एक बहुत जरूरी और लोकतान्त्रिक अधिकार है जो किसी नाकाम रिश्ते पर उम्र भर आंसूं बहाने से ज्यादा बेहतर है | जहाँ दोनों को आगे अपनी जिंदगी संवारने का बराबर हक़ दिया जाता है |पर अगर ये अधिकार एक तरफ़ा हो जाए तो ?आज विभिन्न समुदायों में तरक्की होने के साथ ही लैंगिक समानता की बातें बढ़ी हैं | समुदाय कोई भी हो महिलाओं को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है |

जिस देश में औरत की ना को हाँ समझना सिखाया जाता हो वहां “पिंक ” रेड सिग्नल में कैसे बदलेगी ” सहगल बाबू “



पिंक फिल्म देकहते हुए जैसे मेरी समाधी लग गयी थी | एक एक दृश्य प्रभाव् में डूबते उतराते हुए फिल्म का आखिरी डायलाग” ना का मतलब ना होता है, ना अपने आप में पूरा वाक्य है, जिसे किसी तरह के तर्क, स्‍पष्टीकरण या व्याख्या की ज़रूरत नहीं होती, न मतलब स़िर्फ न होता है।” दिल पर एक गहरी चाप छोड़ गया | कितनी सच्चाई , कितनी इमानदारी और कितनी दमदार आवाज़ में अमिताभ बच्चन ने यह बात कह दी | हाल से बाहर निकलते समय फिल्म का एक हैंगोवर सा हो गया | शायद बाहर निकलती हुई हर औरत को हुआ होगा तभी तो सब सर ऊँचा कर के चल रहीं थी | जैसे सहगल सर ने कोर्ट में उन्हें भी ना कहने का अधिकार दिला दिया हो | एक ऐसा अधिकार जो भारतीय नारी के लिए दिवा स्वप्न ही है | तभी तो जब किसी के मोबाइल की रिंग टन बजी
” आ चल के तुझे मैं ले के चलूं एक ऐसे गगन के तले ,
जहाँ गम भी न हो आंसूं भी न हों बस प्यार ही प्यार पलें “||

तो मेरे साथ न जाने कितनी महिलाएं अर्श से फर्श पर आ गयीं | सच भारतीय महिलाओं के लिए न कहने का अधिकार एक दिवा स्वप्न ही तो है | आज महिलाएं शहरी क्षेत्रों में आत्म निर्भर हो रहीं हैं | शायद कुछ हद तक उन्हें न कहने का अधिकार मिला हो | पर आम भारत जो गाँवों कस्बो और छोटे शहरों में बसता है | वहां दैहिक संबंध तो छोडिये महिला के लिए किसी बात में न कहना आसान नहीं होता |

गुडिया , माटी और देवी


आज जिसके बारे में लिखने जा रही हूँ वह महज एक खबर थी , अखबार के कोने में | मात्र कुछ पंक्तियों की पर मेरे लिए वो मात्र एक खबर नहीं रह पायी | न जाने क्यों मैं उसके दर्द से खुद को अलग नहीं कर पायी | अन्दर की बेचैनी कहती उसके बारे में कुछ लिखू | शायद कोई उसका दर्द समझ सके | शायद समाज कुछ बदल सके | पर उसके दर्द को शब्द देना मेरे लिए आसान न था | इसीलिये अब जो कहेगी वो स्वयं कहेगी ….
क्या कहूँ ,अपने बारे में कुछ लिखने से पहले अपना परिचय देना जरूरी होता है | परिचय में सबसे ऊपर होता है नाम , जो किसी भी अपने द्वारा रखा हुआ और अपनों के लिए बहुत प्यारा होता है | पर जिसका कोई भी अपना न हो उसके लिए नाम के होने न होने का महत्व ही नहीं रहता | यादों के धुंधलके में याद आते हैं अम्मा और बाबा | जो मुझे लाड से गुडिया कहते थे | जीती जागती गुडिया | नटखट , चंचल , हंसमुख गुडिया | जो मासूम थी जिसे विरोध करना नहीं आता था | जिसके प्रश्न जब तब समाज द्वारा ,” चुप रहो “ कह कर दबा दिए जाते और वो चुपचाप यथा स्तिथि स्वीकार कर लेती | क्योंकि उसे वही सोचना था करना था , रहना था जो समाज ने उसके लिए निर्धारित कर दिया था | जो भी हो उस गुडिया में उसके माता पिता की जान बसती थी | बहुत शौक था उसे बाज़ार देखने का |

स्त्री विमर्श का दूसरा पहलू




एक तरफ समाज की यह बिडम्बना है …!जहाँ दहेज जैसे समस्याओं को लेकर , ससुराल वालों के द्वारा , तरह तरह से महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार हो रही हैं …….!.सिसकती है उनकी जिन्दगी ….!.और कभी कभी तो क्रूरता इतनी चरम पर होतीं है , कि छिन जाती है स्वतंत्रता और सरल भावनाओं के साथ साथ उनकी जिन्दगी भी ….! कड़े कानून बने हैं , फिर भी नहीं रुक रहा है ..! स्त्रियों के साथ क्रूरता बढता ही जा रहा है …! बढता जा रहा है उनके साथ दिनोदिन अत्याचार…….!. नहीं सुरक्षित हैं उनके अधिकार……..!.चाहे जितना भी नारी शक्तिकरण की बातें क्यों न हम कर ले……..!चाहे जितने भी कानून क्यों न बने !
वहीं समाज का एक दूसरा सत्य पहलू यह भी है कि , बहुओं के द्वारा भी उनके ससुराल वाले अत्यंत पीडित हैं ..! जिसपर ध्यान कम ही लोगों का जा पाता है…. … !जहाँ महिलाएं अपने मिले हुए अधिकारों का समूचित दुरूपयोग कर रही हैं…….! जो कानूनी हथियार उनकी सुरक्षा के लिए बने होते हैं , उसे वह बेकसूर ससुराल वालों के खिलाफ धडल्ले से इस्तेमाल कर रही हैं ..!.झूठा मुकदमा दर्ज कराकर , धज्जियां उड़ा रही हैं ससुराल वालों की इज्जत प्रतिष्ठा की…….! शायद ऐसी ही स्त्रियों के लिए महाकवि तुलसीदास ने लिखा होगा …!
ढोल गंवार शुद्र पशु नारी ]
ये सब तारन के अधिकारी ]]

नारी ~ब्रह्मा , विष्णु, महेश तीनों की भूमिका में


पंकज “प्रखर ”
कोटा ,राजस्थान
नारी का व्यक्तित्व बहुत ही अद्भुत है | हमारे देश भारत ऐसी अनगिनत नारियों सेसुसज्जित है जिन्होंने अपने त्याग और तपस्या से देश के नाम को उनंचा किया है | माता के रूप में  इस देश को विवेकनन्द, महर्षि रमण ,अरविन्द घोष ,रामकृष्ण परमहंस ,दयानंद ,शंकराचार्य ,भगत सिंह ,चन्द्र शेखर आज़ाद,सुभाष बाबु,वीर सावरकर जैसे महापुरुषों से अलंकृत किया है | ये देश आज भी गार्गी मदालसा,भारती,विध्योत्त्मा,अनुसूया,स्वयंप्रभा,सीता, सावित्री जैसी सतियों और विदुषियों को नही भूल पाया है |

दर्द भरी दास्तान – उन महिलाओं की जो भोगती हैं हर साल रेप / निकलवाने पड़ते हैं गर्भाशय




महाराष्ट्र में गन्ने की कटाई करने वाले मजदूरों के साथ जो होता है, उसे पढ़कर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे. उनके साथ हर साल इस हद तक रेप होता है कि गर्भाश्य निकलवाने पड़ते हैं |मॉनसून के बाद हर साल गौरी भिवड़े और उनके पति दसियों हजार लोगों के साथ गन्ने की कटाई का काम करने के लिए महाराष्ट्र के पश्चिमी जिलों में चले जाते हैं. और हर साल गौरी और उनके जैसी सैकड़ों महिलाओं का यौन शोषण होता है. गौरी बताती हैं कि हां, ऐसा तो हर साल होता है.
एक बार गौरी को प्रेग्नेंसी में बहुत दिक्कतें झेलनी पड़ीं. इसके बाद डॉक्टर ने उनसे कहा कि गर्भाश्य निकाल देते हैं ताकि आइंदा दिक्कत ना हो.
महाराष्ट्र में गन्ने की कटाई के लिए जाने वालीं महिलाएं साल दर साल बलात्कार झेल रही हैं.

मंगलवार, 7 मार्च 2017

सफलता और औरतें



बुजुर्गों के दिल मे घर कर गई भावना :भावना का 17 वां वार्षिक महाधिवेशन संपन्न





लखनऊ -(संजीव कुमार शुक्ल) उत्तर प्रदेश में माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण पोषण तथा कल्याण अधिनियम 2007 एवं उत्तर प्रदेश माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरण पोषण तथा कल्याण नियमावली 2014 तथा उत्तर प्रदेश राज्य वरिष्ठ नागरिक नीति के प्राविधानों को एन केन प्रकारेण यथाशीघ्र पूर्णतः लागू कराने की भावना को लेकर ही भावना समिति ने अपना 17 वां वार्षिक महाधिवेशन राय उमा नाथ बली पे्रक्षागृह में संपन्न किया। इस अवसर पर भावना सदस्यों के साथ साथ वरिष्ठ नागरिकों की तथा उनका ही चिंतन करने वाली कई अन्य संस्थाओं के पदाधिकारी भी उपस्थित थे।

आलोचना पर ओमकार मणि त्रिपाठी के 11 अनमोल विचार




सोमवार, 6 मार्च 2017

उ त्तर प्रदेश के कारागार मंत्री बलवंत सिंह रामूवालिया से ओमकार मणि त्रिपाठी की विशेष बातचीत





उ त्तर प्रदेश के कारागार मंत्री बलवंत सिंह रामूवालिया से विशेष साक्षात्कार
पदों का संक्षिप्त ब्यौरा
महासचिव- स्टूडंेट फेडरेशन आॅफ इंडिया (1963.64)
अध्यक्ष-अखिलभारतीय सिख छात्र संघ (1968 .1972) व पंजाबी भलाई मंच
प्रचार सचिव-शिरोमणि अकाली दल (1975.77. 1980 .82)
महासचिव-शिरोमणि अकाली दल (1985.87)
नेता शिरोमणि अकाली दल ग्रुप-आठवीं लोकसभा
केन्द्रीय मंत्री-समाज कल्याण विभाग (1996-98)
राजनीतिक सफर
बलवंत सिंह रामूवालिया का जन्म 15 मार्च, 1942 को पंजाब के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। उनके पिता श्री करनैल सिंह पारस एक सुविख्यात कवि थे। पिता से विरासत में मिला भावुक हृदय बचपन से ही लोगों के दुःख-दर्द को देखकर व्यथित हो जाता। गरीब, बेसहारा और बेबस लोगों के लिए कुछ ठोस कदम उठाने चाहिए, ये बात उन्हें हर पल बेचैन करती और इसके लिए उन्होंने राजनीति का वो मार्ग चुना, जो त्याग और सेवा के रास्ते पर चलता है।

ऊर्जावर्धक होती है सकारात्मक और सार्थक सोच





हमारे जीवन की वर्तमान दशा और दिशा ही हमारा भविष्य तय करती हैं. इंसान सोचता मन से है और करता अपने तन से है  यानी जीवन की सरिता तन और मन जैसे दो किनारों के बीच बहती रहती है.मन के अंदर के विचार ही बाह्य जगत में नवीन आकार ग्रहण करते हैं। जो कल्पना चित्र अंदर पैदा होता है, वही बाहर स्थूल रूप में प्रकट होता है। सीधी-सी बात है कि हर विचार पहले मन में ही उत्पन्न होता है और मनुष्य अपने विचार के आधार पर ही अपना व्यवहार निश्चित करता है।
विचारों का हमारे जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है.सुख-दुःख , हानि-लाभ,उन्नति-अवनति,सफलता-असफलता, सभी कुछ हमारे अपने विचारों पर निर्भर करते हैं। जैसे विचार होते हैं,वैसा ही हमारा जीवन बनता है। संसार कल्पवृक्ष है, इसकी छाया तले बैठकर हम जो विचार करेंगे, वैसे ही परिणाम हमें प्राप्त होंगे। जिनके दिलो-दि

निराश लोगो के लिए आशा की किरण लेकर आता है वसंत

जनवरी की कडकडाती सर्दी फरवरी में धीरे-धीरे गुलाबी होने लगती है.इसी महीने में ऋतुराज वसंत का आगमन होता है और वासंती हवा जैसे ही तन-मन को स्पर्श करती है,तो समस्त मानवता शीत की ठिठुरी चादर छोड़कर हर्षोल्लास मनाने लगतीहै,क्योंकि जिस तरह से यौवन मानव जीवन का वसंत है,उसी तरह से वसंत इस सृष्टि का यौवन है,इसीलिये वसंत ऋतु का आगमन होते ही प्रकृति सोलह कलाओ में खिल उठती है. पौराणिक कथाओ में वसंत को कामदेव का पुत्र कहा गया है.
शायद इसीलिये रूप और सौन्दर्य के देवता कामदेव के पुत्र का स्वागत करने के लिए प्रकृति झूम उठती है.पेड़ उसके लिए नवपल्लव का पालना डालते हैं,फूल वस्त्र पहनाते हैं,पवन झुलाती है और कोयल उसे गीत सुनकर बहलाती है.